बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का राष्ट्र निर्माण में अन्यतम योगदान है। आमतौर पर लोगों उन्हें वंचित वर्गों का मसीहा और भारतीय संविधान के निर्माता के रूप में याद करते हैं किंतु उनका योगदान और भी बहुत है जो उन्होंने देश की आजादी के पहले ही इस देश के बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए किया था। उन्होंने 1942 से 1946 तक वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम सदस्य के रूप में काम किया जिसे आमतौर पर श्रम मंत्री कहा जाता है। इस पद पर रहते हुए उन्होंने भारत के श्रम कानूनों की नींव रखी, जैसे - 14 घंटे के कार्यदिवस को 8 घंटे का करना, बिना लैंगिक भेदभाव के समान वेतन, महिलाओं के लिए प्रसूति लाभ, फैक्ट्री एक्ट में सुधार और ट्राइपार्टाइट लेबर कॉन्फ्रेंस आदि। उनका यह काम श्रमिकों और महिलाओं की दृष्टि से देखा जाए तो भारत के परिप्रेक्ष्य में अभूतपूर्व, क्रांतिकारी और महनतम था। भारत के वंचित वर्गों और आधी आबादी के रूप में महिलाओं से मिलजुल कर बना हुआ यह विशाल वर्ग उनका सदैव कृतज्ञ रहेगा।
(1942 में वायसराय वेवेल की ब्रिटिश परिषद में श्रम मंत्री के रूप में शामिल डॉ अंबेडकर)
1942 के ब्रिटिश काउंसिल में डॉ भीमराव अंबेडकर के श्रम विभाग के अंतर्गत सिंचाई, जल संसाधन, बिजली भी थे। इसके तहत उन्होंने नदी घाटी परियोजनाओं जैसे - दामोदर, हीराकुंड, कोसी आदि से संबंधित नीति निर्माण और योजनाओं और के आधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जिस पर ज्यादा बातें नहीं होती। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने श्रम विभाग के अंतर्गत भारतीय जल संसाधन नीति की नींव रखी और बड़े-बड़े बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं की शुरुआत की थी जिसे आधार पर भारत में हरित क्रांति और अन्य विकास के तमाम कार्यक्रम सफल रूप में आज हमें दिखाई देते हैं।
(श्रम मंत्री के रूप में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर श्रम आयुक्तों को संबोधित करते हुए)
बहुउद्देशीय नदी घाटी विकास की अवधारणा बाबा साहब
ने अमेरिका की Tennessee Valley Authority मॉडल से प्रेरित होकर बनाई थी। उन्होंने
पहली बार भारत में नदी घाटी को एक इकाई मानकर उसके बहुउद्देशीय विकास की नीति बनाई
जिसमें बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, बिजली उत्पादन, नौवहन, घरेलू जल आपूर्ति आदि शामिल थे।
डॉ. भीमराव अंबेडकर के श्रम मंत्री रहते भारत की प्रमुख परियोजनाओं में उनके योगदान
को विभिन्न परियोजनाओं में देखा जा सकता है -
◾दामोदर घाटी परियोजना -
(दामोदर घाटी परियोजना)
◾ हीराकुद बांध महानदी परियोजना - ओडिशा में महानदी पर बहुउद्देशीय परियोजना में तकनीकी डिजाइन और इंजीनियरिंग डॉ. एम. विश्वेश्वरैया (प्रारंभिक सुझाव) का था जिसकी डॉ. ए.एन. खोसला ने विस्तृत योजना और कार्यान्वयन की जिम्मेदारी निभाई थी किन्तु डॉ अंबेडकर ने श्रम मंत्री रहते इस परियोजना के नीति निर्माण, समन्वय और राष्ट्रीय स्तर पर मंजूरी का निर्वाहन किया। उन्होंने परियोजना को बहुउद्देशीय बनाने का फ्रेमवर्क दिया, केंद्र-राज्य बैठकें आयोजित कीं और CWINC जैसी संस्था के माध्यम से तकनीकी आधार तैयार किया। परियोजना का निर्माण स्वतंत्र भारत में (1948 से शुरू होकर 1957 में पूरा) हुआ, लेकिन इसकी नींव और बहुउद्देशीय रूपरेखा अंबेडकर के श्रम सदस्य काल (1944-46) में ही रखी गई थी। उन्होंने इसके लिए 1945 में कटक में सम्मेलन की अध्यक्षता की थी। हीराकुद बाँध दुनिया का सबसे लंबा (5 किलोमीटर) मिट्टी का बांध है, जो सिंचाई और बिजली के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इस बांध का कुल क्षेत्र 26 किलोमीटर का है जिसके तहत वर्तमान में 4,36,000 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होती है।
(हीराकुद बाँध)
◾सोन नदी घाटी परियोजना - सोन नदी पर बहुउद्देशीय विकास की योजना बाबा साहब के प्रयासों से शुरू हुई। हालांकि यहाँ पर पहले ही 1874 में डेहरी एनीकट जो ब्रिटिश काल की पुरानी सिंचाई व्यवस्था के रूप में मौजूद थी। किंतु उसका विस्तार करना था इसलिए 1944-46 में उन्होंने इसके लिए बतौर श्रम मंत्री बहुउद्देशीय रूपरेखा, नीति निर्माण, केंद्र-प्रांत समन्वय और संस्थागत ढांचा (CWINC आदि) प्रदान किया और सोन नदी घाटी को आधुनिक बहुउद्देशीय परियोजना के रूप में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका यह योगदान दामोदर, हीराकुंड और कोसी जैसी अन्य परियोजनाओं के समान है जहाँ उन्होंने तकनीकी डिजाइन नहीं किया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर बहुउद्देशीय फ्रेमवर्क और नींव रखी। इस परियोजना को केवल सिंचाई तक सीमित नहीं रखा गया बल्कि नहरों से सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, स्थायी जलविद्युत उत्पादन, कृषि विकास (ट्यूबवेल पंपिंग और जलभराव वाले क्षेत्रों में ड्रेनेज), औद्योगिक विकास के लिए सस्ती बिजली, और गंगा क्षेत्र में बेहतर जल आपूर्ति के उद्देश्यों को रखा गया। 1944-46 के दौरान श्रम विभाग के अंतर्गत इसकी योजना को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया गया।
(कोसी बाँध)
◾भाखड़ा-नांगल परियोजना - भाखड़ा-नांगल परियोजना की मूल परिकल्पना सर छोटू राम (तत्कालीन पंजाब के राजस्व मंत्री) की देन मानी जाती है। उन्होंने 1923 में ही इसकी अवधारणा दी थी और 1944 में बिलासपुर के राजा के साथ समझौता (agreement) किया तथा 8 जनवरी 1945 को परियोजना की योजना को अंतिम रूप दिया था पर डॉ. भीमराव अंबेडकर जो उस समय वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम सदस्य थे, ने इस परियोजना को आधुनिक बहुउद्देशीय रूप देकर राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाया था। उन्होंने 1942-46 के दौरान उन्होंने भाखड़ा बांध परियोजना को प्राथमिकता दी। उन्होंने इसके लिए 1944 में उन्होंने United States Bureau of Reclamation के विशेषज्ञ जे. एल. सावेज को आमंत्रित किया। सावेज ने साइट का निरीक्षण किया और सिफारिश की कि बांध का अधिकतम जल स्तर 487.68 मीटर तक रखा जा सकता है। उन्होंने बाँध की नींव और अन्य तकनीकी सलाह भी दी थी। परियोजना का बुनियादी कार्य 1945-46 में बाबा साहब के कार्यकाल में ही पूरा हुआ जिसका उद्देश्य भाखड़ा नांगल को बहुउद्देशीय फ्रेमवर्क देना था जिसमें बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान), जलविद्युत उत्पादन और क्षेत्रीय आर्थिक विकास किया जाना था। इस परियोजना का निर्माण कार्य स्वतंत्र भारत में (मुख्यतः 1948 के बाद) तेजी से हुआ और 1963 में जवाहरलाल नेहरू द्वारा राष्ट्र को समर्पित किया गया। भाखड़ा-नांगल परियोजना सतलज नदी पर स्थित बहुउद्देशीय परियोजना है जिसमें भाखड़ा बांध हिमाचल प्रदेश में और नांगल बैराज पंजाब में बनाया गया।
(भाखड़ा नांगल बांध : निर्माण कार्य के दौरान)
गौरतलब है कि इन विशाल और महान परियोजनाओं का आधार
उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य में रहते किया था। इन बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं
के अलावा डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने श्रम मंत्री रहते अन्य संबंधित संस्थागत योगदान
दिया है जो आज के विकसित भारत की नींव है। डॉ आंबेडकर के इन कार्यों को इस तरह देखा
जा सकता है -
◾केंद्रीय जलमार्ग, सिंचाई और नौवहन आयोग
(CWINC) -इसकी स्थापना डॉ भीमराव अंबेडकर ने मार्च 1944 में किया गया जिसे आज हम केंद्रीय जल आयोग (CWC) के नाम से जानते हैं जो देश की जल नीति, बांधों और सिंचाई परियोजनाओं का मुख्य तकनीकी सलाहकार संगठन है। इस संगठन का उद्देश्य है - बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, नौवहन, पेयजल आपूर्ति और जल विद्युत विकास जिसे केंद्रीय जल आयोग निरंतर पूरा करने में लगा हुआ है।
◾केंद्रीय तकनीकी विद्युत बोर्ड - डॉ अंबेडकर के प्रयासों से यह बोर्ड बिजली विकास के लिए बनाया गया जो बाद में Central Electricity Authority बना। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (Central Electricity Authority - CEA) भारत सरकार के विद्युत मंत्रालय के अधीन एक सांविधिक संगठन है। इसकी स्थापना मूल रूप से 1951 में हुई थी जिसे बाद में 1975 में पुनर्गठित किया गया। इस प्राधिकरण के मुख्य काम है - सलाह देना , योजना बनाने और तकनीकी मानक तय करने का है। इसके कार्य विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 73 के तहत परिभाषित हैं जो निम्न कार्य करते हैं - नीति और योजना संबंधी कार्य, तकनीकी मानक तय करना, सलाहकारी भूमिका - यह केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और विद्युत नियामक आयोगों (CERC, SERCs) को उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण से संबंधित सभी तकनीकी मामलों पर सलाह देना है। इसके अलावा यह अन्य महत्वपूर्ण कार्य जैसे - बिजली परियोजनाओं की निगरानी और समय पर पूरा होने की समीक्षा। बिजली क्षेत्र का डेटा संग्रह, विश्लेषण और प्रकाशन, सुरक्षा नियम बनाना और लागू करना, मानव संसाधन विकास और कौशल उन्नयन में मदद करना, नई तकनीकों पर अध्ययन और सिफारिशें देना और राष्ट्रीय विद्युत योजना जारी करना है।
इन संस्थागत योजनाओं ने देश को भविष्य में नीतिगत
और संवैधानिक योगदान दिया। इससे अखिल भारतीय स्तर पर जल और बिजली संसाधनों की स्पष्ट
नीति बनाई गयी। इसके साथ ही उन्होंने नदी घाटी प्राधिकरण की अवधारणा दी। इसी क्रम में
बाद में संविधान में अनुच्छेद 262 जोड़ा गया, जो अंतर-राज्यीय नदी विवादों के निपटारे
से संबंधित है। इसके अलावा संविधान की सातवीं अनुसूची में जल संबंधी प्रविष्टियों में
संशोधन कर कुछ विषय केंद्र को दिए। आज पिछले लगभग 80 सालों में इन संस्थाओं द्वारा
किए गए कार्य, विस्तार और उससे विकास की ऊंचाइयों तक पहुंचे इस देश को देख पाते हैं
तो उसकी नींव में डॉ. भीमराव अंबेडकर का महान योगदान है।
(श्रम मंत्री के रूप में 1942 में धनबाद कोयला खदान
में लोगों से बात करते हुए डॉ अंबेडकर)
बाबा साहब का मानना था कि जल संसाधनों का वैज्ञानिक और समन्वित उपयोग होना चाहिए ताकि बाढ़, सूखा कम हो और कृषि, उद्योग तथा बिजली का विकास हो। उन्होंने प्रांतों (राज्यों) के बीच सहयोग पर जोर दिया। इसलिए बाबा साहब को 'Water Man of India' भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने स्वतंत्र भारत की सिंचाई और जल प्रबंधन की आधुनिक नीति की नींव रखी। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 2014 में कहा था कि बाबा साहेब लगभग अकेले ही CWINC, Central Technical Power Board और राष्ट्रीय पावर ग्रिड की स्थापना के लिए जिम्मेदार थे। इसी तरह डॉ. अंबेडकर के योगदान के लिए उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2016 में उन्हें ‘water and river navigation पालिसी का आर्किटेक्ट’ कहा था। यह नदी घाटी परियोजनाएं सिंचाई और विद्युत उत्पादन का काम उसे समय के गरीब देश में सर्व प्रमुख आवश्यकता थी जिसके आधार पर आज का यह भारत खड़ा है। इसीलिए प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इन नदी घाटी परियोजनाओं को ‘आधुनिक मंदिर’ कहा करते थे।
CWINC की स्थापना बाबा साहेब की जल संसाधन विकास में सबसे बड़ी देन है। उन्होंने केवल एक आयोग नहीं बनाया, बल्कि स्वतंत्र भारत की आधुनिक जल नीति की नींव रखी, जिससे लाखों एकड़ भूमि को सिंचाई, बिजली और बाढ़ सुरक्षा मिली। यह कार्य उनके श्रम मंत्री काल के हिस्से थे, जिसमें सिंचाई को अलग विभाग के रूप में नहीं, बल्कि एकीकृत विकास के रूप में देखा गया। किसी भी देश में खाद्य व्यवस्था और उसके लिए सिंचाई और बिजली की व्यवस्था उसकी विकास के बुनियादी आधार होते हैं जिसे डॉक्टर अंबेडकर ने अत्यंत कुशलता से पूरा किया। डॉ भीमराव अंबेडकर ने देश के भौतिक विकास के लिए जो स्थाई कार्य किये हैं, उसके लिए यह राष्ट्र सदैव ऋणी रहेगा।
नियति का यह खेल कितना अद्भुत है कि एक समय डॉ. अंबेडकर
को अछूतों को पीने का पानी न मिलने के कारण ‘महाड़ सत्याग्रह’ (1927) करना पड़ा था जिसमें उन्हें चवदार तालाब से पानी पीकर प्रतिरोध जताया था और एक समय ऐसा आया कि उन्होंने
बतौर श्रम मंत्री इस देश के लिए अपनी नदी घाटी परियोजनाओं के माध्यम से भोजन और पानी
की हमेशा के लिए उचित व्यवस्था कर गए।
पीयूष कुमार उच्च शिक्षा विभाग, छत्तीसगढ़ शासन में
सहायक प्राध्यापक (हिंदी) हैं। वे कविता, आलोचना, लोक संस्कृति, आदिवासी अध्ययन, सिनेमा
आदि विषयों पर नियमित रूप से लिखते हैं।
संपर्क - 8839072306











