Friday, August 14, 2026

कविता में तीजन

 

कविता में तीजन


पीयूष कुमार

लोककला किसी समाज की सांस्कृतिक स्मृति, सामूहिक चेतना और जीवन-दृष्टि की सशक्त अभिव्यक्ति होती है। छत्तीसगढ़ की पंडवानी इस दृष्टि से अद्भुत लोकनाट्य विधा है जिसकी सरताज हैं तीजनबाई जिनका अभी पांच जुलाई को सत्तर वर्ष की आयु में देहावसान हो गया है। लोकनाट्य की विलक्षण परंपरा पंडवानी को अपने अद्वितीय गायन, अभिनय और असाधारण मंचीय व्यक्तित्व से वैश्विक पहचान दिलाने वाली तीजन बाई केवल एक लोकगायिका नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता की प्रतिनिधि थीं। उनके निधन ने कुछ कवियों को गहराई से प्रभावित किया, जिसके परिणामस्वरूप स्वतःस्फूर्त ही उन पर कविताएँ रची गईं। किसी लोक कलाकार पर कविताओं का लिखा जाना एक विशेष घटना है। इन कविताओं में तीजन बाई को कहीं लोकनायिका, कहीं संघर्षशील स्त्री, कहीं पंडवानी की अमर साधिका और कहीं भारतीय लोकसंस्कृति की जीवंत प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है। इस लिहाज से यह देखना महत्वपूर्ण है कि समकालीन हिंदी कविता ने तीजन बाई के व्यक्तित्व, उनके सांस्कृतिक अवदान और उनकी लोकधर्मी चेतना को किस प्रकार रूपायित किया है।

धमतरी के साहित्यकार डुमनलाल ध्रुव जो छत्तीसगढ़ी और हिंदी दोनों में समान अधिकार रखते हैं उन्होंने महान तीजनबाई के निधन पर एक मार्मिक कविता ‘तंबूरा अब भी बज रहा है’ लिखी है -

कहते हैं -

तीजन बाई नहीं रहीं

लेकिन यह बात

उतनी ही अधूरी है

जितनी बिना वर्षा के

बादलों की खबर

 

तंबूरा

जिसे उन्होंने जीवन भर

अपने कंधे पर रखा

आज पहली बार

धरती के कंधे पर रखा गया है

उसके तार

चुप हैं

पर चुप्पी भी

एक तरह का संगीत होती है

जिसे केवल वही सुनते हैं

जो स्मृतियों के पास बैठते हैं

 

महाभारत

अब किसी पुस्तक में नहीं

एक खाली आसन पर बैठी है

भीम अपनी गदा खोजते हुए

उस तंबूरे तक आते हैं

अर्जुन

उसकी लकड़ी में अपना गांडीव

पहचान लेते हैं

और कृष्ण

मुस्कराकर कहते हैं -

कथा कभी नहीं मरती

मरता है

केवल वह शरीर

जो उसे बोलता है

आवाजें नहीं मरती

वे हवा की तरह

पेड़ों के बीच से निकलकर

बच्चों की सांसों में रहने लगती हैं

 

छत्तीसगढ़ की मिट्टी

आज कुछ अधिक गीली है

शायद उसने

अपनी सबसे प्रिय बेटी की आवाज

अपने भीतर रख ली है

कल जब

कोई छोटी लड़की

पहली बार तंबूरा उठाएगी

उसके हाथों में

तीजन बाई की उंगलियों की गर्मी

होगी

 

तब कोई नहीं कहेगा

कि तंबूरा शांत हो गया

कहा जाएगा -

उसने अपना संगीत

एक कंठ से निकालकर

समय के हवाले कर दिया है।

और समय

इतना उदार है

कि अच्छी आवाजों को

मरने नहीं देता

विश्वप्रसिद्ध पंडवानी गायिका तीजन बाई पर लिखी गई यह कविता एक साधारण श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि लोककला की शाश्वतता और कलाकार की सांस्कृतिक उपस्थिति की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। डुमनलाल यहाँ उनकी मृत्यु को अंतिम सत्य मानने से इनकार करते हैं। वे विलाप का सहारा नहीं लेते बल्कि संयत संवेदना से कहते हैं कि कलाकार की मृत्यु उसकी कला का अंत नहीं होती। ‘चुप्पी भी एक तरह का संगीत होती है’ जैसी पंक्ति दार्शनिक अर्थवत्ता ग्रहण करती है और पाठक को बाह्य शोक से आगे बढ़कर आंतरिक अनुभूति तक ले जाती है। भाषा सरल है पर व्यंजनापूर्ण और लाक्षणिक है। यद्यपि कुछ स्थानों पर भावावेश के कारण कथन अपेक्षाकृत विस्तार ग्रहण करता है, फिर भी संपूर्ण कविता अपनी सांकेतिकता, कलात्मक संयम और भाव-सघनता के कारण प्रभावशाली बन पड़ी है। यह रचना तीजन बाई की स्मृति को केवल संरक्षित नहीं करती, बल्कि लोककला की अमर परंपरा को भी सशक्त रूप से प्रतिष्ठित करती है।

इसी तरह रायपुर के साहित्यकार जयप्रकाश मानस ने भी तीजन बाई के देहावसान के उपरान्त एक कविता ‘जब पृथ्वी ने महाभारत गाया’ लिखी है जिसमें पंडवानी की कलात्मक विरासत को सहेजा गया है -

जब उन्होंने तंबूरा रखा

उसमें से थोड़ी सी पृश्वी बाहर आई

 

उन्होंने कहा नहीं कि यह भीम है

उन्होंने बस उसे

थोड़ा सा ऊँचा उठाया

और इतने से

अन्याय थोड़ा छोटा दिखाई देने लगा

 

महाभारत

किताब से उतरकर

धान के खेत में चला गया

जहाँ एक किसान

हल चलाते-चलाते

अचानक भीम की तरह सीधा खड़ा हो गया

 

एक लड़की ने

पहली बार अपनी आवाज़ को डर से बड़ा पाया

शायद उसी दिन पंडवानी जन्मी होगी!

या फिर

वह हर बार वहीं जन्म लेती होगी

 

अब वे नहीं हैं

लेकिन किसी गाँव की साँझ में

जब कोई बच्चा

लकड़ी की डंडी को

तंबूरा समझकर पकड़ता है

तो पृश्वी

थोड़ी देर के लिए

फिर से

महाभारत बोलने लगती है

जयप्रकाश मानस की यह कविता तीजनबाई के व्यक्तित्व की अपेक्षा उनकी लोक - सांस्कृतिक चेतना और कलात्मक विरासत का सांकेतिक चित्र प्रस्तुत करती है। यह कविता तीजन बाई के द्वारा महाभारत को ग्रंथ की सीमाओं से मुक्त कर लोकजीवन का जीवंत अनुभव बना देने को जाहिर करती है जिसमें महाभारत केवल आख्यान नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध, श्रम की गरिमा और आत्मविश्वास का सांस्कृतिक रूपक बन जाती है। ‘अन्याय थोड़ा छोटा दिखाई देने लगा’ जैसी पंक्ति इसी विचार का प्रभावी प्रतिपादन करती है। इस कविता में किसान का भीम की तरह खड़ा होना तथा लड़की का अपनी आवाज़ को ‘डर से बड़ा’ पाना, लोककला की प्रेरणादायी शक्ति की स्थापना करना है। कविता का अंतिम दृश्य इस विश्वास को बल देता है कि महान कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुनर्जन्म लेती रहती है। कविता में ‘तंबूरे से पृथ्वी का बाहर आना’, ‘महाभारत का धान के खेत में उतर जाना’ तथा ‘पृथ्वी का महाभारत बोलने लगना’ जैसे बिंब कविता को गहरी सांकेतिकता और दार्शनिक ऊँचाई प्रदान करते हैं। यह कविता कम शब्दों में व्यापक सांस्कृतिक अर्थवत्ता का सृजन करती है और तीजन बाई की कलासाधना को लोकजीवन, प्रतिरोध और सांस्कृतिक स्मृति के शाश्वत रूप में प्रतिष्ठित करती है।

तीजनबाई पर उपलब्ध कविताओं में ज्यादातर कवितायेँ तीजनबाई के देहावसान उपरांत लिखी गयी हैं किन्तु बाँदा के वरिष्ठ कवि केशव तिवारी ने उनपर ‘तीजनबाई’ कविता लिखी थी। यह कविता उनके पहले काव्यसंग्रह ‘ इस मिट्टी से बना‘ (2005 में प्रकाशित) में दर्ज है। इस कविता के साथ ख़ास बात यह है कि कविता प्रकाशन लगभग दस साल बाद तीजनबाई को केशव तिवारी ने यह कविता रायपुर के विश्रामगृह में प्रत्यक्ष सुनाई थी। यह कविता इस प्रकार है -

 तीजन हो गई है छत्तीसगढ़

इसके स्वरों से फूट रही है -

छत्तीसगढ़ी धान की खुशबू

इसकी चाल में है

नाच और गम्मत का जोश

युगों से पंडवानी सुनता आ रहा

छत्तीसगढ़ भी

चकित है सुनकर बिटिया की ललकार

छत्तीसगढ़ की पथरीली छाती पर

तन कर खड़ी हो गई है

शाल के वृक्ष की तरह

महाजन के यहां बर्तन मलती

हाट में सर पर लकड़ी का

गट्ठर लिए खड़ी

ठेकेदारों की निगाहों से

बचकर महुआ बीनती

टूरियों तक पहुंच रही है

उसकी हाँक

तीजन हो गई है छत्तीसगढ़!

 

केशव तिवारी की यह कविता तीजन बाई के व्यक्तित्व को केवल एक लोकगायिका के रूप में नहीं, बल्कि संपूर्ण छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता और लोकचेतना के प्रतीक के रूप में स्थापित करती है। ‘तीजन हो गई है छत्तीसगढ़’ पंक्ति केवल प्रशंसात्मक कथन नहीं, बल्कि कलाकार और उसकी भूमि के अभिन्न संबंध की घोषणा है। कवि तीजन बाई के स्वर में धान की सुगंध, लोकनृत्य की ऊर्जा और पंडवानी की परंपरा को समाहित देखकर मानता है कि उनकी कला लोकजीवन की सामूहिक चेतना का विस्तार है। तीजन के व्यक्तित्व का विस्तार करते हुए केशव तिवारी महाजन, ठेकेदार और श्रमिक स्त्रियों के चित्रों के माध्यम से शोषण के सामाजिक यथार्थ को भी स्वर देते हैं। इस कविता में  तीजन बाई को करुणा की पात्र नहीं, बल्कि प्रतिरोध और आत्मविश्वास की सशक्त प्रतीक के रूप में चित्रित करता है। ‘शाल के वृक्ष की तरह तनकर खड़ी हो गई है’ उपमा उनके व्यक्तित्व की दृढ़ता, स्वाभिमान और जीवन-संघर्ष की विजय का प्रभावशाली संकेत देती है। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में साल वनों का बाहुल्य है। केशव तिवारी की भाषा सरल, लोकधर्मी और संप्रेषणीय है, जिस में गहन व्यंजना-शक्ति निहित है। यद्यपि कविता में तीजन बाई का आदर्शीकरण अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देता है, फिर भी यह आदर्शीकरण कृत्रिम नहीं लगता क्योंकि वह उनके संघर्ष, श्रम और लोक-साधना से अर्जित है। यह कविता तीजन बाई को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक आत्मा और लोकप्रतिरोध की सशक्त आवाज़ के रूप में प्रतिष्ठित करने वाली प्रभावशाली रचना है।

दुर्ग में रहनेवाली अल्पना त्रिपाठी  ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से नाटक एवं रंगमंच पर  शोधकार्य किया है। उन्होंने कुछ वर्ष पहले ही तीजनबाई का साक्षात्कार भी लिया था। इस साक्षात्कार के बाद उन्होंने एक कविता लिखी थी ‘तीजन’ जो तीजनबाई की कला और व्यक्तित्व का आत्मीय चित्रण करती है –

आजादी के साल में जन्मी

ले तीज-त्यौहार का गाढ़ा रंग

गुरबत का आँचल पसरा था

पली-बढ़ी भाई-बहनों के संग

 

भूली नहीं वो बाबा का पारा

पंडवानी नाम से जो चढ़ता था

अब भी हैं वो यादों में कोड़े

पीठ पर खूब जो पड़ता था

 

अगले ही पल कुछ आंखों में चमकी

एक अल्हड़ मस्त रवानी थी

नाना से जो सीख रही

द्वापर की बड़ी कहानी थी

 

आम के छाँव में बचपन गुजरा

जीवन पथ समतल न था

मान सम्मान जन धन मिले

पर मन, अभिमानी चंचल न था

 

रामकथा जन जन में व्यापी

वो कृष्ण से लौ लगा बैठीं

पांडव की अमर कहानी पर

निज जीवन दांव लगा बैठीं

 

नाना से फिर गुरुमंत्र लिया

वय तेरह में अँखुआई की

द्रौपदी की पीड़ा गा गाकर

कुछ अपनी पीर पराई की

 

भरी सभा में जब

द्रौपदी का चीरहरण हुआ

मानो तीजन का भी फिर फिर

दुर्योधन से रण हुआ

 

द्रौपदी के बन रक्षक

कृष्ण ने लाज बचाई

पर कलजुग में अपनों से टूटी

तीजन की है सच्चाई

 

जब जब अपनों ने त्रास दिया

कथा ने उन्हें संभाल लिया

तीजन कथा कथा तीजन है

हर शै खूब खंगाल लिया

 

कापालिक है शैली उनकी

अभिनय में उस्ताद हैं

अपनी लंबी काया में

बच्चों सा दिल आबाद है

 

तंबूरे के तार से झंकृत

हौजी से फिर संवाद हुआ

इस सम्मोहन से बच निकला

ऐसा न कोई अपवाद हुआ

 

तीजन बाई पर आधारित यह कविता उनके जीवन - संघर्ष, कलासाधना और मानवीय व्यक्तित्व का क्रमबद्ध एवं आत्मीय चित्र प्रस्तुत करती है। कविता तीजनबाई की गरीबी, सामाजिक उपेक्षा और पारिवारिक संघर्षों के साथ पंडवानी के लिए उनकी प्रतिबद्धता को जाहिर करती है। कविता की पंक्ति 'तीजन कथा, कथा तीजन है' उनके व्यक्तिगत जीवन को महाभारत की कथा से जोड़ती है। अल्पना त्रिपाठी इस कविता में तीजन बाई के जीवन की कठिनाइयों का उल्लेख करती हैं, किंतु उन्हें दया की पात्र नहीं बनातीं बल्कि उनकी अदम्य इच्छाशक्ति और कला-साधना को रेखांकित करती हैं। 'जब-जब अपनों ने त्रास दिया, कथा ने उन्हें संभाल लिया' इस तथ्य को उद्घाटित करती हैं कि कला उनके लिए केवल आजीविका नहीं, बल्कि आत्मबल और अस्तित्व का आधार थी। इस प्रकार कविता व्यक्तिगत जीवन और लोककला के संबंध को संवेदनात्मक रूप से अभिव्यक्त करती है। कविता गीतात्मक शैली में रची गई है। तुकांत योजना तथा लयात्मकता कविता को सहज गेयता प्रदान करती है। यद्यपि कुछ स्थानों पर कविता जीवनीपरक विवरणों में अधिक उलझ जाती है, जिससे काव्यात्मक व्यंजना कुछ क्षीण होती है, फिर भी उसकी आत्मीयता, संवेदनात्मक प्रामाणिकता और लोकधर्मी अभिव्यक्ति उसे प्रभावशाली बनाती है। 

इन कविताओं से हिन्दी कविता इसलिए भी समृद्ध हो रही है कि यह एक लोक कलाकार पर केंद्रित है। इसी क्रम में तीजन बाई के देहावसान के बाद कवि यश मालवीय ने भी उन्हें अपनी भावपूर्ण रचना 'चली गई तीजनबाई ' कविता में इस तरह याद किया है -

चली गई तीजनबाई

मंचों पर अब नहीं सजेगी

वो मशाल सी तरुणाई

टूट गए घुँघरू चुपके से

चली गई तीजनबाई

 

वो मिट्टी की गन्ध

हमारी संस्कृति का उजला चेहरा

याद आएगा ज्वार उठाता

स्वर समुद्र गहरा गहरा

 

दुनिया भर में छत्तीसगढ़ की

बदली रही घिरी छाई

 

वो संवाद शब्द में

बंधती सी जीवन की लयकारी

एक आग थी, सोए मन में

बो देती थी चिनगारी

 

व्यथा कथा लड़ती औरत की

उसने जी भरकर गाई

 

दसों दिशाएँ नाच उठती थीं

जब वो गाया करती थी

कठिन समय को वीरभाव से

खुलकर बांचा करती थी

 

वो हुंकार मौन है अब तो

आँख हमारी भर आई

 

नहीं काल भी मिटा सकेगा

वो गायन पंडवानी का

अंत न होगा कभी रोशनी देती

अमर कहानी का

 

चट्टानों में फूल खिलाकर

थमी थमी है पुरवाई

इस कविता में महान लोकगायिका के निधन पर शोक के साथ-साथ उनकी कलात्मक विरासत की अमरता का भाव भी समान रूप से व्यक्त हुआ है। यश मालवीय मानते हैं कि तीजन बाई का शारीरिक अवसान अवश्य हुआ है पर वे एक कलाकार के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति की जीवंत मशाल और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान के रूप में अमर हो गयी हैं। 'व्यथा कथा लड़ती औरत की / उसने जी भरकर गाई' जैसी पंक्ति यह संकेत करती हैं कि उनके गायन में केवल महाभारत की कथा नहीं, बल्कि स्त्री-अस्मिता और संघर्ष का स्वर भी उपस्थित था। इस कविता में कवि का शोक आत्मविलाप न होकर सांस्कृतिक क्षति की अनुभूति है। यह कविता करुण भाव से आरंभ होकर श्रद्धा और सांस्कृतिक विश्वास में परिणत होती है। गीतात्मक संरचना की इस कविता में प्रशस्तिपरक स्वर अपेक्षाकृत अधिक है और तीजन बाई के व्यक्तित्व का पक्ष सामने नहीं आता, फिर भी श्रद्धांजलि-काव्य की प्रकृति को देखते हुए यह उसकी स्वाभाविक सीमा है।

किसी लोककलाकार के लिए स्वतःस्फूर्त उठनेवाले भाव ज़ब कविता में दर्ज होने लगते हैं तो उस कलाकार का मैयार निश्चित ही बहुत ऊँचा होता है। तीजनबाई के इसी मैयार को अंबिकापुर की कवि मृदुला सिंह ने भी तीजन बाई को पंडवानी की परिष्ठभूमि में अपनी कविता 'पंडवानी की लोकनायिका' में दर्ज किया है -

गीत

संगीत

नृत्य

इन तीनों से बनी पंडवानी

और बनी तीजन

 

प्राचीन कथा से लेकर

मनुष्य के अंतस में

चल रहे महाभारत तक

हर समय जन्म लेता

धर्म- अधर्म का संघर्ष

कंठ से उसके

अनेक स्वरों में बोलता था

द्रौपदी का आक्रोश

भीष्म की विवशता

कर्ण का अपमान

भीम का क्रोध

और कृष्ण की दूरदर्शी मुस्कान

जीवंत होते रहे

उसकी पंडवानी में

 

बचपन में

कापालिक गायन के लिए

मंच पर खड़ी तीजन को

पता नहीं था कि

पंडवानी में स्त्रियों को सिर्फ बैठकर गाना है

उसे खडे होकर गाना प्राकृतिक लगा

आकाश

वायु

जल

अग्नि

और भूमि की तरह

 

पंडवानी के लिए उनका खड़ा होना

खड़े होना था न्याय और धर्म के पक्ष में

इस प्रतिरोध का शस्त्र था

उनका तंबूरा

जो तत्क्षण ही

भीम की गदा

अर्जुन का गांडीव

द्रौपदी के केश

और

कृष्ण का चक्र बन जाता था

 

धर्म अधर्म के युद्ध का

उन्मुक्त बखान करती

तीजन की आवाज

मौन स्त्रियों के प्रतिरोध की प्रतिनिधि है

जिसमें भाषा को

अनुवाद की आवश्यकता नहीं हुई

पंडवानी के आरोह अवरोह

यति गति ताल छंद

और रागी के हुंकारू में

शब्द पीछे रह जाते

भाव आगे चल पड़ते

इसलिए

जो भाषा नहीं समझते थे

मनुष्य के द्वन्द को समझ लेते थे

 

तीजनबाई ने पंडवानी को

बाज़ार

संग्रहालय

और अभिजात्यता से बचाकर

छत्तीसगढ़ी माटी के लोकराग को

बिखेर दिया संसार भर में

जो गूंजती रहेगी हमेशा

दिगंत तक!

 यह कविता तीजन बाई के व्यक्तित्व और कृतित्व का गहन सांस्कृतिक तथा वैचारिक मूल्यांकन प्रस्तुत करती है। यह कविता तीजन बाई की कला, उनके प्रतिरोध-बोध और लोकपरंपरा में उनके ऐतिहासिक योगदान का सशक्त काव्यात्मक आख्यान है। तीजन बाई ने पंडवानी को केवल महाभारत के गायन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे मनुष्य के भीतर चल रहे धर्म - अधर्म, न्याय - अन्याय और सत्ता प्रतिरोध के शाश्वत संघर्ष की अभिव्यक्ति बना दिया, यह कविता का केंद्रीय प्रतिपाद्य है। इस कविता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि वह तीजन बाई को स्त्री-मुक्ति और सांस्कृतिक प्रतिरोध की प्रतिनिधि के रूप में देखती है। उनका परंपरा के विरुद्ध खड़े होकर गाना केवल शैलीगत परिवर्तन नहीं, बल्कि रूढ़ सामाजिक संरचनाओं के विरुद्ध सांस्कृतिक प्रतिरोध का उद्घोष बन जाता है। मृदुला सिंह तीजन बाई के प्रति गहरे सम्मान के साथ उनकी कला की सामाजिक भूमिका को रेखांकित करती हैं। 'मौन स्त्रियों के प्रतिरोध की प्रतिनिधि' जैसी अभिव्यक्ति कविता को स्त्री-विमर्श की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण बना देती है। यहाँ भावुकता की अपेक्षा चिंतन और सांस्कृतिक चेतना अधिक प्रभावशाली रूप में उपस्थित है। कविता में तंबूरा का भीम की गदा, अर्जुन के गांडीव, द्रौपदी के केश और कृष्ण के चक्र में रूपांतरित होना प्रभावी प्रतीक-योजना का उदाहरण है जो महाभारत के मिथकीय संकेतों का समकालीन संदर्भों में प्रयोग कविता को बहुस्तरीय अर्थ प्रदान करता है। कविता में कहीं - कहीं विचारप्रधानता के कारण गीतात्मक प्रवाह थोड़ा मंद पड़ता है, किंतु इससे उसकी वैचारिक शक्ति कम नहीं होती। समग्रतः यह कविता तीजन बाई को केवल पंडवानी की महान कलाकार नहीं, बल्कि लोकसंस्कृति, स्त्री - अस्मिता और सांस्कृतिक प्रतिरोध की लोकनायिका के रूप में प्रतिष्ठित करती है।

तीजनबाई पर केंद्रित इन समकालीन कविताओं से यह उम्मीद बँधती है कि कवि अभी लोक और कला से विमुख नहीं हुआ है। पूर्व मे भी इसी तरह व्यक्तिकेंद्रित कवितायेँ लिखी गयी हैं जो मात्रात्मक रूप से कम हैं पर गुणात्मक रूप से स्तरीय कवितायेँ हैं। महान पंडवानी कलाकार तीजनबाई पर इन कविताओं से कला, कविता और साहित्य समृद्ध हुआ है।

 (साभार : ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ जुलाई 2026)


पीयूष कुमार

लेखक उच्च शिक्षा विभाग, छत्तीसगढ़ शासन मे हिन्दी के सहायक प्राध्यापक हैं. बागबाहरा, जिला - महासमुंद मे रहते हैं. सम्पर्क : 8839072306

 

Tuesday, April 14, 2026

वाटरमैन ऑफ़ इंडिया : डॉ. भीमराव अंबेडकर

  पीयूष कुमार

बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का राष्ट्र निर्माण में अन्यतम योगदान है। आमतौर पर लोगों उन्हें वंचित वर्गों का मसीहा और भारतीय संविधान के निर्माता के रूप में याद करते हैं किंतु उनका योगदान और भी बहुत है जो उन्होंने देश की आजादी के पहले ही इस देश के बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए किया था। उन्होंने 1942 से 1946 तक वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम सदस्य के रूप में काम किया जिसे आमतौर पर श्रम मंत्री कहा जाता है। इस पद पर रहते हुए उन्होंने भारत के श्रम कानूनों की नींव रखी, जैसे - 14 घंटे के कार्यदिवस को 8 घंटे का करना, बिना लैंगिक भेदभाव के समान वेतन, महिलाओं के लिए प्रसूति लाभ, फैक्ट्री एक्ट में सुधार और ट्राइपार्टाइट लेबर कॉन्फ्रेंस आदि। उनका यह काम श्रमिकों और महिलाओं की दृष्टि से देखा जाए तो भारत के परिप्रेक्ष्य में अभूतपूर्व, क्रांतिकारी और महनतम था। भारत के वंचित वर्गों और आधी आबादी के रूप में महिलाओं से मिलजुल कर बना हुआ यह विशाल वर्ग उनका सदैव कृतज्ञ रहेगा।

(1942 में वायसराय वेवेल की ब्रिटिश परिषद में श्रम मंत्री के रूप में शामिल डॉ अंबेडकर)

1942 के ब्रिटिश काउंसिल में डॉ भीमराव अंबेडकर के श्रम विभाग के अंतर्गत सिंचाई, जल संसाधन, बिजली भी थे। इसके तहत उन्होंने नदी घाटी परियोजनाओं जैसे - दामोदर, हीराकुंड, कोसी आदि से संबंधित नीति निर्माण और योजनाओं और के आधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जिस पर ज्यादा बातें नहीं होती। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने श्रम विभाग के अंतर्गत भारतीय जल संसाधन नीति की नींव रखी और बड़े-बड़े बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं की शुरुआत की थी जिसे आधार पर भारत में हरित क्रांति और अन्य विकास के तमाम कार्यक्रम सफल रूप में आज हमें दिखाई देते हैं।

(श्रम मंत्री के रूप में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर श्रम आयुक्तों को संबोधित करते हुए)

बहुउद्देशीय नदी घाटी विकास की अवधारणा बाबा साहब ने अमेरिका की Tennessee Valley Authority मॉडल से प्रेरित होकर बनाई थी। उन्होंने पहली बार भारत में नदी घाटी को एक इकाई मानकर उसके बहुउद्देशीय विकास की नीति बनाई जिसमें बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, बिजली उत्पादन, नौवहन, घरेलू जल आपूर्ति आदि शामिल थे। डॉ. भीमराव अंबेडकर के श्रम मंत्री रहते भारत की प्रमुख परियोजनाओं में उनके योगदान को विभिन्न परियोजनाओं में देखा जा सकता है - 

दामोदर घाटी परियोजना -  भारत की पहली बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना थी जिसके लिए डॉक्टर अंबेडकर ने 1944 में कलकत्ता में दो सम्मेलनों की अध्यक्षता की। यह परियोजना डॉ. मेघनाथ साहा की वैज्ञानिक परिकल्पना, अध्ययन, साइट चयन और TVA मॉडल की सिफारिश थी जिसे डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यान्वयन, केंद्र-प्रांत समन्वय, नीति निर्माण, बैठकें आयोजित करने और परियोजना को मंजूरी दिलाने का काम किया और कार्यान्वयन के वास्तुकार बने। उन्होंने तत्कालीन बंगाल और बिहार सरकारों को साथ लाकर यह योजना तैयार की। इसी क्रम में बाद में दामोदर वैली कॉर्पोरेशन (DVC) 1948 में बना, जिसमें सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और बिजली दोनों शामिल थे।

                (दामोदर घाटी परियोजना) 

 हीराकुद बांध महानदी परियोजना - ओडिशा में महानदी पर बहुउद्देशीय परियोजना में तकनीकी डिजाइन और इंजीनियरिंग डॉ. एम. विश्वेश्वरैया (प्रारंभिक सुझाव) का था जिसकी डॉ. ए.एन. खोसला ने विस्तृत योजना और कार्यान्वयन की जिम्मेदारी निभाई थी किन्तु डॉ अंबेडकर ने श्रम मंत्री रहते इस परियोजना के नीति निर्माण, समन्वय और राष्ट्रीय स्तर पर मंजूरी का निर्वाहन किया। उन्होंने परियोजना को बहुउद्देशीय बनाने का फ्रेमवर्क दिया, केंद्र-राज्य बैठकें आयोजित कीं और CWINC जैसी संस्था के माध्यम से तकनीकी आधार तैयार किया। परियोजना का निर्माण स्वतंत्र भारत में (1948 से शुरू होकर 1957 में पूरा) हुआ, लेकिन इसकी नींव और बहुउद्देशीय रूपरेखा अंबेडकर के श्रम सदस्य काल (1944-46) में ही रखी गई थी। उन्होंने इसके लिए 1945 में कटक में सम्मेलन की अध्यक्षता की थी। हीराकुद बाँध दुनिया का सबसे लंबा (5 किलोमीटर) मिट्टी का बांध है, जो सिंचाई और बिजली के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इस बांध का कुल क्षेत्र 26 किलोमीटर का है जिसके तहत वर्तमान में 4,36,000 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होती है।

                        (हीराकुद बाँध)

सोन नदी घाटी परियोजना - सोन नदी पर बहुउद्देशीय विकास की योजना बाबा साहब के प्रयासों से शुरू हुई। हालांकि यहाँ पर पहले ही 1874 में डेहरी एनीकट जो ब्रिटिश काल की पुरानी सिंचाई व्यवस्था के रूप में मौजूद थी। किंतु उसका विस्तार करना था इसलिए 1944-46 में उन्होंने इसके लिए बतौर श्रम मंत्री बहुउद्देशीय रूपरेखा, नीति निर्माण, केंद्र-प्रांत समन्वय और संस्थागत ढांचा (CWINC आदि) प्रदान किया और सोन नदी घाटी को आधुनिक बहुउद्देशीय परियोजना के रूप में आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका यह योगदान दामोदर, हीराकुंड और कोसी जैसी अन्य परियोजनाओं के समान है जहाँ उन्होंने तकनीकी डिजाइन नहीं किया, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर बहुउद्देशीय फ्रेमवर्क और नींव रखी। इस परियोजना को केवल सिंचाई तक सीमित नहीं रखा गया बल्कि नहरों से सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, स्थायी जलविद्युत उत्पादन, कृषि विकास (ट्यूबवेल पंपिंग और जलभराव वाले क्षेत्रों में ड्रेनेज), औद्योगिक विकास के लिए सस्ती बिजली, और गंगा क्षेत्र में बेहतर जल आपूर्ति के उद्देश्यों को रखा गया। 1944-46 के दौरान श्रम विभाग के अंतर्गत इसकी योजना को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया गया।

 कोसी नदी परियोजना -   कोसी नदी को 'बिहार का शोक' कहा जाता है। एक नदी में हमेशा अत्यधिक बाढ़ आती है। बाबा साहब ने इसकी समस्या को समझते हुए बहुउद्देशीय समाधान की नींव रखी। उनके नेतृत्व में 1944-46 के दौरान श्रम विभाग में इस परियोजना को सक्रिय रूप से विचाराधीन रखा गया जिसमें कोसी की बाढ़ को नियंत्रित करने के लिए बांध या बैराज जैसी संरचनाओं की योजना बनाई गई, जो सिंचाई और जलविद्युत के साथ जुड़ी हो। डॉ अंबेडकर ने केंद्र स्तर पर तकनीकी संस्थानों (CWINC) के गठन से यह सुनिश्चित किया कि राज्यों (बिहार आदि) को सहयोग मिले और अंतर-राज्यीय/अंतरराष्ट्रीय मुद्दों (नेपाल से संबंधित) का समाधान हो। बाद में अनुच्छेद 262 (संविधान में अंतर-राज्यीय नदी विवादों के लिए) और जल संबंधी प्रविष्टियों में संशोधन उनके इसी विजन का हिस्सा थे। इस परियोजना का उद्देश्य कोसी की बाढ़ से बिहार को राहत, कृषि भूमि को सिंचाई, और क्षेत्र में आर्थिक विकास करना था। कोसी परियोजना बाद में 1950 के दशक में भारत-नेपाल समझौते के तहत आगे बढ़ी लेकिन इसकी अवधारणा और बहुउद्देशीय फ्रेमवर्क बाबा साहब के काल में ही शुरू हुआ था। 

                       (कोसी बाँध)

भाखड़ा-नांगल परियोजना - भाखड़ा-नांगल परियोजना की मूल परिकल्पना सर छोटू राम (तत्कालीन पंजाब के राजस्व मंत्री) की देन मानी जाती है। उन्होंने 1923 में ही इसकी अवधारणा दी थी और 1944 में बिलासपुर के राजा के साथ समझौता (agreement) किया तथा 8 जनवरी 1945 को परियोजना की योजना को अंतिम रूप दिया था पर डॉ. भीमराव अंबेडकर जो उस समय वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम सदस्य थे, ने इस परियोजना को आधुनिक बहुउद्देशीय रूप देकर राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाया था। उन्होंने 1942-46 के दौरान उन्होंने भाखड़ा बांध परियोजना को प्राथमिकता दी। उन्होंने इसके लिए 1944 में उन्होंने United States Bureau of Reclamation के विशेषज्ञ जे. एल. सावेज को आमंत्रित किया। सावेज ने साइट का निरीक्षण किया और सिफारिश की कि बांध का अधिकतम जल स्तर 487.68 मीटर तक रखा जा सकता है। उन्होंने बाँध की नींव और अन्य तकनीकी सलाह भी दी थी। परियोजना का बुनियादी कार्य 1945-46 में बाबा साहब के कार्यकाल में ही पूरा हुआ जिसका उद्देश्य भाखड़ा नांगल को बहुउद्देशीय फ्रेमवर्क देना था जिसमें बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई (पंजाब, हरियाणा, राजस्थान), जलविद्युत उत्पादन और क्षेत्रीय आर्थिक विकास किया जाना था। इस परियोजना का निर्माण कार्य स्वतंत्र भारत में (मुख्यतः 1948 के बाद) तेजी से हुआ और 1963 में जवाहरलाल नेहरू द्वारा राष्ट्र को समर्पित किया गया। भाखड़ा-नांगल परियोजना सतलज नदी पर स्थित बहुउद्देशीय परियोजना है जिसमें भाखड़ा बांध हिमाचल प्रदेश में और नांगल बैराज पंजाब में बनाया गया।

 

        (भाखड़ा नांगल बांध : निर्माण कार्य के दौरान)

गौरतलब है कि इन विशाल और महान परियोजनाओं का आधार उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य में रहते किया था। इन बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं के अलावा डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने श्रम मंत्री रहते अन्य संबंधित संस्थागत योगदान दिया है जो आज के विकसित भारत की नींव है। डॉ आंबेडकर के इन कार्यों को इस तरह देखा जा सकता है -
केंद्रीय जलमार्ग, सिंचाई और नौवहन आयोग (CWINC) -इसकी स्थापना डॉ भीमराव अंबेडकर ने मार्च 1944 में किया गया जिसे आज हम केंद्रीय जल आयोग (CWC) के नाम से जानते हैं जो देश की जल नीति, बांधों और सिंचाई परियोजनाओं का मुख्य तकनीकी सलाहकार संगठन है। इस संगठन का उद्देश्य है - बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, नौवहन, पेयजल आपूर्ति और जल विद्युत विकास जिसे केंद्रीय जल आयोग निरंतर पूरा करने में लगा हुआ है।

केंद्रीय तकनीकी विद्युत बोर्ड - डॉ अंबेडकर के प्रयासों से यह बोर्ड बिजली विकास के लिए बनाया गया जो बाद में Central Electricity Authority बना। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (Central Electricity Authority - CEA) भारत सरकार के विद्युत मंत्रालय के अधीन एक सांविधिक संगठन है। इसकी स्थापना मूल रूप से 1951 में हुई थी जिसे बाद में 1975 में पुनर्गठित किया गया। इस प्राधिकरण के मुख्य काम है - सलाह देना , योजना बनाने और तकनीकी मानक तय करने का है। इसके कार्य विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 73 के तहत परिभाषित हैं जो निम्न कार्य करते हैं - नीति और योजना संबंधी कार्य, तकनीकी मानक तय करना, सलाहकारी भूमिका - यह केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और विद्युत नियामक आयोगों (CERC, SERCs) को उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण से संबंधित सभी तकनीकी मामलों पर सलाह देना है। इसके अलावा यह अन्य महत्वपूर्ण कार्य जैसे - बिजली परियोजनाओं की निगरानी और समय पर पूरा होने की समीक्षा। बिजली क्षेत्र का डेटा संग्रह, विश्लेषण और प्रकाशन, सुरक्षा नियम बनाना और लागू करना, मानव संसाधन विकास और कौशल उन्नयन में मदद करना, नई तकनीकों पर अध्ययन और सिफारिशें देना और राष्ट्रीय विद्युत योजना जारी करना है।

इन संस्थागत योजनाओं ने देश को भविष्य में नीतिगत और संवैधानिक योगदान दिया। इससे अखिल भारतीय स्तर पर जल और बिजली संसाधनों की स्पष्ट नीति बनाई गयी। इसके साथ ही उन्होंने नदी घाटी प्राधिकरण की अवधारणा दी। इसी क्रम में बाद में संविधान में अनुच्छेद 262 जोड़ा गया, जो अंतर-राज्यीय नदी विवादों के निपटारे से संबंधित है। इसके अलावा संविधान की सातवीं अनुसूची में जल संबंधी प्रविष्टियों में संशोधन कर कुछ विषय केंद्र को दिए। आज पिछले लगभग 80 सालों में इन संस्थाओं द्वारा किए गए कार्य, विस्तार और उससे विकास की ऊंचाइयों तक पहुंचे इस देश को देख पाते हैं तो उसकी नींव में डॉ. भीमराव अंबेडकर का महान योगदान है। 

(श्रम मंत्री के रूप में 1942 में धनबाद कोयला खदान में लोगों से बात करते हुए डॉ अंबेडकर)

बाबा साहब का मानना था कि जल संसाधनों का वैज्ञानिक और समन्वित उपयोग होना चाहिए ताकि बाढ़, सूखा कम हो और कृषि, उद्योग तथा बिजली का विकास हो। उन्होंने प्रांतों (राज्यों) के बीच सहयोग पर जोर दिया। इसलिए बाबा साहब को 'Water Man of India' भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने स्वतंत्र भारत की सिंचाई और जल प्रबंधन की आधुनिक नीति की नींव रखी। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 2014 में कहा था कि बाबा साहेब लगभग अकेले ही CWINC, Central Technical Power Board और राष्ट्रीय पावर ग्रिड की स्थापना के लिए जिम्मेदार थे। इसी तरह डॉ. अंबेडकर के योगदान के लिए उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2016 में उन्हें ‘water and river navigation पालिसी का आर्किटेक्ट’ कहा था। यह नदी घाटी परियोजनाएं सिंचाई और विद्युत उत्पादन का काम उसे समय के गरीब देश में सर्व प्रमुख आवश्यकता थी जिसके आधार पर आज का यह भारत खड़ा है। इसीलिए प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इन नदी घाटी परियोजनाओं को ‘आधुनिक मंदिर’ कहा करते थे।

CWINC की स्थापना बाबा साहेब की जल संसाधन विकास में सबसे बड़ी देन है। उन्होंने केवल एक आयोग नहीं बनाया, बल्कि स्वतंत्र भारत की आधुनिक जल नीति की नींव रखी, जिससे लाखों एकड़ भूमि को सिंचाई, बिजली और बाढ़ सुरक्षा मिली। यह कार्य उनके श्रम मंत्री काल के हिस्से थे, जिसमें सिंचाई को अलग विभाग के रूप में नहीं, बल्कि एकीकृत विकास के रूप में देखा गया। किसी भी देश में खाद्य व्यवस्था और उसके लिए सिंचाई और बिजली की व्यवस्था उसकी विकास के बुनियादी आधार होते हैं जिसे डॉक्टर अंबेडकर ने अत्यंत कुशलता से पूरा किया। डॉ भीमराव अंबेडकर ने देश के भौतिक विकास के लिए जो स्थाई कार्य किये हैं, उसके लिए यह राष्ट्र सदैव ऋणी रहेगा।

नियति का यह खेल कितना अद्भुत है कि एक समय डॉ. अंबेडकर को अछूतों को पीने का पानी न मिलने के कारण ‘महाड़ सत्याग्रह’ (1927) करना पड़ा था जिसमें उन्हें चवदार तालाब से पानी पीकर प्रतिरोध जताया था और एक समय ऐसा आया कि उन्होंने बतौर श्रम मंत्री इस देश के लिए अपनी नदी घाटी परियोजनाओं के माध्यम से भोजन और पानी की हमेशा के लिए उचित व्यवस्था कर गए।



पीयूष कुमार उच्च शिक्षा विभाग, छत्तीसगढ़ शासन में सहायक प्राध्यापक (हिंदी) हैं। वे कविता, आलोचना, लोक संस्कृति, आदिवासी अध्ययन, सिनेमा आदि विषयों पर नियमित रूप से लिखते हैं।
संपर्क - 8839072306



Monday, October 20, 2025

छत्तीसगढ़ की दीपावली : सुरहुती

दीवाली भारत का  महत्वपूर्ण त्योहार है जो अपनी मूल परम्परा में खेती की सफलता और पशुपालन का त्योहार है।  इस मूल परम्परा के दर्शन हमें छत्तीसगढ़ की दीवाली जिसे यहाँ देवारी कहा जाता है, उसमें आज भी दिखाई देता है। यह परम्परा सुआ गीत,  ग्वालिन स्थापना, सुरहुति, खिचड़ी (अन्नकूट), मातर मड़ई,  और जेठोनी के रूप में महीने भर में सम्पन्न होती है। जहां छत्तीसगढ़ के उत्तरी हिस्से सरगुजा में यह सोहराई परब है वहीं दक्षिणी हिस्से बस्तर में दिवाड़ है जिसमें ‘हुलकिंग पाटा’ की धूम रहती है। मध्य छत्तीसगढ़ में लक्ष्मीपूजन की रात इसरदेव (संभू) और गौरा (पार्वती) का बिहाव होना है। इसी बिहाव के निमंत्रण और आयोजन हेतु धन धान्य का संग्रह करने लड़कियां और महिलाएं घर-घर के लिए निकलती हैं और सुआ गीत गाती हैं।  गौरतलब है कि लक्ष्मीपूजन की रात यहां शिव पार्वती का विवाह हो रहा है अर्थात छत्तीसगढ़ की मूल परम्परा में देवशयनी नहीं है क्योंकि देवउठनी के पहले ही स्वयं आदिदेव शिव का विवाह हो रहा है। विवाह की यह रात छत्तीसगढ़ में ‘सुरहुति’ कहलाती है। इस विवाह पर डॉ. भुवाल सिंह ठाकुर का यह लेख ‘छत्तीसगढ़ की दीपावली : सुरहुति’  प्रस्तुत है -

-पीयूष कुमार

 छत्तीसगढ़ की दीपावली : सुरहुती


सुरहुत्ती अर्थात गौरा गौरी के विवाहोत्सव और दीपदान का दिवस। कार्तिक अमावस्या के दिन जब पूरा देश लक्ष्मी पूजन करता है उस दिन छत्तीसगढ़ में लक्ष्मी पूजन के साथ एक विशिष्ट लोकपर्व भी मनाया जाता है जिसे 'गौरी गौरा विवाह लोक उत्सव' कहा जाता है।

गौरा अर्थात् शिव और गौरी से आशय है पार्वती। गौरी -गौरा विवाहोत्सव हालांकि लक्ष्मीपूजन की रात्रि सम्पन्न होता है लेकिन इसकी मूल स्वरूप में यह पर्व गौरी और गौरा के जन्म,विवाह और विसर्जन तक के संस्कार तक विस्तारित है। गौरा -गौरी विवाहोत्सव की तैयारी  लक्ष्मीपूजन के 9 दिन पहले ही शुरू हो जाती। कहीं कहीं पर इसकी शुरुआत 3 या 4 दिन पहले भी शुरू होती है। यह पर्व मुख्य रूप से आदिवासी समाज के निर्देशन में सम्पन्न होता है। ख़ासकर छत्तीसगढ़ के मैदान में गोंड एवं कंवर जनजाति द्वारा लेकिन छत्तीसगढ़ के मैदानी क्षेत्र के गांव में अगर दोनों जनजाति के निवासी नहीं है तो गांव का कोई भी समुदाय इस पर्व को मिलजुलकर सम्पन्न करते हैं।ध्यान देने वाली बात यह है कि लक्ष्मीपूजन के दिन छत्तीसगढ़ के लगभग हर गांव में गौरी गौरा की बारात निकलती है। यह छत्तीसगढ़ लोक की विशिष्टता है।


गौरी गौरा लोक उत्सव की शुरुआत लक्ष्मीपूजन के 9 दिन पहले हो जाती है। इसकी शुरुआत से जुड़े लोकरस्म भी है। गांव में गौरा चौरा के पास महिलाएं (मुख्य रूप से आदिवासी) एकत्रित होकर गड्ढे में तांबे का टुकड़ा, मुर्गी का अंडा और पांच प्रकार के फूल को कुटकर अर्पित करते हैं। तत्पश्चात बोरझरी के कांटे गौरा चौरा को समर्पित किये जाते हैं। वे महिलाएं टोकरी में फूल लेकर लोकगीत गाती हुई लोकनृत्य करती है। इसमें गौरा और गौरी का आह्वान किया जाता है। इस प्रक्रिया को "फूल कुचरना"कहा जाता है। नृत्यरत महिलाएं गाती हैं-

एक पतरी रैनी भैनी राय रतन हो दुरगा देवी

तोरे शीतल छांव चौकी चंदन हो पीढूली

गौरी के होथय मान जईसे गौरी हो मान

तुम्हरे तइसे कोरवा के डार पाने ल खाथव हो

फुले पहिरथय खेलत सगरी के पार...

लोक की महिलाएं गौरी और गौरा की प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हे वंदनीय हम सभी महिलाएं पत्तल में पुष्प रूपी लोकरतन लाये हैं हे गौरा रूप दुर्गा देवी तुम्हारे शीतल छाया रूपी आशीष के कारण हम सबके जीवन में उजाला है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि लोक नारियां सोना, चांदी, हीरे जवाहरात गौरा को अर्पित नहीं कर रही है बल्कि अपने आसपास मौजूद पुष्प और वनस्पति उसे अर्पित कर रही हैं जिसे वे रतन कहती हैं। मनुष्य और प्रकृति के सहजात संचरण के साथ अपने लोकदेव को बिना अतिरिक्त प्रदर्शन के प्रणाम भाव का अनूठा पक्ष है गौरा गौरी पर्व।

शुरुआत के 9 दिन जिस 'फूल कुचरना संस्कार' की बात हो रही है वह निराकार गौरा- गौरी का है। सभी महिलाएं अपने मनोनुकूल अपने आराध्य को देख रही है। यह रूप भगवान को चारदीवारी में बांधने की बंदिश से जुदा है। आगे छत्तीसगढ़ की नारियां समवेत स्वर में कहती है -  हे गौरी देवी हम आपको अपने सूखे लकड़ी से निर्मित पीड़हा में अपने शुभ प्रतीक बनाकर उसमें स्थान ग्रहण करने के लिए आमंत्रित करते हैं। यहां आदिवासी समाज की महिलाएं सूखे लकड़ी से पीड़हा (आसन) बनाये है न कि वृक्ष को काटकर। यह उनके लोककारीगरी के साथ उनके जागृत बोध में लबरेज़ श्रम के सौंदर्य का पता देता है। ये महिलाएं इस प्रकार गौरी को मान दे रही है।


वे आगे कहती है- हे गौरी जैसे हम तुम्हारे मान रखेंगे वैसे ही तुम हमें अपने कोरा (गोद) में हमें स्थान देती हो। आगे भक्त और भगवान दो न रहकर एक हो जाते हैं। गौरी अभी जन्म नहीं ली है सिर्फ उसकी परिकल्पना यहाँ की गई है। लोक स्त्रियां गौरी को अपने जीवनचर्या के उल्लास से परिचित करा रही हैं- हे गौरी हम सब पान खाते हैं। पान लालिमा का प्रतीक है। स्त्री जीवन के सहज उल्लास का भी। वे स्त्रियां फूल पहनती है अर्थात् फूलों का शृंगार करती है और सागर अर्थात् तालाब के पार (किनारे) पर खेलती है। छत्तीसगढ़ में विशाल तालाब को सागर भी कहा जाता है। यहां ऐसा लग रहा है मानो कोई सखी अपने से दूर रहने वाली सखी का अभिनन्दन करने के लिए उसे अपने विविध जीवन प्रसंगों को सविस्तार बताकर आमंत्रण दे रही हो।यह आमंत्रण लोक नारियों द्वारा गौरा-गौरी को है। निमंत्रण के साथ ही लोकनारियां समस्त जनसमुदाय और देवी देवताओं का आह्वान करती है-

गौरा जागे मोर गवरी जागे, जागे सहर के लोग

बाजा बाजे मोर ईसर औ नचनियां  जागे गवइया लोग

बैगा जागे,मोर बैगिन जागे,जागे सहर के लोग…

लगातार फूल कुचने के रस्म के बाद लक्ष्मीपूजन के दिन सभी स्त्रियां और पुरुष गौरा-गौरी की प्रतिमा निर्माण के लिए मिट्टी लाने जाते हैं। गढ़वा बाजा छत्तीसगढ़ की विशेष पहचान है जब गौरा -गौरी के लिए ग्रामीण जन तालाब या नदी के किनारे समूह में जाते हैं उस समय गढ़वा बाजा की लोकधुन नई स्वरलहरियां बिखेरती है। इस अवसर के लिए छत्तीसगढ़ के वाद्य कलाकारों ने विशेष रूप से गौरा -गौरी पार (लोकधुन) का निर्माण किया है। जिसमें विशेष प्रकार की गति और उत्सवधर्मिता का बोध होता है। गौरी गौरा निर्माण के लिए डिलवा (ऊंचे स्थान) से मिट्टी लाने का रिवाज है। यह ऊंचा स्थान शिव के निवास कैलाश पर्वत का प्रतीक है। मिट्टी कोडने के दौरान विभिन्न लोकरस्म अदा की जाती है। कोड़े गए मिट्टी को कुंवारी मिट्टी कहा जाता है। कुंवारी मिट्टी के गौरा वाले भाग को नए डलिया में  डालकर कुँवारा लड़का उठाता है और गौरी वाले भाग को कुंवारी लड़की। मिट्टी कोड़ने के दौरान जो लोकगीत छत्तीसगढ़ में गाये जाते हैं वह ईश्वर के मानवीकरण का अद्वितीय रुप है-

राजा हिमांचल गोंडे राजा

माटी कोड़ें बर जात हे हो

कहां अउ गौरा रानी जाति

जनमल कहां लिए अवतार हो

डिलवा के माटी मोरा जाति जनमल

राजा हिमांचल घर लेहे अवतार हो...

हाथे झन लागय भाई गोंडे झन लागय

मैं नारफुल सहित हादों डिलवा म

नागिन नाग रखवार हो

एक कली जिरत है चुलमाटी

दूसर कली गौरा रानी ल भरत हे हो

डहर डहर आवत हे गोडे राजा

राजा हिमांचल घर आत हे हो…


छत्तीसगढ़ लोक में गौरी और गौरा को मिट्टी से उत्पन्न माना जाता है। उनके रूप के सिरजनहार भी मनुष्य होते है। भगवान को भक्त सिरजे यह अद्भुत उत्सव छत्तीसगढ़ की अपनी विशेषता है। स्त्रियां सामूहिक स्वर में गा रही हैं कि राजा हिमांचल मिट्टी कोड़ने जा रहे हैं। स्त्रियां गौरा रानी से प्रश्न कर रही हैं कि आप कहां अवतार लेती हो? गौरा उत्तर देती है हिमांचल राजा के घर। यहां हिमांचल का घर लोक नरनारियों का गांव है। जहां कोई महल नहीं बल्कि प्राकृतिक ऊंचे नीचे उठान लिए मिट्टी है जहां गौरा जन्म ले रही है। लोक नारियों की वात्सल्यजनित पुकार दर्शनीय है मिट्टी कोड़ने वाले पुरुषों से वे कह रही है कि इस डिलवा के नीचे गौरी शिशु रूप में है इसलिए प्रेम से धीरे धीरे इस मिट्टी को हटाओ। किसी का हाथ और पैर शिशु पर नहीं लगना चाहिए। नारफुल सहित जैसे शिशु मां के गर्भ से जन्म लेता है उसी प्रकार नारफुल सहित गौरी मिट्टी के डिलवा से निकाला जा रहा है। वात्सल्य का ऐसा लोक रूप गौरी गौरा पर्व की विशेषता है। इस संस्कार में मिट्टी का मनुष्य द्वारा मानवीकरण दुनिया में अनूठी है। मिट्टी के प्रति वात्सल्य का यह रूप आगे बढ़ता है। स्त्रियां मिट्टी रूपी नारफुल में लिपटी गौरी को टोकरी में स्थान दे रहे हैं। जनसमुदाय अपनी बेटी गौरी को हिमांचल बनकर गांव के बीच में ले जा रहे हैं।

मिट्टी के रूप में गौरा-गौरी गांव के उस स्थान पर लाया जाता है जहां अब प्रतिमा निर्माण का कार्य सम्पन्न होना है। अधिकांश गांवों में गौरी गौरा के लकड़ी सम्बन्धी सजावट बढई द्वारा और मिट्टी सम्बन्धी सजावट और मूल प्रतिमा निर्माण लोहार (विश्वकर्मा) या कुम्हार जाति के लोग करते हैं लेकिन जहां इस जाति के लोग नहीं रहते वहां कोई भी जानकार व्यक्ति इस कार्य को सम्पन्न करता है। अगर गौरी गौरा के लिए मिट्टी कोडाई उनका शिशु रूप है तो प्रतिमा निर्माण उसका युवा रूप। गौरी गौरा की प्रतिमा को मूल रूप से लाई गई कुंवारी मिट्टी का बनाया जाता है। सजावट के लिए इस समय खेतों में मौजूद धान की बालियां, मेमरी, सिलयारी आदि प्राकृतिक वनस्पतियों का उपयोग किया जाता है। साथ ही अब गौरी गौरा को रंगबिरंगे कागजों (सनपना) और अन्य साधनों से भी सजाया जाता है।

गौरी को कछुएँ में और गौरा को बैल (नन्दी) की सवारी में बैठाया जाता है। इस प्रकार धूमधाम से गौरा और गौरी को विवाह के लिए तैयार किया जाता है। लोकसमुदाय की सौंदर्यबोध का एक रूप है यह उत्सव। जब गौरी- गौरा की प्रतिमा बनकर तैयार हो जाती है तब गढ़वा बाजा में गौरी गौरा पार (धुन) बजाते हुए गौरी-गौरा के स्वागत के लिए कलसा निकालने हेतु पूरे गांव लोगों और देवी देवताओं को निमंत्रण दिया जाता है-

करसा सिंगारत बहिनी रिगबिग सिगबिग

करसा सिंगारत बहिनी बड़ निक लागे

बहिनी सिंगारत बड़ सुख लागे भईया!


कलसा निकालने के आमंत्रण के बाद समस्त ग्रामवासी शिव (गौरा) के बारात में शामिल होने हेतु प्रतिमा निर्माण स्थल में आते हैं। कुंवारी लड़की गौरी को सिर में उठाती है और कुँवारा लड़का गौरा को फिर बारात निकल पड़ता है। शिव -पार्वती  के बारात का स्वागत छत्तीसगढ़ के लोकजन अनूठे रूप में करते हैं। सर्वप्रथम गौरा गौरी धुन में सब मग्न होकर नाचते हैं। लड़कियां 'देवी चढ़ती' है। देवी चढ़ने के दौरान वे ‘झूपती’ हैं। इसमें वे अपने सिर को हिलाती है और जोर जोर से आवाज करती हुई धरती में लोटती हैं साथ ही स्त्री और पुरुष जलती हुई अग्नि को तेल के रूप में शरीर में गिराती है। इस गर्म तेल को शरीर में गिराने की क्रिया को 'बोड़ा लेना' कहते हैं। कुश की रस्सी को लपेटकर 'सांट' बनाया जाता है। जिसे लड़के और लड़कियां नृत्य के दौरान अपने शरीर में इस सोंटे को मरवाती है। सांट और बोड़ा लेने का सम्बंध मनोकामना सिद्धि हेतु किया गया प्रयत्न है। गौरी गौरा लोकधुन में शरीर का झूमना और धरती पर लोटना लोकसंगीत के मर्मभेदी प्रभाव का अलहदा रूप है।


अब गौरा -गौरी की बारात निकली है। स्त्रियां गा रही हैं -


लाले -लाले परसा

लाले हे खमार

लाले हे इसर राजा घोड़वा सवार...

घोड़वा कुदावत ईसर पैया वो लरकगे

गिर परे माथा घलो फुले हो लाल...

एक तोर बरे बिहईया हो लाल

बरे बिहईया बहिनी सब दिन सब दिन

हम तुम डुमरी के फुले हो लाल...


इस लोकगीत में ईसर राजा से आशय गौरा (शंकर) से है। जिस प्रकार पलाश, खमार और डूमर के फूल लाल होते हैं उसी प्रकार लालिमा से युक्त लोकदेव गौरा घोड़े में बैठकर आगे बढ़ रहे हैं।

बारात के दौरान विवाह सम्बन्धी सभी रस्मों से सम्बंधित लोकगीत गाये जाते हैं। एक प्रकार से लोक की यह उत्सवी त्यौहार देवप्रबोधिनी एकादशी (तुलसी विवाह) से पहले गौरा गौरी का विवाह शास्त्र परम्परा से इतर लोक परम्परा की द्योतक है। दूसरे रूप में है लोकजीवन में व्याप्त विवाह संस्कार से नई पीढ़ी को परिचित कराने का आयाम भी है।

जब गौरा अपने ससुराल के लिए निकल पड़ती है तब लोकनारियाँ उनके लिए विभिन्न प्रकार की शुभकामनाएं व्यक्त करते हुए कहती है-


धीरे धीरे रेंगबे गौरी ओ गोंटी गडी जाही

गोंटी गडी जाही गौरी ओ खड़ा होई जइबे

जाये बर जाबे गौरी ओ फूल टोरी लाबे

फुलवा के टोरत गौरी ओ कनिहा पिराही

कनिहा पिराही गौरी ओ खड़ा होई जाबे

जाय बर जाबे गौरी ओ देइदे असीसे

चुरी अम्मर रहय गौरी ओ जियो लाख बरिसे



बरात समाप्ति के बाद गौरा गौरी को नियत स्थान (गौरा चौरा) ले जाया जाता है। वहां गौरा गौरी को सोने (विश्राम) करने कहा जाता है-


सुतव गौरा मोर सुतव गौरी हो 

सुतव सहर के लोग

सुतव भवइया मोर सुतव बजईया हो

सुतव सुनइया लोग 

हम धनी सुतबो हो मैया के कोरवा

चंदा ल दइबोन असिस… 

विवाह और विश्राम के बाद पुनः गौरी -गौरा को जगाया जाता है। अब समय गौरा -गौरी का विसर्जन का होता है। बरात के समय का उत्साह अब करुण रस में बदल जाता है। पूरे ग्रामवासी बाजे गाजे के साथ गौरा- गौरी को सिर पर धारण कर नदी या तालाब में विसर्जन करने जाते हैं- 


ढेला ढेलौनी जौहर सेनी ढेला ल मारे तुसार

ईसर राजा कातिक नहाये धोतियां ल मारे तुसार…

जनसमुदाय विसर्जन में भी आशा देखता है और कहता है गौरा -गौरी कहीं जा नहीं रहे बल्कि वे कार्तिक स्नान करने आएं हैं। विसर्जन के बाद गौरा गौरी की मिट्टी और सनपना (चमकीली कागज) और विभिन्न वनस्पतियों को एक दूसरे के बीच शुभ भाव के साथ वितरित किया जाता है। छत्तीसगढ़ में मित्र बनाने की अद्भुत परम्परा है जैसे दवना के पत्ते को साक्षी मानकर दवनापान बदना, गंगा जल को साक्षी मानकर गंगाजल बदना, जंवारा को साक्षी मानकर जंवारा बदना, उसी प्रकार गौरा गौरी के सनपना को साक्षी मानकर सनपना भी बदते हैं।

गौरा गौरी का यह विवाहोत्सव लोक द्वारा माटी का उत्सव है। माटी जो जीवन का सच है। माटी जीवन और सृजन का प्रतीक भी। जिस माटी की प्रकृति को अपने कर्म से जोड़कर मनुष्य गौरा -गौरी को मूर्त जीवन बोध देता है वहीं कुम्हार दीपावली के सार दीपक बनाता है। मिट्टी प्रकृति है तो दीपक संस्कृति।

(तस्वीरें : पीयूष कुमार, बागबाहरा, छत्तीसगढ़)


लेखक परिचय

डॉ. भुवाल सिंह ठाकुर

असिस्टेंट प्रोफेसर (हिंदी)

शासकीय नागार्जुन विज्ञान स्नातकोत्तर महाविद्यालय

रायपुर (छत्तीसगढ़)

मोबाइल : 7509322525

 

 

Thursday, October 16, 2025

घोड़ी- लड़के की शादी में गाए जाने वाले डोगरी लोक गीत

 




हिंदी में भावार्थ  


चूरी कचूरी देही में घोली है आओ बेटा खाओ जी

घर पहुंचते ही मां पूछ रही है, सास ससुर कैसे हैं
मेरा ससुर तीन लोकों का राजा है और सास गंगा जल की तरह है

नौ महीने बेटे को गर्भ में रखा, अब जा सास ससुर को सराह रहा है
गुस्सा मत हो मेरी मां दोबारा ससुराल नहीं जाउंगा

चूरी कचूरी देही में घोली है आओ बेटा खाओ जी

घर पहुंचते ही बहन पूछ रही है कि साला साली कैसे हैं
मेरी सालियां चंबे की कलियां हैं और साले की क्या  तारीफ करूं

छह महीने भाई के के साथ गलियों में खेली, अब जा साली साले की प्रशंसा कर रहा है
गुस्सा मत हो मेरी मां दोबारा ससुराल नहीं जाउंगा

चूरी कचूरी देही में घोली है आओ भाई खाओ जी

घर पहुंचते ही भाभी पूछ रही है कि प्रियतम कैसी लगी
सूर्यादय के समय जैसे किरणें फैलती हैं, वो तुमसे ज्यादा सुंदर है

छह महीने देवर को खाना बना कर खिलाया, अब जा तारीफ पत्‍नी की कर रहा है
गुस्सा मत हो मेरी भाभी दोबारा ससुराल नहीं जाउंगा

चूरी कचूरी देही में घोली है आओ देवर जी खाओ जी


गायिका- शीला शर्मा

Thursday, December 26, 2024

फिलहाल - महिंद्र सिंह 'रंजूर'


 
"तब सही मायनों में होगी पहचान
जब दोस्त चला जाएगा
दोस्त के जाने के बाद
चाय के कप से उठती भाप के साथ
शायद बहस न उठ पाए इस बार
सड़कें करें याद
आवारगी में सराबोर पाँव
बेशक
मुश्किल हो उठेगा
एक झटके से हमेशा की तरह
पूरे संसार को पकड़ लाना अपने तक
कि ज़िंदगी को नथ डालने का सुरूर लेना ..."

जम्मू में नौकरी करने की जो उपलब्धियां रहीं, उनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है, पंजाबी साहित्यकार/संस्कृतिकर्मी महिंद्र सिंह 'रंजूर' से मैत्री। औसत कद -काठी का अधेड़ पुंछी सिक्ख, जो अपनी कर्मठता की बदौलत, प्रत्येक संस्कृतिकर्मी की धमनियों में गूंजता । 'पंजाबी लेखक सभा' को निर्बाध गति से चलाने व इस संस्था का भवन बनाने की मशाल उठाए, वह जहाँ बैठता -बोलता, लोग सुनने को मजबूर हो जाते। मार्क्सवाद का एकनिष्ठ कारकून। जब इप्टा, जम्मू में दोहरे चेहरे वालों का बोलबाला हो गया तो उसके ही प्रयासों से 'संस्कृति मंच, जम्मू (समज )' की नींव रखी गयी। यह नाम भी उसी का दिया है।

वह मूलतः कहानीकार था। कविताएँ कम लिखीं, पर जो लिखा पत्थर पे लकीर। मध्यम किसानी परिवार से बावस्तगी रखता, वह एनसाइक्लोपीडिया रहा। हर जगह हाज़िर। उसकी चुप्पी भी बोलती। मुझे याद है, जब पहली बार मेरे दफ़्तर आकर मिला तो मैंने अपना पहला कविता-संग्रह भेंट किया। मैं, अपने कवि होने पर मुग्ध था। संग्रह गवर्नर -हाऊस में रिलीज हुआ था। उसने संग्रह लिया, कुछ नहीं बोला और चला गया। सच्चे कम्युनिस्ट लड़ीवार काम करते हैं। वह इसी की कोई श्रृंखला पकड़े था। मैं विद्यार्थी जीवन के स्टूडैंटस- स्ट्रगल का अभ्यस्त।कोट के कॉलर पर फख्र से मार्क्स-एजेल्स का बैच लगाए घूमता। यह तो कालान्तर में सिद्ध हुआ कि ऐसा बैच रूह पर लगता है।

मेरे और उसके जो सम्बन्ध रहे, वे शब्दातीत हैं। हमने मिलकर बहुत काम किया। सड़कों से लेकर दीवारों तक क्रांतिकारी स्लोगन लिखे। नुक्कड़ों/चौराहों पर गीत गाए, नाटक खेले, कविताएँ पढ़ीं। अखबारों में कॉलम लिखे। गाँव-गाँव लोगों के बीच गए, रहे। कई आयोजन किए आयोजनों में शामिल रहे। गदरी मेलों में दर्जनों बार 'शहीदे आज़म' भगत सिंह व 'पाश' से सम्बन्धित पोस्टर लगाए। जम्मू में पोस्टर-कविता को 'समज' के आयोजनों में प्रासंगिक बनाया। युवाओं को साथ जोड़ा, इत्यादि। उस समय कई पंजाबी-लेखक, रंजूर को पसंद नहीं करते थे। इसके पीछे की धार्मिक रूढ़िवादिता पर वह केवल हँसता।

जब मैं मुंबई में था, वह चला गया। दोस्त चिल्लाए, तुम विलाप नहीं करते। क्यों रोयूँ? वह अपनी शैली मुझे दे गया है। 
अधिक नहीं, उसके जाने पर लिखी कविता; 'हमारा वसंत' पढ़ें।


| हमारा वसंत |


तुम्हें कहाँ से पकडूं रंजूर^
कहाँ से शुरू करूँ - कसम ले लो यार! 
बिल्कुल नहीं रोया हूँ 
चली गई है तुम्हारी देह

फोन पर दोस्तों ने बताया बार-बार 
तुम्हारा अंतिम संस्कार 
फूट-फूट बिलखता सामने खड़ा है घर-परिवार

नहीं रोया हिचकियां नहीं बंधी हैं 
गश भी नहीं आया 
यार मुर्दा होते समय की छाती के बीचों-बीच 
जो जिंदगी का परचम हमने फहराया 
उसे चूम-चूम आती 
सहलाती रही हवा, हर बार

पूरा दिन बीता शीशा ताकते, 
निहारते आंखों से माँगी भीख, 
बेशक दो बूंद आँसुओं की 
कंठ को वास्ते दिए

दोस्ती से लवरेज-आवारगी के 
जग से छुपाए 
मुलायम और फेनिल रहस्यों के 
सच्ची यार! 
एक चीख तक नहीं निकली

कैसे लूं, साधू कैसे --- 
फरवरी के इस महीने को 
वसंत भरे तेवर 
हम जो पीते, सुड़कते रहे उम्र तमाम 
अकेला, बेबस कर ही नहीं रहे

यही वे दिन हैं न 
जब फुंकी देह दीप* की और 
हमने चिता को ज़ोरदार सैल्यूट किया 
लोगों ने उस रोज़ 
तवी** को हमारी आँखों से देखा

पसरी भयावह हुँआ-हुँआ में 
उदास दिनों को खोल डालने का दम खम 
हमारे ही माथों पर 
मणि बन खिलता रहा है 
यह हमारा ही वसंत रहा है

यहाँ, जोगियों ने जब छेड़ा तरन्नुम 
समझदारों को तौफीक हुई 
यहीं रची गईं बहारें नई-नई 
ठठाकर, नौजवानों ने अंगड़ाई ली 
नुक्कड़ों के ढाबे फूले-फले 
और कच्ची-पकी रोटियों ने 
भूख की तमीज हासिल की

तो इस सबको आज इकहरा जानूं क्यों 
चुक चुका हमारा वसंत 
मानूं क्यों ---

धुआं नहीं लग रहा है 
श्मशान में वनस्पतियों को 
तुम्हारी जलती देह का 
नहीं हैं कहीं प्रेत-आत्माएं 
सन्नाटा नहीं है 
नहीं है निर्जन, उचाट, बियाबान 
विलाप नहीं है

घूम रही है धरती निर्धारित कोण 
पर दूर खारे महानगर में, मैं 
तुम्हारे साथ 
तुम मेरे साथ, रंजूर 
ठीक उसी तरह 
ओढ़े वसंत।

रंजूर^: मार्क्सवादी संस्कृतिकर्मी, पंजाबी लेखक
दीप*: मार्क्सवादी चिंतक, पत्रकार, डोगरी-ग़जल के गालिब
तवी** : जम्मू की प्राचीन नदी



दोस्तो, रंजूर आज भी साथ हैं। इधर उनकी हस्तलिखित एक सुन्दर कविता मिली, कुछ और दस्तावेज़ भी। कविता का अनुवाद हुआ, आपके लिए प्रस्तुत है:  

| घर और सावन
~ महेंद्र सिंह ' रंजूर ' 


मेरे और घर वालों के लिए
सावन जब भी आया है
डर व ख़ौफ़ के काले बादल
साथ अपने लाया है

मेरे परिचित, संगी-साथी
इसी ऋतु वजूद में आएँ
झूम-झूम गीत सुनाएँ
वाह-वाही में डूबते जाएँ

शायद मोर ख़ुशी के अन्दर
पंख फैलाएँ नाचते आएँ
कोयलें आम की डाली से
चहचहाते गीत सुनाएँ
शायद, विरह की मारी
नई-नवेली दुल्हन 
परदेसी पिया की याद में
मस्ती भरी अंगड़ाई लेती
आँखों में ही रात गुजारे
प्यारा उसका पर न आए
जब भी अंबर पर
सावन के बादल छाए हैं
मेरे घर वाले
बेहद घबराए हैं

निर्बल; बूढ़ा बापू
बदनसीबी की छत चढ़कर
किस्मत के दाने भूने है
अनहोनी कोई मेरे घर को
तबाह न कर दे
मौसम रहित माता मेरी
आस की कच्ची दीवार की दरारों का
मजबूरी सने कीचड़ के तोड़ निवाले
पेट भरे है
बिना लय आशाएँ देखती
सांस छोड़ती, बिन कुछ खाए
थकी-मांदी ही सो जाती है
और सोए भी बुदबुदाती है
मुआ सावन अभी न आए
मेरे, घर वालों के लिए...

बच्चा जन उठी मेरी बीवी
पीली, ज़र्द, डूबी आँखों से
देह अलसाई घसीट-घसीट कर
लहू की लोथ झोली में रखकर
छिपाए हुए छाती के नीचे
बादल की अँधेरी वेला में
सारी-सारी रात जागती
यही बोल, बोलती जाए
छत से टपकता पानी कहीं से
नवजात की देह पर पड़ न जाए
होंठ फिर उसके बुदबुदाएँ
मुआ सावन कभी न आए
कभी न आए...

सिम-सिम वर्षा का पानी
घर की छत पर
अजब नक्काशी उभार रहा है
कहीं मेरी गरीबी का हाथी
अडोल खड़ा, सूंड लटकाए
कहीं ज़रूरतों के सांप बैठे, फन फैलाए
कहीं साहस का शेर 
भूखा-प्यासा भी मायूस नहीं है

इन्हें देखता वर्षों से, सो जाता हूँ
और जब आशा की पहली किरण
दीवार के छेदों से झांके
नई आस का पल्लू पकड़े
इक उम्मीद दिल में लेकर
घर से बाहर आ जाता हूँ
कैसे कहूँ फिर, सावन आ जाए

जहाँ देश के ज़्यादा लोग
कच्चे घरों में रहते
बाप मेरे से सारे बापू
बूढ़ी माँ सी सभी माताएँ
पत्नी, लड़कियां, सहमे बच्चे
डर, ख़ौफ की जून हैं भोगें
तो क्यों चाहें
मुआ सावन आ जाए
मेरे, घर वाले सभी...!

(रंजूर का चित्र वरिष्ठ पंजाबी साहित्यकार, फिल्मकार डा. बलजीत रैना ने अपनी पंजाबी पत्रिका "आबरू" के माध्यम से उपलब्ध कराया है। उनका हार्दिक आभार।)



प्रस्‍तुति-


मनोज शर्मा
सम्पर्क: 78894 74880