Saturday, March 22, 2014

नरेश कुमार खजुरिया





जन्म : कठुआ के कटली गाँव में 10 जनवरी 1991 को
माँ : सुश्री राजकुमारी
पिता : बंसीलाल शर्मा
शिक्षा : जम्मू वि० वि० से हिन्दी विषय में परास्नातक
लेखन : 2008 में कविताओं से शुरुआत
अन्य : लोक मंच जम्मू से जुड़े हैं

हिन्दी कविता पर शोध कर रहे  नरेश शर्मा की कुछ नयी कविताएँ मिली। अच्छा लगा पढ़कर। यहाँ विचार नहीं आत्मीय भाव सुखद हैं . इसका ध्यान कवि को विशेष तौर पर रखना होगा। बिना किसी पृथक मुहावरे के भी इस बात की आश्वस्ति है कि अभाव , सच और प्रेम को जीता कवि प्रतिबद्ध दिखाई देता है। यह प्रतिबद्धता बनी रहे। इसी कामना के साथ प्रस्तुत हैं इनकी कविताएँ




यह फूल किसके लिए है

मैं अक्सर  जिसे
तोड़ लेता था
तुम्हारे लिए
आज मैंने फिर
तोड़ लिया है वह लाल फूल
आओ तुम
वैसे ही  पूरे  हक़ से
जैसे पहले आती थी
छीन लेती थी
भरी महफ़िल में
मेरे हाथों का फूल

वैसे ही पूछो
मेरी किताब के हाशिये पर लिखकर
यह फूल किसके लिए है ...



सचमैंने जब भी बोलना चाहा सच
तुमने मेरे होठों पर उंगली धर  दी
पर तुमने ही सिखाया है झूठ बोलना बुरी बात है ...

सच मेरा स्वभाव बन गया है
ऐसा सच
जो प्लेटो द्वारा कविता में तीसरी जगह बताया गया
मैं उसी जगह  से बोल रहा हूँ सच
तुम मुझे  रोक नहीं सकते
कैसे रोकोगे
तुम्हारी अपनी सचाई
जा दुबकी है
कई परतों में
तुम भावशून्य
मुखौटे पहनकर बड़े मंच से बोल रहे हो -

तुम  नेता
अभिनेता
धर्मनेता हो
अमन चमन स्वर्ग की बातें करते हो
पर आईने से डरते हो
इसलिए मुझे बार बार
सकुरात  चेताते हो !



माँ के लिए

मेरी झोपड़ी में लट्टू नहीं
जलती थी ढिबरी
हवाओं से डरती ...

खाना परोसते - परोसते
माँ कितनी ही बार ढिबरी को हाथों से ढक
बुझने से बचाती थी
डगमगाती रोशनी में
माँ  मुझे  'क' से कबूतर
'ख' से खरगोश पढ़ाती थी

झोपड़ी आज मकान हो गई है
रंग बिरंगे बल्ब टयूब लाइट्स हैं
ढिबरी न जाने मकान की नीव या दीवार की
किस ईंट के नीचे दब चुकी है
जिसकी रोशनी में मैंने सीखा
'क' से कबूतर
और लिख रहा हूँ 'क' से कविता
मुझे कविता लिखता देख
माँ खुश है
झुर्रियों भरे चेहरे पर कुलांचे भरती हँसी को देख
मेरा कवि हृदय मुग्ध है
मैं सौभाग्यशाली हूँ
अभी सलामत हैं
मुझे रोशनी देने की खातिर
हवाओं से संघर्ष करते हाथ !
  

पड़ोसी के लिए

उसके चूल्हे आग जली
मेरे कलेजे ठण्डक पड़ी ...


सम्पर्क :-
नरेश कुमार खजुरिया
गाँव व डाक - कटली
तह० - हीरानगर , जिला - कठुआ
जम्मू व कश्मीर [१८४१४४]
दूरभाष - ०९८५८२४७३२९






प्रस्तुति :-
कमल जीत चौधरी
काली बड़ी , साम्बा [१८४१२१]
दूरभाष - ०९४१९२७४४०३
ई मेल - kamal.j.choudhary@gmail.com





(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)

Wednesday, March 5, 2014

कुंवर शक्ति सिंह


जन्म- 10 जनवरी 1977, अखनूर (जम्मू व कश्मीर)
शिक्षा- यूनिवर्सिटी आफ जम्‍मू से फाइन आर्ट्स में पांच वर्षीय प्रोफेशनल डिग्री
पहचान- जर्नलिस्ट और कालमनिस्ट
 

दैनिक कश्मीर टाइम्स को सन 1994 में पत्रकार के रूप में ज्वाइन किया। सन 1998 में साप्ताहिक कालम 'दस्तक' को शुरू किया। उसके बाद सन 1996 से 1999 तक सब एडिटर के तौर पर कार्यरत रहे। सन 1999 में दैनिक जागरण के साथ पत्रकार के तौर पर काम भी किया।
फ्रीलांसर के तौर पर जम्मू से जुड़े मामलों और अनुभव कई पत्रिकाओं जैसे आटउलुक और द संडे इंडियन आदि में सन 2004  से साझा कर रहे।
 

दूरदर्शन जम्मू, श्रीनगर और दिल्ली के लिए नो वृतचित्रों को लिख चुके। आकाशवाणी के भी कई कार्यक्रमों में‌ शिरक्त।

छपे साक्षात्कार- वीपी सिंह, डा. असगर वजाहत, निदा फाजली, उस्ताद अहमद हुसैन, उस्ताद मोहम्‍म्द हुसैन, पद्मा सचदेव, अमृता प्रीतम, मधुकर, पंडित शिव कुमार शर्मा, जगजीत सिंह, उमर अब्दुल्ला, सईद अली शाह गिलानी, राजेंद्र यादव आदि
 

परिचर्चा- राम जेठमलानी, डा. फारूक अब्दुल्ला, उस्ताद अल्लाहरखा खान, उस्ताद जाकिर हुसैन, नक्‍श लायलपुरी, रामानदं सागर, डा. कर्ण सिंह, खुशवंत सिंह, महीदा गौहर आदि।


चिनाब के किनारे बसे खूबसूरत और ऐतिहासिक शहर अखनूर निवासी कुंवर शक्ति सिंह को पढ़ना या सुनना अपने आप को आइने में देखने जैसा है। सरल लहजे में सीधी और सटीक बात अपने अलग मुहावरे में कहना विशेषता है। इनकी कविताओं का अपना अलग मिजाज और महक है। यह शायद चिनाब के पानी की देन है। शक्ति सिंह की कविताएं साहस के साथ कई कठोर सवाल खड़े करती हैं। ऐसे सवाल जिनसे अकसर लोग पीछा छुड़ाना या जान कर भी अंजान बने रहना चाहते हैं। जब अंधी राष्ट्रभक्ति के नाम पर कुछ भी किया जा सकता हो या किया जा रहा हो, जब देश प्रेम की परिभाषा सत्ता के केंद्र में बैठे कुछ लोग तय कर रहे हों, जब राजनीति ने धर्म, जातियों, रंग, भाषाओं और क्षेत्रवाद का लबादा ओढ़ रखा हो, जब सच्ची बात कहने पर जीभ और होंठ काट लिए जा रहे हों, जब राजनीति ‌की चालों पर सवाल करना अपराध माना जा रहा हो, जब किसी को भी राष्‍ट्रद्रोही, आतंकवादी या माओवादी का लेबल चिपका कर सलाखों के पीछे ठोका जा रहा हो, ऐसे इस दौर में शक्ति सिंह की कविताएं ऐसे क्रूर समय से आंख मिलाती, दो दो हाथ करती, मनोबल बढ़ातीं और विद्रोह का बिगुल बजाती हैं। सच्ची बात और हाशिए पर खड़े व्यक्ति के साथ खड़े होने का संस्कार कुंवर शक्ति सिंह को उनके कवि (डोगरी के प्रसिद्ध साहित्यकार) पिता स्व. पद्मदेव सिंह निदोर्ष और माता कृष्णा ठाकुर से मिला हुआ है। 

'खुलते किबाड़' पर पहली बार सहर्ष उनकी कविताएं प्रस्तुत कर रहा हूं




नबील अहमद के लिए

मेरे दोस्त, पाकिस्तान!
मैंने हमेशा तुम्हें चाहा है दिल की गहराईयों से
और इन गहराईयों की टूटती सांसों से

जब मैं बहुत छोटा था
दादी ने बारादरी की छत्त से दिखाई थीं
जुगनुओं की तरह टिमटिमाती मुनावर की सड़कें
दादी सियालकोट की थीं
जहां अब मेरा दोस्त नबील अहमद रहता है
जिसका कई महीनों से फोन नहीं आया
यार नबील! तुम्हारे लहजे-तुम्हारी जवानी की कसम
तुम से जब मिला था
तो तुम में नजर आई थी एक मुक्कमल संस्कृति।
भारत की जमीन पर पांव रखते ही
भले ही कस्टम वालों ने
तुम्हारा लैपटाप खाली कर दिया था
मगर तुम्हारी सबसे अहम चीज
फिर भी तुम्हारे साथ रही

कई बार सोचता हूं
मैं क्यों भुला दूं नबील को
सियालकोट को
या तुम्हें पाकिस्तान?
मैं क्यों भुला दूं मेहदीं हसन, फहमिदा रियाज
या मुल्लिका पुखराज को?

अब समय आ गया है
हम जो चाहते हैं उसे खुल कर बयां किया जाए
हम नहीं चाहते दो एक जैसे पहाड़ों के बीच के फासले को
समझा जाए अंतरराष्ट्रीय सीमा
या अमन और मिलन का भविष्य टिका हो
राजनीति की गंदी चालों पर
या चंद जलती हुई मोमत्तियों पर
हमें लड़ना चाहिए अब
हम लड़ना चाहते भी हैं अब
हर हथियार से
दिल्ली और इस्लामाबाद में लहराते अधरम के विरुद्ध
वैसे भी हमारे बुजुर्गां ने कहा है
'अपने हक के लिए लड़ना जायज है'
या
'जंग और इश्क में सब जायज है'
सरहद पर बीड़ियां बदलते दो किसानों की खातिर
फैज की गजलों और लाहौर की गलियों की खातिर
अगर मैं कह भी दूं
पाकिस्तान जिंदाबाद
तो लोगों को क्यों लगे
कि मैंने
भारत को गाली दी है।



अंधेरे से सनसेट तक, एक मुक्ति यात्रा

सदी के जितनी लंबी
गहरी सुनसान रात में
रोशनी का एक छेद हो गया
समय! जिसकी खबर ही नहीं थी
जमी बर्फ में से निकले लगा
निकल आया मैं भी उस कारावास से
मालूम नहीं था किधर है जाना!
मुक्ति के लिए किधर होता है जाना
पिंजरे से आजाद पक्षी किधर है जाता
कच्चे चूल्हों का धुआं किधर है जाता

एक टूटी फूटी सड़क के किनारे
ठिठुरते हुए कुछ लोग बस का इंतजार कर रहे थे
सोचा, इन्हें पूछूं - जाना है किधर?
फिर रहने दिया
यह जो घड़ियाल लटका है मंदिर के भीतर
कहीं गिर न जाए पुजारी के सिर पर
सोचा, बता दूं, फिर रहने दिया
रहने दिया सारा काम अधूरा ही
रात, जो रातभर
अपने दुपट्टे से आसमान पौंछती रहती
रहने दी।

कहते हैं
जहां वास्तव में होता है सन-सेट
वहीं समाया है समय का भेद
कई जलसमाधियों और अग्निसमाधियों
से होता हुआ उतर आया हूं इस जगह
यहां एक साथ होते रहते हैं
कईं सन-सेट।




शहर जब सो जाता है

शहर जब सो जाता है
मैं सुबह तक पढ़ता हूं तेरे खत
किस्सों के पुतले बनाकर रखता हूं सामने
और दिल से कहता हूं
तुम्हारा न कहा हर शब्द

जिंदगी इसे ही कहते हैं तो
एक टेढ़ी-मेढ़ी
लंबी-छोटी लकीर
अगर कोई बच्चा ही खींच दे
तो क्या करें खुदाओं का

शहर जब सो जाता है
मैं तब सच से पीठ लगाए
देखता हूं झूठ
शहर जब जाग जाता है
मैं तब एक सड़क होता हूं।


अंतिम गृहयुद्ध

इस भारत की कसम
जो हमें कभी हजम नहीं हुआ
भले ही हम मुट्ठी भर बच गए हैं
कभी हाथ नहीं खड़े करेंगे
तुम्हारे किसी भी तंत्र के आगे
हमारा विचार सड़ा गला देगा
तुम्हारी व्यवस्‍था, तुम्हारा युग

इस भारत की कसम
जो भगत सिंह के बाद मर गया
हमारा कोई मसला नहीं
हम किसी मसले का हल नहीं चाहते
हम चाहते हैं सर्वनाश
जिस तरह किसान नई फसल से पहले
आग लगाता है अपनी जमीन को
ताकि धरती सजरी हो
और इस पर हो नया जीवन
इस भारत की कसम
जिसका सफेद साहफा रौंद दिया है
संसद की तरफ जाती गाड़ियों ने
कामरेड कोई विंटेज कार नहीं
तुम्हारी खिलाफत से भरा
परमाणु हथियार है
जो बना है किसानों के जत्‍थों से
भूख के तांडव से
धिक्कार और अपमान की जुल्मत से
कभी तो होगा अंतिम गृहयुद्ध
कभी भी हो सकता है अंतिम गृहयुद्ध




अब यहां नहीं रहता

कईं भजन, गंगा जल
और पूजा के फूल थे
उसकी आंखों में
बांसुरी की एक तान के जैसी थी
उसकी पूरी उम्र, उसका ‌अस्तित्व
उसका जिस्म था
जैसे हवा में उड़ता रंग रुहानी
उसका हर प्रेमी
अज्ञातवास में मोक्ष पा लेता था
अजीब जादुई किरदार था
सबको अपनी मंजिल सा लगता था
डूबते हुए सूरज की कोई किरण
तोड़ लेता था रात भर के लिए
सपनों की पूरी दुकान थी उसकी
और सांसें किराए पर देता था
कोई कहता है लाहौर की गलियों से आया था वो
कोई कहता है बनारस के घाट से आया था
यहीं इसी जगह रहता था
अब यहां नहीं रहता

लोग कहते हैं
जिन्न था, लौट गया चिराग में
कोई कहता है दिल्ली की झिलमिलाती सड़क पर
स्ट्रीट लाइट के नीचे खड़ा दिखा था

समय के निर्वात से धूल तो उतरे
तलाश जारी है!


संपर्क 

हाउस नंबर 48, वार्ड नंबर 2
अखनूर- जम्मू व कश्मीर
मोबाइल - 94196-31196
ई-मेलः  dastak.kt@rediffmail.com


(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)

Sunday, February 9, 2014

अनामिका शर्मा


जन्म :- ०६ अक्तूबर १९९१ में शाहजहांपुर ,उत्तरप्रदेश में 
शिक्षा :- उत्तरप्रदेश तकनीकी वि०वि० लखनऊ से स्नातक 
लेखन :- १९९९ में लघु कथा से आरम्भ , बाद में कविताओं और आलेख की और भी अग्रसर 
प्रकाशित :- अमर उजाला , स्वतन्त्र भारत , जन जन तक आदि पत्र - पत्रिकाओं में कविताएँ तथा आलेख प्रकाशित
प्रिय लेखक / कवि :- तसलीमा नसरीन , सआदत हसन मंटो , जय शंकर प्रसाद , निराला आदि 
अन्य :-  समकालीन कलाओं में भी रूचि , साहित्य के प्रचार प्रसार हेतु सोशल नेटवर्किंग को बहुत उपयोगी मानती हैं
 
अनामिका की यह कविताएँ प्रेम और आलोकिकता की सच्ची आंकाक्षा व्यक्त करती हैं। यह प्रेम धुएं से दूर जिस राजकुमार के महल की कल्पना करता है वह किसी क्रूर शासक और सत्ता की सहभागिता की इच्छा नहीं है। कद्धू का रथ और चूहों के घोड़े जैसा बिम्ब एक आम लड़की के प्रेम का सच्चा प्रतिनिधित्व करता है। जो इस बाज़ारवाद में अपने लम्हों तक को कैद होने देने  से बचाना चाहता है। अपना अस्तित्व तलाशती इस युवा कवयित्री को अनंत शुभकामनाओं सहित प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताएँ। 


सिन्ड्रेला 

सिन्ड्रेला..!
तुम आती रहना
सपनों, कल्पनाओं और आशाओं के घर में
पतझड़ में वसन्त की उम्मीद की तरह
ताकि लगता रहे मुझे
कि कद्दू बन जाएगा रथ
चूहे घो़ड़े बन उसे चलायेंगे
ले जायेंगे समय से पार
चूल्हे के धुएँ से दूर
किसी राजकुमार के महल में
उस समारोह में
जिसके चर्चे सुने हैं
हर किसी ने लम्बे समय से
और चमकनें लगेंगी मेरी जूतियाँ..


अस्तित्व
आती थी
समन्वय के समय में
वसन्त लेकर 
पतझड़ के बीतने पर
खिलतें थे
नवागंतुक
कोमल बागों की
सब्ज शाखों पर मिलती थी
नव ऊर्जा
प्राणिमात्र को
प्रकृति के इस परिवर्तन पर
परिवर्तित हुए
पृष्ठ
परिवर्तन के निमित्त
समय की पुस्तिका पर
विलुप्त हुए चिन्ह
मधुमास के सभी
अचानक प्रस्थान पर
प्रतीत हुआ
अस्तित्व
जीवन का
अग्रसर लुप्तता के पथ पर
दृष्टिगत हुआ
अवशेष
चिन्ह जीवन का
मस्तिष्क एवम् दृष्टिपटल पर
प्रतीत हुआ
प्रयासरत
वो शजर अस्तित्व हेतु
आज भी अपनी जगह पर।


लड़की, फ्रेम और यादें

वो लड़की कहती थी
तस्वीरें लेने से लम्हें ज़िन्दा नहीं रहते
उस ज़िन्दादिली के साथ
यादें फ्रेम हो जाती हैं

खुलकर जी नहीं पातीं 
हँसती हुई बड़ी-बड़ी आँखों से
रोती थी छिप-छिप कर
वो लड़की कहती थी
कैसे गल़त हूँ मैं
जो किसी और से तुम्हें माँगा है
मैनें भी तो अपना हिस्सा बाँटा है
अकेले में पहनती थी कभी साड़ी
सिंदूर लगा माथे पर
खामोशी से खुद को देखती जाती थी 
वो लड़की अक्सर यूँ ही
कल्पना के आईने पर
उतारी बिंदिया लगाती थी,
वो लड़की कहती थी 
तस्वीरों में मत कैद करो
मेरी तरह मेरे लम्हों को
मुझे तो न दे सके
इन्हें तो आजादी दो 

सिलती थी चादर
भावनाओं की कतरनों से
और ओढ़कर उसे मिलनें आती थी
इस तरह लड़ती-झगड़ती खुद से
हँसती हुई सिसकियों में
वो लड़की जीती जाती थी।


तुम्हारी आँखें

तुम्हारी ये आँखें
जब भी कोशिश करती हूँ
इनमें देखने की
इन्हें समझने की
तो दिखता है इनमें मुझे सम्पूर्ण सागर
जिसमें कुछ कश्तियाँ
छोटी-बड़ी
अपने गन्तव्य को अग्रसर
कुछ मंजिल को पाती हुई
कुछ विनष्ट होती हुई
कुछ अब भी अग्रसर अपने पथ पर
दिखते हैं कुछ माँझी
हौसला देते हुए
पहुँचने का तट पर
दिखती हैं कुछ लहरें
या लहरों का भ्रमजाल
खो जाती हूँ मैं इनमें कहीं
देखने लगती हूँ मैं खुद को इनमें
कि झुका लेते हो तुम अपनी पलक
और सिमट जाता है सब कुछ
नाट्यशाला के परदे की तरह ।


अपारगम्य

सावन के महीने में
जब फुहार बरसी
खिंच आई मैं आँगन में
बचपन की उत्सुकतावश किसी
भीग गया तन मेरा फुहार में
पहुँच सकी परन्तु आत्मा तक वो नहीं
बचपन की सहजता से...
जैसे बन गई है एक दीवार कहीं
शरीर और आत्मा के बीच
एक परत अपारगम्य...


सम्पर्क :-
नज़दीक कबीर धन बाबा मन्दिर
मोहल्ला - गढ़ी 
पोवायाँ , शाहजहांपुर , उत्तर प्रदेश 
दूरभाष - +91-9999-103-420

प्रस्तुति :-
कमल जीत चौधरी 
काली बड़ी , साम्बा [ जे०& के० ]
दूरभाष - ०९४१९२७४४०३ 


(कुछ चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)
 




Thursday, January 16, 2014

पम्मी शर्मा


जन्म - १८ अप्रैल १९९३ में हीरानगर के दयालाचक गाँव में
शिक्षा - राजकीय महाविधालय हीरानगर से स्नातक  
लेखन - २०१० में कविताओं से आरम्भ 
प्रकाशित - मई २०१३ में एक लघु प्रेम आधारित उपन्यास 'द जर्नी वी लेफ्ट' प्रकाशित 
प्रिय कवि - जॉन मिल्टन 
अन्य - फेस बुक पर सक्रिय रहते हैं

पम्मी शर्मा मूलत: अंग्रेजी में लिखते हैं। इनकी कुछ कविताएँ अंग्रेजी के दैनिक 'डेली एक्सेलसियर' में प्रकाशित हुई हैं। मैं इनकी कविताएँ पढ़ता रहता हूँ। इनमें अभी स्वाभाविक कच्चापन है।  जो धीरे- धीरे परिपक्वता में बदलता दिख रहा है। इन कविताओं में  इनकी संवेदनशीलता और पक्षधरता देखते बनती है। यहाँ सृजित मानवीय बिम्ब इनकी कविता को आत्मीय बना देते हैं। आशा है वे जल्दी अपना काव्य मुहावरा अर्जित कर लेंगे। अनंत शुभकामनाओं सहित प्रस्तुत हैं यहाँ पम्मी की दो कविताएँ। 



मैंने उसको देखा 

मैं जानता हूँ
वह वहाँ था 
मैं उसे चकाचौंध में भी
देख सकता था 
मैंने उसे भरपूर नज़र से देखा भी 
पर जैसे ही 
हमारी आँखें चार हुई 
वह तेज कदमों से आगे बढ़ गया
मैं वही घुटनों पर सिर रख बैठ गया 
सनसनाती हवा से मैंने जाना
कुछ नज़रें मुझे घूर रही हैं 
अपनी आवारगी में आगे बढ़ते
मैंने एक प्रेमी जोड़े को 
आलिंगनबद्ध देखा
फिर मैंने 
किसानों को खेती करते देखा 
पक्षियों को दाना चुगते देखा 
पशुओं को घास चरते देखा 
चरवाहों को गाते देखा 
फूलों को खिलते मुरझाते देखा  
लोगों को हँसते रोते देखा ...

मैं उड़ते बाज की ताकत भी देख सका 
सब कुछ देख सका 
कुछ न देख सका तो बस इतना 
कि वो रुकता और 
एक बार पलट कर देखता।



वो सर्द रात 

यह एक सर्द रात थी

धुंध और कोहरे में वहाँ खड़ा रहना 
अति दुर्गम था 
वहां बतियाने के लिए 
मुश्किल से कोई उपस्थित था 
इस बीच मैंने एक पुलिस वाले को देखा 
इससे पहले कि
मैं उससे कोई बात करता 
मैंने जाना 
वह घड़ाभर शराब पिए 
अन्धी ताकत वाला हाथी था 
वह सीधे कोने में दुबके भिखारी के पास 
अपनी सूंड लहराता 
उसे टटोलने लगा 
पर उसे वहां 
सिर्फ साँस लेता 
एक पिंजर ही मिला 
उसने एकाएक ताबड़तोड़ 
उस पर लात घूसे बरसाना शुरू कर दिए 
वह चीख पड़ा -
बचाओ बचाओ 
मदद करो मदद करो ...
उसकी दर्दभरी कराह ने 
मेरी अंतरात्मा को भेद दिया 
पर मेरे हाथ पैर सुन्न हो गए थे 
आँसू सूख गए थे 
सर्दी के कारण नहीं 
बर्दी के कारण ...
स्टेशन को दूर तक टटोलने के लिए 
वह आगे जा चुका था 
मैं वही खड़ा था 
मैंने अब हिम्मत दिखाई 
मगर अब देर हो चुकी थी। 

सम्पर्क :-
गाँव व डाक - दयाला चक,
तहसील - हीरानगर , जिला - कठुआ,
जम्मू व कश्मीर।
दूरभाष -०९९०६३५०२६४


अनुवाद व प्रस्तुति :-
कमल जीत चौधरी
काली बड़ी , साम्बा 
जम्मू व कश्मीर [ १८४१२१ ] 
दूरभाष - ०९४१९२७४४०३


Thursday, December 19, 2013

सीताराम सपोलिया


जन्म- 22 नवंबर, 1938
जन्म स्‍थान- दियानी, जिला सांबा
शिक्षा- एमए‌ हिंदी, बीएड
व्यवसाय- सेवानिवृत्त सीनियर लेक्चरर
लेखन-1958 से

प्रकाशिक साहित्य -
हिंदी भजनमाला (सन 1962)
डोगरी देश प्यार दे गीत (सन 1963)
चेते बनी गे गीत (गीत, सन 1988)
मानस मोती (भजन, सन 1992)
मैह्क फुल्लें दी (कविताएं, सन 1966)
चाननी दे अत्‍थरुं (कहानियां, सन 2006)
भ्यागा दी कशबो (भजन, सन 2008)
मोनो ग्राफ दुर्गादास गुप्ता (सन 2010)


विशेष -
डोगरी संस्‍था के अलावा डुग्गर कला मंच सांबा, डोगरा सदर सभा सांबा और लाइंस क्लब सांबा के साथ जुड़े हुए हैं।

(अपरिहार्य कारणों के चलते पोस्ट करने में देरी हुई, उसके लिए खेद है।)




डोगरी के वरिष्‍ठ साहित्यकार सीता राम सपोलिया को सन 2013 के लिए साहित्य अकादमी दिया गया है। सपोलिया को यह सम्मान उनकी किताब 'दोहा सतसई' के लिए दिया गया। बहुआयामी व्यक्तितव के मालिक और मिलनसार सपोलिया सादगी और सरलता में विश्वास रखते हैं। इस खास मौके पर उनका कहना है कि यह उनका नहीं बल्कि उनकी भाषा और पूरे डुग्गर का सम्मान है। यह सम्मान उन सभी का सम्मान है जिन्होंने हर हाल में उनका साथ दिया और उनकी भाषा से प्रेम किया। सम्मान मिलने पर वह खुश हैं। लिखने के शौक के बारे में सपोलिया ने कहा कि वह सन 1957 में कीर्तन मंडली बना कर भजनों को गाया करते थे। साथ ही हिंदी और पंजाबी के भजन लिखते और गाते थे। जिस 'दोहा सतसई'  किताब के लिए उनको साहित्य अकादमी मिला है यह उनकी 9वीं किताब है। इसको लिखने में छह माह का वक्त लगा था। भविष्य की योजनाओं के बारे में उनका कहना था कि वह दो किताबें और लिख रहे हैं और उम्मीद है कि जल्द ही वह भी पूरी हो जाएगी। नए लेखकों के लिए उनकी राय थी कि लेखन साधना है। साधना में लगे रहें। साधना व्यर्थ नहीं जाती। इसका फल कभी न कभी मिल ही जाता है।


संपर्क -
गांव-दियानी
तहसील व जिला- सांबा

मोबाइल- 95966-07522