Friday, October 3, 2014

तस्लीमा नसरीन

आतंकवाद पर खलती है यह चुप्पी



वामपंथी राजनीति को मैं बचपन से ही पसंद करती थी। इस विश्वास में विश्वासी होकर बचपन में मैं सबके लिए रोटीकपड़ा और मकान की मांग करती थी। अकाल पीड़ित लोगों की मदद करती थी। मेरे बड़े मामा कम्युनिस्ट और नास्तिक थे। मैं उनसे बहुत डरती थी। मेरे लिए जुलूस में जाना और बहसों में हिस्सा लेना तो मुमकिन नहीं था। हांकिताबें पढ़ने का नशा था। फिर समता और समान अधिकार के लिए मैंने लिखना शुरू कर दिया।
मैं वामपंथ में विश्वास करती हूं। पर मेरे लेखन की शुरुआत से ही वामपंथियों ने मुझे खारिज किया है। महिलाओं की बराबरी के बारे में जब मैं लिखती थीतब ये लोग मुझे टोकते थे। कहते थेतुम सिर्फ वर्गशत्रु को चिह्नित करो। कम्युनिस्टों के सत्ता में आने पर महिलाओं को बराबरी का अधिकार तो मिल ही जाएगा। पर जहां भी कम्युनिस्ट सत्ता में आएवहां महिलाओं को समान अधिकार नहीं मिला। कहां के पोलित ब्यूरो में कितनी महिलाएं हैंजरा बताइए तो!
बाद में वामपंथियों ने एक अजीब-सी वजह से मुझे दोष देना शुरू किया। बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ जो अत्याचार हो रहा थाउसका विरोध करते हुए मैंने लज्जा नाम से एक तथ्य आधारित उपन्यास लिखा था। जब भारत में भारतीय जनता पार्टी मेरी बगैर अनुमति के लज्जा की नकल छाप-छापकर रेलबस और फुटपाथ पर थोक के भाव बेचने लगीतब कम्युनिस्टों ने मुझे दोषी ठहराना शुरू किया। भारत में दक्षिणपंथी मेरा समर्थन कर रहे थेइसके लिए मैं ही दोषी थीआज भी वामपंथी मुझे लज्जा लिखने का दोषी ठहराते हैं। उनका आरोप था कि लज्जा के जरिये मैंने भारत के दक्षिणपंथी कट्टरवादियों के हाथों में हथियार थमा दिया है। भारत के वामपंथी अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होने की स्थिति में उनके साथ खड़े होते हैंजबकि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ मैं खड़ी हुईतो मैं दोषी हूंमैंने लज्जा बांग्लादेश में बैठकर लिखा थाभारत में नहीं। फिर भी दोषी थीक्योंकि बांग्लादेश के कम्युनिस्ट तो कट्टरवादियों के साथ हैं। अपने संगी-साथियों के खिलाफ कोई बात वे भला कैसे सुन सकते थे?
कम्युनिस्टों ने मेरे जीवन का सबसे बड़ा नुकसान तब कियाजब उन्होंने भारत में मेरी किताब पर प्रतिबंध लगा दिया। आत्मकथा का तीसरा खंड द्विखंडितो भारत में प्रतिबंधित हैक्योंकि इसमें मैंने इस्लाम की आलोचना की हैजिससे उनकी धार्मिक भावना पर आघात लगने का आरोप है। जबकि किसी भी मुस्लिम ने मेरी इस किताब को प्रतिबंधित करने के लिए आवाज नहीं उठाई थी। इसके बावजूद पश्चिम बंगाल की कम्युनिस्ट सरकार ने आगे बढ़कर मेरी किताब पर प्रतिबंध लगाया। इस प्रतिबंध के बाद भारतीय उपमहाद्वीप में मेरा जीवन पूरी तरह बदल गया। इसकी वजह यह है कि कम्युनिस्ट सरकार ने मुझे इस्लाम-विरोधी बताकर कट्टरवादियों के हाथ में एक हथियार थमा दिया। मुस्लिम कट्टरवादी आज भी मेरे खिलाफ इस हथियार का इस्तेमाल कर रहे हैं।
किताब पर प्रतिबंध लगाने के बाद कट्टरवादियों ने मेरे खिलाफ फतवा जारी किया। मेरे सिर की कीमत लगाई। मुझ पर हमले किए। मेरे खिलाफ जुलूस निकाले गए। इसी दौरान कम्युनिस्ट सरकार ने पश्चिम बंगाल से मुझे निकाल बाहर किया। मुझे भगाने का कारण वोट था। मैं इस्लाम विरोधी हूंमुझे भगाने से मुस्लिम मतदाता वाम मोर्चे को वोट देंगेइस उम्मीद में मुझे बाहर किया गया।
जब एक राज्य ने मुझे भगायातो दूसरे ने इसी नीति का अनुसरण किया। कोई सरकार वोट खोने का जोखिम नहीं ले सकती थी। पश्चिम बंगाल से मुझे राजस्थान भेज दिया गया। लेकिन राजस्थान की तत्कालीन भाजपा सरकार ने मुझे वहां छह घंटे भी नहीं रहने दिया। राजस्थान से मैं दिल्ली आई। केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने भी मुझे वहां से बाहर करने की कोशिश कीपर ऐसा नहीं हुआ।


कम्युनिस्टों की गलत नीति आज भी खत्म नहीं हुई है। दुनिया भर में वे मुस्लिम कट्टरवादियों के हक में बोल रहे हैंक्योंकि उनका मानना है कि ये लोग अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ रहे हैं। वामपंथियों की यह बहुत बड़ी भूल है। यदि वे कट्टरवादी अमेरिका के खिलाफ लड़तेतो ह्वाइट हाउस या कैपिटल को निशाना बनातेट्विन टावर को नहीं। ट्विन टावर के ध्वस्त होने से हजारों लोग मारे गएजिनमें अमेरिकी साम्राज्यवाद का खैरख्वाह शायद ही कोई था। इस्लामी आतंकवादी किसी राष्ट्र पर हमला नहीं करतेआम जनता को निशाना बनाते हैं।
तालिबान को अमेरिकी साम्राज्यवाद ने ही पैदा किया है। अनेक कट्टरवादी और आतंकवादी संगठन सऊदी अरब के पैसे से तैयार हुए हैं। सऊदी अरब अमेरिकी साम्राज्यवाद का घनिष्ठ मित्र है। इस्लामी कट्टरवादी दारूल-इस्लाम बनाना चाहते हैंजिसमें दूसरे मजहब को मानने वाले और काफिरों के लिए जगह नहीं होगी। वैसी इस दुनिया में वामपंथियों की जगह तो सबसे पहले खत्म होगी। कम्युनिस्ट नारी के समानाधिकार में यकीन करते हैं। जबकि मुस्लिम कट्टरवादी औरतों को बुर्के में छिपाकर रखते हैं। वे पत्थर मार-मारकर महिलाओं की हत्या करते हैंवे औरतों को पुरुष की संपत्ति समझकर गृहस्थी में कैद करते हैं। फिर कम्युनिस्ट किस तर्क से कट्टरवादियों का समर्थन करते हैं?
किसी अच्छी चीज के खत्म होने से कितनी दुर्गंध निकलती हैयह समकालीन वामपंथियों को देखने से समझा जा सकता है। ईसाइयों या यहूदियों से जो नए मुस्लिम बने हैंवे आईएस जैसे आतंकी संगठनों से जुड़े हैं। वे बगैर किसी दुविधा के किसी की भी गर्दन रेत दे रहे हैं। चाहे आईएस होअल कायदा होअल शवाबबोको हराम या दूसरे कट्टरवादी आतंकी संगठन-वामपंथी इन सबके समर्थन में हैं। ये कट्टरवादी संगठन मनुष्य की हत्या करके अपने ईश्वर को खुश करना चाहते हैं-उस ईश्वर कोजो उन्हें इस काम के लिए ऐशो-आराम की चीजें तो देंगे हीहर आतंकी को बहत्तर हूरों की सौगात भी बख्शेंगे। आश्चर्य है कि ईश्वर में विश्वास  करने वाले वामपंथी इस्लामी कट्टरवाद के इस पक्ष पर कुछ नहीं बोलते।

(अमर उजाला से साभार)

Monday, September 15, 2014

कमल जीत चौधरी

पाठक पैदा किए जा सकते हैं , कवि नहीं !




किसी आयु सीमा से परे प्रगतिशील कविता को ही युवा कविता मानना चाहिए. जम्मू की युवा कविता पर बात करते हुए भी यही पैमाना रखना सही होगा .जम्मू की युवा कविता को एक साथ तीन पीढ़ियाँ समृद्ध कर रही हैं. अपनी प्रवृत्तियों से यह किसी भी प्रकार केवल स्थानीय कविता नहीं कहला सकती . विस्थापन की पीड़ा , जनपक्षधरता , तीखा व्यंग्य , राजनीतिक स्वर , आत्मीय  बिम्ब तथा संवाद इस कविता की ताकत है तो सपाटबयानी , गद्य शैली और नारेबाजी इसकी कमजोरी है . यहाँ का स्त्री स्वर मुख्यधारा के फैशनबल स्त्री विमर्श से परे एक मौलिक और मुखर भावजगत के गवाक्ष खोलता है . २०१० में वरिष्ठ कवि अशोक कुमार द्वारा सम्पादित जम्मू के प्रतिनिधि काव्य संग्रह ' तवी जहां से गुज़रती है ' के सन्दर्भ में डॉ० नामवर सिंह व  सुप्रसिद्ध कवि अरुण कमल ने भी जोर देकर इस युवा कविता को रेखांकित किया. यह संग्रह निश्चित ही जम्मू की कविता का प्रामाणिक इतिहास होता अगर इसमें युवा कवि कुँवर शक्ति सिंह , योगिता यादव और अरुणा शर्मा की कविताएँ भी होती तथा इसका सम्पादकीय भी लिखा जाता . खैर , मुंबई से निकलने वाली त्रैमासिक पत्रिका सृजन सन्दर्भ के मनोज शर्मा द्वारा सम्पादित अप्रैल - जून २०१० के जम्मू विशेषांक ने यहाँ की युवा अभिव्यक्ति को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा मंच दिया . लेखक व धरती के सम्पादक शैलेन्द्र चौहान द्वारा अभिव्यक्ति के अंक ३७ जुलाई २०११  में जम्मू के  पांच कवियों की विशेष प्रस्तुति भी एक खाका खींचती है . इस स्तम्भ में उन्होंने कृष्ण कुमार शर्मा , अमिता मेहता , डॉ० शाश्विता , कमल जीत चौधरी , शेख मोहम्मद कल्याण की कविताओं को प्रकाशित करते हुए लिखा - 'इनकी कविताओं में एक और स्थानीयता की सौंधी महक है तो वही राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों की प्रतिक्रियाएँ भी हैं . '  यानि यहाँ का युवा स्वर समय समय पर नोटिस होता रहा  है . फिर भी  यहाँ के ज्यादातर कवि जम्मू से बाहर बहुत कम पहचाने जाते हैं . वरिष्ठ कवि रमेश मेहता ,  डॉ० अग्निशेखर व कुछ अन्य तथा ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कृत युवा कहानीकार कवि योगिता यादव और कमल जीत चौधरी , कृष्ण कुमार शर्मा आदि कुछ नाम अपवाद अवश्य हैं .इन्होंने खासकर देश भर में केंद्र से इतर हाशिए पर लिखी जा रही कविता से संवाद कायम किया है . यही आवश्यक है . हिन्दी कविता का समग्र मूल्यांकन इसी कविता से होगा . इससे जुड़ना एक वर्गबोध भी दर्शाता है . २०१३ में वरिष्ठ कवि सम्पादक प्रभात पाण्डेय द्वारा दिल्ली से इतर अखिल भारत सेचयनित ग्यारह कवियों के कविता संग्रह ' स्वर एकादश ' में कमल जीत चौधरी और अग्निशेखर का होना जम्मू के लिए सुखद है .वैसे राजकुमार शर्मा , महाराज कृष्ण संतोषी , कुँवर शक्ति सिंह , कपिल अनिरुद्ध , पवन खजुरिया , संजीव महाजन , संजीव भसीन , अरुणा शर्मा , श्याम बिहारी ,निर्मल विनोद जैसे नाम भी जम्मू के काव्य परिदृश्य में अलग चमक रखते हैं. फिर भी बात घूम फिर कर वही आठ दस कवियों पर आ जाती है तो कुछ सवालों का उठना स्वाभाविक और अनिवार्य हो जाता है . क्या कम पहचाने जा रहे जम्मू के कवि भूख , बेरोज़गारी , शोषण , राजनीतिक भेदभाव , सीमारेखा पर तनाव धर्म की राजनीति से त्रस्त जनता की आवाज़ बन पाए हैं ? क्या कला अकादमी व इससे अनुदान प्राप्त कर रही संस्थाएँ अपनी भूमिका सही निभा पा रही हैं ? काव्यगुरू का ध्यान सतत इस ओर क्यों एकाग्र है कि कैसे किसी नवोदित कवि पर मोहर लगा दी जाए ? यह बात मैं कला अकादमी की पत्रिका शीराज़ा में प्रकाशित नवांकुरों के सन्दर्भ में कह रहा हूँ . इन्हें ही दिशा देने के लिए पत्रिका का न्यून स्तर बनाए रखना ज़रूरी है न कि उनमे छपास की प्रवृत्ति को बढ़ावा देना . ऐसे ही कुछ मठाधीश किसी युवा के बढ़ते कदमों को देख जगह जगह उसकी कटु आलोचना तो करते हैं ...क्यों ?? पर उन्हें पाठकों और कविता के प्रसार की आवश्यकता कभी ज़रूरी  नहीं लगती ? आदि आदि .





समय को पहचान कर जम्मू के कवियों को छपास और संवाद की तरफ ध्यान देना होगा. प्रिंट में अगर किसी कारण ये छपने से वंचित हैं तो चिठ्ठा जगत और सोशल नेटवर्किंग का सही उपयोग इनको बाहर की कविता से जोड़ सकता है . यहाँ पर इनकी उदासीनता समझ से परे है . जबकि इधर की हिन्दी कविता ब्लॉग्स पर नया इतिहास रच रही है . इधर कृष्ण कुमार शर्मा और कमल जीत चौधरी द्वारा संचालित जम्मू कश्मीर के पहले साहित्यिक ब्लॉग ' खुलते किवाड़ ' ने खासकर जम्मू की युवतर कविता को सामने लाया है . इस पर भगवती देवी , शालूप्रजापति , रिपुदमन परिहार , नरेश कुमार खजुरिया , मुदासिर अहमद भट्ट ,संगीत , पम्मी शर्मा आदि की प्रस्तुति इस बात की प्रमाण है .सांस्कृतिक अकादमी के साथ पच्चीस साल पुरानी साहित्यिक संस्था युहिले और दो साल से सक्रिय लोक मंचक्रमशः कवियों व सांस्कृतिक कर्मियों के लिए भाव और कर्मभूमि सिद्ध हो रहे हैं . साहित्यिक पत्रिकाओं के अभाव में पिछले सालों दैनिक जागरण के साहित्यिक पन्ने ने सार्थक भूमिका निभाई . इस पन्ने को योगिता यादव देखती है . अब सामग्री की कमी के कारण यहाँ जम्मू की भागीदारी न के बराबर हो गई है .
नीरू शर्मा के संपादन में राष्ट्र भाषा प्रचार समिति ने सेतु नाम की पत्रिका का अंक निकाला है . कामना है कि यह निकलता रहेगा . कविता के क्षेत्र में अग्निशेखर को प्राप्त सूत्र सम्मान , अरुणा शर्मा को पृथ्वियां पर और पृतपाल बेताब  को शहरे गज़ल  कविता संग्रह पर केंद्रीय हिन्दी निदेशालय का हिन्दीतर सम्मान आश्वस्त करता है . 

अंत में एक दो ज़रूरी बातें  कि आज के परिदृश्यपर कविता से अधिक कवि हावी न हो यह ध्यान रहे. पुरस्कार , जोड़ - तोड़ , आपसी ईर्ष्या  - द्वेष , सरकारी काव्य यात्राएँ , मंचीय प्रशंसा , कला अकादमी , अनुदान और ३१ मार्च से बचना होगा . और हाँ पाठक पैदा किए जा सकते हैं , कवि नहीं !


(दैनिक जागरण से साभार)




 
कमल जीत चौधरी
काली बड़ी , साम्बा { जे० & के० }
दूरभाष - ०९४१९२७४४०३

ई मेल - kamal.j.choudhary@gmail.com

(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)