Wednesday, March 4, 2015

मृदुला शुक्ला


शिक्षा :- स्नातकोत्तर
लेखन :- एक लम्बे अंतराल के बाद २०१२ में फिर शुरू किया
प्रकाशित :- बोधि प्रकाशन से २०१४ में पहला कविता संग्रह ' उम्मीदों के पाँव भारी हैं ' प्रकाशित , वरिष्ठ कवि विजेंद्र द्वारा संपादित १०० कवियों के संग्रह ' शतदल ' तथा अनेक पत्र- पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित
पुरस्कार : - ' इला त्रिवेणी ' सम्मान प्राप्त हुआ है 
अन्य :- दिल्ली में  'अविधा' नामक साहित्यिक संस्था की सक्रिय सदस्य हैं
सम्प्रति :- शिक्षण व स्वतंत्र पत्रकारिता

जे० एन० यू० में कवि - कथाकार मित्र सईद अयूब द्वारा आयोजित ' स्वर्गीय कवि दीपक अरोड़ा स्मृति काव्यपाठ ' में जाना हुआ . पिछले साल वही पर मृदुला शुक्ला जी से मेरा परिचय हुआ . फिर इनकी कविताएँ पढ़कर जान पाया कि वे कविताओं के अन्दर और बाहर एक जैसी हैं . इनका पहला कविता संग्रह ' उम्मीदों के पाँव भारी हैं ' काफी चर्चित है . उनका लेखन कवि होने के दम्भ से परे है . इनकी कविता एक गृहणी का प्यार है . जिसमें एकाधिकार की जिद नहीं सामूहिकता का गान है .  जिसमें अलग मुहावरा बनाने का प्रयास नहीं है . कोई चौंकाने वाली बात नहीं है. वे कोरी भावुकता और गला रेतने वाले विचार से बचती हैं .सहजता से भरी कविताई की अपनी एक परम्परा है . इन्हें इसी के आलोक में देखा जाना चाहिए. वे अपनी कविताओं को संवेदना और विसंगतियों की वैध संतान मानती हैं. उनके संग्रह पर विस्तार से फिर कभी बात होगी . फिलहाल इन्हें ' खुलते  किवाड़ ' की ओर से हार्दिक धन्यवाद व बहुत - बहुत शुभकामनाएँ . 

आइये इनकी पाँच कविताएँ पढ़ते हैं -






तुम्हारा न होना

अँधेरा नहीं है ज़िन्दगी में
बस सूरज सुबह सर झुका कर निकलता है
घर के सामने से
कि मैं माँग न लूँ थोड़ा सा उजाला अपने भीतर के लिए

हवाएँ ठण्डी होती हैं मगर ...
बिना नमी की खुश्क उदासी लिए

ओस सीधा जा गिरती है ज़मीन पर
बिना मुझे छुए और कभी कभी
ठहरती भी है तो मेरी पलकों के कोर में

और चाँद ने तो आना ही छोड़ दिया इधर
कि शायद अमावस ठहरा सा है मेरे भीतर
...
वो आए भी तो भला कैसे

मैं उदास नहीं होती तुम्हारे बिना
लेकिन खुश भी नहीं हूँ शायद ...





उम्मीदों के पाँव भारी हैं

एक जहाँ हो हमारा भी
जहां तल्खियां मुस्कुरा कर गले मिलें
रुसवाइयों को मिल जाएँ पंख शोहरतों के
जब तोली जाएँ खुशियाँ बेहिसाब
तो दूसरे पलड़े पर रखा जाए थोड़ा सा ग़म

सुबहें थोड़ी धुँधली सही
शामें पुररौशन हों
बूढ़ी इमारतों के पास हो अपनी खुद की आवाज़
जो भटके मुसाफिरों को रास्ते पर लाये
सुना कर कहानी अपनी बुलंदी के दिनों की

जहां हमारी हाँ को हाँ
और न को न सुना जाए
वही समझा भी जाए

शायद मैं नींद में हूँ

मगर क्या करूँ मेरी उम्मीदों के पाँव भारी हैं
मेरे सपने पेट से हैं .





तांडव


बम भोले बम भोले बम बम बम
लट्टू की तरह नाच रहा है
जटा से निकलती गंगा की धारा
और उसमें भीग कर नाचती उन्मत्त भीड़
शिव होने का उन्माद सवार है सिर पर
कतारबद्ध औरतें पैर छूने को बेचैन
फूलों और रुपयों की भीड़ में
मुस्कुराता ठेकेदार



छनाक ! ओह आज फिर सोता रह गया
आँखों के सामने घूमती पानी की लम्बी कतार
शिव तांडव ही क्यों नाचे , कुछ आसान भी तो नाच सकते थे
कैसा टूटता है बदन ? और हर रात निकल जाता है टैंकर
तीन दिन हुए
आज रात की झाँकी में
फिर से बनेगा भोले नाथ
बिना नहाये
कोई बात नहीं !!
गंगा तो बहती रहती है उसकी जटाओं से अविरल .



यादें - एक

यादें बचपन के अंगूठे में लगी
ठेस सी होती हैं
जो भरते - भरते
फिर से ही दुःख जाती हैं अचानक
खेल खेल में

और भूलने की कोशिश
ऊन की सलाइयों पर छूट गया फंदा
जो शाम को उधड़वा देता है पूरी बुनाई
कल दुबारा बुनने के लिए

जेठ की दोपहर में डामर वाली सड़क पर
खुले सर और नंगे पाँव चलना है
जब पिघलता डामर लिपट रहा हो पैरों से
तो बस हिकारत से देख सूरज को कह देना
देखो तुम भी मत टपक पड़ना इन निगोड़ी यादों सा

भूलना और याद करना शायद
पहुँचना होता है टी पॉइंट पर
जहां ख़त्म नहीं होता पुराना रास्ता
बस दो और राहें फूट पड़ती हैं
उलझन भरी .




चाकू


खुश रहो
कामिनी के काजल की धार बनकर

पड़े रहो सब्जियों के छिलकों में
गंधाते
बजबजाते

मन नहीं करता
कि मूठ हो
मखमली म्यान हो
दीवार में एक महत्वपूर्ण स्थान हो
इतिहास में कहानियों में
वीरता का गान हो

उड़ो मत !

चाकू हो ! चाकू रहो

जरा भी कुंद हुए
घिसे जाओगे पत्थरों पर
चिंगारियाँ निकलने तक .



सम्पर्क :-
mridulashukla11@gmail.com




प्रस्तुति :- 
 
कमल जीत चौधरी
काली बड़ी , साम्बा { जे० & के० }
दूरभाष - ०९४१९२७४४०३

ई मेल - kamal.j.choudhary@gmail.com

(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)

Thursday, January 22, 2015

संदीप रावत

अगर कुछ और देर अँधेरा रहा तो मुझे गोली मार दी जायेगी



मैं किसी को कोई प्रमाण पत्र देने की पात्रता नहीं रखता. फिर भी विशुद्ध पाठक की हैसियत से कविता पर जब भी बात करूँगा पूरी जिम्मेवारी के साथ करूँगा. संदीप रावत संवेदना का दूसरा नाम हैं. इनकी कविता ऊँची नहीं गहरी है. वे विचार को मुकुट की तरह नहीं पहनते. किसी समारोह की सीढ़ियाँ चढ़ने जैसे नहीं बल्कि भावों के पुल से सरोकार की नदी में रस्सी से उतरने जैसे कवि हैं.
अपने इस प्रिय कवि मित्र का आभार व खुलते किवाड़ पर हार्दिक स्वागत. शुभकामनाएँ भी. आइये पढ़ते हैं इनकी तीन कविताएँ -





शीर्षकहीन भूचाल 

रात के अँधेरे की चौंध मन की आँखों पर पड़ती है
अंधविश्वास से भरी एक बालिकावधू की आँख खुलते ही
रात्रिकालीन कर्फ्यू टूटता है
दिल चुपचाप सपनों की आवाजाही देखता है

नीदं में गिनती बोलती हुई एक बच्ची की बुदबुदाहट
अचानक अपहृत लड़की की सिसकियों में तब्दील हो जाती है
लापता लड़की
माँ की स्मृति में
लौट आती है
बार बार
ये कहते हुए – ‘मां ! मैं स्कूल जा रही हूँ ’

कोई पिता एक पल के लिये भी
दुनिया से कान नहीं हटाता 
और अपनी बच्ची को ढूंढते हुए 
दुनिया के आखरी वैश्यालय का दरवाज़ा खटखटाता है

एक रास्ता हमेशा छूट जाता है
एक वादा हमेशा टूट जाता है
छूटे हुए रास्तों पर
गुमशुदा कुछ बच्चे
गाते गाते
घूम रहे हैं गोल गोल
‘एक लड़की भीड़ में बैठी रो रही थी
    उसका साथी कोई नहीं था
        हमने कहा उठो ए लड़की
            आँख बंद कर
                अपने साथी को खोजो ’

उन टूटे हुए वादों दिलासों को
गाते गाते
भूखे बच्चों के अपश्र्व्य सुर टूट जाते हैं .


जोकर की मानिंद
आवाजें
बना रही थीं किस्म किस्म के चेहरे
और उन चेहरों को देख
उठ चुकी धूप की रोशनी में
पार्क की बेंच पर
बैठा
बच्चा एक नबीना
इस पल खिलखिलाता
उस पल हुआ जाता था उदास
कौन था वहां ?
हाथों में जिसके
थी डोरियाँ
अहा वो ध्वनियाँ
गोया ठुम ठुमा ठुमा झूमती हुई
कठपुतलियां
और उनके रक्स को
अपलक निहारता
इस पल खिलखिलाता उस पल हुआ जाता था उदास
बच्चा एक नबीना
था किस कदर गमगीं
गमगीं वजूदे-जीस्त सा
था किस कदर हसीं
हसीं विसाले–यार सा
उठ चुकी धूप की रोशनी में
पार्क की बेंच पर
बैठा
बच्चा एक ...



अगर कुछ और देर अँधेरा रहा तो मुझे गोली मार दी जायेगी 

मोमबत्ती की तरफ फूंक मारने से मोमबत्ती बुझते बुझते जल उठी
जो बुझते बुझते जली थी फिर हवा से बुझ ही गई .

अँधेरे में
घुप्प अँधेरे में
पेड़ों की सरसराहट ने उगा दिये बहुत से पेड़
पानी की छलछल ले आई कितनी ही नदियाँ
चूहों के कुतरने की आवाज़ ने सभी कुछ को कागज़ी कर दिया
पृथ्वी को सड़कों ही सड़कों से भर दिया
सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों ही गाड़ियों के शोर ने
अँधेरे में
घुप्प अँधेरे में
दूर एक बच्चे की रोने की आवाज़ ने सभी कुछ को माँ बना दिया
सभी कुछ को एक दुश्मन बना दिया कहीं गोली चलने की आवाज़ ने
भूख से रोते ,ठंड से ठिठुरते एक आदमी की रुलाई ने
पूरे विश्व से रोटी और कपड़ा छीन लिया 
अगर कुछ और देर
कुछ देर और अँधेरा रहा तो
मैं नदी में बह जाऊँगा
हवा मुझे उड़ा ले जायेगी
चूहे मुझे कुतर खायेंगे
गाड़ियाँ मुझे कुचल जायेंगी
अँधेरे में मुझे बच्चे को जन्म देने की पीड़ा सहनी होगी .
अगर कुछ देर और अँधेरा रहा तो
मुझसे रोटी और कपड़ा छिन जाएगा
मुझे गोली मार दी जाएगी ...
इससे पहले ही मैं
उठकर
मोमबत्ती जला देता हूँ .


नाम - संदीप रावत 
जन्म तिथि 31 जनवरी १९८८ 
शिक्षा - बी.एस .सी (गणित ), 
वर्तमान में दूनागिरी इंटर कॉलेज(अल्मोड़ा) में गणित का अध्यापन 
मोबाइल न. -9690248415



प्रस्तुति :- 
 
कमल जीत चौधरी
काली बड़ी , साम्बा { जे० & के० }
दूरभाष - ०९४१९२७४४०३

ई मेल - kamal.j.choudhary@gmail.com

(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)

Wednesday, January 14, 2015

अदिति शर्मा


जन्म : २७ सितम्बर १९९५ में
माँ :   श्रीमती वीणा देवी
पिता : श्री माया राम
शिक्षा : राजकीय महाविधालय , साम्बा से कला संकाय से स्नातक कर रही हैं
लेखन : कविता से शुरुआत , कहीं पर भी पहली बार प्रकाशित हो रही हैं

लिखना छुपाया नहीं जा सकता . यह प्रेम की तरह है. अदिति की कविताएँ मेरे सामने आईं. पढ़कर खुशी हुई. बिना किसी ख़ास मुहावरे से प्रभावित इनकी कविताएँ सच्ची भावनाओं और विचार का सुन्दर संवाद हैं. एक दृष्टि, निर्णयबोध तथा प्रतिरोध यहाँ साफ देखा जा सकता है. मैं कविता की दुनिया में अदिति का जोरदार स्वागत करता हूँ. वह खूब खूब लिखे पढ़े और दुनिया को और सुन्दर बनाने में योगदान दे. 

प्रस्तुत हैं इनकी चार कविताएँ -




भाषण

मंच पर खड़ा हो नेता देते है भाषण
खूब पीटी जाती हैं तालियाँ
साठ साल के युवा इन्ही के कारण युवा हैं
पन्द्रह बीस साल के युवा इन्ही के कारण बूढ़े हैं
पर कट्टर समर्थक व प्रशंसक हैं

वे आते हैं आगे
पीछे धकेले जाने के लिए
फिर वक्ता बोलता है
चुप करवाने के लिए
छीनने के लिए उनके कुछ शब्द
उनके जिन्दा रहने तक
जैसे कपड़ा मकान आसमान अधिकार आदि आदि ...

यूँ ही
क्रम चलता रहता है
एक बोलता है
तो दूसरा चुप हो जाता है
दोनों परम्परा निभा रहे हैं
यह परम्परा टूटनी चाहिए ...




घाव और बड़ा आदमी

कोहनी पर भिनभिनाती मक्खियाँ
नाक भौं सिकोड़ता बड़ा आदमी ...

उसके घाव और बड़े आदमी में समानता है
दोनों उसे खत्म कर रहे हैं .




मैं


सदियों से घिसी जाती रही औरत
अपने अस्तित्व के लिए
मर्यादा और कर्त्तव्य  के सिलबट्टे पर
शायद मैं भी घिसी जाऊँगी
चन्दन हो जाऊँगी

ईंट ईंट जुड़ती
खड़े होते झूठी शान के महल
शायद बनाकर कोई वस्तु मात्र
उसमें मैं भी रखी जाऊँगी
झाड़न हो जाऊँगी

हर दूसरे पल
चुपके से निकलता जाता जीवन
कहा जाएगा मुझे भी अगर
आँखों में सीलन लिए मुस्कराने को
फूल बन जाऊँगी

घोंट कर गला इच्छाओं का
रहना जो पड़े
रहूंगी
रोशनी की ज़रुरत जो पड़े
दीप बन जाऊँगी
.....

पर कहो कि आत्मा को बेच दो
अपनी ही चोंच से अपने पंखों को नोच दो
सोच से आसमान निकाल दो
कागज कलम को छोड़ दो
फिर तो मैं लडूंगी
सुई को छोड़कर
तलवार ही बनूँगी .





कौन

आधुनिक दिखने को आतुर
ग्राहकों से भरी कस्बाई फास्ट फूड की दूकान पर
वो कच्ची उम्र का लड़का
जो पक्क रहा हर मौसम में
रोटी के लिए
कर रहा नीलाम अपना करोड़ों का जीवन
उर्जा से भरपूर
या मालिक के डर से
वो दौड़ दौड़ कर पहुँचा रहा आर्डर
कर रहा टेबुल साफ़
जूठे बर्तन उठा रहा
फिर से चमका रहा
फिर से उठा रहा
फिर चमका रहा ...

पर उसके भविष्य को धुंधलाने वाला कौन
उसे इस दलदल में धंसाने वाला कौन ???



सम्पर्क :
गाँव व डाक - सुपवाल
जिला व तहसील - साम्बा
जम्मू व कश्मीर ( १८४१२१ )





प्रस्तुति :- 
 
कमल जीत चौधरी
काली बड़ी , साम्बा { जे० & के० }
दूरभाष - ०९४१९२७४४०३

ई मेल - kamal.j.choudhary@gmail.com

(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)

Thursday, January 8, 2015

डा. राजकुमार


डा. राजकुमार जम्मू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अवकाश प्राप्त प्रोफैसर एवं पूर्व अध्यक्ष हैं। देश विदेश  में संगोठियों में शोध पत्र पढ़ते रहे हैं। मौजूदा समय में जम्मू विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त बीएड कालेज के प्रिंसिपल हैं। डा. राजकुमार की सात समीक्षा पुस्तकें इनके विस्तृत अध्ययन और गहन चिंतन का परिचय देती हैं। कविता और कहानी के साथ साथ मिथकीय लेखन में विशेष रूचि है। डा. राजकुमार को कहानी और समीक्षा के क्षेत्र में राज्य सरकार और केंद्र से पुरस्कार मिल चुके हैं और इनकी कविता और कहानी पर शोध कार्य हो चुके हैं। 

डा. राजकुमार की प्रकाशित पुस्तकें हैंः

कविता संग्रहः इस भूमंडल पर, सांप मेरे साथी हैं, इक्कीसवीं शताब्दी के नाम, खून का रंग तो है
कहानी संग्रहः खुले हाथ, जाल, वेटिंग रूम, अमलतास के फूल
समीक्षाः मिथक और आधुनिक कविता, नयी कविता में मिथक, कविता एक संदर्भ और परख, कविता में सांस्कृतिक चेतना, शिवालिक क्षेत्र में हिंदी कविता का उद्भव और विकास, जम्मू कश्मीर  का स्वातंोत्तर हिंदी साहित्यः एक विवेचन, कविताः स्वभाव और समीक्षा 

शुभकामनाओं सहित उनका हार्दिक आभार कि उन्होंने ये कविताएँ उपलब्ध करवाई

(प्रस्तुत कविताएं हाल ही  में विमोचित उनके कविता संग्रह 'खून का रंग तो है' से ली गई हैं)





लोहा लोहा होता तो

पक्का होता तो 
गीली हवा से न डरता
लोहा
लोहा होता तो

जंग से न मरता


भोर अरुणाई

सूरज से
भोर
अरुणाई

पवित्रता
रात की

सूरज से
शरमाई!



कोमल क्या बचा है

पड़ी रहने दो
आंखों पर पट्टी

हटा कर
क्या पाओगी

कोमल क्या बचा है

किसे पत्थर बनाओगी



भारत में नेता

दांव लगे
देता धत्ता
दांव पड़े
हथियाए  सत्ता

बुरे वक्त में
गोल्ला
बेग़म का
दांव पड़े तो
हुक्म का पत्ता

ढंकी
आंख ले
बैल सरीखा
एक लीक पर
नहीं घूमता 
भारत में नेता


बेकारी

बच्चे की उंगलियां

रेत पर
बना रहीं
गोल  गोल रोटियां

बेकार पिता
अपाहिज हुआ सा
देख रहा

बच्चा
रेत पर बिसूरता!


भोपाल

बरसों पहले
लीक हुआ
भोपाल

बरसों बीते
न टांक सकी
कोई चौपाल


क्यों लिखूं कविता

क्यों लिखूं कविता
जब
थूथन पर लगा हो
लहू आदमी का
जब वीरांगना-सी लड़ रही बलात्कृता
कोख में ले
बीज़ दुष्ट का
जब चाॅक पर कलेजा काली का
मंच पर गोरी
चमक रही
चिट्टी ट्यूब लाईट-सी
पर नीग्रो खंबे पर टंगा
और रात बेवा रो रही

कुछ भी तो सही नहीं
क्यों लिखूं कविता
क्या करूं कविता का
जो मूल से उखड़ रही!


संपर्क
128-लाजपत नगर, गली नंबर 1
कनाल रोड, जम्मू 
मोबाइल : 0-94-192-53-44-7


(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)



Thursday, December 25, 2014

शायक आलोक


शायक आलोक कैमरे से कविताई और कविताई से जीवन के विविध रंग देखते हैं.वे युवा हिन्दी कविता के सशक्त हस्ताक्षर हैं. इनकी कविता कोरी भावुकता, खोखले राजनीतिक नारों और कवि होने के प्रयास से मुक्त सिर्फ और सिर्फ कविता है. सघन संवेदना, मौलिकता और सहजता ही इनकी पहचान है. इसी को इनका एक बड़ा पाठक वर्ग पसन्द करता है . आप भी पढ़ें और अपनी राय रखें. शायक आलोक को धन्यवाद व शुभकामनाओं सहित प्रस्तुत हैं उनकी तीन कविताएँ -




सर्दी और एक ट्रेन यात्रा

1.
[ ट्रेन की खिड़की से बाहर झांकते हुए ]

मुझे ठण्ड लग रही है
और मेरी उँगलियाँ सर्द हो गयी हैं
कल की ही तरह
आज भी
घिर आई है शाम
और मेरे हिस्से का आकाश
सिकुड़ता जा रहा है..
कुहासे की पतली चादर
चीरती महानंदा एक्सप्रेस
जब भी सिहरती है
चरवाहे बच्चे तालियाँ बजाते हैं
घर को लौट जाओ बच्चों
गोबर का बोरसी सुलगाये
इन्तजार में होगी माँ....


2.
[लेमनचूस वाला बच्चा]

उसे घर नहीं लौटना
किसी जल्दबाजी में नहीं है
गोती बांधे किसी मंगोल सेनानायक सा दिखता है वह
खिड़की से अभी अभी टकराई सर्द हवा
उसे थर्रा गयी है
लेमन्चुस्स्स्सस्स्स्स...
लेमनचूस बेचने वाले बच्चे की आवाज़ सर्द हो गयी है
अपनी महँगी जैकेट में
थोडा और सिकुड़ आया हूँ मैं
मुझे घर की याद आ रही है
क्या उसे नहीं आती ?


3.
[बोरियत और किर्र किर्र ]

मैं इन्तजार में हूँ ..
अभी अभी गुजरा है
भूले बिसरे गीत गाने वाला भिखारी
मेरे चेहरे पर जमी सर्दी की तरह
जमे हुए हैं चाय वाले
पिछले डब्बे की मछली रोटी की गंध
मेरे डब्बे तक आ रही है
आधी गंजी पर दुपट्टा डाली नेपाली लड़की
पांच बार थूककर सो गयी है
सनपापरी वाला नौगछिया में उतर गया
मेरी खिड़की से उलटी दिशा में भागते पेड़
अब भी भाग रहे हैं
..वह अब तक नहीं आई
मैं इंतजार में हूँ ...
उबासी में खुद से ही पूछा है मैंने
क्या सर्दियों में नहीं बिकता
किर्र किर्र वाला खिलौना ?


4.
[लौट आना घर को ]

सुबह के ३ बजे भी रिक्शा चलता है
मेरी ही तरह साढ़े पांच फुट का एक इंसान चलाता है उसे
मेरी ही तरह उसकी आँखें लाल होती हैं
उसकी भी एक मोटी चादर होती है
वह भी मनमोहन और अन्ना को जानता है
उसे भी बुर्जुआ सर्वहारा का मार्क्स संघर्ष पता होता है
उसे भी मेरी ही तरह ठण्ड लगती है
मेरी ही भाषा भी बोलता है वो
......
अपने गर्म बिस्तर में घुस आया हूँ मैं
वह अब भी सड़क पर है ..





मरे हुए बच्चे

मैं तुम्हारी ही उम्र का हूँ
तुम मेरी भाषा समझ सकते हो
मेरे साथ खेल भी सकते हो
तुम अपनी गेंद मेरी ओर उछालोगे
और मैं उसे वापस तुम्हारी ओर फेंक दूंगा
हम देर तक यूँ खेल सकते हैं
अब मुझे स्कूल जाने की जल्दी नहीं होती
मैं पेशावर का मृतक बच्चा हूँ
मैं अपनी कब्र में लेटा रहता हूँ
मैं तुम्हें ख़त लिख रहा हूँ क्योंकि
मेरे बाकी सब दोस्त भी मेरे साथ कब्र में लेटे हैं
और हमें खेल के लिए जिंदा बच्चे चाहिए
जवाबी ख़त मिला
जिस दिन तुम मरे
उस दिन से नहीं लौटे हैं पिता मेरे
लिया गया उनसे मौत का बदला
मैं गेंद जेब में लिए यहाँ छुपा बैठा हूँ
कब्र सी ठंडक, अँधेरा है यहाँ
और अम्मी कहती है
डूब गया है हमारी धरती का सूरज
कि यह खेल अब बंद होना चाहिए.


द प्रपोजल

उसने शादी के लिए नहीं पूछा
नहीं बैठा घुटने के बल और
नहीं निकाल लाया हीरे जड़ी अंगूठी
नहीं कहा उसने कि कि रखूँगा संभाल कर
तुम्हारा दिल
उम्र भर मेरे शहद भरे अंतरात्मा के भीतर
कुछ नहीं बुदबुदाया
चिल्ला कर कहा भी नहीं कि
करता हूँ तुम्हें जहाँ भर का प्रेम
उसने नहीं कहा हिंदी फ़िल्मी तर्ज पर कि
चलो मेरी माँ चाय के बहाने देखेगी तुम्हें
उसने इधर उधर देखा
आसमान से लिए शब्द उधार
या अपने ही कलेजे को खंगाल कुछ हर्फ़ जुटाये
और जितना बेतरतीब था वह उतने ही सलीके से
कहा उसने उसे है अब खुद की जगह की तलाश
कि उसे चाहिए अब अपना एक घर
जिसमें हो वाकई एक अदद रसोई भी
और लड़की ने मुस्कुराकर 'हाँ' कह दिया.



शायक आलोक इतिहास व मनोविज्ञान के छात्र रहे हैं. कस्बाई पत्रकारिता से जुड़े रहे. उनकी कविताएं कहानियां कुछ प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
सम्प्रति :- दिल्ली में रहकर स्वतंत्र लेखन व फोटोग्राफी करते हैं. आजीविका के लिए अनुवाद का कार्य करते हैं.
दूरभाष :- 85270-36706 
ई मेल :- shayak.alok.journo@gmail.com



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कमल जीत चौधरी
काली बड़ी , साम्बा { जे० & के० }
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