Wednesday, July 8, 2015

लोक मंच जम्मू व कश्मीर द्वारा एकल काव्य पाठ


बू से लथपथ 
उसकी सांसे
जिस्म हो जाने को बेताब
जब घुटन देना चाहती है मुझे
रोज की तरह
मुक्ति की छटपटाहट में
मैंने चाहा
नदी हो जाऊं
बाढ़ में बदल जाऊं
उठाऊं तूफ़ान
बह जाए दर्द सारा
कारण सारा
फिर
एक दिन मैं माफ कर देती हूँ उसे
...
और मुक्त हो जाती हूँ .


' लोमज 'ने साहित्य सांस्कृतिक गतिविधियों में एक नयी कड़ी जोड़ते हुए युवा कवि डॉ० शाश्विता के एकल काव्य पाठ का सफल आयोजन करवाया . उमस भरे रविवार के दिन हर बार की तरह साथियों का उत्साह देखते ही बनता था . अध्यक्ष , मुख्य अतिथि , मीडिया आदि तामझाम से परे यह विशुद्ध रूप से श्रोताओं एक्टिविस्ट साथियों का कार्यक्रम था . डेढ़ घंटे के इस कार्यक्रम से नई ऊर्जा का संचार हुआ . आलम यह था कि कार्यक्रम खत्म होने के बाद भी जानीपुर चौक पर साथियों ने बाद दोपहर तक साहित्य की भूमिका सीमा को लेकर जोरदार विचार विमर्श किया . साथियों की यही राय रही कि चुपचाप हाशियों पर रहकर हाशिए के लिए ही काम किया जाए ...
बिना किसी औपचारिकता के कविता पोस्टरों के बीच १२ बजे काव्य पाठ शुरू हुआ . डॉ . शाश्विता ने अपने प्रभावी काव्य पाठ से श्रोताओं को ४५ मिनट तक बाँधे रखा . उन्होंने - वह स्त्री , तीली भर रोशनी , सहवेदना , जन्मजात अन्धी , तुम इक कोशिश करना , कागज की नाव , वही मैं हूँ वही तुम हो , मेम साहब , उम्मीद से है रात , मैंने उसे छुआ , स्पर्श , तीसरा आदमी समेत १५ कविताओं का पाठ किया . काव्यपाठ के बाद उपस्थित श्रोताओं ने अपने अपने विचार रखे . रवि कुमार ने कहा कि डॉ० शाश्विता की कविताओं पर त्वरित टिप्पणी नहीं की जा सकती . इनकी कविताएँ अधिक पाठ मांगती हैं . संजीत सिंह चौहान ने शाश्विता की कविताओं को कोमल भावों और सशक्त भाषा की कविता कहा . उन्होंने यह भी कहा कि साथियों को यह भी विचार करना होगा कि ऐसे आयोजन का सन्देश कहीं गलत जाए , क्योंकि लोक मंच की भूमिका कहीं कहीं शहर की दूसरी सभी संस्थाओं से अलग है . कमल जीत चौधरी ने कहा कि डॉ शाश्विता की कविताएँ सहवेदना , अँधेरे , लोक - अलोक और आत्मसाक्षात्कार की कविताएँ हैं . ये व्यष्टि से समष्टिपरकता की ओर ले जाती हैं . अस्तित्व की तलाश करती ये कविताएँ अपने सामाजिक दायित्व को भी नहीं भूलती . उन्होंने कहा कि इनकी कविताएँ चौंकाती नहीं है . कोई पंच नहीं मारती हैं . बिम्ब सृजन का अति उत्साह इनके यहाँ नहीं है . जैसे कि इधर की हिन्दी कविता ध्यान आकर्षण के चक्कर में अनबुझे बिम्बों और चमत्कार प्रदर्शन में फंसती जा रही है . ईश्वर पर लिखी एक कविता के सन्दर्भ में उन्होंने कहा कि कविता शुरू में जिस ईश्वर पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती दिखती है अंत में उसी की गोदी में बैठ जाती है . आदर्श और आस्था की ऐसी अभिव्यक्ति से कला और कविता को अधिकाधिक बचना चाहिए . कहीं कहीं इनकी कविताओं में दोहराव है . इससे भी बचना होगा .उन्होंने कहा कि अपनी परम्परा को पहचान कर कवि समृद्ध होता है . इनकी सूक्ष्म संवेदना , मार्मिकता और विषय इन्हें महादेवी वर्मा की परम्परा से जोड़ते हैं . नरेश कुमार खजुरिया ने कहा कि कविता महसूस करने की चीज है . आज यही किया है . उन्होंने यूटोपिया की बात करते हुए भी ईश्वर पर लिखी कविता को कमज़ोर कहा . रविन्द्र सिंह ने कहा कि विज्ञान का यह विद्यार्थी भी समझ रहा है कि अराजकता के इस युग में कविता कितनी ज़रूरी है . मोहित शर्मा ने उनकी कविताओं की दार्शनिकता पर विचार रखे . रविन्द्र ने कहा कि जम्मू में ऐसे मुहावरे की कविता कोई नहीं लिख रहा . पम्मी शर्मा ने कहा कि मेरे जैसे श्रोता के लिए यह सुखद आश्चर्य है कि एक डॉक्टर के अन्दर ऐसी कविता है . उन्होंने उनकी कविताओं की कुछ पंक्तियों को पढ़कर उन्हें बधाई दी . ज्योति शर्मा ने शाश्विता की कविताओं को बहुअर्थी कहते हुए कहा कि इसे आदिवासी संवेदना से जोड़कर भी देखा जा सकता है . उन्होंने अनाथ बच्चे , अव्यवस्था , और अंधेपन पर लिखी कविताओं को खुलकर रेखांकित किया . लोक मंच जम्मू कश्मीर के संयोजक कुमार कृष्ण शर्मा ने आयोजन हेतु सभी साथियों का धन्यवाद किया . उन्होंने कहा कि हम में से कोई आलोचक नहीं है . आम पाठक की समझ से किसी का मूल्यांकन होना बड़ी बात है . इसी रूप में समग्रता से डॉ शाश्विता की कविता पर चर्चा हुई है . यह सुन्दर और सार्थक बात है . उन्होंने कहा कि स्त्री संसार की ऐसी कविताएँ एक स्त्री ही सृज सकती है . उन्होंने सुझाव देते हुए कहा कि इन्हें कविता के अनावश्यक विस्तार से बचना चाहिए . कुमार ने साथी संजीत के उठाये प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा की वैचारिक ईमानदारी और प्रतिबद्धता बनी रहनी चाहिए . फिर किसी भी तरह के आयोजन गलत नहीं हैं . डॉ० मनीषा ने कहा कि शाश्विता अपनी कलम से स्वजागरण की बात करती हैं . समाज में सुधार हो सकता है , मठ और सत्ताएं बदली जा सकती हैं . बस स्व के जागने में देरी है . इनकी कविता आदमी होना सिखाती है . कार्यक्रम में सुनीता कपूर , अमित पुरी , बी० सी० कपूर , असीम पुरी , आसमी , आशुतोष शर्मा , अंकुर सेठी , सुरेश मिश्र , गजेन्द्र सिंह रावत , मंजीत कौर रावत आदि साहित्यिक प्रेमियों की गरिमामय उपस्थिति रही
.



दोस्तो इनकी दो कविताएँ और पढ़ें -

जन्मजात अन्धी 


उसने 
तवचा के रोयें रोयें से 
दिशाओं का साक्षात्कार किया 
स्पर्श के नैसर्गिक सम्बोधन की 
हर सम्भावना को 
उसने स्वीकार किया
... 
आहट की छोटी से छोटी इकाई 
उसकी संवेदनाओं को रोमांचित कर 
देह में गूँज भर देती 
रगों में दौड़ता अन्धकार 
उसके अंतर को आकार देता रहा 
जैसे कोख के गहरे अँधेरे में 
सांस लेता है जीवन 
वह धरती की हर करवट को 
पोर पोर महसूस करती
पगडंडियों की गंध 
उसे मंजिल के करीब ले जाती -
वह लड़की 
जन्म और जात से अंधी 
नहीं समझ पाई 
जन्म से जात का सम्बन्ध 
वह दिन और रात के सौन्दर्य में निरन्तर 
निष्पक्ष बनी रही 




तीसरा आदमी
बसंत लगभग झड़ चुका है वहां
परिदों की आँखों में
सदी के ध्वंस की
दरिद्र स्मृतियाँ साफ नज़र आती हैं
पिछली सदी के लोग
उम्र की दरारों में
ठहर गया
तीसरे आदमी का तजुर्बा
बार बार दोहराते हैं
हवाओं की बदलती
तरंगों से
वह उसकी गंध
भांप लेते हैं
युवाओं की त्वचा से
शुष्क होती नमी को छूकर
वह तीसरे आदमी के संकेत समझ जाते हैं
तीसरा आदमी
धोती टोपी और पगड़ी को
पोशाक से निकालकर
मजहबी मंसूबों तक लाता है
वह उनकी मिट्टी में जीवन की जगह
बारूद रोपता है
वह उनकी हड्डियों के खनिज में
साम्प्रदायिक रसायन पिघलाकर
महंगी सिगार में कश फूंकता है
उसका इरादा महामारी की तरह फैल जाता है
यह तीसरा आदमी
हर दूसरे आदमी में
कमज़ोर कोशिकाओं की
अराजक उपज है
पिछली सदी के लोग कहते हैं
बहुत पहले हुआ करता था
सिर्फ आदमी
जो धोती टोपी और पगड़ी की जगह
बस कपड़ा पहनता था
पुराने लोग बताते हैं
देर रात
शहरों के कुओं के पास
कुछ साए मंडराते हैं
वह जलियांवाले बाग़ का सामूहिक ध्वंस सुनाते हैं
और वीरांगनाओं का जोहर भी
...
उनकी चीखों से
आज भी बच्चे जाग जाते हैं
माँ की छातियों का दूध दहल जाता है
देर रात मंडराते साए
शोक गीत गाते हैं
वह देखते हैं
बसंत लगभग झड़ चुका है
घोंसलों में
बिखरे हुए पंख
कुछ जाने पहचाने धब्बे हैं
लोरियां रुआंसी हैं
और रात की कोख में
ज़ख़्मी सन्नाटा है
सरसों की गंध
कभी भी पीलापन खो सकती है
धरती अपनी करवटों में
अब और लावा नहीं समेट पाएगी
जब जब दूसरा आदमी पाया जाएगा -
पहला आदमी
तीसरे आदमी की मौत मारा जाएगा
और बसंत पूरा झड़ जाएगा .


प्रस्तुति :-
कमल जीत चौधरी ,
सदस्य ; लोक मंच , जम्मू कश्मीर

Wednesday, June 17, 2015

तस्लीमा नसरीन

मैं भगोड़ी नहीं हूं



वायरस की तरह यह खबर पूरी दुनिया में फैल गई है कि मैं भारत छोड़कर अमेरिका चली गई हूं। क्यों? अंसारुल्लाह बांग्ला टीम के जिन हत्यारों ने अभिजीत-वाशिकुर-अनंत की हत्या कर दी है, वे मुझे भी मार डालेंगे, इस डर से। अगर मैं इतनी ही भयभीत होती, तो यूरोपीय नागरिक होते हुए, अमेरिका की स्थायी नागरिकता हासिल कर चुकने के बाद भी बांग्लादेश लौटने की इतनी कोशिश क्यों कर रही हूं? फिर क्यों मैं भारत में इतने साल न सिर्फ रहती रही, बल्कि वहां रहने के लिए लड़ती भी रही? इन्‍हीं दो देशों में तो जीवन पर खतरा सर्वाधिक है, इन्‍हीं दो देशों में मेरे खिलाफ जुलूस निकले हैं, मुझ पर शारीरिक हमले हुए हैं, और मेरे खिलाफ फतवा जारी हुआ है, मेरे सिर की कीमत लगाई गई है, और इन देशों में कट्टरवादी मुझे मार डालने के लिए तैयार रहते हैं। इतने समय तक जीवन का खतरा मोल लेकर जिंदा रहने की अभ्यस्त मैं अब भला डरकर भागूंगी? भगोड़ी मैं कभी थी नहीं।
पिछले करीब 21 वर्ष से मैं निर्वासन में हूं। पहले जब मेरी चर्चा थी, और कट्टरवादी मेरी जान लेने पर तुले हुए थे, तब यूरोप की सरकारों से लेकर गैरसरकारी संगठन तक मुझसे पूछते थे-आपकी किस तरह सहायता करूं? मैंने उन सबको कहा था, मेरी नहीं, बांग्लादेश की गरीब लड़कियों की मदद कीजिए। मुझे जब देश निकाला दे दिया गया, तब कुछ दानदाता देशों ने कहा था कि वे बांग्लादेश का अनुदान बंद कर देंगे। तब मैंने कहा था, ऐसा न करें। आपकी मदद बांग्लादेश की गरीब लड़कियों को जीवित रखेगी।
नहीं, मैं अपने लिए नहीं सोच रही। इस बार मैं अमेरिका आई हूं, तो उसकी कई वजहों में से एक वजह है, सेक्यूलर ह्यूमनिस्ट कॉन्फ्रेंस में बांग्लादेश के लेखकों की भयभीत मानसिकता पर बोलना और उनकी जान बचाने के लिए यूरोप-अमेरिका की सरकारों-संगठनों से गुजारिश करना। अमेरिका में मेरे लिए जो फंड तैयार हो रहा है, वह बांग्लादेश के लेखकों को विदेश ले आने और उनके रहने-खाने पर खर्च होगा।
बीती सदी के आखिरी दशक में मैंने कट्टरवादियों के अनेक जुलूस देखे हैं, जिनमें मुझे फांसी देने की मांग की जाती थी। उन्हीं कट्टरवादियों के बेटे आज बांग्लादेश के प्रतिभाशाली लेखकों की हत्या करते हैं, पीछे से उनकी गर्दन पर वार करते हैं। बांग्लादेश में कट्टरवादियों के निशाने पर आज अनेक ऐसे लेखक हैं, जो धर्म में नहीं, विज्ञान में विश्वास करते हैं, जो शरिया पर नहीं, औरतों को बराबरी का अधिकार देने पर यकीन करते हैं। पर डर के मारे उन लेखकों ने आज लिखना बंद कर दिया है, वे घरों में छिप गए हैं, भय से देश छोड़ना चाहते हैं, हेल्मेट लगाकर घर से निकल रहे हैं। डरे हुए कुछ लेखक शहर छोड़कर गांवों में चले गए हैं, चेहरा बदलकर वे लोगों की भीड़ में मिल गए हैं।
बांग्लादेश में लगभग हर महीने एक आदमी कट्टरवादियों का निशाना बन रहा है। धमकियों के बाद कुछ लेखक पुलिस के पास गए, लेकिन उनकी रिपोर्ट नहीं लिखी गई। उन्हें कहा जा रहा है, जिंदा रहना है, तो देश से बाहर जाओ। हत्यारों की गिरफ्तारी नहीं हो रही। पूछने पर बताया जाता है, ऊपर से निर्देश नहीं है। यह दुर्दशा केवल लेखकों या ब्लॉगरों की नहीं है। राजशाही विश्वविद्यालय के अध्यापक शफीउल इस्लाम को कट्टरवादियों ने पिछले दिनों मार डाला। उनका जुर्म यह था कि उन्होंने छात्राओं को बुर्के में आने से मना किया था। उनका कहना था, बुर्के से मुंह ढके रहने से पढ़ाने में असुविधा होती है।



दुनिया भर के प्रचार माध्यमों में मेरे अमेरिका आने से भी बड़ी खबर यह है कि मैंने भारत छोड़ दिया है। भारत छोड़कर मैं कहां जाऊंगी? भारत के उस घर में अब भी मेरी किताब-कॉपियां, कपड़े, असंख्य चीजें और पालतू बिल्ली है। दिल्ली से मैं एक छोटे-से सूटकेस में दो जींस, दो शर्ट और कुछ टी-शर्ट लेकर निकली हूं। लैपटॉप और आईपैड तो हाथ में ही रहते हैं, मैं चाहे जहां भी जाऊं।
मेरा भारत छोड़ना निस्संदेह कोई अच्छी खबर नहीं है। लेकिन मेरे बारे में क्या कभी कोई अच्छी खबर आती है! दो दशक से भी अधिक समय से यूरोप और अमेरिका की विभिन्न सरकारें, विभिन्न विश्वविद्यालय, मानवाधिकार संगठन और नारीवादी संगठन मुझे भाषण देने के लिए जिस तरह बुलाते हैं, इन देशों से मुझे जो इतने सम्मान मिले हैं-इतने पुरस्कार, डॉक्टरेट-उपमहाद्वीप में क्या कभी किसी ने इन सबके बारे में बताया? इसके बजाय यही लिखा जाता है कि कितने पुरुषों से मेरी निकटता रही है, मैंने कितनी शादियां की हैं, किस देश ने मुझे भगाया है, किस राज्य ने मुझे अपने यहां से बाहर किया है, किस राज्य ने अपने यहां मेरी किताब, टीवी सीरियल पर प्रतिबंध लगाया है, कितने लोग मुझसे घृणा करते हैं। मेरे नाम के साथ एक शब्द जोड़ दिया गया है-विवादास्पद। दोनों बंगाल मुझे सिर्फ भगाकर ही चुप नहीं रहे, उन्होंने ऐसी कोशिशें कीं कि मेरी पहचान एक अवांछित नाम, एक निषिद्ध लेखिका के तौर पर हो। इतने दिनों तक जिन लोगों ने मुझसे नहीं पूछा कि मैं कहां हूं, आज वही लोग सवाल कर रहे हैं कि मैंने भारत क्यों छोड़ा। भारत में तुष्टिकरण की राजनीति और लड़कियों की असुरक्षा पर मैं मुंह खोलती थी, तो पुरुषवर्चस्ववादी मानसिकता के लोग मुझे निशाना बनाते थे, भारत छोड़कर बांग्लादेश लौट जाने के लिए कहते थे। बहुतों को आश्चर्य होता था कि भारत में पैदा न होने के बावजूद मैं वहां की अव्यवस्था पर इतनी चिंतित क्यों होती थी।
लेकिन इनसे अलग लोग भी हैं, जो मुझसे प्यार करते हैं। भारत के कितने ही शहरों में कितने ही लोग मेरे पास दौड़े चले आते हैं मेरा ऑटोग्राफ लेने, मेरी तस्वीर लेने, मुझसे लिपटने, मुझे स्पर्श करने, रोने। वह प्यार और सम्मान फिर से पाने के लिए मैं लौटकर जाऊंगी ही। मेरा सब्जीवाला जयंत मेरे लिए प्रतीक्षा करता है। मछली बेचने वाला बनमाली मेरा इंतजार करता है। इसी तरह प्रतीक्षा करता है साड़ी की दुकान का मालिक मजुमदार। यह प्यार ही मेरी सबसे बड़ी सुरक्षा है।
दुनिया भर में मेरे अमेरिका आने से भी बड़ी खबर यह है कि मैंने भारत छोड़ दिया है। भारत छोड़कर मैं कहां जाऊंगी? भारत के उस घर में अब भी मेरी किताब-कॉपियां, कपड़े, असंख्य चीजें और पालतू बिल्ली है।




(अमर उजाला से साभार)

(चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)

Friday, May 1, 2015

मजदूर दिवस


   
मजदूर दिवस पर सभी को बधाई। इस खास और ऐतिहासिक मौके पर रियासत के दो महान कवियों वेदपाल दीप (तीन जून 1929-चार फरवरी 1995) और महजूर (11 अगस्त 1887-19 अप्रैल 1952) की दो-दो रचनाएं एक बार फिर पाठकों के सामने प्रस्तुत कर रहा हूं। डोगरी गजल के बादशाह, शायर, पत्रकार और मार्क्ससिस्ट वेदपाल दीप और कश्मीरी कवि महजूर किसी परिचय के मोहताज नहीं है। वेदपाल दीप की कविताएं साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित और मोहन सिंह द्वारा संपादित किताब वेदपाल 'दीप' रचना संसार (सन 2003) से जबकि महजूर की कश्मीरी कविताएं जम्मू और कश्मीर कला, संस्कृति और भाषा अकादमी श्रीनगर की ओर से प्रकाशित किताब महजूर की श्रेष्‍ठ कविताएं (सन 1989, अनुवाद डा. शिबन कृष्‍ण रैना ) से साभार ली गई हैं। 



वेदपाल दीप




नमीं अजादिये!

नमीं अजादिये साढ़े' च आ
देसागी समझी लै अपना गै घर।
बनियै बरखा, ठंडियां कनियां
सुक्के गरीबी दे खेतरें बर।
प्हाड़े मदानें बिछे दा इ सबजा
बनियै गवां बकरियां चर।
के होया चे चिरें देसागी परतियें
असेईं पच्छान, निं बिंद भी डर।
जित्‍थे जरूरत ऐ लोकें गी तेरी
नमीं अजादिये उत्‍थैं गे चल।
कड़कदी धुप्प बी खेतरें जित्‍थैं
नंगे पिण्डै मानु जोता दा हल।
गासा' नैं छोन्दी मशीनें'च जित्‍थैं
माहनु बी बने दा लोहे दी कल।
उच्चियें माड़िये मेह़्लैं गी छोड़ी
पुज्जां पर बिच्छे दे खेतरें ढल।
सुन्ने' ने जड़े दे देवतेईं छोड़ी
मिट्टी ने सनें दे लोकें' ने रल।
आरती करनेई दीये गी बाली
बोली गरीबनी, 'करमेंदा फल'।
बडि्डयें मैहफलें सज्जियै बौनियें
सुन हां आनियै इन्दी भी गल्ल।
मैहलें च रातीं बी सूरज गै चमकै
तू कच्चे कोठें दे दिये' व बल।







गजल

उट्टी दी रात नडाल क् जारो! समां बदलने आला ऐ।
बडले नै मारी छाल क् जारो! समां बदलने आला ऐ।
रुख बदलन लगे हवाएं दे रस्ते बदले दरयाएं दे
बदलै दा जमाना चाल क् जारो! समां बदलने आला ऐ।
ओ ज्वाला मुखियें मुंह खोले, कम्बी धरती परबत डोले
इक औन लगा भंचाल क् जारो! समां बदलने आला ऐ।
त्रुट्टे-भज्जे दे पैमाने, सुनसान होए दे मैखाने
पीने आले बेहाल क् जारो! समां बदलने आला ऐ।
तड्फै दा शलैपा व्याकल जन, हुन होने बाज निं रौग मिलन
हिरखै दा कलेजा घाल क् जारो! समां बदलने आला ऐ।
नां उच्चा कुल, ना बड़याई, पैरें सौंगल नां गल फाई
(आ) जाद होए कंगाल क् जारो! समां बदलने आला ऐ।
ओ गगन दमामा बज्जै दा, ताण्डव छिड़ेआ रण सज्जे दा
देऐ दी सृष्टि ताल क् जारो! समां बदलने आला ऐ।
नईं अत्‍थरूं 'दीप' दे नैने च, चरचे पेई गे तरफैनें च
ए कैसा चरज कमाल क् जारो! समां बदलने आला ऐ।









महजूर




रे गुलेलाला!

लाला, लाला रे गुलेलाला *!
हाल अपने दिल का
कर तू इजहार!
सीने पर दाग लेकर
आया तू जहां से
रे बाल गोपाल!
क्या वहां भी सब-के-सब
हैं दागदार!
विकलता से मुक्त
शांति से युक्त था, वह संसार
भौतिकता से परे
वहां तो था सुख-चैन, और
मन का पूरा करार!
फिर
तेरे कोमल हृदय को
कौन-सा यह हादसा
दे गया वेदना आपार?
वहां भी, यहां की तरह ही
है अव्यवस्‍था और अंधकार?
वहां भी है
'यंबरज़ल' 'मसवल'
गुल और गुलजार?
हैं वहां भी बुलबुल को
फूलों की लगन?
या
वहां भी
खत्म हो रही है बहार?
वहां भी इंसान
इंसान को मारने के लिए
बना रहा है हथियार?
और
औरतों, मासूम बच्चों पर
कर रहा बमबार?
वहां भी हैं
कब्रिस्तान और मरघट
'मलखाह', 'नूरबाग','दानामज़ार' **
और इन सबके ठेकेदार?
वहां भी है
व्यवस्‍था कंट्रोल की गोलमोल
और वस्तुओं का चोर-बाजार?
वहां भी है
पक्षपात समान बांटने में
और इस लोक जैसे धूर्त राशनदार?
वहां भी
अकिंचन की
कोई इज्जत नहीं
और सिद्धांतहीन-पाखंडी
कहलाते हैं इज्जतदार?
वहां भी हैं
काश्तकार, जमींदार
और बड़े-बडे चकदार?
वहां भी निठ्ठलों में
बंटती हैं नियामतें
और मेहनतकशों को
फोके और अत्याचार?
वहां भी निर्धन हैं कहलाते
मुजरिम-गुनहगार और
साफ छूट जाते हैं मालदार?
वहां भी
दुर्बल-पीड़ित कहलाते हैं झूठे
सत्यवाद कहलाते
पूंजपति मक्कार?
वहां भी कैद है किया जाता
सच्चों को
और राज करते
वाचाल और तेज-तर्रार?
(होते जो मोटर कार में सवार)
वहां भी
न्याय के नाम पर
लुटते हैं मुलज़िम
और उनके नातेदार?
वहां भी
पिटते हैं बेगुनाह
साथ उसके साथी-रिश्तेदार?
वहां भी करता है जालिम
दमन कमजोरों का, और
उनके पक्षघरों के साथ
करता है दुराचार?
वहां भी विद्वान-पंडित
शोषक को हाथ जोड़
कहते हैं अपना दिलदार?
वहां भी ज्ञानीजन
कहते हैं दिन को रात
ओर झाड़ियों को देवदार?
वहां भी 'महजूर' दूर बैठ कर
फैंकते हैं मुर्गियों को
मोती दाने ये निर्लज्ज चाटुकार?


लाल रंग का खास फूल जिसकी पंखुडियों के बीच दाग होता है
** श्रीनगर में स्थित विभिन्न कब्रिस्तान





दर्द का संगीत

मधुबाले, किया बहुत अधीर
तुने मुझे
अब मदिरा पिला
कुछ ऐसी
भर जाए
इस व्याकुल मन में
दर्द का संगीत और
बेचैनी।
सुबह की बयार
बगीचे में जो बही
बुलबुल के लिए लाई
खुशियां बेहिसाब, और
मालिक के लिए
चटकते गुलाब।
मगर
रीते प्याले की तरह
पानी में घूमता रहा भंवर
रात-दिन
दरिया ने दिया नहीं उसे
एक भी कतरा पानी।
(दोस्त मेरे)
मांगने और मनाने का
दौर हो चला है समाप्त
दौर नया आया है अब-
होगा जिसकी भुजाओं में दम
विजय-किरीट बंधेगा उसी के।
उमंग-उत्साह
जोश और बेचैनी
होंगे पैदा जब दिलों में हमारे
इंकलाब होगा तब
इंकबाल के हैं ये
लक्षण सारे।
(अन्याय का आलम देखो)
पहले लुटे दादा मेरे
जब मैं भी हूं लुट रहा
माल ले गए
जान भी ले रहे हैं
देकर अहंकार पे धार
तेज हुए जुल्म के औज़ार
(दोस्त मेरे फिक्र न कर)
वक्‍त पड़ने पर
जुल्म की कैंची से ही कटेंगी
गुलाम की ये जंजीरें।
लाखों लोग तब
देख कर बाग को
होंगे पुलिकत
खिलेंगे फूल
चहकेंगी बुलबुलें
उजड़ेंगे घर भी कई के।
लिप्त रहे स्वार्थ में कुछ लोग
मुल्क की आजादी के खिलाफ-
वक्‍त जब प्रभावित करेगा
कैसे समझाएंगे
आने वाली पीढ़ियों को वे
पड़ेगा मुश्किल
देना जवाब।
दूर हो जा एक तरफ
मेरे कौम के बाग का
दुश्मन है तूं।
सींचना है मुझे पेड़ों को
पानी बहने लगा है अब
हमारी नदियों में।
हवा गुलों को हंसाती है
'महजूर' दिलों को है जगाता
दोनों है इस बात से बेखबर
पाप क्या और पुण्य क्या?