Tuesday, March 28, 2017

गलाड कैम्प में ' शहीदे आज़म - अमर रहे , इंकलाब - जिन्दाबाद ' के नारे गूंजे


' लोमजक ' द्वारा आयोजित ' भगत सिंह - शहीदे आज़म ' कड़ी का अंतिम कार्यक्रम सम्पन्न हुआ . इस साल बैठकी , एकल भाषण और पोस्टर कविता जैसे छोटे - छोटे कार्यक्रमों के अंतर्गत छात्र वर्ग को प्राथमिकता दी गयी . आज लोकमंच के साथी पाकिस्तान सीमा से सटे साम्बा जिले के गाँव गलाड कैम्प में थे . 


यह गाँव आए दिन पाकिस्तानी गोलीबारी के कारण राष्ट्रीय सुर्खियों में रहता आया है . यहाँ देशभक्ति , युद्ध , तनाव , खौफ , विस्थापन , फसलों की बर्बादी , अनदेखी और अशांति जैसे शब्द ग्रामीणों के लिए नए नहीं हैं . ऐसे में शहीदे आज़म के देशभक्ति , क्रांति , राजनीति , शोषण , विज्ञान , ईश्वर , धर्म , साम्प्रदायिकता सम्बन्धी विचारों को बड़े ध्यान से सुना गया .


 कार्यक्रम की शुरुआत गाँव के बुजुर्ग किसान श्री सेवा राम को सम्मान देकर की गई . इसके बाद ' लोकमंच जम्मू - कश्मीर ' के संयोजक कुमार कृष्ण शर्मा ने सबका स्वागत किया . उन्होंने संगठन द्वारा की जाने वाली सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों के बारे में जानकारी दी . उन्होंने बाजारवाद , पूँजीवाद और सपनों के बदलते अर्थ पर विचार प्रकट किये . शहीद भगत सिंह और पाश के बलिदान को नमन किया . प्रतिबद्ध सदस्य अदिति ने शहीद भगत सिंह के जीवन पर एक सुन्दर आलेख पढ़ा . 

अगले वक्ता के रूप में चौथी कक्षा में पढ़ने वाले कृतिक ने शहीदे आज़म पर बहुत प्यारे विचार रखे . उन्होंने कहा कि जिस दिन तक स्कूल जाती बस में से झुग्गी झोपड़ियों के बाहर खेलते ; शिक्षा से वंचित बच्चे दिखाई देंगे , तब तक प्यारे भगत सिंह का सपना पूरा नहीं हो सकता . 

उसके बाद सह संयोजक कमल जीत चौधरी ने दुनिया में बढ़ते हत्यारों और हथियारों की निंदा की . पर्यावरण , धार्मिक कट्टरता , अंधविश्वास , साम्प्रदायिकता , उन्माद को लेकर चिंता ज़ाहिर की . देशहित में युवाओं से सामूहिक सपनों और प्रतिरोध की संस्कृति को मजबूत करने में अपना योग देने का आह्वान किया . 

उन्होंने कहा कि संकुचित और स्वार्थी सत्ताएँ शहीदे आज़म को अपनी सुविधा अनुसार गलत ढंग से पेश कर रही हैं ; जबकि उनका जीवन विश्वबंधुत्व और वसुधैवकुटुम्बकम के व्यापक आदर्श को सामने रखता है . वे किसी विशेष के नहीं आम आदमी के नायक हैं . उनकी विचारधारा का अनुकरण करते हुए हमें एक तार्किक , प्रतिबद्ध और वैज्ञानिक जीवन जीना चाहिए . 

कलाकार शशि पावेल ने कहा कि जब तक हमारे पास सवाल और जिज्ञासा नहीं हैं ; हम किसी के बारे में सही - सही नहीं जान सकते . उन्होंने भगत सिंह के नास्तिक जीवन को प्रासंगिक और महान बताया .

 इसके बाद महेश कुमार ने भी अपने विचार रखे . कार्यक्रम में मिन्टू सिंह ने भगत सिंह और साथी सदस्य कुलदीप ' किप्पी ' ने बेटियों पर सुन्दर भावपूर्ण गीत गाए . साथी स्वामी अंतरनीरव ने पहाड़ी कविताओं को प्रभावी अभिनय से प्रस्तुत करके खूब सराहना पाई . 

सके अलावा गाशा पावेल , कुमार कृष्ण शर्मा , श्वेत केतु , किप्पी और कमल जीत ने अपनी कविताओं का पाठ किया . कार्यक्रम के शुरू और अंत में ' इंकलाब ज़िन्दाबाद ' और ' भगत सिंह , सुखदेव , राजगुरु और पाश अमर रहें ' के नारे लगे . 

कार्यक्रम खत्म होने पर गाँव के युवा लड़कों ने भविष्य में भी लोकमंच को सहयोग देने की बात की . कार्यक्रम में कंगवाला से आए मोनू चौधरी ने अगला कार्यक्रम अपने गाँव में करवाने का प्रस्ताव रखा . जिसका स्वागत किया गया . 




कार्यक्रम में राकेश , अश्वनी चौधरी ( बोनी ) , शुभम , रमण , सुमित चौधरी , अभि , अनमोल , दीपक चौधरी , रोहित , अमित , मारकोनी , बिल्ला , अल्ब्रेटा , बाबा , अमन , स्मृति , मंजुला , पंकज , रजत , महेश कुमार , सोबित , सन्नी , कपिल , संजू , मोंटी चौधरी , संदीप सिंह , सुभाष चौधरी , हरनाम , अनिल चौधरी , मिठ्ठू , मोती चौधरी आदि शामिल हुए .


रिपोर्ट :
गगन सिंह ' शशि '
लोक मंच जम्मू - कश्मीर ,
26 मार्च , 2017.

Tuesday, February 28, 2017

कुंवर शक्ति सिंह


जन्म- 10 जनवरी 1977, अखनूर (जम्मू व कश्मीर)
शिक्षा- यूनिवर्सिटी आफ जम्‍मू से फाइन आर्ट्स में पांच वर्षीय प्रोफेशनल डिग्री
पहचान- जर्नलिस्ट और कालमनिस्ट
 

दैनिक कश्मीर टाइम्स को सन 1994 में पत्रकार के रूप में ज्वाइन किया। सन 1998 में साप्ताहिक कालम 'दस्तक' को शुरू किया। उसके बाद सन 1996 से 1999 तक सब एडिटर के तौर पर कार्यरत रहे। सन 1999 में दैनिक जागरण के साथ पत्रकार के तौर पर काम भी किया।
फ्रीलांसर के तौर पर जम्मू से जुड़े मामलों और अनुभव कई पत्रिकाओं जैसे आटउलुक और द संडे इंडियन आदि में सन 2004  से साझा कर रहे।
 

दूरदर्शन जम्मू, श्रीनगर और दिल्ली के लिए नो वृतचित्रों को लिख चुके। आकाशवाणी के भी कई कार्यक्रमों में‌ शिरक्त।

छपे साक्षात्कार- वीपी सिंह, डा. असगर वजाहत, निदा फाजली, उस्ताद अहमद हुसैन, उस्ताद मोहम्‍म्द हुसैन, पद्मा सचदेव, अमृता प्रीतम, मधुकर, पंडित शिव कुमार शर्मा, जगजीत सिंह, उमर अब्दुल्ला, सईद अली शाह गिलानी, राजेंद्र यादव आदि
 

परिचर्चा- राम जेठमलानी, डा. फारूक अब्दुल्ला, उस्ताद अल्लाहरखा खान, उस्ताद जाकिर हुसैन, नक्‍श लायलपुरी, रामानदं सागर, डा. कर्ण सिंह, खुशवंत सिंह, महीदा गौहर आदि।



कुंवर शक्ति सिंह का काव्य संग्रह 'शहर जब सो जाता है' कुछ महीने पहले विमोचित किया गया। इसी संग्रह में से तीन कविताएं पाठकों के समक्ष प्रस्तुत हैं: 


जासमीन के फूल
(दिवंगत कामरेड मित्र मोहसिन के लिए)

जासमीन का फूल था वो
मुरझाने से पहले
टूट की बिखर गया
सब का कहना है-
'मोहसिन तो मर गया है'
मुझसे मेरे भीतर से
कोई बार बार कह रहा है
बांध टूट गया है, शहर बह गया है
यह कहां की है खुदाई
कि जगह जगह नजर आते है
उसके फूल से चेहरे पर
मुझे काली स्याही फेंक देनी होगी
घाव होने के कारण
मुझे जिस्म का वह हिस्सा ही काट देना होगा
ओ साथी
मैं क्या करूं
नेहरू से गांधी हुई पीढि़यों का
या 26 जनवरी के दिन
लोकतंत्र की सलवार फहराने वालों का
मेरे लिए तो अहमियत रखता है
अपने कसबे में बहनता चिनाब
विनोद दुआ की खबरें
या तुम्हारी चिट्ठी
हम एक और एक ग्यारह थे
हम किसी से कम नहीं थी
हममें से एक भी बचा तो
हम दोनों जिंदा हैं
हलाल पसीने की खातिर
लड़ते रहेंगे हम
ढलान से चढ़ाव की तरफ चलेंगे
बहाव के विपरीत बहेंगे
और दिन-दोपहर में
काले ही आसमान की स्टेज के पीछे
जा कर ही रहेंगे


 दस्तक

मेरी शायरी तवायफ ही सही
पर ऐसा भी नहीं
कि तुम जब भी दस्तक दो इस द्वार पर
यह खुल जाए...
छलनी में अटक गए हैं कुछ टुकड़े गुनाहों के
मेरी रात के सिरहाने
आहट आती रहती है जिनके पिसने की
कई सालों से सोया नहीं हूं
सन्नाटा पसरता रहता है आत्मा में
अनचाही स्मृतियों के साथ
सोचता हूं तो
तुम्हारा चेहरा नहीं दिखता
खुद को देखता हूं पत्थर हो चुका
शायद
तुम्हारी चूड़ी का कोई टुकड़ा
मेरे कमरे में नहीं है
तुम्हारा दिया हुआ कोई फूल
मेरी किताब में नहीं है!


अंधेरे से सनसेट तक, एक मुक्ति यात्रा

सदी के जितनी लंबी
गहरी सुनसान रात में
रोशनी का एक छेद हो गया
समय! जिसकी खबर ही नहीं थी
जमी बर्फ में से निकले लगा
निकल आया मैं भी उस कारावास से
मालूम नहीं था किधर है जाना!
मुक्ति के लिए किधर होता है जाना
पिंजरे से आजाद पक्षी किधर है जाता
कच्चे चूल्हों का धुआं किधर है जाता

एक टूटी फूटी सड़क के किनारे
ठिठुरते हुए कुछ लोग बस का इंतजार कर रहे थे
सोचा, इन्हें पूछूं - जाना है किधर?
फिर रहने दिया
यह जो घड़ियाल लटका है मंदिर के भीतर
कहीं गिर न जाए पुजारी के सिर पर
सोचा, बता दूं, फिर रहने दिया
रहने दिया सारा काम अधूरा ही
रात, जो रातभर
अपने दुपट्टे से आसमान पौंछती रहती
रहने दी।

कहते हैं
जहां वास्तव में होता है सन-सेट
वहीं समाया है समय का भेद
कई जलसमाधियों और अग्निसमाधियों
से होता हुआ उतर आया हूं इस जगह
यहां एक साथ होते रहते हैं
कईं सन-सेट।



संपर्क 
हाउस नंबर 48, वार्ड नंबर 2
अखनूर- जम्मू व कश्मीर
मोबाइल - 94196-31196
ई-मेलः  dastak.kt@rediffmail.com


(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)

Saturday, October 8, 2016

खुद से लड़ता, खुद को गढ़ता मूर्तिकार



रियासत जम्मू व कश्मीर के विश्व विख्यात मूर्तिकार रविंद्र जम्वाल पर हाल ही में कला, संस्कृ​ित और भाषा अकादमी के केएल सहगल हाल पर झरोखाश्रंखला के तहत कार्यक्रम का ओयाजन किया गया। कार्यक्रम अकादमी तथा रेडियो कश्मीर जम्मू  की ओर से किया गया था। इसमें विभिन्न सम्मान हासिल कर चुकी प्र​ितष्ठित साहित्यकार योगिता यादव ने जम्वाल के व्यक्तित्व एवं कृतियों पर पेपर पढ़ा। 
हार्दिक आभार और  अनंत शुभकामनाओं सहित योगिता यादव का पेपर सहर्ष पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है। उम्मीद है कि पेपर पाठकों को रविंद्र जम्वाल के कर्म के साथ साथ उनकी विचारधारा, चिंताओं और व्यक्तित्व के  और पास ले जाएगा। 


('खुलते किबाड़' पर योगिता यादव का स्वागत इस उम्मीद के साथ भविष्य में भी उनका सहयोग ऐसे ही प्राप्त होता रहेगा।)






वे अपने लिए कुछ रेखाएं खींचते हैं, कुछ मिट्टी जुटाते हैं, फिर उनमें भाव खोजते हैं। आस्था बनती है। फिर कोई नया ख्य़ाल, कोई नया भाव आकर अब तक की तमाम मान्यताओं को धराशायी कर देता है। अधिकतर कलाकार ऐसे ही बनते हैं और ऐसे ही बिगड़ती हैं एक के बाद एक निर्मित हुईं उनकी अवधारणाएं। जम्मू की शान, शान-ए-डुग्गर, लोकप्रिय शख्सियतों में से एक रविंद्र जम्वाल कलाकारों के मूल प्राणतत्व से भला अलग कैसे हो सकते हैं। वे भी अपने लिए मिट्टी जुटाते हैं, मजबूत धातुओं को ख्यालात की तरह खूबसूरत मोड़ देते हैं। उनकी संयोजित ऊर्जा और लगन से एक खूबसूरत कलाकृति आकार लेती है। कृति तो पूर्ण हुई पर कलाकार अब भी संतुष्ट नहीं हो पाया। रविंद्र कुछ और करना चाहते हैं। कुछ और खोजना चाहते हैं। वे अपने आसपास के उपलब्ध संसाधनों से सबसे जटिल पत्थर चुनते हैं। उसके गठन के एक-एक तंतु पर बहुत बारीकी से अनुसंधान करते हैं। फिर उसे तोड़ते हैं, ऐसे कि जैसे कोई अब तक की जघन्यतम आस्था को तोड़ रहा हो। उसमें फिर से एक नए रूप, एक नए भाव की स्थापना करते हैं। लीजिए तैयार है किसी खास स्तंभ के लिए बना अब तक का सबसे आकर्षक बुत। पर वह जो चौबीस घंटे, सातों दिन निरंतर क्रियाशील है, उसके लिए चित्ताकर्षक कृति फिनीक्स पक्षी की राख से अधिक और कुछ नहीं है। बेहतरीन कृतियों का ये अनावरण, ये तालियों की गडग़ड़ाहट, प्रशंसा के ये कसीदे.... इन पर रचनाकार घड़ी भर ठहरता जरूर है पर रुकता नहीं है। रविंद्र जम्वाल भी अपनी कल्पनाओं की ऊष्मा में इन सब को स्वाहा कर फिर से विकल हो उठते हैं कुछ और नया गढऩे के लिए। वे अभी संतुष्ट नहीं हैं। उन्हें अभी कुछ और गढऩा है। उन्हें अभी कुछ और ढूंढना है। इन रेखाओं में, रंगों में, धातुओं में, पत्थरों में वे किसी कलाकृति को नहीं ढूंढ रहे, असल में वे अपनी खोज में हैं। वह ढूंढ रहे हैं उस कौन (?) को जिसने अदृश्य होते हुए भी सभी को ऐसे जोड़ रखा है कि जैसे बिखरे पन्नों पर शीराजा बंधा हो। 
राजपूत बहुल गांव बीरपुर में जन्मे रविंद्र जम्वाल के लिए बहुत आसान था सेना में भर्ती होकर देश की माटी का कर्ज चुकाना। राज्य की राजनीतिक पहचान भले ही बदली हो पर इस गांव की परंपरा नहीं बदली। जब राजतंत्र था तब भी इस गांव के नब्बे प्रतिशत पुरुष सेना में भर्ती हुआ करते थे और अब जब देश में लोकतंत्र है तब भी इस गांव के लगभग हर परिवार से कोई न कोई पुरुष सेना में है। स्वयं रविंद्र जी के पिताजी धु्रब सिंह जम्वाल भी सेना में कैप्टन रहे हैं। पुरुषों के सेना में होने के बावजूद इस गांव के परिवारों का गठन कुछ ऐसा रहा है कि घर अकेले नहीं होते। चार भाई-बहनों में सबसे छोटे रविंद्र जम्वाल भी ऐसे ही भरे-पूरे परिवार के बीच पले-बढ़े। चार तायों के संयुक्त परिवार में पले बढ़े रविंद्र कहते हैं, ''अब जो खालीपन घरों में दिखता है, वह हमें बचपन में कभी महसूस ही नहीं हुआ। परिवार ऐसे होते थे कि घर में हर उम्र का कोई सदस्य होता था। मैं अपने बड़े भाई का अपने पिता की तरह सम्मान करता हूं क्योंकि उनसे हमेशा वही आशीर्वाद, वही सहयोग पाया जो कोई बच्चा अपने पिता से पाता होगा। हालांकि इनके पिताजी ने भी इन्हें हमेशा प्रोत्साहित किया। जब इन्होंने तय कि इन्हें मिट्टी का कर्ज नहीं चुकाना, उससे बतियाना है, तब भी इनके पिता ने इन्हें प्रोत्साहित किया। वह कृतियां जिन्हें देखकर शहरी तथाकथित पढ़े-लिखे लोग भी दाएं-बाएं देखने लगते हैं, उन्हें बनाने का प्रोत्साहन कैप्टन धु्रब सिंह ने रविंद्र जम्वाल को बीरपुर गांव में दिया। जहां तक गाडिय़ां भी घंटों इंतजार के बाद पहुंचती थीं, वहां तक प्रसिद्धी को तो जैसे ही आना था। गांव के ही स्कूल में किशोर रविंद्र जब चित्रकला की कॉपी में छोटे-छोटे चित्र बनाता था, यह तभी तय हो गया था। चित्रकला के अध्यापक बोधराज जी और फिर जगदीप सिंह जम्वाल ने इसकी परख कर ली थी। उन्हीं के मार्गदर्शन और दो साल के चिंतन मनन के बाद रविंद्र जम्वाल ने जम्मू के फाईन आर्ट कॉलेज में दाखिला लिया। शर्मीले स्वभाव के रविंद्र के लिए बीरपुर गांव से निकल कर सीधे जम्मू के कला पारखियों और बर्हिमुखी लोगों के बीच सामंजस्य बैठाना निश्चय ही मुश्किल होता यदि उन्हें हर्षवर्धन जैसा दोस्त न मिल गया होता। रविंद्र के पास हुनर था और हर्षवर्धन के पास हुनर और उसे प्रस्तुत करने का कौशल दोनों। जहां कहीं भी मुश्किल आती, कोई संकोच रविंद्र के कदम रोकता, हर्षवर्धन उनके कंधे पर हाथ धरे उन्हें वहां से निकाल ले जाते। दोस्ती किस तरह व्यक्ति को आत्मविश्वास से भर देती है यह रविंद्र ने यहां आकर जाना। वहीं जब पद्मश्री राजेंद्र टिक्कू, अरविंद्र रेड्डी और विद्यारतन खजूरिया जैसे महान कलाकारों का मार्गदर्शन मिला तो उनकी कला में और निखार आया। उनके सोचने और काम करने के ढंग में भी अप्रत्याशित बदलाव आया। कोई भी नया प्रशिक्षु गीली मिट्टी की तरह होता है। उसमें कोई भी आकार लेने की असीमित संभावना होती है। पर उसे गढऩे का कौशल कुम्हार ही जानता है। राजेंद्र टिक्कू और पीजी धर चक्रवर्ती ऐसे ही कुशल मार्गदर्शक साबित हुए रविंद्र जम्वाल के लिए। 



उम्र का एक गुलाबी दौर ऐसा भी आता है जब व्यक्ति को हर शाख और हर फूल में एक ही चेहरा नजर आता है। उसने अपनी कृति दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कृति लगती है और जो वह बना रहा होता है, उसके प्रति वह इतना अधिक आसक्त होता है कि उसी स्टाइल को अपना सिग्नेचर बना लेना चाहता है। हर कलाकार के जीवन में ऐसा दौर आता है। जो इससे असहमत होंगे, वे अपने बारे में कुछ अधूरा जानने और मानने वाले लोग होंगे। ऐसे दौर में जब रविंद्र एक खास स्टाइल की तरफ बंधने लगे थे, तब राजेंद्र टिक्कू जी की एक हल्की सी थपकी ने उन्हें जैसे नींद से जगा दिया। जैसे कुम्हार जब पात्र गढ़ रहा होता है, तो वह उसे बाहर से थाप देता है और अंदर से सहारा। इसी थाप और सहारे ने रविंद्र को फिर से खुद पर काम करने, अपनी रचनात्मकता पर मनन करने के लिए प्रेरित किया। यह रविंद्र के जीवन और रचनात्मकता का तीखा मोड़ था। इस मोड़ से गुजर कर वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कलाकार बने। इस दौरान वे बड़ौदा के सायाजी राव विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर कर चुके थे। बड़ौदा के उदार और रचनात्मक माहौल ने भी उनके सोचने के ढंग में उत्तरोत्तर वृद्धि की। कई बार वे चौंकते, तो कभी सुकून भी महसूस करते कि बीरपुर का लड़के का काम बड़ौदा में भी किसी से कमतर नहीं है। यहीं से उनके पास कई तरह के प्रस्ताव आने शुरू हो गए थे। कुछ नौकरी के थे, तो कुछ विदेशों के भी प्रस्ताव थे। पर रविंद्र ने जैसे मन में ठान लिया था कि मुझे अपने गांव की मिट्टी को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर लाना है। तमाम प्रस्तावों को नजरंदाज करते हुए उन्होंने वापस अपने जन्मभूमि अपने गांव लौटने की ठानी और यहीं पर ध्रुबसत्य नाम की अपनी कार्यशाला बनाई। यही रविंद्र की जन्म भूमि है, यही तपोभूमि भी है। यह उनका तपोसाधना ही है कि वे एक साथ व्यवसायिक और रचनात्मक दोनों मंचों पर डटे हुए हैं। न कभी अध्यापन से कोई कोताही की, न कभी रचनात्मक काम से पीछे हटे। दिल्ली, मुंबई, बड़ौसा सहित देश और पेरिस, कोरिया सहित विदेशों में दर्जनों एकल और समूह प्रदर्शनियों में रविंद्र का काम प्रदर्शित होता रहता है। हर काम उन्हें कुछ नया सबक देकर जाता है। हर अनुभव उन्हें रचनात्मकता के स्तर पर फिर से ताजा कर देता है। ऐसा ही एक अनुभव साझा करते हुए वे कहते हैं, ''यह दक्षिण कोरिया की यात्रा थी। वहां की एक उच्चाधिकारी एयरपोर्ट पर उनका स्वागत करने पहुंची थी। अभी कार में बैठे वे कोरिया की सड़कों, वहां की स्वच्छता को देख अभिभूत थे। इसी मुग्ध भाव में वे अनायास ही बोल उठे, 'यहां की सड़कें कितनी साफ हैं। धूल मिट्टी का नामो निशान नहीं है। हमारे यहां तो बहुत गंदगी है।Ó कोरियाई उच्चाधिकारी कुछ क्षण के लिए खामोश रहीं। फिर बोलीं, 'जम्वाल हम अपने देश के लिए कभी ऐसी बात नहीं कह सकते।Ó मेरे लिए यह जिंदगी का सबसे बड़ा सबक था कि देश प्रेम क्या होता है। हम जरा सा छैनी हथोड़े पर हाथ सधते ही देश से ऊपर हो जाते हैं। यहां मैंने देश भक्ति का सबक सीखा। आज मुझे गर्व है कि मैं बीरपुर की मिट्टी में जन्मा हूं और भारत देश का नागरिक हूं।
रविंद्र अपने देश पर जान छिड़कते हैं। देश में घटी कोई भी घटना, दुर्घटना उन्हें उसी तरह उद्वेलित करती है, जैसे किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को उद्वेलित करती है। जब घाटी से कश्मीरी पंडितों का जबरन विस्थापन किया गया, तब रविंद्र के मन को गहरा आघात पहुंचा। अभी तक रविंद्र जम्वाल की कृतियों में डुग्गर की लोक आस्था, विश्वास और कलाएं स्थान पा रहीं थीं वहीं अब विस्थापन की पीड़ा, घुटन भरे माहौल की यंत्रणा और जन्मभूमि से दर बदर कर दिए जाने की पीड़ा अभिव्यक्त होने लगी। लंबे समय तक यही भाव उनकी कृतियों का प्रधान स्वर रहे। रणबीर नहर में सबसे लंबी तैरती कलाकृति बनाकर उन्होंने लिमका बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड में अपना नाम भी दर्ज करवाया। 




पर हर आघात की एक सीमा होती है, हर अनुभव का एक दायरा होता है। हमारी आस्था, हमारी नजर, रफ्तार, संहार, पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूमना, सूरज का ताप, आकाश गंगाओं में तारों का लश्कर.... इन सभी की एक सीमा है। कोई तो दायरा है, जिसमें ये सभी बंधे हैं, यही सोचते हुए अब आपने 'दायरोंÓ पर काम करना शुरू किया। खुशियों के फ्रेम, यंत्रणाओं के फ्रेम और अनुभवों के फ्रेम इनकी कुछ उल्लेखनीय प्रदर्शनियां रहीं हैं। सब कुछ फ्रेम में बंध सकता है पर एक रचनाकार का जन्म ही होता है, इस फ्रेम को तोडऩे के लिए। निश्चित ही रविंद्र जम्वाल भी इस फ्रेम से बाहर आएंगे और कुछ नया अप्रत्याशित गढ़ेंगे। वे बड़े कलाकार हैं, उन्हें अभी और बड़ा बनना है। उनकी प्रतिस्पर्धा स्वयं से है। और यह सबसे जटिल प्रतिस्पर्धा होती है। इस प्रतिस्पर्धा में कोई संबल है तो उनका परिवार, उनकी पत्नी बीना जम्वाल। उनकी भाभियां, उनके भतीजे, भतीजियां। जो संसार में रहते हुए भी उसकी लौकिक कामनाओं से निर्लिप्त रहने वाले इस कलाकार की एक आवाज पर दौड़ पड़ते हैं। रविंद्र बिना मॉडल के कृति नहीं गढ़ पाते, तो उनके भाई जोगेंद्र सिंह वैसी ही जरूरी पोशाक पहनकर उनके लिए मॉडल बनते हैं, तो कभी दूसरे भाई नरेंद्र सिंह उनके लिए जरूरी सामान जुटा देते हैं। भला होगा कोई ऐसा सौभाग्यशाली कलाकार जिसे अपने परिवार का इतना साथ मिले। रविंद्र अपनी जन्मभूमि बीरपुर पर जान छिड़कते हैं। पर उसकी रूढिय़ों के खिलाफ किसी योद्धा की तरह डटकर खड़े हो जाते हैं। जब अपनी इच्छा से विवाह करने वाली बेटियों का राजपूती शान बहिष्कार करती है, तो रविंद्र उन्हें अपने आंगन में जगह देते हैं। जब अंधभक्तों की आस्था कनफोड़ू शोर में बदलने लगती है, तो वह उसके भी खिलाफ खड़े हो जाते हैं। फिर चाहें सारा गांव उनके खिलाफ हो जाए। कोई उन्हें सनकी ही क्यों न कहने लगे। कलाकार कुछ अलग मन लिए होते हैं। वे अपने आसपास से बहुत दूर होते हुए भी उससे बहुत गहरे से जुड़े होते हैं। हर व्यक्ति को अपने कलाकार मित्र, रिश्तेदार, पड़ोसी के प्रति अतिरिक्त संवेदनशीलता से काम लेना चाहिए। इनके हाथों में ब्रह्मा का वास है और हृदय किसी कोमल फूल की तरह है। जो जरा सी धूल, धूप से भी कुम्हला सकता है। सुख जहां ठहरे आसन की तरह है, वहीं दुख और पीड़ा औषधियों की बहती हुई नदी की तरह है। यह निश्चित ही रविंद्र जम्वाल को कुछ सकारात्मक दे कर जाएंगे। उनके हाथ मिट्टी में सने हैं, काग$ज की लुगदी भीगी हुई प्रतीक्षा कर रही है नई शक्ल और आकार की। कुछ धातुएं हैं, जो पिघल जाना चाहती हैं, उनके स्पर्श से एक नए रूप की कामना में। इनकी भाषा सिर्फ रविंद्र समझते हैं और वही इनका उत्तर भी देंगे। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ 



Yogita Yadav

911, Subhash Nagar

Jammu – (J&K)

Wednesday, June 15, 2016

महाराज कृष्ण संतोषी



जन्म : कश्मीर, 1954
शिक्षा: एमए अंग्रेजी साहित्य
विधिवत काव्यलेखन सन 1975 के आसपास शुरू किया। पहला काव्य संग्रह 'इस बार शायद' 1980 में प्रकाशित। पहल, साक्षात्कार, समकालीन भारतीय साहित्य, वागर्थ, हंस, आलोचना, कथादेश, विपाशा, जनसत्ता सहित देश की लगभग सभी महत्वपूर्ण पत्र प​ित्रकाओं में कविताएं और कहानियां प्रकाशित।
कुछ रचनाओं के अनुवाद अंग्रेजी, पंजाबी, डोगरी, बंगाली और कश्मीरी में।

प्रमुख कश्मीरी कवियों की प्र​ितनिधि कविताओं के हिंदी में अनुवाद।

प्रकाशित कृ​ितयां 

काव्य: 1. इस बार शायद (1980) 2. बर्फ पर नंगे पांव (1993, पुरस्कृत) 3. यह समय कविता का नहीं (1996) 4. वितस्ता का तीसरा किनारा (2005, पुरस्कृत)
कहानी संग्रह: हमारे ईश्वर को तैरना नहीं आता (2009)

सम्प्र​ित: स्वतंत्र लेखन

हार्दिक आभार और  अनंत शुभकामनाओं सहित प्रस्तुत हैं अग्रज संतोषी जी की कुछ कविताएँ।




व्यथा

अभी भी जिंदा है मेरे भीतर
गुरिल्ला छापामार
बेहतर दुनिया के लिए लड़ने को तैयार

पर एक कायर से
उसकी दोस्ती है
जो उसे यही समझाता रहता है
दूसरों के लिए लड़ोगे
तो मारे जाओगे

सच कहता हूं
यही है मेरे जीवन की व्यथा
सपना देखा उस गुरिल्ला ने
जीवन जिया इस कायर ने




बेरहम

पहाड़ ने मान रक्खा
मेरे हौंसले का
घाटी ही बेरहम निकली
पेड़ से गिरा दिया
मेरा घौंसला





एक अच्छा दिन

बहुत अच्छा दिन बीता आज

न पढ़ा अखबार
न देखा टेलिविजन ही

सुबह सुबह ओस की बूंदों में
मैंने देखा लिया अपना प्र​ितबिंब
फिर अच्छा लगा यह सोचना
कि ओस ही है हमारे जीवन की आत्मकथा

बहुत अच्छा दिन बीता आज

न मंत्र
न ईश्वर
न मित्र याद आए

आज अकेला ही
हरी हरी घास पर
लंगे पांच चलते हुए
मैंने पृथ्वी का प्यार नाप लिया
और पेड़ों से लिया मौन

बहुत अच्दा दिन बीता आज

ने किसी ने नाम पूछा
न जात
ना गांव

आज ऐसा लगा
दुनिया का सबसे बड़ा अमीर
वहीं हो सकता है
जो सारी पृथ्वी से कर पाए प्यार
और यह बात
मुझे किसी किताब से नहीं
हरी घास की एक पत्ती ने समझाई


काठ की तलवारें

हम काठ की तलवारें हैं
हमें डर लगता है
माचिस की छोटी-सी तीली से भी

हम मंच पर कलाकार का साथ
तो दे सकते हैं
पर सड़क पर किसी निहत्थे की रक्षा नहीं कर सकतीं

हम काठ की तलवारें हैं
हमारा अस्तित्व छद्म है
हमारी निय​ित में कोई युद्ध नहीं
कोई जोखिम नहीं
किसी का प्यार नहीं
हम रहेंगे हमेशा
मौलिकता से वंचित

हम काठ की तलवारें हैं
हमें आग से ही नहीं
छोटे से चाकू से भी डर लगता है।



आतंक और एक प्रेम कविता

अभी जैसे कल की बात हो
जब मुझे उसने चूमा था इस पार्क में

उसके चुंबन का सुख
भीतर ही भीतर छिपाते हुए
मैंने उससे कहा था
और मत करना साहस

अभी जैसे कल की बात हो
जब मौसम था बसंत
और पेड़ फूलों से भरे हुए
इन्हीं फूलों की महक में
हम बातें करते रहे
भूलते हुए समय को
और लौटते हुए घर
जब उसने मुझे भर लिया बाहों में
मैंने उसे चेताया
कहा
यहां हवा जासूस हे
कुछ भी छिपा नहीं रहता

अभी जैसे कल की बआत हो
जब उस ने
पुल और नदी को गवाह बनाकर
मुझे अपने प्यार का विश्वास दिलाया था
उस समय बहुत डर गई थी मैं
कहीं कोई दुश्मन चेहरा
हमें देख तो नहीं रहा था

पर अब जैसे थम गया हो समय
मारा गया मेरा प्यार
बीच सड़क पर
अपनी असीम संभावनाओं के साथ
क्या इसलिए वह मारा तो नहीं गया
कि वह प्यार के सिवा
कुछ जानता ही न था

ऐ मेरे वतन की हवाओं
सचमुच यहां खतरनाक है
प्यार करना
फिर भी कहना
मेरे हमउम्रों से
जोखिम उठाकर भी प्यार करना
जैसे हमने किया
समय के खिलाफ
समय को भूलते हुए।


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(चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)