Saturday, July 1, 2017

विद्या रत्न आसी



हाल
ही में पंडित विद्या रत्न आसी के गजल संग्रहजिंदगी के मारे लोग’ (चेतना प्रकाशन लुधियाना) का विचोमन जम्मू में अभिनव थिएटर में किया गया। जिस संख्या में लोगों ने कार्यक्रम में हिस्सा लिया, उसने दिखा दिया कि आसी हर दिल अजीज शायर हैं, उनका कितना सम्मान किया जाता है। 152 पन्नों के संग्रह में कुल 93 गजलें हैं।
‘खुलते किबाड’ पहली बार आसी की गजलों को सहर्ष प्रस्तुत कर रहा है। गजलें इसी संग्रह से हैं। प्रस्तुति के लिए बेहद छोटी बहर की गजलों का ही चयन किया गया है।




गजल

जरा सा आदमी हूं
बला का आदमी हूं

कहा ना आदमी हूं
सुना क्या आदमी हूं

कहां का आदमी हूं
मैं दिखता आदमी हूं

तेरे ही फजल से मैं
खुदाया आदमी हूं

जिंदा मुर्दा
डरा सा आदमी हूं

मुझे क्या जाब्तों से
मैं घर का आदमी हूं

खुदा वाले तो तुम हो
मैं सीधा आदमी हूं

निहायत कम हूं इंसा
जियादा आदमी हूं

जुबां, किरदार कुछ है
मैं कैसा आदमी हूं

यह दो ही सूरतें हैं
खुदा या आदमी हूं

कभी मिल कर तो देखो
मैं अच्छा आदमी हूं

मगर बा होश मिलना
मैं जिंदा आदमी हूं

सिवाए सब्र आसी
करूं क्या आदमी हूं




गजल

यह हाहाकार कुछ है
गलत सरकार कुछ है

सियासत, यार कुछ है
वतन से प्यार कुछ है

मुहब्बत, प्यार कुछ है
हमें दरकार कुछ है

ये इस उस पार कुछ है
मजा मंझदार कुछ है

कहीं इसरार कुछ है
उफक के पार कुछ है

दवा, तीमार कुछ है
मुझे आजार कुछ है

तुम वो हो मैं हूं
समय की मार कुछ है

किसे तेरी खबर दूं
कहीं घर बार कुछ है


दिलों में रब्त--बाहम
अगर दुशवार कुछ है

सुकुं से, चैन से हूं
यकीनन हार कुछ है

मुहब्बत और आसी
पस--दीवार कुछ है






गजल

तेज रफ्तारियां
भूख बीमारियां

नेक किरदारियां
झूठ मक्कारियां

इक सुकूं के लिए
उम्र भर ख्वारियां

चांदनी धूप में
कब रही यारियां

जिंदगी जी के मर
छोड़ लाचारियां

आसमां से उतर
छोड़ सरदारियां

हम भले या बुरे
तेरी फनकारियां

घर से उंची कर
चार दीवारियां

कुछ मुसाफिर गए
कुछ की तैयारियां

तू भी आसी संभल
छोड़ खुद्दारियां





गजल

रात अच्छा लगा
चांद तुम सा लगा

गया जिस पे दिल
कौन कैसा लगा

हीर रांझा लगी
हीर रांझा लगा

जिस किसी से मिले
कम जियादा लगा

खुद को पहचानते
इक जमाना लगा

अपनी अपनी नजर
कौन कैसा लगा

कुछ पकड़ में नहीं
सब हवा सा लगा

खेल खेला कोई
घर किसी का लगा

बस कि रिसता रहे
जख्म ऐसा लगा

कल की छोड़ो मियां
आज कैसा लगा

तुम मेरे हो गए
वक्त कितना लगा

जब कि तैराक तुम
पार मैं जा लगा

शख्स आसी फजूल
शायर अच्छा लगा



गजल

इक जमाना था
आशियाना था

क्या छुपाना था
गुम पुराना था

दिल से मिलते थे
क्या जमाना था

जान भी देते
आजमाना था

फूल कर रोए
मुस्कुराना था

जी लिया जब तक
आब--दाना था

जान जानी थी
दिल को आना था

क्या गिले शिकवे
दोस्ताना था

आबरू कैसी
घर बचाना था

इश्क करतब था
कर दिखाना था

हम तो थे नादां
तू तो दाना था

सौ ठिकाने थे
बे-ठिकाना था

कौन क्या आसी
इक दीवाना था



गजल

वो भूलता थोड़े ही है
इतना बुरा थोड़े ही है

तेरा नसीब, मेरा नसीब
मेरा तिरा थोड़े ही है

जिंदगी है जिंदगी
कब करबला थोड़े ही है

शायर बला का तू सही
लेकिन चला थोड़े ही है

आसी मियां, मोमिन गलत
पागल हुआ थोड़े ही है

मंदिर में तू मस्जिद में तू
तू, हर जगह थोड़े ही है

तेरा खुदा, तेरा खुदा
मेरा खुदा, थोड़े ही है

दूर का ढोल सुहाना मैं
पाला पड़ा थोड़े ही है

दोजख से जन्नत मुंतकिल
आसी मरा थोड़े ही है




गजल

क्या कहा, जिंदगी
बद्दुआ जिंदगी

इब्तदा, जिंदगी
इंतहा, जिंदगी

जिंदगी है खुदा
है खुदा जिंदगी

बेखुदी चाहिए
कुछ पिला जिंदगी

जिस बहाने से
रास , जिंदगी

तेरा आशिक हूं मैं
कुछ सुना जिंदगी

छोड़ शिकवे गिले
खिलखिला जिंदगी

बताएं तुझे
है ये क्या जिंदगी

कूचा गर्दी ये छोड़
मेरे जिंदगी

झूठ सच ही सुना
कुछ सुना, जिंदगी

तेरा मकरूज हूं
मैं तिरा, जिंदगी

खूब नाचूंगा मैं
तू नचा, जिंदगी

अपना आसी संभाल
मैं चला, जिंदगी




साभार
जिंदगी के मारे लोग, चेतना प्रकाशन लुधियाना
फोटो: राजकुमार बहरूपिया के फेसबुक पेज से



Tuesday, March 28, 2017

गलाड कैम्प में ' शहीदे आज़म - अमर रहे , इंकलाब - जिन्दाबाद ' के नारे गूंजे


' लोमजक ' द्वारा आयोजित ' भगत सिंह - शहीदे आज़म ' कड़ी का अंतिम कार्यक्रम सम्पन्न हुआ . इस साल बैठकी , एकल भाषण और पोस्टर कविता जैसे छोटे - छोटे कार्यक्रमों के अंतर्गत छात्र वर्ग को प्राथमिकता दी गयी . आज लोकमंच के साथी पाकिस्तान सीमा से सटे साम्बा जिले के गाँव गलाड कैम्प में थे . 


यह गाँव आए दिन पाकिस्तानी गोलीबारी के कारण राष्ट्रीय सुर्खियों में रहता आया है . यहाँ देशभक्ति , युद्ध , तनाव , खौफ , विस्थापन , फसलों की बर्बादी , अनदेखी और अशांति जैसे शब्द ग्रामीणों के लिए नए नहीं हैं . ऐसे में शहीदे आज़म के देशभक्ति , क्रांति , राजनीति , शोषण , विज्ञान , ईश्वर , धर्म , साम्प्रदायिकता सम्बन्धी विचारों को बड़े ध्यान से सुना गया .


 कार्यक्रम की शुरुआत गाँव के बुजुर्ग किसान श्री सेवा राम को सम्मान देकर की गई . इसके बाद ' लोकमंच जम्मू - कश्मीर ' के संयोजक कुमार कृष्ण शर्मा ने सबका स्वागत किया . उन्होंने संगठन द्वारा की जाने वाली सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों के बारे में जानकारी दी . उन्होंने बाजारवाद , पूँजीवाद और सपनों के बदलते अर्थ पर विचार प्रकट किये . शहीद भगत सिंह और पाश के बलिदान को नमन किया . प्रतिबद्ध सदस्य अदिति ने शहीद भगत सिंह के जीवन पर एक सुन्दर आलेख पढ़ा . 

अगले वक्ता के रूप में चौथी कक्षा में पढ़ने वाले कृतिक ने शहीदे आज़म पर बहुत प्यारे विचार रखे . उन्होंने कहा कि जिस दिन तक स्कूल जाती बस में से झुग्गी झोपड़ियों के बाहर खेलते ; शिक्षा से वंचित बच्चे दिखाई देंगे , तब तक प्यारे भगत सिंह का सपना पूरा नहीं हो सकता . 

उसके बाद सह संयोजक कमल जीत चौधरी ने दुनिया में बढ़ते हत्यारों और हथियारों की निंदा की . पर्यावरण , धार्मिक कट्टरता , अंधविश्वास , साम्प्रदायिकता , उन्माद को लेकर चिंता ज़ाहिर की . देशहित में युवाओं से सामूहिक सपनों और प्रतिरोध की संस्कृति को मजबूत करने में अपना योग देने का आह्वान किया . 

उन्होंने कहा कि संकुचित और स्वार्थी सत्ताएँ शहीदे आज़म को अपनी सुविधा अनुसार गलत ढंग से पेश कर रही हैं ; जबकि उनका जीवन विश्वबंधुत्व और वसुधैवकुटुम्बकम के व्यापक आदर्श को सामने रखता है . वे किसी विशेष के नहीं आम आदमी के नायक हैं . उनकी विचारधारा का अनुकरण करते हुए हमें एक तार्किक , प्रतिबद्ध और वैज्ञानिक जीवन जीना चाहिए . 

कलाकार शशि पावेल ने कहा कि जब तक हमारे पास सवाल और जिज्ञासा नहीं हैं ; हम किसी के बारे में सही - सही नहीं जान सकते . उन्होंने भगत सिंह के नास्तिक जीवन को प्रासंगिक और महान बताया .

 इसके बाद महेश कुमार ने भी अपने विचार रखे . कार्यक्रम में मिन्टू सिंह ने भगत सिंह और साथी सदस्य कुलदीप ' किप्पी ' ने बेटियों पर सुन्दर भावपूर्ण गीत गाए . साथी स्वामी अंतरनीरव ने पहाड़ी कविताओं को प्रभावी अभिनय से प्रस्तुत करके खूब सराहना पाई . 

सके अलावा गाशा पावेल , कुमार कृष्ण शर्मा , श्वेत केतु , किप्पी और कमल जीत ने अपनी कविताओं का पाठ किया . कार्यक्रम के शुरू और अंत में ' इंकलाब ज़िन्दाबाद ' और ' भगत सिंह , सुखदेव , राजगुरु और पाश अमर रहें ' के नारे लगे . 

कार्यक्रम खत्म होने पर गाँव के युवा लड़कों ने भविष्य में भी लोकमंच को सहयोग देने की बात की . कार्यक्रम में कंगवाला से आए मोनू चौधरी ने अगला कार्यक्रम अपने गाँव में करवाने का प्रस्ताव रखा . जिसका स्वागत किया गया . 




कार्यक्रम में राकेश , अश्वनी चौधरी ( बोनी ) , शुभम , रमण , सुमित चौधरी , अभि , अनमोल , दीपक चौधरी , रोहित , अमित , मारकोनी , बिल्ला , अल्ब्रेटा , बाबा , अमन , स्मृति , मंजुला , पंकज , रजत , महेश कुमार , सोबित , सन्नी , कपिल , संजू , मोंटी चौधरी , संदीप सिंह , सुभाष चौधरी , हरनाम , अनिल चौधरी , मिठ्ठू , मोती चौधरी आदि शामिल हुए .


रिपोर्ट :
गगन सिंह ' शशि '
लोक मंच जम्मू - कश्मीर ,
26 मार्च , 2017.

Tuesday, February 28, 2017

कुंवर शक्ति सिंह


जन्म- 10 जनवरी 1977, अखनूर (जम्मू व कश्मीर)
शिक्षा- यूनिवर्सिटी आफ जम्‍मू से फाइन आर्ट्स में पांच वर्षीय प्रोफेशनल डिग्री
पहचान- जर्नलिस्ट और कालमनिस्ट
 

दैनिक कश्मीर टाइम्स को सन 1994 में पत्रकार के रूप में ज्वाइन किया। सन 1998 में साप्ताहिक कालम 'दस्तक' को शुरू किया। उसके बाद सन 1996 से 1999 तक सब एडिटर के तौर पर कार्यरत रहे। सन 1999 में दैनिक जागरण के साथ पत्रकार के तौर पर काम भी किया।
फ्रीलांसर के तौर पर जम्मू से जुड़े मामलों और अनुभव कई पत्रिकाओं जैसे आटउलुक और द संडे इंडियन आदि में सन 2004  से साझा कर रहे।
 

दूरदर्शन जम्मू, श्रीनगर और दिल्ली के लिए नो वृतचित्रों को लिख चुके। आकाशवाणी के भी कई कार्यक्रमों में‌ शिरक्त।

छपे साक्षात्कार- वीपी सिंह, डा. असगर वजाहत, निदा फाजली, उस्ताद अहमद हुसैन, उस्ताद मोहम्‍म्द हुसैन, पद्मा सचदेव, अमृता प्रीतम, मधुकर, पंडित शिव कुमार शर्मा, जगजीत सिंह, उमर अब्दुल्ला, सईद अली शाह गिलानी, राजेंद्र यादव आदि
 

परिचर्चा- राम जेठमलानी, डा. फारूक अब्दुल्ला, उस्ताद अल्लाहरखा खान, उस्ताद जाकिर हुसैन, नक्‍श लायलपुरी, रामानदं सागर, डा. कर्ण सिंह, खुशवंत सिंह, महीदा गौहर आदि।



कुंवर शक्ति सिंह का काव्य संग्रह 'शहर जब सो जाता है' कुछ महीने पहले विमोचित किया गया। इसी संग्रह में से तीन कविताएं पाठकों के समक्ष प्रस्तुत हैं: 


जासमीन के फूल
(दिवंगत कामरेड मित्र मोहसिन के लिए)

जासमीन का फूल था वो
मुरझाने से पहले
टूट की बिखर गया
सब का कहना है-
'मोहसिन तो मर गया है'
मुझसे मेरे भीतर से
कोई बार बार कह रहा है
बांध टूट गया है, शहर बह गया है
यह कहां की है खुदाई
कि जगह जगह नजर आते है
उसके फूल से चेहरे पर
मुझे काली स्याही फेंक देनी होगी
घाव होने के कारण
मुझे जिस्म का वह हिस्सा ही काट देना होगा
ओ साथी
मैं क्या करूं
नेहरू से गांधी हुई पीढि़यों का
या 26 जनवरी के दिन
लोकतंत्र की सलवार फहराने वालों का
मेरे लिए तो अहमियत रखता है
अपने कसबे में बहनता चिनाब
विनोद दुआ की खबरें
या तुम्हारी चिट्ठी
हम एक और एक ग्यारह थे
हम किसी से कम नहीं थी
हममें से एक भी बचा तो
हम दोनों जिंदा हैं
हलाल पसीने की खातिर
लड़ते रहेंगे हम
ढलान से चढ़ाव की तरफ चलेंगे
बहाव के विपरीत बहेंगे
और दिन-दोपहर में
काले ही आसमान की स्टेज के पीछे
जा कर ही रहेंगे


 दस्तक

मेरी शायरी तवायफ ही सही
पर ऐसा भी नहीं
कि तुम जब भी दस्तक दो इस द्वार पर
यह खुल जाए...
छलनी में अटक गए हैं कुछ टुकड़े गुनाहों के
मेरी रात के सिरहाने
आहट आती रहती है जिनके पिसने की
कई सालों से सोया नहीं हूं
सन्नाटा पसरता रहता है आत्मा में
अनचाही स्मृतियों के साथ
सोचता हूं तो
तुम्हारा चेहरा नहीं दिखता
खुद को देखता हूं पत्थर हो चुका
शायद
तुम्हारी चूड़ी का कोई टुकड़ा
मेरे कमरे में नहीं है
तुम्हारा दिया हुआ कोई फूल
मेरी किताब में नहीं है!


अंधेरे से सनसेट तक, एक मुक्ति यात्रा

सदी के जितनी लंबी
गहरी सुनसान रात में
रोशनी का एक छेद हो गया
समय! जिसकी खबर ही नहीं थी
जमी बर्फ में से निकले लगा
निकल आया मैं भी उस कारावास से
मालूम नहीं था किधर है जाना!
मुक्ति के लिए किधर होता है जाना
पिंजरे से आजाद पक्षी किधर है जाता
कच्चे चूल्हों का धुआं किधर है जाता

एक टूटी फूटी सड़क के किनारे
ठिठुरते हुए कुछ लोग बस का इंतजार कर रहे थे
सोचा, इन्हें पूछूं - जाना है किधर?
फिर रहने दिया
यह जो घड़ियाल लटका है मंदिर के भीतर
कहीं गिर न जाए पुजारी के सिर पर
सोचा, बता दूं, फिर रहने दिया
रहने दिया सारा काम अधूरा ही
रात, जो रातभर
अपने दुपट्टे से आसमान पौंछती रहती
रहने दी।

कहते हैं
जहां वास्तव में होता है सन-सेट
वहीं समाया है समय का भेद
कई जलसमाधियों और अग्निसमाधियों
से होता हुआ उतर आया हूं इस जगह
यहां एक साथ होते रहते हैं
कईं सन-सेट।



संपर्क 
हाउस नंबर 48, वार्ड नंबर 2
अखनूर- जम्मू व कश्मीर
मोबाइल - 94196-31196
ई-मेलः  dastak.kt@rediffmail.com


(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)