Sunday, June 28, 2020

‘मुझे आई. डी. कार्ड दिलाओ’ से चुनिंदा कविताएं

2018 में कमल जीत चौधरी के संपादन में जम्मू-कश्मीर की कविताई को रेखांकित करता एक महत्त्वपूर्ण कविता संग्रह मुझे आई. डी. कार्ड दिलाओशीर्षक से रश्मि प्रकाशन लखनऊ से प्रकाशित हुआ था। मेरा मानना है कि हिन्दी में बरसों बाद ही कोई ऐसा सार्थक व सुन्दर कार्य होता है। इसका मूल्यांकन होना चाहिए।

किताब में 15 कवियों की 66 कविताएं हैं। ऐसा पहली बार हुआ है कि  महाराज कृष्ण संतोषी,  मनोज शर्मा, अग्निशेखर, योगिता यादव, निदा नवाज़, कुंवर शक्ति सिंह, शेख मोहम्‍मद कल्‍याण सहित अन्‍य कवि एक साथ एक किताब में प्रकाशित हुए हों। यह कविताएं व संपादकीय रूप में लिखा गया आलेख हिन्दी कविता को विस्तार देते हैं, एक नयी दुनिया खोलते हैं। रश्मि प्रकशन और कमल जीत को इस कार्य के लिए सलाम। 

आज इस संग्रह से सभी कवियों की एक-एक कविता और संपादक द्वारा लिखित भूमिका किताब के बारे मेंयहाँ लगा रहा हूँ। उम्मीद है कि इन्हें पढ़कर आप इस किताब तक ज़रूर पहुँचेंगे।

 

किताब की भूमिका 

कविता का एक अच्छा पाठक हूँ। पाठक की ताकत जानता हूँ। वह किताब के बाहर भी सार्थक हस्तक्षेप करता है। अपना एक पक्ष रखता और चुनता है। पाठक के भरोसे इस किताब को संपादित करने का साहस जुटा सका हूँ।

हिन्दी में यह विशेषांक युग है। साहित्यिक पत्रिकाएँ धड़ाधड़ विशेषांक निकाल रही हैं। ज़्यादातर की सीमा सिर्फ चार पाँच राज्यों और अपनी अपनी - दिल्ली तक है। हिन्दीतर भाषी राज्यों के लेखक और उसमें भी जो हाशिए पर लिख रहे हैं, उन्हें एक साथ छापने का नैतिक प्रयास कोई संपादक नहीं कर रहा। लगभग दो साल पहले हरे जी से इस विषय को लेकर बात हुई। उन्होंने 'मंतव्य' में जम्मू-कश्मीर की प्रतिनिधि कविता को सामने लाने की बात कही। मुझे इस पर काम करने के लिए बोला। मैंने चार महीने में यह कार्य पूरा करके उन्हें सौंप दिया। मगर 'मंतव्य' में स्थान पाने के लिए लम्बा इंतज़ार करना पड़ता। दरअसल 'मंतव्य' अपनी कुछ पूर्व योजनाओं को संपादित करने के बाद मेरे कार्य को स्थान दे पाता। इस बीच हरे जी ने 'रश्मि प्रकाशन' से इस कार्य को किताब रूप में लाने का प्रस्ताव रखा। जिसे साथी कवियों ने भी सहर्ष स्वीकार कर लिया।

1990 के बाद की हिन्दी कविता में जम्मू कश्मीर का एक महत्वपूर्ण अवदान है। इस समय विस्थापित कवियों ने मर्मान्तक पीढ़ा भोगकर हिन्दी को विस्थापन की कविताएँ दी। यह आलोचना और साहित्य इतिहासों में दर्ज होना चाहिए। विस्थापन के समानांतर जम्मू में जो अन्य प्रवृत्तियों को लेकर कविता रची गयी; खासकर सन 2000 ई० के बाद, वह खास रेखांकित करने योग्य है। उस पर बात होनी चाहिए। यह मौलिक और ताजा है। प्रेम और प्रतिरोध से उपजी है। इसमें विविध सरोकार हैं। यह जितनी स्थानीयता रखती है उतनी ही ग्लोबल भी है इसकी सीमाएँ भी हैं और यह सीमाओं का अतिक्रमण भी करती है। इन प्रवृत्तियों को आधार बनाकर मैंने 2016 में एक आलेख लिखा था। जिसे जम्मू-कश्मीर कला अकादमी के एक कार्यक्रम में पढ़ा। सुनकर कुछ लोग काफी नाराज़ हुए थे। वह आलेख अनुनाद और शीराज़ा में छपा। उस आलेख को इस संग्रह में दे रहा हूँ। इसे इन कविताओं के साथ पढ़कर जम्मू-कश्मीर की कविताई की। नयी तस्वीर बनेगी।

मेरा इतना भर प्रयास है कि राज्य में नयी सदी की शुरुआत से लिखी जा रही कविता की ओर ध्यान दिया जाए। इस दौर के लेखन को समूह और समग्रता में पढ़ा जाए। जिन्हें लिखते हुए दस साल हो गए, जिन्हें लिखते हुए बीस साल हो गए, जिनका एक संग्रह शाया हुआ, जिनका एक भी संग्रह नहीं आया, जो दो-चार पत्रिकाओं में छपे, जो कहीं भी नहीं छपे, हो सकता है आने वाले सालों में इनमें से दो-तीन कवि हिन्दी में एक पहचान बना लें। वे अब तक जो भी अच्छा लिख सके हैं फिलहाल उस पर कुछ बात चले।

संकलन में चयनित सभी कवियों का आभार व्यक्त करता हूँ। इनमें तीन चार को छोड़कर अन्य मेरे अग्रज हैं। जिनके विनम्र सहयोग के बिना यह संकलन इस रूप में नहीं आ पाता। हरे भाई और 'रश्मि प्रकाशन' का भी धन्यवाद करता हूँ।

यह खूब पढ़ी जाएगी। एक उम्मीद और अपार खुशी से किताब आपके हाथ में सौंपता हूँ ...

-कमल जीत चौधरी



मिट्टी के हिरण    

(महाराज कृष्ण संतोषी)

हमें नहीं कोई डर

सामने शेर भी हो अगर

हम सजावट हेतु रखे गए

मिट्टी के हिरण

 

हमें न भूख लगती है

न प्यास

 

हम ने सुना है

जंगल के बारे में

कहते हैं वहां

हरी हरी घास होती है

पेड़ होते हैं अनगिनत

बेपरवाह घूमते हुए पशु होते हैं

और चहकते हुए परिंदे

 

हम मगर दिनभर

आदमी की पनाह में रहते हुए

इतने सभ्य हो गए हैं

कि जब टेलिविजन पर

किसी शेर को दहाड़ते हुए सुनते हैं

तो अभिवादन में कहने लगते हैं

सलाम हमारे शिकारी दोस्त

 

हमारे इस अभिवादन का

उत्तर दिए बिना

जब शेर कहीं गायब हो जाता है

तो ज़रा भी बुरा नहीं मानते

और पुन:

सच से घबराए हुए

आदमियों की चख चख

सुनने लगते हैं

 

हम मिट्टी के हिरण

न सत्य से

हमारा कोई बास्ता

न झूठ से

 

हम तो बस

आदमी के सौन्दर्यबोध का प्रतीक

और किसी दिन

शेल्फ से उतर जाएँगे

 

ज़रूरी नहीं

हमारी जगह

कोई दूसरा हिरण ही आ जाए

 

हो सकता है इस बार

कोई भूसा भरा हुआ शेर

आदमी के सौन्दर्यबोध का

शिकार बन जाए।



मुझे आई० डी० कार्ड दिलाओ    

(कुमार कृष्ण शर्मा)


शहर सुनसान है

हर तरफ पसरा सन्नाटा

शहर के मुख्य चोराहे पर घायल पड़ा व्यक्ति

दर्द से चिल्ला उठा

मेरी मदद करो ...

मुझे पहचानो

प्लीज हेल्प मी

क्यों कोई नहीं सुन रहा

अरे मैं हूँ धरती का स्वर्ग

डोगरों का शौर्य

और लद्दाख का शांति स्वरूप

लेकिन अब मुझे कोई नहीं पहचान रहा

हर कोई मेरे ही घर में

मेरा आईडी कार्ड मांग रहा है।

घायल हाथों से माथे का खून पोंछते हुए फिर चिल्लाया

अरे कोई तो युवा उमर को आवाज़ दो

क्या उमर नहीं सुन रहे तो

फारूक, आज़ाद, महबूबा, गिलानी, मीरवायेज, कर्ण सिंह, खजूरिया, रिगजिन, दुबे...

अनगिनित नाम है

किसी को तो बुलाओ

नहीं आते तो उन तक सन्देश पहुँचाओ

कहो कि मेहरबानी कर

मेरे आई डी कार्ड का प्रबन्ध करें

मुझ तक पहुंचाएं मेरी पहचान

मैं बेबस हूँ

मैं घायल हूँ

दिल्ली है कि मेरा विश्वास नहीं करती

इस्लामाबाद सबूत मांगता है

यू0  एन00 मुझे पहचानने की बजाय

अपना सिर खुजलाता है

...

तभी चौक का सन्नाटा टूटा

हाथ में पत्थर उठाए युवाओं की टोली

शोर करती शांति को चीरते चिल्लाई

कौन है जो पहचान की बात कर रहा है

मारो बचने न पाए

युवाओं के पीछे पीछे खाकी वर्दी वाले भी लपके

तभी किलाश्न्कोव की गोली चली

घायल के सीने को चीरते हुए निकल गयी

घरों में दुबकी शहर की भीड़

बाहर निकल चौराहे पर जमा हुई

युवाओं के साथ बन्दूक उठाए सिपाही भी बोला

कोई पहचानता है इसको

अगर नहीं तो इसका आई डी कार्ड देखो

देखो कौन है यह

नहीं...इसके पास तो आईडी कार्ड है ही नहीं

पेंट छोड़ो कमीज़ की जेब देखो

नहीं है

पेंट की अंदर की जेब

अरे कुछ भी नहीं

तो यह बिना आई डी कार्ड के यहाँ क्या कर रहा था

इसको तो मरना ही था

बिना आई डी कार्ड के धरती के

इस टुकड़े पर कोई किसी को नहीं पहचानता

न दिल्ली

न इस्लामाबाद

न यू0  एन0  ओ0

न मैं

न तुम .




दोस्त 

(सुधीर महाजन)

दोस्त तो

बटुए में रखे पुराने कागजों की तरह है

जिन्हें न जाने कितने सालों से सम्भाले हूँ

कुछ मुड़तुड़ गए हैं

अपना सफेदपन भी खो चुके हैं

कुछ की तह इतनी सावधानी से खोलनी पड़ती है

कि लेशमात्र कठोरता भी इन्हें फाड़ देगी -

 

मैं जानता हूँ

इन कागजों पर लिखी गई

धूमिल हो चुकी पंक्तियों के मायने

जो गुदगुदा भी जाती हैं

रुला भी जाती हैं

कितने ही पुराने चेहरों से मिलवा जाती हैं

सच कहूँ तो

मुझे मेरे पास बैठा जाती हैं

जीवन की इस गोधुलि वेला में

यह अहसास कितना सुखद है

कि मैं भी

एक मुड़ा तुड़ा कागज़ पुराना बनकर

किसी न किसी बटुए में सम्भाला जा रहा हूँ ..

दोस्त तो बटुए में

रखे कागज की तरह हैं .

 


संदूक का ताला

(अमिता मेहता)

 

सासू माँ की संदूक पर जड़ा ताला

अक्सर मुझे मुँह चिढ़ाता था

पर एक उम्मीद थी कि

एक दिन यह खुल जाएगा

और सभी परेशानियों का हल निकलेगा

...

सासू माँ के परलोक सिधार जाने पर

मैंने उम्मीद भरी जिज्ञासा से उस ताले को खोला

मुझे उसमें दो जोड़ी कपड़ों के सिवा

कुछ नहीं मिला

कोने में एक मुड़ा तुड़ा कागज़ रखा था

जिस पर लिखा था -

' बिटिया , निराशा में भी आशा का भ्रम बनाए रखना '

 

मैंने अपने दो जोड़ी कपड़े

और वो कागज़ का टुकड़ा संदूक में रखकर

उस पर जड़ दिया ताला

और ताली पल्लू से बांध ली ...



करना प्रेम

(योगिता यादव)

 

कंटीली बाड़ के इस तरफ

बासमती के खेतों से आती

अधपकी फसलों की खुशबू के बीच

मेरी आंखों में आंखें डाल

जब तुम कह रहे थे -

            करना प्रेम

            करती रहना प्रेम

            प्रेम बचा तो बची रहेगी दुनिया ----

 

ठीक उसी वक्त

मेरे कानों ने सुनी थी

भयंकर धमाके की आवाज

तुम्हारे हाथों से अपना हाथ

जब तक छुड़ाती

खेतों में उतर चुकी थी बारुदी गंध

छलनी हुई जाती थी मेरे आंगन की मुंडेर

बस अब गिरने ही वाला था

मेरे सपनों का आसमान

 

मैंने संभाला आंचल, जगाए बच्चे

उठाया संदूक

और जरूरी बर्तन

तुम भी घबराए से

आनन फानन में

बस समेट ही रहे थे

सपनों की फैली चादर

 

ट्रैक्टरों में, पगडंडियों पर

दौड़ रहे थे गांव

दौड़ रहे थे बस्ते

भाग रहे थे खिलौने

दम साधे ओढ़नियां

कुल देवताओं से

कर रहीं थी प्रार्थना

 

दो पल आंखें मूंद

गांव घर की रक्षा को

मैंने भी बुलाए बड़े पीर

राजा मंडलीक

बुआ दाती

 

और देखो न

इस भगदड़ के बीच

मैं भूल ही गई उठाना

आले में रखी सिंदूर की डिबिया

 

फिर किसी रोज

गर बिछी सपनों की चादर

तो बताना

कहाँ  करूं प्रेम

कब करूं प्रेम

क्योंकि कहते हों न तुम

प्रेम बचा तो बची रहेगी दुनिया ।

 


औरत को सबसे अधिक खतरा है 

(शालू देवी प्रजापति)


मुझे याद है

तुमने हमेशा कहा

दुनिया में औरत को सबसे अधिक खतरा है

मैं कहती थी

इस बार फेल होने का खतरा है

मैं समझती न थी

मैं बच्ची थी

मैं खेल आती थी

गलियों से

बाग बगीचों से

मूंगफली ने मेरे छिलके कभी नहीं उतारे

अमरुद ने कभी मुझे कड़वा नहीं किया

....

बड़ी हो गई हूँ

फुसफुसाहट और ठहाकों के बीच

गलियाँ बाग़ बगीचे मूंगफली और

अमरुद के मालिक

मेरी चुगली करते हैं

मैं सिर्फ साम्बा से जम्मू का सफ़र करती हूँ

और घर आकर

अपनी डायरी में लिखती हूँ

मेरी एम० ए० को नहीं

दुनिया में औरत को सबसे अधिक खतरा है ...

 


स्त्री विलाप कर रही है  

(मनोज शर्मा)


एक स्त्री विलाप कर रही है

देखा जाए तो

साधारण सी कितनी आम पंक्ति है यह

जैसे कह दिया जाए

कोई सो रहा है

सुबह की सैर को निकल रहा है कोई

जैसे कोई खाना खा रहा है

और स्त्री विलाप कर रही है

पता नहीं क्यों लग रहा है मुझे

क्या ऐसा नहीं हो सकता ...

लिखूं यदि यूँ कि

स्त्री विलाप कर रही है

तो ऐसा लिखते ही सूख जाए पेन की स्याही

जिस कैमरे ने खींची हो ऐसी तस्वीर

उसके लैंस में पड़ जाए तरेड़

या फिर झड़ जाए ब्रुश चित्रकार का

गायक के कंठ में फँस जाए सुर

कमाल देखें

कि ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है

दुनिया के प्रारम्भ से

विलाप कर रही है स्त्री

जैसे घूम रही है पृथ्वी

वह नहा रही है और रो रही है

हिचकियाँ ले रही है और सेंक रही है रोटियां

एक हाथ से बाँधा है नाड़ा उसने अभी

और दूसरे से , होठों तक फैले आँसुओं को पोंछा है

पूरे जोर से निचला होंठ दबाकर

ईश्वर की निर्धारित प्रार्थना तक पूरी की है

बाजारों के उठ जाने के बाद

ज्यूं उजड़े नज़र आते हैं मैदान

ज्यूं भरे थानों के बावजूद

उतरता नहीं गाय का दूध

इच्छाएं अलमस्ती में खुद को ही निगलती जाती हैं ज्यूं

ज्यूं रात का आखिरी गजर बजते ही भयावह हो उठता है कब्रिस्तान

इस शाश्वत रुदन की

कुछ ऐसी ही सच्चाई है

दुनिया के तमाम शोर शराबे में

एक स्त्री का विलाप

किस उम्मीद से है ...

स्त्री विलाप करे

और वृक्ष फलदार न रहें

सूख जाएं पक्षियों की चोंचें

हमेशा के लिए मल्लाह उलट दें अपनी किश्तियां

चीत्कार उठे तथा आखिरी ध्रुवों तक जाए

और इसके बाद फिर

परछाइयां ऐंठना भूल जाएं

सोचें ज़रा

ऐसा घट सकता है क्या ...

 (वरिष्ठ कथाकार सुधा अरोड़ा जी को समर्पित। ) 

 

अँधेरे की पाज़ेब  

(निदा नवाज़)


अँधेरे की पाज़ेब पहने

आती है काली गहरी रात

दादी माँ की कहानियों से झाँकती

नुकीले दांतों वाली चुड़ैल सी

वह मारती रहती है चाबुक

मेरी नींद की पीठ पर

काँप जाते हैं मेरे सपने

वह आती है जादूगरनी सी

बाल बिखेरती

अपनी आँखों के पिटारों में

अजगर और सांप लिए

मेरी पुतलियों के बरामदे में

करती है मौत का नृत्य

अतीत के पन्नों पर

लिखती है कालिख

वर्तमान की नसों में

भर देती है डर

भविष्य की दृष्टि को

कर देती है अंधा

मेरे सारे दिव्य-मन्त्र

हो जाते हैं बाँझ

वह घोंप देती है खंजर

मेरे परिचय के सीने में

रो पड़ती है पहाड़ी श्रृंखला

सहम जाता है चिनार

मेरे भीतर जम जाती है

ढेर सारी बर्फ़ एक साथ।

 


हवाई यात्रा में कविताएं  

(अग्निशेखर)


कुछ प्रिय कवियों को

पढ़ा है हवाई यात्रा में मैंने

जैसे अमरीका जाते

नाज़िम हिकमत

मुझे नहीं मालूम

अमरीका के दोस्त मेरे

इसे संयोग मानेंगे

या पूर्वाग्रह मेरा

 

मुझे याद है

लगा था मुझको खिड़की से देखते

बाहर पँख पर बैठे थे

नाज़िम हिकमत किसी देवदूत से

 

मैंने पढ़ा है हवाई यात्रा में

जर्मनी के ऊपर से उड़ते

रूसी कवि आंद्रे इ वोज़्नेसेंस्की

और येवतुशेंको को

दोनों बैठे थे जैसे अगल बगल मेरे

शालीन, गंभीर और चुप

पता नहीं जर्मनी के दोस्त मेरे

कैसे लेंगे इस बात को

 

मैंने पाकिस्तान और अफ़गानिस्तान के ऊपर  से

उड़ते पढ़ी है वारिस शाह की मोटी किताब

और अमृता प्रीतम की गुहार उससे

 

मैंने कितना चाहा कि मेरी सीट के सामने लगे छोटे से

टी.वी. स्क्रीन पर

दिखाया जाए

बुल्ले शाह के गाँव से मेरे लिए

मुट्ठी भर मिट्टी लाते हुए

मेरे एक कहानीकार दोस्त को

 

मैंने कितने ही कवियों को पढ़ा है

हवाई जहाज़ में

हेग, एम्स्टर्डेम, पेरिस, लंदन जैसे देशों में

अपनी बात जलावतनी की  उठाने जाते

जैसे सोचते हुए इस्राइल को

मैंने पढ़ा है सीरिया के नज़ीर कब्बानी को

और फिलिस्तीन के महमूद दरवेश को

याद करते पढ़ी हैं

यहूदा अमीखाई की कविताएँ

निर्वासन उसके माता पिता का

और मॅास्को की यात्रा पर जाते

एक मित्र को दी थी मैने

ब्रॅाद्स्की की रचनाएँ

 

और इस बार अपने एक कवि मित्र की

ज़मीनी कविताएँ मैंने पढ़ डालीं

हवाई जहाज़ में

अपनी मिट्टी, गाँव, वन-प्राँतर

और छोटे छोटे लोगों की संवेदनाओं के बारे में

 

मैं हर बार जहाज़ की खिड़की से देखते बाहर

सोचता हूँ

काश संसार में एक साथ

सभी देशों में

हज़ारों लाखों जहाज़ों से

फूलों की तरह बरसाई जाएँ

ललद्यद और कबीर की कविताएँ

और हम

प्रार्थना में हाथ उठाए

देखें आकाश की तरफ़

पृथ्वी-प्रेम में उठते देखें खुद को

तमाम क्षुद्रताओं से

ऊपर ऊपर।


 

हाथ सेंकते जाओ   

(नरेश कुमार खजूरिया)

 

 चटख-चटख कर

जलती लकड़ियों की आवाज़

उठती है मेरे भीतर से

तुम कविता सुनाने की बात कर रहे थे

सुन लो !

वो कविता ही क्या

जिसमें आग न हो

वो कविता ही क्या

जिसमें आंच न हो

इस भरी सदी में

हाथ सेंकते जाओ

ठण्डे दिलों ,

ठण्डे हाथों से लड़ाइयाँ नहीं लड़ी जाती।



शहर जब सो जाता है    

(कुँवर शक्ति सिंह)

 

 शहर जब सो जाता है

मैं  सुबह तक पढ़ता हूँ तेरे ख़त

किस्सों के पुतले बनाकर रखता हूँ सामने

और दिल से कहता हूँ

तुम्हारा न कहा हर शब्द

ज़िन्दगी इसे ही कहते हैं तो

इक टेढ़ी मेढ़ी

लम्बी छोटी लकीर

अगर कोई बच्चा ही खींच दे

तो क्या करें खुदाओं का

शहर जब सो जाता है

मैं तब सच से पीठ लगाए

देखता हूँ झूठ

शहर जब जाग जाता है

मैं एक सड़क होता हूँ।

 

बूढ़ा आदमी  

(शेख मोहम्म्द कल्याण)

 

पहाड़ पर खड़ा

पहाड़ ओढ़ता

पहाड़ जी रहा है

बूढ़ा आदमी

बेशक दिखता है खड़ा पहाड़ पर

किन्तु सदियों से ढो रहा है

पहाड़

 

दरअसल थूकना चाहता है वह

समय के पहिये पर

सदी के किसी इतिहासकार ने

उसे दर्ज़ नहीं किया

अब उसे भी

किसी के हंसने या रोने से

कोई फर्क नहीं पड़ता

और जब वह हँसता है

उसके सिर से

जूएँ गिरती हैं

उसकी पसलियों में धँसी हुई हैं सदियाँ

जी में आता है जब भी

थूक देता है बलगम

 


मैंने उसे छुआ    

(डॉ. शाश्विता)

  

उसके अधखुले होठों पर

बेजुबान बातें थीं

विरासत में थे मैले दिन

बदनाम रातें

कुछ ज़िद थी

थोड़े हौसले भी

इन्सान हो पाने की कोशिश

जीने का सामान भी था ...

 

मैंने वो सब सुना

जो उसने कभी न कहा

मैंने वो सब छुआ

जो भी उसने छुपाया ...

 


घर के बाहर

(मुदस्सिर अहमद भट्ट)

  

वे आज सवेरे

घर के बाहर बैठकर आए

...

आए

एक गीत गाते हुए

हाथ में बन्दूक लेकर -

मुन्ना की आँखों पर  पट्टी बंध गई है

उसे अब कुछ नहीं दिखता ...

 


हिन्दी का नमक   

कमल जीत चौधरी

 

 खेत खेत

शहर शहर

तुम्हारे बेआवाज़ जहाज

आसमान से फेंक रहे हैं

शक्कर की बोरियां

 

इस देश के जिस्म पर

फैल रही हैं चींटियाँ

छलांग लगाने के लिए नदी भी नहीं बची -

 

मीठास के व्यापारी

यह दुनिया मीठी हो सकती है

पर मेरी जीभ तुम्हारा उपनिवेश नहीं हो सकती

 

यह हिन्दी का नमक चाटती है।



प्रस्तुति व फोटोग्राफ: कुमार कृष्ण  शर्मा

  

Sunday, June 21, 2020

रजत कृष्ण


निवासी: बागबाहरा, छत्तीसगढ़
संपादक: सर्वनाम पत्रिका
संप्रति: सहायक प्राध्यापक (हिंदी)
मोबाइल: 9755392532
विगत 30 वर्षों से साहित्य में सक्रिय। सभी प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में 
रचनाओं का प्रकाशन।

रजत जी से मेरा परिचय पीयूष जी के माध्‍यम से हुआ था। कोई पांच साल पहले रजत जी के बारे में पीयूष जी ने फोन पर ही विस्‍तार से बातचीत के दौरान बताया था। तमाम चुनौतियों को दरकिनार कर किस प्रकार से अपनी शर्तों पर विजेता के रूप में जीवन जिया जाता है, रजत जी उसी की मिसाल हैं। रजत जी हमेशा प्रेरणास्रोत बने रहेंगे। हमेशा हाशिए पर खड़े व्‍यक्ति का साथ देने वाले रजत जी का व्‍यक्तित्‍व कमाल का है। हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ‘खुलते किबाड़’ पर पहली बार सहर्ष प्रस्तुत हैं उनकी कुछ रचनाएं।


युद्ध की बात करने से पहले 

युद्ध की बात करने से पहले 
परिंदों के पंख में पलते 
उजले -धुले , नीले 
आसमान को देखो !
देखो -
पेड़ों के तन-मन में 
लहराते हरियर समुद्र को !!

युद्ध की बात करने से पहले 
बादलों को पुकारती 
खेतों की उर्वर मिट्टी को देखो !
देखो -
धान की बाली में 
मोतियों -सी चमकती 
ओस की बूंदों को !!

युद्ध की बात करने से पहले 
गमला गढ़ते 
कुम्हार के चेहरे में खिले 
फूल को देखो !
देखो -
पालना बनाते बढ़ई की 
आँखों में खेलते 
शिशु की अठखेलियों को 

युद्ध की बात करने से पहले 
पतंग उड़ाते , बाँटी खेलते 
बच्चों की हथेलियों में धड़कते 
आसमान और मैदान के 
विस्तार को देखो !
देखो -
रंगोली पारती 
व्रत -उपवास रखतीं 
बहनों के सपनों में झिलमिलाते 
दूधिया संसार को !!

युद्ध की बात करने से पहले 
डायरी के पन्नों में दर्ज 
अपने मित्रों, परिजनों की 
जन्म तारीखों को देखो ! 
देखो-
उम्र की गुलाबी किताब में 
बड़े जतन से छुपा रखे 
प्रेम पत्रों को !!

युद्ध की बात करने से पहले 
देख सको तो 
युद्धों में मिली 
बैसाखियों को देखो !
देखो -
युगों -युगों से भिन्ज कर भारी हो रहे 
आँचल , चुनरी और दुपट्टे को !


अगरबत्ती से बातचीत 

देह जलाती 
खुशबू फैलाती 
आस्था की ओ ध्वज वाहिका 
कहो आखिर तुम क्या पाती ?

पाने -खोने के गणित में 
मैं कभी उलझती 
न सोचती ,
महकना मेरे जीवन का सार 
कर्तव्य हर संभव पूरा करती !

ईश्वर से 
कभी मिलती भी हो ...
सम्मुख उनके 
बातें भक्तों की एकाध रखती हो ?

कविवर !
ईश पहुँच का मारग कठिन बहुत 
अति लंबा ...
उस पर बाट छेंके बैठे होते 
सिद्धहस्त पुजारी 
नामवर पण्डे !

हाँ ,
पहुँच सकी कभी
फलाँग उनके जाल और फंदे सभी 
पूछुंगी यह बातें जरूर तब ...
कि मौन सदा 
क्यों रहते हो प्रभुवर ,
सुनाओगे फैसला कब आखिरकर
हम श्यामवर्णी क्षीण देही के
जनक जनों की
सदियों से लंबित मुक्ति याचिका पर !
      

उम्मीद के दीये

उठो ! जागो !!
ओ उम्मीद के बुझे हुए दीये 
सहेजो फिर से जीवन की बाती !
सिरजो सपनों का तेल 
जोड़ते हुए तिल-तिल !!

देखो ऑंखें खोल फिर से 
जिंदगी के उन अहातों 
और गलियों को
जहाँ पदचिन्ह छुटे हैं 
उजास जीवी हमारे पुरखों के !

इस बड़ी सी दुनिया में 
कमी कब रही भला 
उन हथेलियों की 
जो अपने संगे संग 
औरों के अँगना-दुआर खातिर 
सिरजा करते हैं 
स्नेह के दीये ,सपनों  की बाती !

बखत की कड़ी मार से 
लाख करिया जाए ज़िंदगी
चाहे ग्रस ले बिपत का अमावस कोई भी
उम्मीद की किरणों को ,
बाँचना माटी के नन्हें से दीये का जीवन तुम 
कि कैसे एक अकेला ही 
चीरता आ रहा है वह सदियों से 
अँधेरे की हरेक चट्टानी छाती !

उठो ! जागो !!
ओ उम्मीद के बुझे हुए दीये 
सहेज लो फिर से 
जीवन की बिखरी हुई हरेक बाती !!!
       

तुम्हारी बुनी हुई प्रार्थना

बुझे मुर्झाए
मेरी हँसी के पेड़ में
टिमटिमा उठी हैं
जो पत्तियाँ आज
उनकी जड़ें
तुम्हारे सीने में टहल रही
मेरे नाम की
मिट्टी-पानी में है ।

मेरी आँखों के
डूबते आकाश में
गुनगुनाने लगी हैं
जो तितलियाँ
उनकी साँसें
तुम्हारी हथेलियों में
बह रही
मेरे हिस्से की हवा में है ।

ओ जलधार मेरी !
हार-हताशा
टूटन और तड़कन के
बीहड़ में बिलमे
जो मुकाम और रास्ते
खटखटा रहे हैं कुण्डियाँ
मेरे पाँवों की
मेरी खातिर बुनी हुई
वह तुम्हारी प्रार्थना है ।


आग

आग से हमारा रिश्ता
उतना ही जीवन्त
और गहरा है
जितना कि पेड़ पवन और पानी से

पेड़ पवन और पानी की तरह
आग भी देवता होता है
यह बताते हुए
चेताती रहतीं हैं दादी नानी
आग चूल्हे की
कभी बुझे नहीं
ख्याल रखना आग बुझे नहीं
किसी भी सीने की ।

आग के महाकुण्ड में
पककर ही
नारंगी की तरह
गोल सुन्दर हुई है
हमारी धरती ।

आग में तप कर ही
खरा होता है
हमारी ज़िन्दगी का सोना
असल रूप धरता है
क़िस्मत का लोहा ।

आग से
हमने पानी को उबकाया
तो दुनिया की पटरी पर
दौड़ी पहली रेल गाड़ी ।

कुम्हार के आँवे को सुलगाया
तो हमें
पकी हण्डी, मटकी
और सुराही मिली,
मिले ईंट खपरे
खिलौने और गमले ।

गृहणी के हाथ में
आग जब पहुँची
हमने अन्न की मिठास को
भरपूर जाना....!

गोरसी में
शिशु देह की सेंकाई के लिए
जब सिपची वह
हमने माँ के गर्भ की
दहक के मर्म को पहचाना ।

आग की जोड़ का सम्वेदनशील
दुनिया में कौन होगा
जो बुझने के बाद भी
राख के ढेर में
धड़कती रहती है ।
एक ही फूँक से
जो दहक उठती है ।

तब आग की
एक लपट ही बहुत होती है
जब शासक की धमनियों में
पसर जाता है ठण्डापन
जुड़ा जाते हैं विचार 
        

प्रस्तुति व फोटोग्राफ: कुमार कृष्ण  शर्मा

Sunday, June 14, 2020

परवीन कुमार

प्रिय पाठको, 
परवीन कुमार मेरे दोस्त हैं। लेखन की दुनिया में उनका यह पहला कदम है। वे राजनीति शास्त्र के व्याख्याता हैं। दस साल पहले बिलावर,भड्डू में एक साथ नौकरी करते हुए हम एक ही घर में रहते थे। आज भी हमारा नियमित संवाद है। वे किसी भी संवाद में प्रेम, राजनीति और कविताई को रेखांकित करने से नहीं चूकते। इन कविताओं में भी वे शिनाख़्त व तसदीक करने की भूमिका में हैं। उनकी भूमिकाएँ बनी रहें। 
मेरी टिप्पणी से अधिक आपकी टिप्पणियाँ महत्त्वपूर्ण हैं। पढ़ें और बताएँ कि यह पाठ कैसा है।


अँगूठा 
          
अँगूठा उठा तो उठ गए
जोश से
विजय से
अँगूठा झुका तो झुक गए
निराशा से
एक अँगूठा बढ़ा
काले अक्खर की भैंस चराने
खत्म हो गई चरागाहें
एक अँगूठा बढ़ा गुरु यश बढ़ाने के लिए
एक अँगूठा घुमाए सोने के कंगन...

अँगूठों की कथा में
किसका अँगूठा बड़ा?


मैं आज खुश हूँ

मैं आज खुश हूँ
क्यों!
तुम्हें आज खुश देखा
खुश महसूस किया
खुश सुना
खुश जाना

मैं आज खुश हूँ
क्यों!
मेरा कवित्व खुश है
तुमसे बात करके
तुमसे मुलाकात करके

मैं आज खुश हूँ
क्यों!
आज पहली बार तुमने झूठ बोला
यह सच है झूठ नहीं

मैं आज खुश हूँ
क्यों!
तुमने एक और सम्पर्क सूत्र दिया
सिर्फ सूत्र ही नहीं
समीप आने के लिए एक पुल भी दिया।


क्या हुआ

क्या हुआ जो मेरा सिर सरहद पर कट गया
कुर्सी, कार, लश्कर तुम्हारा बंगला तो बच गया
क्या हुआ जो फूल मुरझा गया मिट्टी का
तेज़ाब खार पागलपन का कांटा तो बच गया
क्या हुआ जो मैं धूप, ट्रेन, प्लेटफॉर्म या पटरी पर मर गया
तुम्हारे कंक्रीट का जंगल, शर्म का शामियान तो बच गया ...




चरित्र

गाड़ियों पर पढ़ी जा सकती हैं
देशभक्ति, प्यार, वफ़ा, नैतिकता को दर्शाती 
तुकबंदियाँ
मैंने लगभग हर गाड़ी पर लिखा देखा -
'सामान' पीछे से उतारें

सामान तो आगे सेे भी उतरता रहा
मगर 'पीछे' को हमने अपना चरित्र बना लिया।
  



रखकर देखेंं

मेरे मित्र के पास लाइसेंस है
मगर वह गाड़ी चलाना नहीं जानता
मेरे पास लाइसेंस नहीं है
मगर मैं गाड़ी चलाना जानता हूँ

मुझे पता है 
आप 'लाईसेंस' और 'ड्राइविंग' की जगह
'लाईसेंस' और 'बंदूक' रखकर नहीं देखेंगे
आप 'बी.पी.एल. कार्ड' और 'राशन' रखकर ही देख लें।


चिट्ठी पत्र- 
गाँव- सल्लन, 
तहसील- याला चक, जिला- कठुआ
पिन कोड- 184144
दूरभाष-7006229144
मेल आई. डी.- Pk11977777@gmail.com



प्रस्तुति :- 

कमल जीत चौधरी
काली बड़ी , साम्बा { जे० & के० }
दूरभाष - ०९४१९२७४४०३
ई मेल - kamal.j.choudhary@gmail.com


फोटोग्राफ: कुमार कृष्‍ण शर्मा

Sunday, June 7, 2020

पीयूष कुमार


निवासी: बागबाहरा, छत्तीसगढ़
उपसंपादक: सर्वनाम
संप्रति: सहायक प्राध्यापक
साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशन
संपर्क: 8839072306
मेल: piyush3874@gmail.com

छत्तीसगढ़ निवासी पीयूष जितने अच्छे कवि हैं उतने ही अच्छे  इंसान भी हैं। सरलता, सहजता, संवेदना और पंक्ति में सबसे पीछे खड़े व्यक्ति की चिंता करना इनके मानवीय व्यक्तित्व का हिस्सा है। चिंता इतनी कि लॉक डाउन के दौरान जब इनको पता चला कि कश्मीर के एक हिस्से में छत्तीसगढ़ के कुछ मजदूर फंसे हुए हैं तो चिंतित हो कर मुझे जम्मूे में फोन किया कि अगर किसी प्रकार से मदद हो सकती है तो की जाएं। खैर, कश्मीर के मेरे मित्रों ने हमेशा की तरह मुझे इस बार भी निराश नहीं किया। पीयूष 
छत्तीसगढ़  की लोक संस्कृति के साथ साथ अन्य  मुद्दों और विभिन्न पहलुओं की जानकारी नियमित रूप से सोशल मीडिया के माध्यकम से देते रहते हैं। इनकी अपनी रचनाओं में अगर रोजमर्रा के घटनाक्रमों को लेकर रोष और लूट व मुनाफे की नींव पर टिके बाजार के खिलाफ खड़े होने का साहस है तो वहीं प्रेम के लिए सूक्ष्मता और संवेदना भी। छत्तीसगढ़ के लोक  बिंबों के साथ साथ आधुनिक जीवन शैली को पीपूष अपनी रचनाओं में पिरोना बहुत अच्छे तरीके से जानते हैं। हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ‘खुलते किबाड़’ पर पहली बार सहर्ष प्रस्तुत हैं उनकी कुछ रचनाएं।


 
बारिश मे सेमरसोत

हर साल
आषाढ़ की पहली नमी सोखकर
सेमरसोत का प्यासा जंगल
बिखेर देता है जमीन पर 'पुटू'
ताकि सोनापति उसे दोने में लेकर
पाढ़ी के मोड़ पर
चालीस रुपये में बेच सके

सवारी बस की रफ्तार
कम होती है पाढ़ी मोड़ पर
खिड़की से सिर निकालकर
जोर से पूछता है कंडक्टर
बीस में देगी ?
महुए के नीचे भीगती बैठी सोनापति
इनकार में सर हिलाती है
किराए में पांच रुपये भी
कम नही करनेवाला कंडक्टर बडबडाता है
इन लोगों का भी भाव बढ़ गया है

बस में बैठा कवि सोचता है
विकसित सभ्यता की चमक में
सस्ते में मिले संसाधनों
और श्रम के लूट का
मिट्टी और पसीना शामिल है
ऐसे वक्त में सोनापति का
इनकार में सिर हिलाना
एक जरूरी घटना है

मंथर सेमरसोत से कवि पूछता है
यह इनकार जरूरी था ?
वह सहमति में सिर हिलाती
उछाह लेने लगती है
और भीगता हुआ जंगल मुस्कुराता है
आषाढ़ की इस बारिश में

(सेमरसोत वन अभ्यारण्य छत्तीसगढ़ के उत्तरी हिस्से सरगुजा मे अवस्थित है। इसका
नाम यहाँ बहनेवाली सेमरसोत नदी पर पड़ा है। 'पुटू' साल के जंगलों में आषाढ़ में
उगनेवाला एक फंगस है जिसकी सब्जी बनती है और यह बहुत महंगा बिकता है।)


 
वापसी

काश! मुमकिन हो पाता
मेहनतकश के लिए भी
तीन पग में तीन लोकों को नापना
और स्वामी बन जाना सकल का
पर वह नहीं हो सकता
उनका मालिक जरूर हो सकता है
जिसने लौटा दिया है उन्हें

स्पंज आयरन फैक्ट्री के
बन्द दरवाजे के बाहर खड़े रहकर
किया होगा जब फैसला वापसी का
आंख धुंधली हुई होगी लोहे से उड़ी राख सी
पिघले लोहे सा हो गया होगा मन
जो पसर गया होगा देह में
कि अब लौटना ही है

दिल्ली से देवरिया अलीगढ़ आरा जहानाबाद
या राजस्थान के किसी गांव के लिए
लौट रहे हैं जत्थे
रायपुर बिलासपुर कोरबा रायगढ़ से भी
निकल पड़े हैं
गढ़वा रंका और डाल्टनगंज के लिए
एक - एक जोड़ी बहुत से पांव
मुंह फेर लिया है कर्मभूमि ने
यहां मिट्टी भी अपनी न रही
जो देह को थाम ले मरने के बाद
पर जन्मभूमि तो थाम ही लेगी
इसी भरोसे का लहू पैरों में लिए
चल निकले हैं वे
पांच सौ - हजार किलोमीटर के लिए

यहां और वहां की मौत के बीच की
बाकी जिंदगी में चल रहे हैं कदम
इन कदमों के कई इम्तहान अभी बाकी है
कहीं मुर्गा बना दिये जाने का
या मां बहन की गालियों के साथ
दौड़ा दिए जाने का
वे सह लेंगे यह सब बुद्ध की तरह
संसाधनों और श्रम की लूट से चमचमाती
इस सभ्यता में
बुद्धत्व के लिए ज्ञान नही
मजबूर कमजोर और लाचार होना जरूरी है

जिस शहर को बनाया संवारा
उसकी गलियों से जाना मुमकिन नही
इसलिए शहरों के बाईपास से होकर
वापस जा रहे हैं कामगार
शहर गुजरा तो गांव आये
गांव आया तो घर आये
घरों के सामने खेलते हंसते बच्चों को देखकर
काँधे पर लदा उधड़े सीवन वाला पिट्ठू बैग
आह भरता है
जिसके भीतर इस बार
बीस रुपये की मिठाई भी नहीं है
न कोई छोटा खिलौना
और न ही किसी नन्हे का कपड़ा

वापसी नियम है
लाखों सालों में पानी वापस आ जाता है
युद्ध से भी लौट आता है जीवित बचा सैनिक
निकल आती है कटे पेड़ से कोंपल
आ ही जाता है जहाज का पंछी
बच्चों की शक्ल में आ जाते हैं पूर्वज
पेड़ का बीज जमीन पर गिरकर
उग ही जाता है फिर से

कमबख्त भूख भी आ ही जाती है बार बार
मरती नही यह
कहीं बन्द नही होती
काश भूख पर ताला लगाया जा सकता
ताकि न लौटे
कभी कोई इस तरह



गार्गी !

गार्गी !
कभी जनक की सभा में
जब याज्ञवल्क्य से
प्रतिप्रश्न किया था तुमने
ऋषि क्रोधित हो उठे थे एक बार
पर शास्त्रार्थ समुचित संम्पन्न हो गया था

गार्गी !
आज प्रश्न करके देखो
कहो - आसमान से ऊंचा
और पृथ्वी के नीचे क्या है?
तुम्हारे प्रश्न के उत्तर में
आसमान से ऊँची पताका लिए
पृथ्वी के नीचे
पतन की अनन्त गहराइयों तक
कुत्सित अट्टहास के साथ
प्रतिप्रश्न लिए
एक विराट कुपुरुष
नग्न खड़ा है

अभी व्यस्त हैं जनक
उनकी ओर उम्मीद से मत देखो
इधर देखो
याज्ञवल्क्य लिख रहे हैं
वृहदाराजक उपनिषद
नवीन आर्यावर्त का !

 


ऑनलाइन मन

जाड़ों की इन रातों में
मैं गले तक खींचता हूँ
तुम्हारी हंसी का कम्बल
और व्हाट्स एप्प में
देखता हूँ तुम्हे ऑनलाइन
पर कुछ नही कहता
तुम भी चुप ही रहती हो
यह ऑनलाइन
हमारे बीच का पुल है

उधर जंगल में
नदी सिमट रही खुद में
और किनारों पर
छोड़ जा रही मन की नमी
ताकि सुबह
वहां तुम्हारा नाम लिख सकूं
प्रेम की यह नदी
नहीं सूखेगी गर्मियों में भी
वह भी रहेगी हमेशा
ऑनलाइन

तुम्हारा स्टेटस देखता हूँ
इमोजी में मुस्कुराता हूँ
तुम भी वैसी ही मुस्कुराती हो
दो बार...
सोचता हूँ
इस चित्रलिपि ने
क्या सिंधु सभ्यता में भी इसी तरह
इमोशन को जाहिर किया होगा ?

तुम्हारा लास्ट सीन दिख रहा है
मैं भी तीन डॉट्स छोड़कर
मोबाइल डाटा ऑफ करता हूँ
तुम्हारे ख्वाब संजोए हुए हूँ
कोई स्क्रीन शॉट लेकर
गैलरी में संजोता हो जैसे

मन रे !
हमेशा ऑनलाइन ही रहना




ढिंग एक्सप्रेस

धान के खेतों से उपजी
टखने भर मिट्टी पानी की ऊर्जा
उसकी रगों से होकर
ट्रेक पर सनसनाती भाग रही है
और उसके कदमो के नीचे की जमीन
सुनहरी होती जाती है

गूगल में खोजकर उसकी जाति
कुछ लोग निराश हो रहे हैं
उधर उत्तरकाशी में अभी तीन महीनों में
एक भी लड़की ने जन्म नही लिया है
इधर एक पूंजीवादी खेल हार कर
सुस्ता रहा है अभी
इसी समय जमीन से जुड़े दस लोग
मार दिए गए हैं जमीन की खातिर

उसके अंग्रेजी नही बोल पाने को
कमजोरी बतानेवाला प्रवक्ता चुप है आज
हैरान हैं अभिजात्य मीडिया के कैमरे
एक दुबली सांवली फर्राटा भरती देह
उन्हें खींच रही बार बार
उसकी गति इतनी तेज है कि
उनके बने बनाये फ्रेम से बाहर हो जाती है

गोल्डन गर्ल दौड़ रही है पटरियों पर
चन्द्रयान भी भेद रहा अनंत को
यह दो दृश्य एक साथ हैं
राष्ट्रगान बज रहा है
मैडल लटकाए बिटिया मुस्कुरा रही है
लड़कियां तैयार हो रही हैं भागने को
ढिंग एक्सप्रेस की तरह

(हिमा दास को ढिंग एक्सप्रेस कहा जाता है।)


प्रस्तुति: कुमार कृष्ण  शर्मा




Wednesday, June 3, 2020

शेख मोहम्मद कल्याण


निश्चित विचार से युक्त शेख मोहम्‍मद कल्‍याण की कविताएँ अपने आत्मीय भावों से घर , आँगन , गाँव , कस्बे व शहर को उकेरती हैं। यह आम आदमी की कविताएं हैं। आदमी को अपने हक़ के लिए लड़ना सिखाती हैं। प्रेम कविताओं और प्रकृति के मानवीय बिम्बों के लिए कल्याण खास पहचाने जाएंगे। प्रस्तुत कविताएं उनके काव्‍य संग्रह 'पहाड़ अपनी जगह छोड़ रहे हैं' से साभार ली गई हैं।
 
(अपरिहार्य कारणों के चलते नई पोस्‍ट करने में जरूरत से ज्यादा देर हुई, उसके लिए खेद है।) 



पहली तारीख

पहली तारीख का काला साया
जब-जब भी मंडराने लगता
घुमड़ आते हैं काले बादल
आज फिर पहली तारीख है
पिता के हाथ में
खुजली हुई होगी
मोल भावों में तुली होगी पेंशन की रकम
बूढ़ी मां ने फिर दोहराया होगा
नए सूट का पुराना स्‍वप्‍न
और नन्‍हें पैरों ने भी नापी होंगी
जूतों की कई दुकानें
और मकान के झड़ते
पलस्‍तर से झांकती ईंटें
आज फिर खूब हंसी होंगी
क्‍योंकि
आज पहली तारीख है
सपनों के जिंदा और मर जाने का दिन

आज पहली तारीख है।





बहुत दिनों बाद

बहुत दिनों बाद
कोयल ने सुर में गाया
बागों में नाचे मोर
और कवियों ने रचीं
प्रेम कविताएं
बहुत दिनों बाद
रंगीन तितलियों ने नापा आसान
और दुबके खरगोशों ने जमीन
समय के खिलाफ
कइयों ने मारीं चीखें
एक साथ
बहुत दिनों बाद। 




तुम्‍हारे ही बहाने से... 

शाम का किया इंतजार
ढलते सूरज की तरफ
चेहरा घुमा बनाई कई आकृतियां
समय को झिंझोड़ा कई बार
तुम्‍हारे ही बहाने से...
रात को देखा
खुद से भी व्‍याकुल
तड़पते शब्‍द देखे
कागज पर आने को
शरारती हवा जो छूकर निकल गई
पास से
फैल गई ब्रह्मांड में
तितलियों के रंग चुराने चाहे
उड़ना चाहा आसमान की ओर
लौट लौट जाना चाहा
बचपन में
किताबों को गटगट पी जाना चाहा
लैला-मजनू
शीरी-फरहाद के किस्‍से
फिर
फिर चाहे पढ़ने
तुम्‍हारे ही बहाने से...
यही नही प्रिय
काम से लौटतीं महिलाओं की पीड़ाओं को
महसूस किया
मजदूर के हाथों से रिसते लहू की
बाजारबाद में, रोटी तक पहुंचने की यात्रा को
महसूस किया
तुम्‍हारे ही बहाने से।






बोल के लब आजाद हैं तेरे
(फैज अहमद फैज को समर्पित)

माना की बोलने पर बंदी लगी है
माना कि राजा के आदमी
खींच लेंगे तुम्‍हारी जुबान कभी भी
बह रही
यह मनमोहक हवा भी
तुम्‍हारी चुगली कर देगी राजा के दरबार में
लेकिन तुम सपने देखना मत छोड़ना
हालाांकि
तुम्‍हारी रातों में घुस आएगा
लंबे दांतों वाला काला दैत्‍य
चाह कर भी भाग नहीं  पाओगे तुम
मेरे बच्‍चे
कह रहे हैं सारे
राजा की बिछी बिसात में
बहुत से मोहरे हैं
जो राजा के कहने पर चलते हैं
तुम उलझ जाओगे
शतरंज के इस व्‍यूह में
इस व्‍यूह केवल राजा ही तोड़ सकता है
मेरे बच्‍चे
कह रहे हैं सारे
बेशक तुम्‍हारे हाथ में तिरंगा है
बेशक तुमने गाया है राष्‍ट्रगीत
तुमने बेशक सींचा है
इस देश का बगीचा
अपने लहू से
तुमने उड़ाई है पतंग बेशक
काटे जा सकते हैं तुम्‍हारे हाथ
यह वक्‍त के हाकिम हैं
कह रहे हैं सारे
राजा कहां देखता है आईना
उसे मत भेंट करो
उसे आईनों से सख्‍त नफरत है
आईना दिखाता है चेहरा
असली चेहरा
राजा को लगता है
समय पड़ा है उसकी जेब में
कह रहे हैं सारे
लेकिन मैं कहता हूं मेरे बच्‍चे
जुल्‍म के खिलाफ बोलने की
जितनी आज जरूरत है
शायद इससे पहले कभी नहीं थी
कि हम सब की आजादी
बचाए रखने के लिए
हम सब का बोलना जरूरी है
बोल कि लब आजाद हैं तेरे। 



सम्पर्क :-
नरवाल पाई , सतवारी
जम्मू , जे० & के०
दूरभाष - 08825063844
ई मेल - smkalyan2010@gmail.com
प्रस्‍तुति और फोटोग्राफ: कुमार कृष्‍ण शर्मा