Sunday, December 31, 2023
फ़िलहाल 4 - कविता किसी सरलीकृत परिभाषा में नहीं ढलती
Friday, September 15, 2023
जब रहमान राही बोले-बहुत तीखा सवाल है
सन 2007 के जनवरी माह के सर्दियों के दिन थे। मुझे खबर मिली कि प्रो रहमान राही जम्मू में किसी परिचित के घर ठहरे हुए हैं। थोड़ी छानबीन के बाद पता चला कि वह गांंधी नगर में उनके परिचित किसी कश्मीरी पंडित परिवार के घर पर रुके हुए हैं। मैं उस समय समाचार पत्र अमर उजाला को अपनी सेवाएं दे रहा था। फिर क्या था। बाइक लेकर बताए पते पर चल दिया। जब मैं उस घर में पहुंचा तो दुबले पतले रहमान राही बाहर लॉन में 'फिरन' पहने घूप में बैठे हुए थे। मैं भी दुआ सलाम के साथ उसके साथ लाॅन में ही लगी दूसरी कुर्सी पर बैठ गयाऔर बातचीत के सिलसिले को शुरू कर दिया। बताता चलूं कि प्रो. रहमान राही को सन 2007 (सन 2004 के लिए) में उनकी कश्मीरी काव्य संग्रह "सियाह रूद जेरन्य मंज़ " (काली बारिश की फुहारों में) के लिए ज्ञानपीठ दिया गया था। वह एकमात्र कश्मीरी साहित्यकार हैं जिनको इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
मेरा नहीं, पूरी कश्मीरियत का सम्मान
ज्ञानपीठ मिलने पर रहमान राही का कहना था कि यह उनका नहीं बल्कि पूरे कश्मीर, उसकी जुबान और पूरी कश्मीरियत का सम्मान है। उनको इस बात की कुछ संतुष्टि है कि आखिर उनकी मेहनत को पहचाना गया। अपने सफर के बारे में उनका कहना था कि हर सामान्य व्यक्ति की तरह उनका जीवन भी उतार चढ़ाव वाला रहा है। यहां तक बात कश्मीरी भाषा की है तो यह भाषा भीअन्य स्थानीय भाषाओं की तरह मौजूदा समय में कई चुनौतियों से गुजर रही है। हर भाषा एक पूरी संस्कृति का आइना होती है। अगर कश्मीरी भाषा नहीं होगी तो कोई कश्मीरी नहीं होगा। कोई कश्मीर नहीं होगा। भाषा यहां एक ओर संवाद का माध्यम है तो वहीं दूसरी ओर यह लाेगोंं को आपस में जोड़ती भी है। यह पहचान का काम करती है। कश्मीरी भाषा की चुनौतियों को लेकर उनका कहना था कि कश्मीरी भी कई चुनौतियों का सामना कर रही है। उर्दू और अंग्रेजी बहुत तेजी से अपना स्थान बना रही हैं और समय के साथ कश्मीरियों का भी कश्मीरी जुबान के प्रति रुझान भी बदला हैै। हम पर एक प्रकार से सांस्कृतिक हमला हो रहा है, ऐसे में हमें अपनी भाषा बचानी होगी। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम दूसरी भाषाओं से नफरत करें। हमें दूसरी भाषाओं काे भी सीखना होगा। दुनिया और तकनीक की अनदेखी नहीं की जा सकती। इसके अलावा हमारी शिक्षा व्यवस्था भी ऐसी होेनी चाहिए जो मातृभाषा का प्राथमिकता दे। उन्होंंने अनुवाद के महत्व को भी खास तौर पर रखा।
तब आती है कश्मीरी होने पर शर्म
प्रो राही से विदा लेते समय मैंने उनसे ऐसा सवाल पूछा जो मैं आफिस से निकलते समय सोच कर निकला था। मैंने पूछा कि आपको कब भारतीय होने पर गर्व होता है और कब कश्मीरी होने पर शर्म आती है। यह सवाल सुनते ही प्रो राही के शांत और मुस्कुराते चेहरे के हाव भाव बदल गए और बोले- यह बहुत तीखा सवाल है। फिर थोड़ी देर सोच कर उनका कहना था कि मैं गांधी के देश का हूं, यह मेरे लिए गौरव की बात है और जब भी कश्मीर में किसी बेगुनाह का लहू बहता है तो उनको अपने कश्मीरी होने पर शर्म आती है। एक ओर घटना का जिक्र मैं विशेष रूप से करना चाहूंगा। बात सन 2008 की है। पूरी रियासत श्री अमरनाथ भूमि विवाद की आग में जल रही थी। पूरी रियासत दो पक्षों में बंट चुकी थी। हमारे संपादक चाहते थे कि रियासत के महत्वपूर्ण सााहित्यकारों से बात कर इस विषय पर लेख छापा जाए। इसका जिम्मा मुझे दिया गया। मैंने सबसे पहले दिल्ली फोन कर साहित्यकार पदमा सचदेव से बात कर लेख तैयार किया जो अखबार के संपादकीय पेज पर छपा। उसके बाद मैं चाहता था कि इस विषय पर कश्मीरी साहित्यकार से बात की जाए। मैंने श्रीनगर प्रो राही के घर फोन मिलाया और फोन भी संयोग प्रो राही ने ही उठाया। मैंने कहा कि पूरी रियासत के जो हालात है, मैं उनसे इस विषय पर विस्तार से बात करना चाहता हूं। उस पर उन्होंने अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे हालात में कुछ भी कहना उनके लिए उचित नहीं रहेगा। खैर, उस समय घाटी के हालात भी बहुत ज्यादा संवेदनशील थे। मैंने भी शुक्रिया करते हुए रिसीवर को नीचे रख दिया।
जम्मू कश्मीर के श्रीनगर में छह मई 1925 को पैदा हुए कश्मीरी कवि, अनुवादक और आलोचक प्रो रहमान राही का निधन नौ जनवरी 2023 को 97 साल की आयु में हुआ।
प्रस्तुति: कुमार कृष्ण शर्मा
94191-84412
( फोटो गूगल की मदद से विभिन्न साइट से साभार लिए गए हैं)
Thursday, December 8, 2022
फरीदा खानम- सुर सरहद की बंदिशों के मोहताज नहीं
सीरियल के अलावा पीटीवी पर ऐसे कई कार्यक्रम चलते थे जिनमें पाकिस्तान के मशहूर गायक गजलें या नज्में पेश करते थे। मल्लिका-ए-तरन्नुम बेगम अख्तर, उस्ताद मेंहदी हसन, उस्ताद अमानत अली खान, इकबाल बानो, हामिद अली खान, मल्लिका पुखराज, गुलाम अली, शौकत अली खान, ताहिरा सईद, आबिदा परवीन, उस्ताद नुसरत फतेह अली, अत्ताउल्लाह खान, महनाज़, आरिफा सिद्दिकी कुछ आदि ऐसे नाम हैं जिनसे पहली बार मेरी मुलाकात पीटीवी के माध्यम से ही हुई।
ऐसी ही एक गजल
गायिका जिससे पीटीवी के माध्यम से मेरा राबता हुआ वह थीं ‘क्वीन आफ गजल’ कही जाने वाली फरीदा
खानम। फ़य्याज़ हाशमी की लिखी गजल- आज जाने की जिद न
करो, अतहर नफ़ीस की लिखी- वो जो इश्क हमसे रुठ गया, फैज अहमद फैज की
लिखी- शाम-ए-फिराक अब न पूछ आदि फरीदा
खानम की कुछ गाई ऐसे गज़ले थीं जिनको मैं अकसर गुनगुनाता रहता था। उस समय कभी सोचा
भी नहीं था कि जिन चेहरों को मैं पड़ोसी देश के टीवी चैनेल पर देखता रहता हूं, उनमें से किसी एक से भी मिलना कभी नसीब होगा।
सुर सरहद की बंदिशों के मोहताज नहीं
बात तीस मार्च 2007 की है जब मुझे खबर मिली कि फरीदा खानम मंदिरों के शहर जम्मू में पहुंची हुई हैं। उस समय मैं अमर उजाला के साथ पत्रकार के तौर पर काम करता था। मुझको जब इस बात का पता चला कि वह हरि निवास पैलेस पर रुकी हुई हैं तो मैं दोपहर बाद करीब एक बजे हरि पैलेस पहुंच गया। वहां पहुंचा तो पता चला कि फरीदा जी शहर देखने निकली हुई हैं, जल्द आ जाएंगी। फरीदा जी का इंतजार मेरी सोच से भी ज्यादा लंबा निकला। वह चार बजे के करीब होटल पहुंचीं।
आप जमीन के उस हिस्से पर खड़ी हैं जो दोनों देशों के बीच तनाज़े का सबब है, उनसे मिलते समय दुआ सलाम के बाद मैंने आपनी बातचीत की शुरुआत सीधे इसी प्रश्न से की। इस सवाल पर उनका कहना था कि वह इस तल्खी से दुखी है। सियासत उनका मज़मून नहीं है। फिर भी वह यह कहना चाहती हैं कि सियासत दूरियां पैदा करने की चाहे जितनी कोशिश करे, सुर सरहद की बंदिशों के मोहताज नहीं होते। कलाकार को जो मोहब्बत और इज्जत अपने देश में मिलती है, उससे ज्यादा अपनापन और दीवाने दूसरे मुल्क में मिलते हैं। फनकार हर धर्म, जाति और देश से उपर होता है। दोनों देशों को चाहिए कि वह अपने झगड़े आपस में बैठ कर सुलझाएं।
खान साहिब की हूं मुरीद, फराज-फैज महबूब शायर
भारत रत्न बिस्मिल्लाह
खान की फरीदा खानम खासतौर पर मुरीद हैं। उनका कहना था कि उनके बारे में जो भी कहा
जाए वह कम है। उनको सुनना सबके नसीब में नहीं है। वह उन चंद खुशनसीब लोगों में से
हैं जिनको खुदा ने खान साहिब की शहनाई सुनने का मौका बख्शा है। उनको सुनना अलग ही
जोन में चले जाने जैसा है।
जब मेंहदी हसन का
जिक्र करते लगाए कानों को हाथ
मैं खुद उस्ताद मेहंदी हसन का दीवाना हूं। इसलिए मैंने फरीदा खानम से मेंहदी हसन के बारे में खास तौर पर पूछा। उस समय उस्ताद जी छाती के संक्रमण के चलते बीमार थे। उनका जिक्र करते समय फरीदा खानम की आवाज भर आई। सम्मान में फरीदा खानम ने दोनों कानों का हाथ लगाते और अपनी कुर्सी से थोड़ा उठते हुए मेंहदी हसन का नाम लिया। उन्होंने दुआ में हाथ उठाते हुए कहा कि खुदा उनका जल्द आराम फरमाए। उस समय मैंने जो बात सीखी वह थी कि कैसे एक बड़ा कलाकार दूसरे बड़े कलाकार का सम्मान करता है।
बात बात में मैंने उनसे काफी देर से आने का जिक्र भी किया। उनका कहना था कि जम्मू में वह शॉपिंग के लिए गईं थीं। इस शहर में इतना कुछ अच्छा है कि उनको समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या कुछ खरीदें और क्या नहीं। उनको समय का ध्यान ही नहीं रहा और उन्होंने चार घंटे इसमें लगा दिए।
प्रस्तुति और फोटोग्राफ: कुमार कृष्ण शर्मा
94191-84412
( फरीदा खानम का फोटो उनके फेसबुक पेज से साभार लिया गया है। )
Thursday, November 3, 2022
जगजीत 'काफ़िर'
जगजीत 'काफ़िर' पंजाबी, हिंदी और उर्दू में लिखते हैं। तीस जुलाई 1979 को पंजाब के लुधियाना शहर में जन्मे जगजीत की किताब जल्द प्रकाशित होने वाली है। कमाल के शायर और इंसान जगजीत विभिन्न मंचों, दूरदर्शन और आकाशवाणी पर काव्य पाठ कर चुके हैं। उनकी कुछ रचनाओं को पूरे सम्मान के साथ पहली बार 'खुलते किवाड़' पर साझा कर रहा हूं।
Saturday, October 1, 2022
अमन जोशी 'अज़ीज़'
शिक्षा - M.A.,M.Phil.,M.Ed.
युवा शायर अमन जोशी 'अज़ीज़' लुधियाना से संबंध रखते हैं और पंजाब शिक्षा विभाग में बतौर अंग्रेज़ी लेक्चरर के पद पर कार्यरत हैं। बेहद मिलनसार, शांत और सादा तबियत के मालिक अमन से मेरी उनसे मुलाकात लुधियाना में हुई थी।
'खुलते किबाड़' पर पूरे सम्मान के साथ उनकी कुछ गजलों को सहर्ष साझा कर रहा हूं। गजल से पहले उनके कुछ अशआर
# बात कहने के सौ तरीक़े हैं
कुछ न कहना भी इक तरीक़ा है
# आँख से देखा भी जा सकता है
वैसे रोने के लिए होती है
ताजदारों को ज़रा होश में लाया जाए
# परिंदा रोज़ क्यूँ आ बैठता है मेरी चौखट पर
मेरे दरवाज़े की लकड़ी यक़ीनन जानती होगी
# आप लायक़ नहीं मुहब्बत के
आपका दिल दिमाग़ जैसा है
गजल
यूँ सर-ए-बज़्म तमाशा न बनाया जाए
बात मेरी है तो फिर मुझको बताया जाए
अमन जोशी 'अज़ीज़'
संपर्क:- 98142-98099
प्रस्तुति और फोटोग्राफ:- कुमार कृष्ण शर्मा
94191-84412























