Friday, January 26, 2024

रोहित ठाकुर


दोनों 


दोनों साथ खड़े हैं पुरी के समुद्र तट पर 

वे समुद्र को देख रहे हैं मैं उन्हें देख रहा हूँ 

दोनों कितने स्थिर हैं कितने पास-पास

क्या पता वे नाप रहे हों समुद्र से गहरे अपने प्रेम को

वे क्या यह कहने आये हैं समुद्र को -

जब हम दूर होते हैं एक- दूसरे से तो समुद्र की तरह ही अशांत हो जाता है हमारा हृदय 

मैं उन दोनों प्रेमियों के बीच कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहता 

चाहता हूँ असंख्य बरसों तक ये दोनों आते रहें इसी तरह 

मैं उन दोनों प्रेमियों पर लिख सकता हूँ असंख्य कविता

अगर वे इसी तरह प्रेम में डूबे आते रहें 

और 

मुझे दिखाईं दें 

दिल्ली- कलकत्ता- सूरत कहीं भी मिल सकते हैं प्रेम में डूबे लोग 

बहुत छोटी जगहों पर मसलन बस्ती - दरभंगा- कौसानी में 

एक ही आकाश के नीचे मिलते हैं 

सबसे बेखबर ये प्रेम करने वाले |




मज़दूर की कमीज़ 


मजदूरों का एक समूह कई महीनों से एक निर्माण कार्य में लगा है

वे गर्मी के दिनों में आये बरसात में रहे और इस जाड़े के बाद भी शायद कुछ दिनों तक रुकें

उनके समूह में कई लड़के हैं 

वे किसी दिन गीत गाते हुए काम करते हैं और हँसते हैं 

शाम को आती है उनसे मिलने उनकी औरतें 

ये लड़के साफ और नये फ़ैशन के कपड़े पहनते हैं 

घूम आते हैं साथ आस-पास के बाज़ार

औरतें लौट जाती हैं 

देर रात खाना पकाते हैं और कपड़े साफ करते हैं ये नये लड़के

कई दिनों तक चुपचाप काम करते हुए दिखते हैं 

मैं इन्तज़ार करता हूँ इनकी हँसी की इनके गीतों की

अचानक एक दिन वे फिर हँसने लगते हैं गाते हैं कोई गीत 

वह शाम कितनी देर से आती है कितनी देर से आती है उनकी औरतें | 



कोरोमंडल एक्सप्रेस 


कोरोमंडल एक्सप्रेस पटरी से उतर कर पलट गई है

बहुत साल पहले की एक बात अचानक याद आती है

पिता मद्रास इसी रेलगाड़ी से जाते थे

हम बहुत छोटे थे 

उस समय पटना तक दक्षिण से कोई रेलगाड़ी नहीं आती थी

पिता कहते थे दौड़ती हुई कोरोमंडल एक्सप्रेस के डब्बे में 

किसी यात्री के लिए खड़ा रहना बहुुत मुश्क़िल काम था

बचपन में सपने में कई बार कोरोमंडल एक्सप्रेस में बैठा 

कई बार रात में डर से नींद खुल जाती थी 

पिता को गुजरे हुए कई बरस हो गए 

कोरोमंडल एक्सप्रेस को भूल गया मैं

पटरी से उतर गई है कोरोमंडल एक्सप्रेस 

न तो पिता बैठे थे और न ही सपने मे मैं जाकर बैठ गया था

फिर भी कल से कई बार रूलाई छूटती है 

हर आदमी से कहे फिर रहा हूँ-

किसी रेलगाड़ी को पटरी से उतर कर पलटनी नहीं चाहिए |




कविता एक सार्वजनिक जगह है जहाँ हम मिल सकते हैं 


मेरी कविता तक जो आया वह मेरा शत्रु कैसे है

कविता तो मेरा घर है 

जो घर आया वह मेरा शत्रु कैसे है 

कविता में मैं कामना कर सकता हूँ कि जो मेरे घर आयें

वे आबाद रहें 

मेरी कविताओं की तरलता उनकी मनुष्यता को सूखने न दे

कविता की रोशनी में कोई भी आधी रात को भी मेरे घर आ सके 

इतनी रोशनी हो कि किसी को चलते हुए ठेस न लगे 

कविता प्रेम और आन्दोलन के लिए एक रास्ता है 

जिस पर ज़रूरत पड़ने पर सब चलें 

कविता एक सार्वजनिक जगह है जहाँ हम मिल सकते हैं।



बेटी की चिट्ठियाँ 


बेटी जब छोटी थी तो मुझे चिट्ठी लिखा करती थी

मैं घर के एक कमरे में होता था और वह दूसरे कमरे में

कभी हम दोनों एक ही कमरे में होते थे 

फिर भी वह चिट्ठी लिखती थी

ऐसा बेटी ही कर सकती है

उन कई चिट्ठियों में वह मेरा रेखाचित्र बनाती थी

उन रेखाचित्रों में कोई समरूपता नहीं थी 

पर मैं उन सभी के जैसा होना चाहता हूँ |



दिसंबर की धुंध कितनी निष्पक्ष है


दिसंबर की धुंध कितनी निष्पक्ष है

सब कुछ ढंक लेती है 

कुछ भी नहीं दिखाई देता

न आदमी न देवता न दिशा 

ओह! जीवन ओस की बूंद की तरह ठंडी 

और समय किस तरह निश्चेत पड़ा हुआ है 

निस्तेज है उगे सूरज की आभा 

एक बस तुम्हारी याद है गतिशील 

जो धँसी है मेरी आत्मा में 

जल रही है दिसंबर की आग की तरह |





अभी बक्सर दूर है दूर है आरा पटना बहुत दूर है 


उदास सर्द रातों में गुजरती है रेल 

काँपती है उसकी आवाज सन्नाटे में 

सुनाई देती है नींद में 

नींद से होकर गुजरती हुई रेल की रोशनी में 

मैं बदलता हूँ करवट देखता हूँ घड़ी में समय 

अभी बक्सर दूर है दूर है आरा

पटना बहुत दूर है 

घर दूर है और दूर हो तुम

दूर रहा नहीं जाता

नींद में गुजरती है घर जाने वाली रेल

बक्सर जाने वाली पटना जाने वाली रेल

सर्द रातों में ठोस लोहे की रेल शीत में भीगती है

हम भीगते हैं ऑंसू में |



रिक्शावाले 


जिस शहर में रहा कुछ रिक्शा चालकों से जान-पहचान होती रही

उनसे बात करना हमेशा अच्छा लगा 

वे मेहनत की कमाई खाते हैं और घर से दूर घर को याद करते हैं 

जैसे मैं दूसरे शहर से आया था उसी तरह वे भी परदेशी थे 

कुछ नये रिक्शा चालकों को शहर के कई इलाकों की जानकारी नहीं थी 

वे मेरी ईमान पर किराया छोड़ देते थे

एक रिक्शा चालक शर्मिला था जब भी उसके रिक्शा पर बैठता था 

वह मुस्कुराता था और कहता था कि वह रिक्शे को बहुत सजाकर रखता है 

मैं उसके रिक्शे की तारीफ करता था और वह फिर मुस्कुराता था

रिक्शा खिंचते हुए कई गाते थे 

कुछ घर की बात बताते 

पर सब के सब अपनी गिरती सेहत और बढ़ती महंगाई को लेकर हताशा से भर जाते

हम कभी साथ चाय पीते और फिर मिलने की बात कह कर शहर में खो जाते ।




नाव नदी की आँखों जैसी लगती हैं
 

नावों ने नदियों का साथ कभी नहीं छोड़ा

बेतवा को अमावस में जब पार किया तो जान पड़ी बिल्कुल अकेली

एक छोटी सी नाव नदी के साथ डोल रही थी

आत्मा पर जो एक भार था वह जैसे कम हो गया 

अकेलापन किसी का भी हो भला नहीं लगता 

चंबल नदी में नाव का नाविक जो गीत गा रहा था 

उसका चेहरा नदी के बेटे की तरह था 

नर्मदा में कईं बार नावों को देखा और इस तरह नर्मदा तक गया कई बार 

गंगा को अकेले बहते हुए नहीं देखा है कभी

बनारस और पटना में गंगा को कोई छू सकता है 

एक नाव पर यात्रा कर

नदियों को याद करते हुए नाव याद आते हैं 

जैसे 

तुम्हें याद करते हुए घर की याद आती है 

हमारा घर भी एक छोटा सा नाव है 

जो डोलता रहता है तुम्हारी हँसी की नदी में  |


रोहित ठाकुर 

मोबाइल नम्बर : 6200439764

मेल आईडी : rrtpatna1@gmail.com


Sunday, December 31, 2023

फ़िलहाल 4 - कविता किसी सरलीकृत परिभाषा में नहीं ढलती


विता दरहक़ीक़त क्या है? किसके लिए है? लिखी क्यों जाती है? कविता से होगा क्या? कविता बुनी, बनाई जाती है, कहीं ऊपर से उतरती है अथवा स्वतः प्रस्फुटित होने वाली कोई क्रिया है? कविता के बीज - सूत्र कौन से होते हैं? क्या कविता निज तत्व को पुनः प्राप्त करने की प्रक्रिया है? कविता कहां मानीखेज है कहां नहीं? कविता, कवि को कितना धारण करती है? क्या कविता कोई फार्मूला हो सकती है? ऐसे बीसियों प्रश्न हैं। कविता को किसी सरलीकृत परिभाषा में ढालना लगभग कठिन है।

यदि कविता की परंपरा में जाएं, आदि - कविता को उठाएं, तो कविता उससे भी पहले मनुष्य के होश में विद्यमान मिलती है। वह उल्लास में रही, तो रुदन में रोयी भी। वह संस्कारों में रही, तो हरेक धर्म की पूजा - अर्चना, उपासना इत्यादि में रही। वह लोक - संस्कार है। लोक - मानस में महकती है।
हिंदी - कविता ने बहुत युग देखे हैं और एक सुदीर्घ परंपरा इसके पास है। मेरा मंतव्य हिंदी - कविता के इतिहास को पुनः उलीकना कतई न है। मैं चाहता हूं, मौजूदा दौर में कविता के बहाने से अपने विचार साझा करूं।
इस समय विश्व में एक ओर युद्ध व हथियारों की बेच का माहौल है, तो दूसरी ओर दक्षिणपंथी ताकतें, पूरी तरह से मुस्तैद हैं। नित्य नयी बीमारियां फैल रही हैं। हर जगह मंहगाई चरम पर है। एक महामारी जो निर्मित की गयी; उसने जीवन ही नहीं ग्रसे, लोगों के जीवनुपार्जन के साधन तक ध्वस्त कर दिए। इतनी चीखो - पुकार के बावजूद बौद्धिक - समाज शांत सा है। मीडिया के पास तयशुदा कार्यक्रम हैं। सोशल - मीडिया भी ख़ास तरह से संचालित किया जा रहा है। स्कूल, चिकित्सालय, कचहरियां, धार्मिक - संस्थान वगैरह दोहन केंद्रों में बदल चुके हैं, और कहीं कोई सुनवाई अब नहीं होती। ज़ुर्म बढ़ते जा रहे हैं। आत्ममुग्धता, राजनेताओं की पहचान बन चुकी है। ऐसा ही और भी बहुत कुछ है, तो कविता क्या कर रही है ? मूलतः कवि शीर्षक अपनी कविता में; अविनाश मिश्र इसका उत्तर देते हैं: 

| मूलतः कवि |

ततायियों को सदा यह यक़ीन दिलाते रहो 
कि तुम अब भी मूलतः कवि हो 
भले ही वक़्त के थपेड़ों ने 
तुम्हें कविता में नालायक़ बनाकर छोड़ दिया है 
बावजूद इसके तुम्हारा यह कहना 
कि तुम अब भी कभी-कभी कविताएँ लिखते हो 
उन्हें कुछ कमज़ोर करेगा।


कविता सदा से समाज सापेक्ष रही है। कविता, राजनैतिक - सांस्कृतिक प्रक्रिया है। वह अपने समय के अंतर्विरोधों से संघर्ष करती है। मुख्यतः मानव के पक्ष में खड़ी होती है। समय से सीधे जुड़ती है। अभिव्यक्ति का औज़ार है। मुक्ति का नाद है। विमर्श है। त्रासदियों का बयान है। चेतना है। संघर्ष है। यह जीवन-आख्यान रचती है। सर्वहारा के लिए एक प्रामाणिक स्रोत है। निरंतर गतिशील है। वह आत्मगत कतई नहीं, जनपक्षधर है। प्रतिकार है। दायित्व - बोध और सामूहिकता है। यहां चमत्कारिता या वाग्मिता का कतई स्थान नहीं, एक तरह का वर्ग - संघर्ष है, इतिहास - बोध है, अपनी ज़मीन से चुतरफ़ा जुड़ाव है। देखें, विजया सिंह की एक कविता कहाँ जुड़ती है:

| लाल बेर और मोटा नमक |

लाल बेर और मोटा नमक सभ्यता के दायरे में नहीं 
उन्हें अब भी डूँगर और रेत पसंद हैं 
कम पानी वाली जगहों और तमाम कच्चे रास्तों पर 
वे अपने आप उग आते हैं 
सिर्फ़ बकरियाँ और ऊँट उन तक पहुँच पाते हैं 
और वे जो स्कूलों में नहीं 
उमस भरी गर्मियों, मेलों और सरकारी स्कूलों के बाहर 
पार्कों के आवारा और बच्चे 
पानी में भीगे लाल बेर और मोटा नमक 
चटखारे ले-लेकर खाते 
आत्मा के उस छोर की ओर लौटते हैं 
जहाँ बीहड़ अब भी ज़िंदा हैं 

कोई नदी इस आमंत्रण पर उफान में आती है 
उसके किनारे गोता लगाना 
स्फिंक्स की प्रतिमा के ठीक नीचे पहुँचना है 
स्फिंक्स की नाक टूटी है और आँखों में दया नहीं 
है तो सिर्फ़ प्रचंड कौतूहल

उसकी पहेलियाँ अब भी 
उन रास्तों की ओर धकेलती हैं 
जहाँ घर छोड़ते हुए भी, 
घर ही की ओर लौटना है। 


कविता, जनपदों की परिभाषा है। यह 'मैटाबोलिक रिफ्ट' को भाषा के ज़रिए तोड़ते हुए लोकधर्मी संवेदना की ओर बढ़ना है। जब चेतना तक का पदार्थीकरण किया जा रहा हो, तब कविता ही स्त्रियों, किसानों, दलितों, श्रमिकों के हित में संवाद करती है। सत्तारूढ़ सामाजिक ताकतों के ख़िलाफ़ विरोध रचती है। कालजयी है। इसे नष्ट नहीं किया जा सकता। यह जीवनानुभव है और जीवंत तर्क भी है। हिमाचल में रहने वाले प्रदीप सैनी की एक कविता पढ़ें:

| या |

गातार गहराता है शीत
पहले से ज़्यादा गिरती है बर्फ़ हर रोज़
मैं धीरे-धीरे एक विराट और निर्जन हिमनद हुआ जाता हूँ

कुहरा घना है हर तरफ़
अँधेरा एक दूसरे अँधेरे से अँधेरे में मिलता है गले
उनकी आहट तो होती है शक्ल नहीं दीखती

बिना किसी प्रकाश के शापित है मेरी धवलता
या तो ऊष्मा का स्पर्श बचाएगा मुझे या फिर
किसी स्पर्श की ऊष्मा

उस बर्फ़ से बदनसीब कुछ भी नहीं
जिसकी क़िस्मत में नहीं है पानी होना।
   
इधर जब कविता - आलोचना कविता केंद्रित न होकर, चेहरा - केंद्रित हो चुकी हो। अधिकांश कवि इक - दूजे की ही पीठ खुजला रहे हों। तब मैं युवा - कविता की ओर देखता हूं और मुझे दिलासा मिलता है कि यह गहन अंधकार में दिए की लौ सा है। यहां मौलिकता है। नयी तर्ज़ व तमीज़ है। कहने के नए ढंग हैं और गहन जिजीविषा है। यह विषयों को छूकर ही नहीं निकलती, उनमें साधिकार दाखिल होती है तथा अपने लहजे में दो टूक है। यह कविता की नयी चेतना है, जो अपने संप्रेषण में मनुष्य के निकट है व उसे प्रत्येक फ्रेम में खोजती है। यह प्रकृति से सजीव जुड़ाव है। वस्तु - जगत का पुनः सृजन करती है यह हारे की उम्मीद है। इसके पाठ के साथ ही इसका सायास वरण होता है। यह हिंदी - कविता की ऐसी उम्मीद है, जो नैरेटिव बदल देती है। दिल-आकार के चेहरे वाली निम्न उद्धृत कविता तथाकथित चाँदों को आईना दिखा देती है:

| रात को होस्टल में एकदम अकेले रहते हुए
(कमल जीत चौधरी)

अँधेरे ने मुझे अपने सुरक्षित घेरे में ले रखा है
पेड़ पर बैठे उल्लू की आँखों में नई दुनिया खुल रही है...
दो सौ सत्तर डिग्री घूमती नज़र
दिल के आकार का चेहरा
चार उंगलियाँ
तेज़ कान
बाल
दाढ़ी
और जादुई आवाज़ों की यह रात

मैं डूबती जा रही हूँ...
पत्तों से छनकर 
मेरे बिस्तर पर आने वाले दिलफरेब चाँद,
देखो,
उल्लू की कलाओं ने मुझे कैसे बचा रखा है। 
  

मेरे निकट यदि कोई कवि अपनी ज़मीन, अपनी लोक - संस्कृति के साथ अंगीकार होता है, तो मौलिक उपस्थिति दर्ज़ कराता है। यहां कविता कलात्मक नक्काशी की फार्मूला - कविता से कहीं बाहर होती है। जम्मू-कश्मीर के कवि कुमार कृष्ण शर्मा की कविता उद्धृत कर रहा हूँ:
 

| उसका ज़िक्र

सके डोगरी लोक गीतों जैसे
चेहरे को पढ़ कर ही
मैंने लिखी है
कविता
उसकी तुबंकनारी* जैसी
गुफ़्तगू सुन कर ही
मैंने समझी है
ग़ज़ल

उसका
कविता गजल का वजूद
मानो
वितस्ता का ठंडा पानी
तवी के गर्म पत्‍थरों से
टकरा कर उछल जाए
जैसे
लल**
के वाख को
कोई भाख*** के सुरों में
पिरो कर गा दे
जैसे
डल के ठहरे पानी में
चिनाब का यौवन मिल जाए। 

उसकी
रोउफ**** जैसी चाल को
देख कर ही
मैंने किया है कुड*****
उसकी
बर्फ जैसी खामोशी को सुन
मैंने समझी है
गर्म हवाओं के थपेड़ों की भाषा

उसका रोउफ बर्फ जैसा सिरापा
जैसे
चिल्ले कलान की बर्फ में
ज्येष्ठ की लू मिल जाए
जैसे
शीन मुबारक
कोई बैसाखी के ढ़ोल की थाप पर दे रहा हो
मानो
पतझड़ के चिनार के तंबेई रंग में
कोई कच्चे आम की खटास मिला जाए 

उसको पढ़ लेना
उससे बात कर लेना
संग उसके चलना
उसकी खामोशी से गुफ्तगू करना
कविता पढ़ लेना है
गजल लिख लेना है
नाच उठना है
मुस्कुराना है...

*तुंबकनारी - कश्मीर  का लोक वाद्य यंत्र
**लल - कश्मीर की महान शिव भक्त
***भाख- डोगरों की लोक गायन शैली
****रोउफ- कश्मीर की लोक नृत्य शैली
*****कुड- डोगरों की लोक नृत्‍य शैली

Friday, September 15, 2023

जब रहमान राही बोले-बहुत तीखा सवाल है

सन 2007 के जनवरी माह के सर्दियों के दिन थे। मुझे खबर मिली कि प्रो रहमान राही जम्‍मू में किसी परिचित के घर ठहरे हुए हैं। थोड़ी छानबीन के बाद पता चला कि वह गांंधी नगर में उनके परिचित किसी कश्‍मीरी पंडित परिवार के घर पर रुके हुए हैं। मैं उस समय समाचार पत्र अमर उजाला को अपनी सेवाएं दे रहा था। फिर क्‍या था। बाइक लेकर बताए पते पर चल दिया। जब मैं उस घर में पहुंचा तो दुबले पतले रहमान राही बाहर लॉन में 'फिरन' पहने घूप में बैठे हुए थे। मैं भी दुआ सलाम के साथ उसके साथ लाॅन में ही लगी दूसरी कुर्सी पर बैठ गयाऔर बातचीत के सिलसिले को शुरू कर दिया। बताता चलूं  कि प्रो. रहमान राही को सन 2007 (सन 2004 के लिए)  में उनकी कश्‍मीरी काव्‍य संग्रह "सियाह रूद जेरन्य मंज़ " (काली बारिश की फुहारों में) के लिए ज्ञानपीठ दिया गया था। वह एकमात्र कश्‍मीरी साहित्‍यकार हैं जिनको इस पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया है। 

मेरा नहीं, पूरी कश्‍मीरियत का सम्‍मान

ज्ञानपीठ मिलने पर रहमान राही का कहना था कि यह उनका नहीं बल्कि पूरे कश्‍मीर, उसकी जुबान और पूरी कश्‍मीरियत का सम्‍मान है। उनको इस बात की कुछ संतुष्टि है कि आखिर उनकी मेहनत को पहचाना गया। अपने सफर के बारे में उनका कहना था कि हर सामान्‍य व्‍यक्ति की तरह उनका जीवन भी उतार चढ़ाव वाला रहा है। यहां तक बात कश्‍मीरी भाषा की है तो यह भाषा भीअन्‍य स्‍थानीय भाषाओं की तरह मौजूदा समय में कई चुनौतियों से गुजर रही है। हर भाषा एक पूरी संस्‍कृति का आइना होती है। अगर कश्‍मीरी भाषा नहीं होगी तो कोई कश्‍मीरी नहीं होगा। कोई कश्‍मीर नहीं होगा। भाषा यहां एक ओर संवाद का माध्‍यम है तो वहीं दूसरी ओर यह लाेगोंं को आपस में जोड़ती भी है। यह पहचान का काम करती है। कश्‍मीरी भाषा की चुनौतियों को लेकर उनका कहना था कि कश्‍मीरी भी कई चुनौतियों का सामना कर रही है। उर्दू और अंग्रेजी बहुत तेजी से अपना स्‍थान बना रही हैं और समय के साथ कश्‍मीरियों का भी कश्‍मीरी जुबान के प्रति रुझान भी बदला हैै। हम पर एक प्रकार से सांस्‍कृतिक हमला हो रहा है, ऐसे में हमें अपनी भाषा बचानी होगी। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम दूसरी भाषाओं से नफरत करें। हमें दूसरी भाषाओं काे भी सीखना होगा। दुनिया और तकनीक की अनदेखी नहीं की जा सकती। इसके अलावा हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था भी ऐसी होेनी चाहिए जो मातृभाषा का प्राथमिकता दे। उन्‍होंंने अनुवाद के महत्‍व को भी खास तौर पर रखा।


तब आती है कश्‍मीरी होने पर शर्म

प्रो राही से विदा लेते समय मैंने उनसे ऐसा सवाल पूछा जो मैं आफिस से निकलते समय सोच कर निकला था। मैंने पूछा कि आपको कब भारतीय होने पर गर्व होता है और कब कश्‍मीरी होने पर शर्म आती है। यह सवाल सुनते ही प्रो राही के शांत और मुस्‍कुराते चेहरे के हाव भाव बदल गए और बोले- यह बहुत तीखा सवाल है। फिर थोड़ी देर सोच कर उनका कहना था कि मैं गांधी के देश का हूं, यह मेरे लिए गौरव की बात है और जब भी कश्‍मीर में किसी बेगुनाह का लहू बहता है तो उनको अपने कश्‍मीरी होने पर शर्म आती है। एक ओर घटना का जिक्र मैं विशेष रूप से करना चाहूंगा। बात सन 2008 की है। पूरी रियासत श्री अमरनाथ भूमि विवाद की आग में जल रही थी। पूरी रियासत दो पक्षों में बंट चुकी थी। हमारे संपादक चाहते थे कि रियासत के महत्‍वपूर्ण सााहित्‍यकारों से बात कर इस विषय पर लेख छापा जाए। इसका जिम्‍मा मुझे दिया गया। मैंने सबसे पहले दिल्‍ली फोन कर साहित्‍यकार पदमा सचदेव से बात कर लेख तैयार किया जो अखबार के संपादकीय पेज पर छपा। उसके बाद मैं चाहता था कि इस विषय पर कश्‍मीरी साहित्‍यकार से बात की जाए। मैंने श्रीनगर प्रो राही के घर फोन मिलाया और फोन भी संयोग प्रो राही ने ही उठाया। मैंने कहा कि पूरी रियासत के जो हालात है, मैं उनसे इस विषय पर विस्‍‍तार से बात करना चाहता हूं। उस पर उन्‍होंने अपनी असमर्थता व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि ऐसे हालात में कुछ भी कहना उनके लिए उचित नहीं रहेगा। खैर, उस समय घाटी के हालात भी बहुत ज्‍यादा संवेदनशील थे। मैंने भी शुक्रिया करते हुए रिसीवर को नीचे रख दिया।
जम्‍मू कश्‍मीर के श्रीनगर में छह मई 1925 को पैदा हुए कश्‍मीरी कवि, अनुवादक और आलोचक प्रो रहमान  राही का निधन नौ जनवरी 2023 को 97 साल की आयु में हुआ।  


प्रस्‍तुति: कुमार कृष्‍ण शर्मा

94191-84412

( फोटो गूगल की मदद से विभिन्‍न साइट से साभार लिए गए हैं) 

Thursday, December 8, 2022

फरीदा खानम- सुर सरहद की बंदिशों के मोहताज नहीं

 

सन 1988-89 की बात होगी। उस समय रियासत जम्‍मू कश्‍मीर में दूरदर्शन के अलावा पाकिस्‍तान टेलीविजिन देखा जाता था। कारण भी साफ था। उस समय टीवी सिग्‍नल ही इन्‍हीं दोनों चैनेलों के ही आते थे। वहीं, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि दूरदर्शन की तुलना में रियासत के अधिकांश घरों में पाकिस्‍तान टीवी के सीरियल ज्‍यादा मकबूल थे।

सीरियल के अलावा पीटीवी पर ऐसे कई कार्यक्रम चलते थे जिनमें पाकिस्‍तान के मशहूर गायक गजलें या नज्‍में पेश करते थे। मल्लिका-ए-तरन्‍नुम बेगम अख्‍तर, उस्‍ताद मेंहदी हसन, उस्‍ताद अमानत अली खान, इकबाल बानो, हामिद अली खान, मल्लिका पुखराज, गुलाम अली, शौकत अली खान, ताहिरा सईद, आबिदा परवीन, उस्‍ताद नुसरत फतेह अली, अत्‍ताउल्‍लाह खान, महनाज़, आरिफा सिद्दिकी कुछ आदि ऐसे नाम हैं जिनसे पहली बार मेरी मुलाकात पीटीवी के माध्‍यम से ही हुई। 

ऐसी ही एक गजल गायिका जिससे पीटीवी के माध्‍यम से मेरा राबता हुआ वह थीं क्‍वीन आफ गजल कही जाने वाली फरीदा खानम। फ़य्याज़ हाशमी की लिखी गजल- आज जाने की जिद न करो, अतहर नफ़ीस की लिखी- वो जो इश्‍क हमसे रुठ गया, फैज अहमद फैज की लिखी- शाम--फिराक अब न पूछ आदि फरीदा खानम की कुछ गाई ऐसे गज़ले थीं जिनको मैं अकसर गुनगुनाता रहता था। उस समय कभी सोचा भी नहीं था कि जिन चेहरों को मैं पड़ोसी देश के टीवी चैनेल पर देखता रहता हूं, उनमें से किसी एक से भी मिलना कभी नसीब होगा।



सुर सरहद की बंदिशों के मोहताज नहीं

बात तीस मार्च 2007 की है जब मुझे खबर मिली कि फरीदा खानम मंदिरों के शहर जम्‍मू में पहुंची हुई हैं। उस समय मैं अमर उजाला के साथ पत्रकार के तौर पर काम करता था। मुझको जब इस बात का पता चला कि वह हरि निवास पैलेस पर रुकी हुई हैं तो मैं दोपहर बाद करीब एक बजे हरि पैलेस पहुंच गया। वहां पहुंचा तो पता चला कि फरीदा जी शहर देखने निकली हुई हैं, जल्‍द आ जाएंगी। फरीदा जी का इंतजार मेरी सोच से भी ज्‍यादा लंबा निकला। वह चार बजे के करीब होटल पहुंचीं।

आप जमीन के उस हिस्‍से पर खड़ी हैं जो दोनों देशों के बीच तनाज़े का सबब है, उनसे मिलते समय दुआ सलाम के बाद मैंने आपनी बातचीत की शुरुआत सीधे इसी प्रश्‍न से की। इस सवाल पर उनका कहना था कि वह इस तल्‍खी से दुखी है। सियासत उनका मज़मून नहीं है। फिर भी वह यह कहना चाहती हैं कि सियासत दूरियां पैदा करने की चाहे जितनी कोशिश करे, सुर सरहद की बंदिशों के मोहताज नहीं होते। कलाकार को जो मोहब्‍बत और इज्‍जत अपने देश में मिलती है, उससे ज्‍यादा अपनापन और दीवाने दूसरे मुल्‍क में मिलते हैं। फनकार हर धर्म, जाति और देश से उपर होता है। दोनों देशों को चाहिए कि वह अपने झगड़े आपस में बैठ कर सुलझाएं।

 

खान साहिब की हूं मुरीद, फराज-फैज महबूब शायर

भारत रत्‍न बिस्मिल्‍लाह खान की फरीदा खानम खासतौर पर मुरीद हैं। उनका कहना था कि उनके बारे में जो भी कहा जाए वह कम है। उनको सुनना सबके नसीब में नहीं है। वह उन चंद खुशनसीब लोगों में से हैं जिनको खुदा ने खान साहिब की शहनाई सुनने का मौका बख्‍शा है। उनको सुनना अलग ही जोन में चले जाने जैसा है। फरीदा खानम जो की एक गजल गायिका हैंसे उनके महबूब शायरों के बारे में पूछना बनता था। इस बाबत उनका कहना था कि फैज अहमद फैज और फराज अहमद उनके महबूब शायर हैं। 

जब मेंहदी हसन का जिक्र करते लगाए कानों को हाथ

मैं खुद उस्‍ताद मेहंदी हसन का दीवाना हूं। इसलिए मैंने फरीदा खानम से मेंहदी हसन के बारे में खास तौर पर पूछा। उस समय उस्‍ताद जी छाती के संक्रमण के चलते बीमार थे। उनका जिक्र करते समय फरीदा खानम की आवाज भर आई। सम्‍मान में फरीदा खानम ने दोनों कानों का हाथ लगाते और अपनी कुर्सी से थोड़ा उठते हुए मेंहदी हसन का नाम लिया। उन्‍होंने दुआ में हाथ उठाते हुए कहा कि खुदा उनका जल्‍द आराम फरमाए। उस समय मैंने जो बात सीखी वह थी कि कैसे एक बड़ा कलाकार दूसरे बड़े कलाकार का सम्‍मान करता है।

बात बात में मैंने उनसे काफी देर से आने का जिक्र भी किया। उनका कहना था कि जम्‍मू में वह शॉपिंग के लिए गईं थीं। इस शहर में इतना कुछ अच्‍छा है कि उनको समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्‍या कुछ खरीदें और क्‍या नहीं। उनको समय का ध्‍यान ही नहीं रहा और उन्‍होंने चार घंटे इसमें लगा दिए।

 

प्रस्‍तुति और फोटोग्राफ: कुमार कृष्‍ण शर्मा

94191-84412

फरीदा खानम का फोटो उनके फेसबुक पेज से साभार लिया गया है। ) 

 

Thursday, November 3, 2022

जगजीत 'काफ़िर'

जगजीत 'काफ़िर' पंजाबी, हिंदी और उर्दू में लिखते हैं। तीस जुलाई 1979 को पंजाब के लुधियाना शहर में जन्‍मे जगजीत की किताब जल्‍द प्रकाशित होने वाली है। कमाल के शायर और इंसान जगजीत विभिन्‍न मंचों, दूरदर्शन और आकाशवाणी पर काव्‍य पाठ कर चुके हैं। उनकी कुछ रचनाओं को पूरे सम्‍मान के साथ पहली बार 'खुलते किवाड़' पर साझा कर रहा हूं। 


# लोगों की असली फितरत से मयखाना ही वाकिफ हैं
बेहतर बेहतर लोग वहां पर कितना बदतर खुलते हैं


ग़ज़ल

ख़्वाबों की ऐशगाह में मख़मूर मस्त लोग
और इक तरफ़ हयात से बेज़ार पस्त लोग

हैरत है इतने इल्म ज़हानत के बावजूद 
अपनी अना से खा गए कैसे शिकस्त लोग 

इनको नहीं पता कि कमाई भी चाहिए 
सांसों को खर्च करने में ही हैं व्यस्त लोग 

अच्छे दिनों के ख़्वाब की कीमत तो देख ले
कैसे चुका सकेंगे भला तंग दस्त लोग

इनमें सलाहियत है कि ज़ंजीरें तोड़ लें 
अपनी फना से दूर हैं बस एक जस्त लोग

आओ जो मेरे पास तो सीने में आग हो
रहते हैं इस दयार में आतिश-परस्त लोग

काफ़िर को अब भी याद हैं, मोमिन भुला ना दें 
अपना कफ़न पहन के खड़े सर-ब-दस्त लोग





ग़ज़ल

वस्ल की रात ढल गई, चांद भी घर चला गया
वक्त को रोकते मगर… महव-ए-सफ़र चला गया

कितनी अजीब बात है, हम पे ये सानिहा हुआ 
दर्द-ए-हयात रह गया, दर्द-ए-जिगर चला गया

वो भी तो एक दौर था, जबकि हिरास-ए-कब्र थे
अब जो फ़ना शनास हैं, मौत का डर चला गया

हमसे वो सुर्खरू हुआ हाय इस इत्मीनान से 
उसने बस अलविदा कहा और वो घर चला गया

तुमसे है इल्तिजा मेरी, कुछ तो ख़्याल-ए-यार हो
शम्मअ बुझाई जाए अब, एक पहर चला गया

हम भी ग़ज़ल सरा रहे, हमने भी शे'र कह लिए 
जिस पे उबूर था कभी, अब वो हुनर चला गया 

काश वो देख ले कभी काफ़िर-ए-कम-नसीब को
जिसकी अना भी मर गई और ये सर चला गया




ग़ज़ल

दुनिया भर में रोज़ ही कितने इल्म के दफ़्तर खुलते हैं
लेकिन अब तक जान ना पाए, कहां मुकद्दर खुलते हैं

हासिल और महरुमी में सब फ़र्क पता चल जाता है
दरिया वाले लोगों को जब सहरा के दर खुलते हैं


इश्क़ यकीनन हमको ऐसी आंख अता कर देता है
पस-मंज़र के पीछे हैं जो, वो भी मंज़र खुलते हैं

सजदे आंसू और निदामत चौखट तक महदूद रहे
किस्मत वाले होते हैं जो उन पर ही दर खुलते हैं

अंबर को तकते रहते हैं आशिक शाइर और फ़क़ीर
ये वो खिड़की दरवाजे हैं जो बस पल भर खुलते हैं 

लोगों की असली फितरत से मयखाना ही वाकिफ हैं
बेहतर बेहतर लोग वहां पर कितना बदतर खुलते हैं

इल्म, रियाजत और इबादत जब अपनी तक़मील चुनें
रफ्ता रफ्ता नफ़्स की इस कश्ती के लंगर खुलते हैं

मूसा होना हम जैसों के बस की बात नहीं काफ़िर
नूरी हो जो उस पर ही उस नूर के पैकर खुलते हैं




ग़ज़ल

अभी भी झिझक? ये सोच विचार? वहशत-ए-दिल?
तड़प के अभी सनम को पुकार, वहशत-ए-दिल

ये रंग-ए-हिरास और निखार वहशत-ए-दिल
उसे भी सुने ये चीख़ पुकार वहशत-ए-दिल

तू चल तो सही हम उसकी गली में रक्स करें 
अब और कहां मिलेगा क़रार वहशत-ए-दिल

वो जान-ए-ग़ज़ल कहीं तो मिले, कभी तो मिले
कि जिसके लिए हम आज हैं ख़्वार वहशत-ए-दिल

इसी में तुझे मिलेगी तेरी फना या बक़ा  
अलम को पकड़, सुकूं को नकार वहशत-ए-दिल

उन्होंने अगर वुजूद तेरा क़ुबूल किया 
तो क्यों ना रहे तू शुक्र गुज़ार वहशत-ए-दिल

ये हासिल-ए-इश्क काफ़िर-ए-नामुराद से पूछ
कहां की निजात? कैसी फरार? वहशत-ए-दिल



ग़ज़ल

चंद लम्हों की कहानी और बस फिर अलविदा।
आँसुओं की राएगानी और बस फिर अलविदा

एक सजदा मुन्तज़िर है आरज़ू के जा-नमाज़
इक दुआ है आज़मानी और बस फिर अलविदा

मैं अभी उलझा हुआ हूं उसके लहजे के सबब
इंकिशाफ़ उसकी ज़ुबानी और बस फिर अलविदा

आते आते आ गई है जिंदगी तक़मील पर,
एक रस्म-ए-जावेदानी और बस फिर अलविदा

ख़ुद की ही तहरीर मुझ पर एक दिन ऐसे खुले,
ओढ़ लूँ अपना मआनी और बस फिर अलविदा

ऐ ज़मीं वालो यहां पर दाइमी कुछ भी नहीं
इक इशारा आसमानी और बस फिर अलविदा

ज़िंदगी के मंच पर अशआर क़ाफ़िर पढ़ चुके,
रह गया मक्ते का सानी और बस फिर अलविदा




ग़ज़ल

मेरा ज़ब्त और ना आज़मा, मुझे मार दे
मुझे यूं ना तोड़ ज़रा ज़रा, मुझे मार दे

तेरी बेरुखी, तेरी नफरतें भी क़ुबूल हैं
तेरे सामने हूं खड़ा हुआ, मुझे मार दे

तेरे हिज्र ने मेरी वहशतों को जगा दिया
मुझे और कुछ नहीं सूझता, मुझे मार दे

ये जो मौत है, ये निजात है मेरे वास्ते
मैं हूं ज़िन्दगी से डरा हुआ, मुझे मार दे

तुझे इस अना ने जिता दिया या हरा दिया
इसे बाद में कभी सोचना, मुझे मार दे

तेरे साथ ही मेरी ज़िन्दगी भी चली गई
तो अब ऐसे जीने में क्या मज़ा, मुझे मार दे

तेरे बिन जहान में क्या करुं, मेरे हमनफ़स
तुझे कर रहा हूं ये इल्तिज़ा, मुझे मार दे

तुझे देख कर किसी रोज़ तुझपे जो मर मिटा
वही काफ़िर आज ये कह उठा, मुझे मार दे




ग़ज़ल

ये ज़मीं ये आसमां ये कहकशां कुछ भी नहीं
सब फना की क़ैद में हैं जावेदां कुछ भी नहीं
 
है, मेरे ही दूर उफ़तादा किसी गोशे में है
वुसअत-ए-कौनैन हूं मैं, ये जहां कुछ भी नहीं

मैं बड़ी मुश्किल से समझा हूं कज़ा के राज़ को
बर्क-ए-रक़्सां के मुक़ाबिल आशियां कुछ भी नहीं

ज़िन्दगी तख़रीब और तामीर का ही खेल है
इल्म वालों को जहां की गुत्थियां कुछ भी नहीं

ऐ परिंदो इन परों में ज़र्फ़ तो पैदा करो
हसरत-ए-परवाज़ को ये बेड़ियां कुछ भी नहीं

ज़हर भी गर हिकमतन लें तो दवा बन जाएगा
इस जहां में देखिए तो राइगां कुछ भी नहीं

यार की गलियों में घुंघरू बांध कर भी नाच लूं
इश्क़ में काफ़िर मेरी खुद्दारियां कुछ भी नहीं



संपर्क
जगजीत 'काफ़िर' 
मोबाइल: 9877590282
ई-मेल: jagatairtel@gmail.com

प्रस्‍तुति और फोटोग्राफ: कुमार कृष्‍ण शर्मा
94191-84412