Wednesday, February 14, 2024

मृदुला सिंह

पूर्व प्रकाशन-  वागर्थ, हंस ,सांस्कृतिक पत्रिका लोकबिम्ब, जन संदेश, छपते छपते, छतीसगढ़ आस पास, मड़ई, पाठ, प्रेरणा, लोक सृजनकविता विहान,जनपथ, छत्तीसगढ़ मित्र, समकालीन जनमतअन्विति, मधुमती तथा रचनाकार आदि में लेखकविताएँ लघुकथा का प्रकाशन

आगामी प्रकाशन - हंस के फरवरी अंक मे कविता प्रकाशित होने की एवं साहित्य अकदमी राजस्थान की पत्रिका मधुमती मे कहानी के प्रकशन की सूचना

 
Ø कोरोना काल विशेष .' दर्द के काफिले '  कविता संकलन (सं कौशल किशोर) में कविताएँ प्रकाशित
Ø जिंदगी जिंदाबाद (सं. रीमा चड्डा दीवान)  में कहानी 'ताले 'का प्रकाशन
Ø मराठी, और अंग्रेजी भाषा मे कविताओ का अनुवाद और प्रकाशन


प्रकाशित
पुस्तक

1.सामाजिक संचेतना के विकास में हिंदी पत्रकारिता का योगदान ( संपादन)
2 मोहन राकेश के चरित्रों का मनोविज्ञान ( पुस्तक)
3.पोखर भर दुख (कविता संग्रह) 2021 में प्रकाशित
4. अंधकार के उस पार (मुक्तिबोध पर केंद्रित (संपादन)
5. तरी हरी ना ना (संपादन) (छत्तीसगढ़ की स्त्री कहानीकारों की कहानियों का संकलन )
 

Ø आकाशवाणी अम्बिकापुर से वार्ताएं और साक्षात्कार का प्रसारण
Ø रायपुर दूरदर्शन  से कविता पाठ का प्रसारण
Ø महत्वपूर्ण मंचो से कविता पाठ
Ø प्रगतिशील लेखक संघ अध्यक्ष ,सरगुजा इकाई



एक
 पीली दुपहरी वसंत की

 

मेरी स्मृतियों में ठहरी है

वसंत की एक पीली दुपहरी

 जब सरसों के खेतों में 

 बिखेर दी थी तुमने अपनी उज्जर हंसी

 और कच्ची सड़क के दूसरी ओर

 गेंहूँ के खेत हरियर हो उठे थे

 तुम्हे याद है  वह बँसुहार

 जिससे खरीदी थी तुमने कंघी

 मैने कहा था क्या तुम बांसुरी नहीं बनाते

 वह हैरान देखता रह गया था

 जमीन पर सजी अपनी दुकान

 रास्ते मे अमरूद बेचती औरत ने

 ज्यादा तौला था अमरूद

 तुमने भी मूल्य समझा था

 होड़ लगी हो जैसे तुम्हारे बीच

 एक दूसरे को अधिक देने की

 सरई के पेड़ों पर मैना मुस्कुराई थी तब

 और पुटुस जगमगा रहे थे

 अमराइयों में  गईं हैं बौरें

 उमग आया है वसंत  

 आओ हम भी लौट चलें गांव

 कि बंजर होती दुनिया मे

 पीली हंसी और हरियर प्रेम

 उपजता रहे

 बनी रहे मन की नमी

 

ताकि बचा रहे नाम का अर्थ


क्षा नौ

मामूली सा सरकारी कमरा नं पांच

बारिश थमी है अभी

और खिड़की पर थिरकती

सुनहरी धूप में गुम

एक साधारण सी लड़की

हिदी के नए शिक्षक की हाजिरी में

अपने नाम की पुकार से चौंक जाती है

 
बहुत खूब!

किसने रखा है तुम्हारा नाम

जानती हो अपने नाम का अर्थ ?

तुम्हारे नाम में छुपा है भाव

बीहड़ मे कोमल के सृजन का

आगे का समय कठोरतम होगा

शब्द की तरह जीवन से

खत्म हो जाएगी कोमलता 

 

लड़की ! करना अपने नाम को सार्थक

फैलाना सब तरफ प्रेम की उजास

जहाँ नरमी  है वहां नमी है

है वहीं शेष कुछ मानवता

पूरी कक्षा हंस रही थी मन ही मन

और वह लड़की पैर के नाखूनों पर

नजरें टिकाए सोच रही

कि आगे कैसे बचाएगी वह 

प्रेम भरी ओस सी आंखें

और लोक की नरम जमीन

नाम के अर्थ तक पहुँचना

कहाँ है इतना आसान

 

अब भी जब कोई पुकारता है उसका नाम

उसे याद जाती है

वर्षों पहले गुरु की दी नसीहत

डर जाता है उसका मन

कि पत्थर होते  समय  में

जमा होती मुश्किलों की काई को धोना

कितना मुश्किल जब

 

फाइनल ईयर की लड़कियां

 

मुस्कुराती हैं

खिलखिलाती हैं

स्कूटी के शीशे में

खुद को संवारती

कॉलेज बिल्डिंग के साथ

सेल्फी लेतीं है

फाइनल ईयर की लड़कियां

 

ग्राउंड स्टाफ से सीखती हैं

जीवन का पाठ

विषमताओं से जूझने की कला

उनके मन के सपने

नीली चिड़िया के साथ

उड़ जाते हैं दूर आसमान में

 

भूगोल के पन्ने पलटते

कर लेती हैं यात्राएं असंभव की

सेमिनार और असाइंमेंट में उलझती

कविता की लय में

तिनके सी बहती

वर दे, वीणावादिनी वर दे

की तान में

सबसे प्यारा हिंदुस्तान की

लय के साथ

रस विभोर हो जाती

जी लेती है क्षणों को

 

निबंध और पोस्टर लेखन मे

नारी जीवन का मर्म अंकित करती

ये फाइनल ईयर की लड़कियां

अंतिम साल को जी लेने की

कामना से भरी

विदा के मार्मिक क्षणो में मांगती हैं

बिन बोले आशीष गुरुओं का

वे

खुश रहो ! के मौन शब्द

पढ़ लेती हैं और मुस्कुरा देती हैं

 

नीले पीले दुपट्टों वाली

गाढ़े सपनो वाली

तीन सालों की पढ़ाई के बाद

जाने कहाँ चली जाती है

ये फाइनल ईयर की लड़कियां।

 



बापू के चश्मे के पार की नायिकाएं 

 

सड़क पर देखा मैने

सच का करुण चेहरा

स्वच्छता मिशन की खाँटी नायिकाएँ

ठसम ठस्स कचरे से भरे रिक्शे

खीचते चल रही थी जांगर खटाते

क्या यह सबका पाप धोने वाली

पुराणों से उतरी गंगाएँ हैं?

नहीं ये औरतें हैं

इसलिए लोग इन्हें

कचरावाली कहते हैं

मां कहलाने के लिए तो

नदी होना जरूरी है

 

दीवार पर बना है बापू का चश्मा

वे देख रहे हैं सब

कहते हैं-

मैं ईश्वर के सबसे करीब बैठता हूँ

देखता हूँ कि ईश्वर के काम करने का ढंग

ठीक इनके जैसा है

 

स्वच्छता का

राष्टीय पुरस्कार मिला है शहर को

उसमें इनके ही पसीने की चमक है

पर पसीने की चमक से

पेट की भूख

और सम्मान का उजाला नही बढ़ता

इंसान गुजरते जाते हैं किनारे से

पर गौरव पथ के बीच लगे पौधे

करते हैं यशोगान इनका

चमचमाती सड़क

स्वागत करती है बाहें फैला कर

 

अरे देखो!

चौक की हरी बत्ती भी अब बोल पड़ी

जाओ, जल्द निकलो

मांगो अपना वाजिब हक

कि दुनिया सिर्फ

महंगे रैपरों, ब्रांडेड चीजों के कवर

और बचा हुआ खाना फ़ेंकनेवालों की नही है



खुरदुरी
हथेलियों में उगा नया ग्लोब 

 

रीता ऑटो वाली मिली थी

जब पहली बार

उस रात उसकी पहली सवारी थी मैं

उसने दिखाई थी मुझे

जीवन की कुछ परछाइयां

चौक चौराहों से भागती स्ट्रीट लाइटों के बीच

 

सादा दुपट्टा ओढ़ लूं

और मौन हो जाऊं

उसके रचे एकांत को नियति समझ लूँ

चलती रहूँ जीवन की

अंधी पगडंडियों पर

मुकर्रर हुआ था यही

उसकी आखिरी सुनवाई में

 

सड़क पर नजरें जमाये

दोनो हाथों से हैंडिल थामें

यह बताते उसे नहीं था कोई विषाद

बल्कि सुनहरा तेज था सांवले रंग पर

पानी के प्रिज्म से टकराकर

पड़ी हों जैसे धूप की किरच  

वह स्त्री नहीं

सप्तवर्णी चिड़िया नजर आई मुझे

 

ठोस इरादों वाली औरते काटती हैं इसी तरह

वर्जनाओं की बेड़ियां बिना उदास हुए

समय की मार सहते

जो नहीं टूटतीं

वे बचा लेती हैं अंतस के गीत

उड़ने नही देतीं दुपट्टे का हरा गुलाबी रंग

रेत होते सपनों पर 

रोपतीं है चुटकी भर उम्मीद

ऐसी ही औरतों की आँख मे बसंत ठहरा है

जहां पीले फूल उमगते रहते हैं

 

अपने भविष्य का हरापन बचा पाना

अकेली औरत के लिए कोई खेल नही

हर पल धोते रहना है उसे

मन की खारी परतें 

लड़ती रहना है नर पिशाचों से

 

खुद के पैरों खड़ी

! नये युग की औरतों

देखो!अपनी खुरदुरी हथेलियां 

उग आया है उन में एक नया ग्लोब

भोर चल कर रही है

तुम्हारे जागने से

सुनो उसकी मद्धिम पदचाप

सब सुनों

 

 

मन की तलछट से उगी हरी धरती

 

की तलछट में

किर्च- किर्च स्मृतियो का जुटान

होता गया समय के साथ

वे सोई पडीं रहीं

बिन करवट लिए

 

कुछ स्मृतियाँ प्रेम की तरह कोमल थी

कुछ लोक की तरह सुंदर

और कुछ संघर्ष की

जो कभी नोटिस ही नही हुईं

धूपछाही समय में ये

तरंगित होती रही

मन के किसी कोने में

 

धीरे धीरे सयानी हुईं यह स्मृतियां

एक दिन सघन हो उठीं

और सुबक कर रोते रहे पहरों तक

मन के भीगे भाव

शब्दों के कांधे रख अपना सर

 

अभिव्यक्तियाँ फूटीं

स्याही बनीं

बिखर गईं सादे कागज पर

स्याही का रंग हरा हो उठा

जिसने भी पलटा उन पन्नो को

उसे धरती दिखी हरी भरी

जिसने भी पढ़ा

कहा, भाव यही हों

जो हरियर कर दें

इस लाल होती धरती को

 


गुलबिया
!

 

सुनो स्वीटी !!

तुम गुलबिया हो ?

वही जो मिली थी मुझे 

साल के हरीले वनों में

 

तुम्हारी सेमल पात सी हंसी

गुदगुदाती रही है

मेरे निराश क्षणों को..

कैसे पलक झपकते ही

कूद गई थी

पहाड़ की तराई वाली

बर्फीली नदी में

जादूगरनी हो तुम

सोचा था मैंने

 

फेंटे में बांध सावन

बीज छीटती हो खेतों में

तो सारी प्रकृति नीली हो जाती है

अपने हिस्से की खुशी

मुट्ठी में बंद किये नापती हो दूरियां

मनुष्येतर जगत की

 

बहते पानी के दर्पण मे

संवारती हो अपनी सुंदरता

गंगा इमली की पायल पहन

जब वासंती सी नाचती हो

तब पतझड़ी मौसमों की कोख में

खिलते हैं पलाशवन

 

कटे पेड़ों की ठूंठ को

छाती से लगाकर पी लिया करती हो

उनकी पीड़ा

गुलाल सी उड़ती हो बन में

महुये सी महकती हो

तुम्हारे आदिम राग से

फूल जाती है धरती की छाती

खिल जाते हैं वनफूल

 

सुनो ! इतना ही कहना है

मत आओ शहर

यहाँ व्यर्थ ही खर्च हो जाओगी

तुम्हारी सहजता को 

सोख लेगा सीमेंट का यह जंगल

बचा लो अपना नाम

भरम है   गुलबिया से स्वीटी बनना ............

 

 


मूर्ति भंजकों के प्रति

 

मूर्तियों को तोड़ने के लिए

जुटाई गई भीड़

क्या सचमुच जानती होगी

मूर्ति के विचारों को ?

कभी देखी होगी

'राज्य और क्रांति' की जिल्द

'सत्य के प्रयोग' से

हुए होंगे रूबरू

या पन्ना भी पलटा होगा

संविधान का?

 

ये नही जानते

जातिगत अपमान का दंश

नही जानते कृतज्ञता

नही जानते करोड़ों सपनों का

पसीना लगा है

इस देश को रचने में

ये सभ्यता की सीढ़ियों को हटाते

नही सोचते

कि संस्कृति का क्षरण हो रहा है

तोड़ते जा रहे

वापस लौटने के लिए बने पुल

 

मूर्ति भंजको के अट्हास में

विध्वंस का संदेश प्रसारित होता है

वर्तमान की लड़ाई इतिहास से करते

इन्हें पता नही

भविष्य इनकी पीढ़ियों के सामने

इन्ही खंडित मूर्तियों को रखेगा

अमानत के रूप में

 

पर क्या नाश के पक्षगामी

तोड़ पाते है मूर्तियों के विचारों को ?

क्योंकि जितनी प्रचंडता से

उनके विग्रह पर चलते हैं हथौड़े

उतनी ही प्रखरता से वे

जी उठते है हर बार

पहुंचते हैं जन जन तक

 

सोचती हूँ मूर्तिभंजन की संस्कृति

किस भूमि में उपजती है

कौन सिरज रहा होता है इतनी नफरत

संवैधानिक देश में यह काली पताकाएं

कट्टरता की नई व्याख्याएं हैं

ये हवा हैं रुकेंगी नही

गुजरने दो सर ऊपर से

दिल थामे रहो

ये हवा बदलेगी एक दिन


मृदुला सिंह
सम्प्रतिअंबिकापुर
मोब. 6260304580

Sunday, February 4, 2024

फ़िलहाल 6 - निदा फाजली


... प्रिय ! 
जानती हो ...
मीलपत्थरों का नहीं होता
कोई भी अंत
और जिन्हें समझते हैं हम खनिज जीवन के
वे सभी पा लिए जाने के बाद भी/
हमें अपनी कथाओं से मुक्त नहीं करते हैं...


****
अबकि, कुछ श्रृंखलाएं संस्मरण आधारित। क्रम चलता रहेगा। **** 

'कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई,
आओ कहीं शराब पिएं रात हो गयी ।' ( निदा फ़ाज़ली ) 

वह एक हसीन सी शाम थी। रेडियो कश्मीर, जम्मू ने 'अखिल भारतीय मुशायरे' का आयोजन किया था। कई नामचीन हस्ताक्षर उपस्थित थे। मुंबई से 'निदा फ़ाज़ली', 'सरदार अली जाफ़री' और शेष राज्यों से भी बड़े- बड़े कवि। मुशायरा देर से शुरू हुआ। अंत में निदा जी आए और महफ़िल लूट ली। रात उरूज पे थी। वे, इस बीच अपने किसी पटियाला के शागिर्द से शराब के इंतजाम के बारे में बोल चुके थे, शायद उसे पैसे भी दिए थे। मैं किसी काम से हॉल से बाहर आया था।अचानक एक आदमी हांफते हुए मेरे पास आया तथा शराब की दुकान तक ले चलने के लिए बोला। मैंने पूछा, "क्यों" तो कहने लगा कि निदा जी के लिए शराब खरीदनी है। उन दिनों जम्मू में रात के ठीक 9 बजे शराब की तमाम दुकानें बंद हो जाती थीं। मैंने स्कूटर स्टार्ट किया व 'ज्यूल चौक' आया। 9 बजने ही वाले थे। उसने पता नहीं किस ब्रांड का अधिया (हाफ़) खरीदा तथा मुझसे कहा कि उसे भी पीनी है। जम्मू में खुलेआम शराब- नोशी की सख़्ती से मनाही थी। मैं एक परिचित ढाबे वाले के पास गया और चिरौरी करके उस आदमी के लिए गिलास-पानी जुटाया। देखते-देखते वह पूरा अधिया गटक गया तथा साधिकार स्कूटर की पिछली सीट पर सज गया। मैं हतप्रभ। बहरहाल, वापस अकादमी आए। मुशायरा बाकमाल रहा था।
रात गहरा चुकी थी। रेडियो-स्टेशन के निदेशक बेहद भद्र युवा सज्जन थे- मुस्लिम, जो शराब को हराम मानते थे। अकादमी के दरवाज़े से बाहर आते ही, निदा जी ने चारों ओर निगाह घुमाई। शागिर्द का कहीं अता- पता ही न था।उन्होंने, स्टेशन-डायरेक्टर से पूछा, "शराब का क्या इंतज़ाम है? "उसे तो जैसे सांप सूंघ गया हो। निदा जी का पारा चढ़ने लगा, वे गुस्से में थे। सारे श्रोता निकल चुके थे। मैं एक ओर खड़ा था और निदा जी की बगल में वरिष्ठ पत्रकार/चिंतक 'बलराज पुरी' जी खड़े थे। वे धीमे से बोले, " मेरे घर में स्कॉच पड़ी है।आपको ऐतराज़ न हो तो मेरे साथ चलें।" पुरी जी ने अपना लँब्रेटा स्कूटर अकादमी की पार्किंग में लगाया हुआ था। ईद आने वाली थी तथा रोज़े चल रहे थे। निदा जी और सरदार साहिब के ठहरने का इंतज़ाम जम्मू - यूनिवर्सिटी के गैस्ट- हाऊस में था। सरदार साहिब चले गए थे। एक कोई और व्यक्ति निदा जी के साथ था, जिसने रोज़े रखे थे।रेडियो स्टेशन की गाड़ी पुरी जी के घर की ओर चल पड़ी। मुझे पुरी जी ने पीछे -पीछे आने को कहा। उनसे प्रगाढ़ संबन्ध थे। ना नहीं कह सकता था। घर पहुंच पुरी जी की पत्नी ने बेहद प्यार से साथ आए आदमी के लिए खाना बनाया। उसने रोज़ा खोला, फिर चला गया। रेडियो स्टेशन की गाड़ी भी जा चुकी थी । रात, रंगीन थी। निदा जी मूड में। रात का डेढ़ बजे चुका था। अचानक निदा जी जाने का कहने लगे। उन्होंने लगभग ज़िद पकड़ ली। पुरी जी अब कुछ नहीं कर सकते थे। मैंने कहा कि मेरे स्कूटर के पीछे बैठ जाएं, आपको छोड़ दूंगा। हम यूनिवर्सिटी पहुँच गए। रात के इस समय, बाहर का ही गेट बंद था। शुक्र है, अंदर के कमरे में कुछ गार्ड बैठे थे। आतंकवाद के उस चरम दौर में किसी ने गेट न खोला। मैंने अपना 'कश्मीर टाईम्स' का रेफरेंस दिया, तो गेट खुला। हम अंदर आए। अंदर गैस्ट-हाऊस का गेट भी बंद था तथा कोई गार्ड भी नहीं था।निदा जी, सरदार साहिब के पास जाने की रट लगाए थे, कि अचानक गेट के जंगले पर चढ़ने लगे। शुक्र है गिरे नहीं। गेट ने न खुलना था और न ही खुला।
रात के दो बज चुके थे। मैंने आग्रह किया कि मेरे घर चलें। अंततः, वे माने। मैं, त्रिकुटा- नगर में किराए के मकान में रहता था। हम दोनों ने खाना नहीं खाया था। एक बात तो भूल गया कि घर की ओर आते हुए मैंने निदा जी से हिंदी-गद्य को लेकर अपना ज्ञान बघारना शुरू किया, वे चुप रहे। घर आकर पत्नी को जगाया, वे बेटे को सुलाते-सुलाते सो गई थीं। बताया कौन आया है...खाना बना। किराए का घर, छोटे कमरे और निदा जी जैसा बड़ा शायर तथा नासमझ सा मैं। सुबह उठे। सर्दी थी। मैंने सर पर लोई लपेटी व निदा जी को ले यूनिवर्सिटी की ओर चल पड़ा। गैस्ट-हाऊस के कमरे में घुसते ही, सरदार अली जाफ़री ने मुझे कैंटीन का कोई कारिंदा समझ, चाय के दो कप लाने का हुक्म दिया। निदा जी मेरा परिचय देने लगे तथा इस परिचय में वे हिंदी-साहित्य, गद्य, कविता पर विस्तार से बोले। मैं भौचक, इतना ज्ञान, ऐसी समझ, कमाल की याददाश्त। मुझे पता चल चुका था, बड़े लोग दरहक़ीक़त क्यों बड़े होते हैं। कुछ साल बीते, निदा जी एकबार फिर मुशायरा पढ़ने जम्मू आए। तब तक मैं उनका प्रिय हो चुका था, तो साधिकार जम्मू- विश्विद्यालय के हॉल के पीछे जाकर उनसे मिला। बेहद खुश हुए। कालांतर में मेरा तबादला मुबई हो गया। निदा जी के साथ गहरी अंतरंगता हो चुकी थी। इसका एक प्रसंग ही काफी है: एक बार, एक प्रकाशक मुंबई मेरे घर आए। निदा जी का लेखन चाहा। उन्होंने, बिना किसी अग्रिम राशि के कंट्रेक्ट साईन कर दिया। उस प्रकाशक ने बाद में भी कोई राशि दी या नहीं, कभी ज़िक्र न किया।उनके साथ मुंबई में एकाधिक महफ़िलें सजीं, जिनमें अक्सर कहते कि, 'उस रात, मुझे लगा तुम कोई आतंकवादी हो, जो मुझे अगवा करके ले जा रहे हो। फिर सोचा, चलो यह अनुभव भी ले लें। 'और गड़ाका मार हँस पड़ते। 

"सिखा देती हैं चलना ठोकरें भी राहगीरों को, 
कोई रस्ता सदा दुश्वार हो,ऐसा नहीं होता ।"
(निदा फ़ाज़ली)


-मनोज शर्मा
7889474880

Friday, January 26, 2024

रोहित ठाकुर


दोनों 


दोनों साथ खड़े हैं पुरी के समुद्र तट पर 

वे समुद्र को देख रहे हैं मैं उन्हें देख रहा हूँ 

दोनों कितने स्थिर हैं कितने पास-पास

क्या पता वे नाप रहे हों समुद्र से गहरे अपने प्रेम को

वे क्या यह कहने आये हैं समुद्र को -

जब हम दूर होते हैं एक- दूसरे से तो समुद्र की तरह ही अशांत हो जाता है हमारा हृदय 

मैं उन दोनों प्रेमियों के बीच कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहता 

चाहता हूँ असंख्य बरसों तक ये दोनों आते रहें इसी तरह 

मैं उन दोनों प्रेमियों पर लिख सकता हूँ असंख्य कविता

अगर वे इसी तरह प्रेम में डूबे आते रहें 

और 

मुझे दिखाईं दें 

दिल्ली- कलकत्ता- सूरत कहीं भी मिल सकते हैं प्रेम में डूबे लोग 

बहुत छोटी जगहों पर मसलन बस्ती - दरभंगा- कौसानी में 

एक ही आकाश के नीचे मिलते हैं 

सबसे बेखबर ये प्रेम करने वाले |




मज़दूर की कमीज़ 


मजदूरों का एक समूह कई महीनों से एक निर्माण कार्य में लगा है

वे गर्मी के दिनों में आये बरसात में रहे और इस जाड़े के बाद भी शायद कुछ दिनों तक रुकें

उनके समूह में कई लड़के हैं 

वे किसी दिन गीत गाते हुए काम करते हैं और हँसते हैं 

शाम को आती है उनसे मिलने उनकी औरतें 

ये लड़के साफ और नये फ़ैशन के कपड़े पहनते हैं 

घूम आते हैं साथ आस-पास के बाज़ार

औरतें लौट जाती हैं 

देर रात खाना पकाते हैं और कपड़े साफ करते हैं ये नये लड़के

कई दिनों तक चुपचाप काम करते हुए दिखते हैं 

मैं इन्तज़ार करता हूँ इनकी हँसी की इनके गीतों की

अचानक एक दिन वे फिर हँसने लगते हैं गाते हैं कोई गीत 

वह शाम कितनी देर से आती है कितनी देर से आती है उनकी औरतें | 



कोरोमंडल एक्सप्रेस 


कोरोमंडल एक्सप्रेस पटरी से उतर कर पलट गई है

बहुत साल पहले की एक बात अचानक याद आती है

पिता मद्रास इसी रेलगाड़ी से जाते थे

हम बहुत छोटे थे 

उस समय पटना तक दक्षिण से कोई रेलगाड़ी नहीं आती थी

पिता कहते थे दौड़ती हुई कोरोमंडल एक्सप्रेस के डब्बे में 

किसी यात्री के लिए खड़ा रहना बहुुत मुश्क़िल काम था

बचपन में सपने में कई बार कोरोमंडल एक्सप्रेस में बैठा 

कई बार रात में डर से नींद खुल जाती थी 

पिता को गुजरे हुए कई बरस हो गए 

कोरोमंडल एक्सप्रेस को भूल गया मैं

पटरी से उतर गई है कोरोमंडल एक्सप्रेस 

न तो पिता बैठे थे और न ही सपने मे मैं जाकर बैठ गया था

फिर भी कल से कई बार रूलाई छूटती है 

हर आदमी से कहे फिर रहा हूँ-

किसी रेलगाड़ी को पटरी से उतर कर पलटनी नहीं चाहिए |




कविता एक सार्वजनिक जगह है जहाँ हम मिल सकते हैं 


मेरी कविता तक जो आया वह मेरा शत्रु कैसे है

कविता तो मेरा घर है 

जो घर आया वह मेरा शत्रु कैसे है 

कविता में मैं कामना कर सकता हूँ कि जो मेरे घर आयें

वे आबाद रहें 

मेरी कविताओं की तरलता उनकी मनुष्यता को सूखने न दे

कविता की रोशनी में कोई भी आधी रात को भी मेरे घर आ सके 

इतनी रोशनी हो कि किसी को चलते हुए ठेस न लगे 

कविता प्रेम और आन्दोलन के लिए एक रास्ता है 

जिस पर ज़रूरत पड़ने पर सब चलें 

कविता एक सार्वजनिक जगह है जहाँ हम मिल सकते हैं।



बेटी की चिट्ठियाँ 


बेटी जब छोटी थी तो मुझे चिट्ठी लिखा करती थी

मैं घर के एक कमरे में होता था और वह दूसरे कमरे में

कभी हम दोनों एक ही कमरे में होते थे 

फिर भी वह चिट्ठी लिखती थी

ऐसा बेटी ही कर सकती है

उन कई चिट्ठियों में वह मेरा रेखाचित्र बनाती थी

उन रेखाचित्रों में कोई समरूपता नहीं थी 

पर मैं उन सभी के जैसा होना चाहता हूँ |



दिसंबर की धुंध कितनी निष्पक्ष है


दिसंबर की धुंध कितनी निष्पक्ष है

सब कुछ ढंक लेती है 

कुछ भी नहीं दिखाई देता

न आदमी न देवता न दिशा 

ओह! जीवन ओस की बूंद की तरह ठंडी 

और समय किस तरह निश्चेत पड़ा हुआ है 

निस्तेज है उगे सूरज की आभा 

एक बस तुम्हारी याद है गतिशील 

जो धँसी है मेरी आत्मा में 

जल रही है दिसंबर की आग की तरह |





अभी बक्सर दूर है दूर है आरा पटना बहुत दूर है 


उदास सर्द रातों में गुजरती है रेल 

काँपती है उसकी आवाज सन्नाटे में 

सुनाई देती है नींद में 

नींद से होकर गुजरती हुई रेल की रोशनी में 

मैं बदलता हूँ करवट देखता हूँ घड़ी में समय 

अभी बक्सर दूर है दूर है आरा

पटना बहुत दूर है 

घर दूर है और दूर हो तुम

दूर रहा नहीं जाता

नींद में गुजरती है घर जाने वाली रेल

बक्सर जाने वाली पटना जाने वाली रेल

सर्द रातों में ठोस लोहे की रेल शीत में भीगती है

हम भीगते हैं ऑंसू में |



रिक्शावाले 


जिस शहर में रहा कुछ रिक्शा चालकों से जान-पहचान होती रही

उनसे बात करना हमेशा अच्छा लगा 

वे मेहनत की कमाई खाते हैं और घर से दूर घर को याद करते हैं 

जैसे मैं दूसरे शहर से आया था उसी तरह वे भी परदेशी थे 

कुछ नये रिक्शा चालकों को शहर के कई इलाकों की जानकारी नहीं थी 

वे मेरी ईमान पर किराया छोड़ देते थे

एक रिक्शा चालक शर्मिला था जब भी उसके रिक्शा पर बैठता था 

वह मुस्कुराता था और कहता था कि वह रिक्शे को बहुत सजाकर रखता है 

मैं उसके रिक्शे की तारीफ करता था और वह फिर मुस्कुराता था

रिक्शा खिंचते हुए कई गाते थे 

कुछ घर की बात बताते 

पर सब के सब अपनी गिरती सेहत और बढ़ती महंगाई को लेकर हताशा से भर जाते

हम कभी साथ चाय पीते और फिर मिलने की बात कह कर शहर में खो जाते ।




नाव नदी की आँखों जैसी लगती हैं
 

नावों ने नदियों का साथ कभी नहीं छोड़ा

बेतवा को अमावस में जब पार किया तो जान पड़ी बिल्कुल अकेली

एक छोटी सी नाव नदी के साथ डोल रही थी

आत्मा पर जो एक भार था वह जैसे कम हो गया 

अकेलापन किसी का भी हो भला नहीं लगता 

चंबल नदी में नाव का नाविक जो गीत गा रहा था 

उसका चेहरा नदी के बेटे की तरह था 

नर्मदा में कईं बार नावों को देखा और इस तरह नर्मदा तक गया कई बार 

गंगा को अकेले बहते हुए नहीं देखा है कभी

बनारस और पटना में गंगा को कोई छू सकता है 

एक नाव पर यात्रा कर

नदियों को याद करते हुए नाव याद आते हैं 

जैसे 

तुम्हें याद करते हुए घर की याद आती है 

हमारा घर भी एक छोटा सा नाव है 

जो डोलता रहता है तुम्हारी हँसी की नदी में  |


रोहित ठाकुर 

मोबाइल नम्बर : 6200439764

मेल आईडी : rrtpatna1@gmail.com


Sunday, December 31, 2023

फ़िलहाल 4 - कविता किसी सरलीकृत परिभाषा में नहीं ढलती


विता दरहक़ीक़त क्या है? किसके लिए है? लिखी क्यों जाती है? कविता से होगा क्या? कविता बुनी, बनाई जाती है, कहीं ऊपर से उतरती है अथवा स्वतः प्रस्फुटित होने वाली कोई क्रिया है? कविता के बीज - सूत्र कौन से होते हैं? क्या कविता निज तत्व को पुनः प्राप्त करने की प्रक्रिया है? कविता कहां मानीखेज है कहां नहीं? कविता, कवि को कितना धारण करती है? क्या कविता कोई फार्मूला हो सकती है? ऐसे बीसियों प्रश्न हैं। कविता को किसी सरलीकृत परिभाषा में ढालना लगभग कठिन है।

यदि कविता की परंपरा में जाएं, आदि - कविता को उठाएं, तो कविता उससे भी पहले मनुष्य के होश में विद्यमान मिलती है। वह उल्लास में रही, तो रुदन में रोयी भी। वह संस्कारों में रही, तो हरेक धर्म की पूजा - अर्चना, उपासना इत्यादि में रही। वह लोक - संस्कार है। लोक - मानस में महकती है।
हिंदी - कविता ने बहुत युग देखे हैं और एक सुदीर्घ परंपरा इसके पास है। मेरा मंतव्य हिंदी - कविता के इतिहास को पुनः उलीकना कतई न है। मैं चाहता हूं, मौजूदा दौर में कविता के बहाने से अपने विचार साझा करूं।
इस समय विश्व में एक ओर युद्ध व हथियारों की बेच का माहौल है, तो दूसरी ओर दक्षिणपंथी ताकतें, पूरी तरह से मुस्तैद हैं। नित्य नयी बीमारियां फैल रही हैं। हर जगह मंहगाई चरम पर है। एक महामारी जो निर्मित की गयी; उसने जीवन ही नहीं ग्रसे, लोगों के जीवनुपार्जन के साधन तक ध्वस्त कर दिए। इतनी चीखो - पुकार के बावजूद बौद्धिक - समाज शांत सा है। मीडिया के पास तयशुदा कार्यक्रम हैं। सोशल - मीडिया भी ख़ास तरह से संचालित किया जा रहा है। स्कूल, चिकित्सालय, कचहरियां, धार्मिक - संस्थान वगैरह दोहन केंद्रों में बदल चुके हैं, और कहीं कोई सुनवाई अब नहीं होती। ज़ुर्म बढ़ते जा रहे हैं। आत्ममुग्धता, राजनेताओं की पहचान बन चुकी है। ऐसा ही और भी बहुत कुछ है, तो कविता क्या कर रही है ? मूलतः कवि शीर्षक अपनी कविता में; अविनाश मिश्र इसका उत्तर देते हैं: 

| मूलतः कवि |

ततायियों को सदा यह यक़ीन दिलाते रहो 
कि तुम अब भी मूलतः कवि हो 
भले ही वक़्त के थपेड़ों ने 
तुम्हें कविता में नालायक़ बनाकर छोड़ दिया है 
बावजूद इसके तुम्हारा यह कहना 
कि तुम अब भी कभी-कभी कविताएँ लिखते हो 
उन्हें कुछ कमज़ोर करेगा।


कविता सदा से समाज सापेक्ष रही है। कविता, राजनैतिक - सांस्कृतिक प्रक्रिया है। वह अपने समय के अंतर्विरोधों से संघर्ष करती है। मुख्यतः मानव के पक्ष में खड़ी होती है। समय से सीधे जुड़ती है। अभिव्यक्ति का औज़ार है। मुक्ति का नाद है। विमर्श है। त्रासदियों का बयान है। चेतना है। संघर्ष है। यह जीवन-आख्यान रचती है। सर्वहारा के लिए एक प्रामाणिक स्रोत है। निरंतर गतिशील है। वह आत्मगत कतई नहीं, जनपक्षधर है। प्रतिकार है। दायित्व - बोध और सामूहिकता है। यहां चमत्कारिता या वाग्मिता का कतई स्थान नहीं, एक तरह का वर्ग - संघर्ष है, इतिहास - बोध है, अपनी ज़मीन से चुतरफ़ा जुड़ाव है। देखें, विजया सिंह की एक कविता कहाँ जुड़ती है:

| लाल बेर और मोटा नमक |

लाल बेर और मोटा नमक सभ्यता के दायरे में नहीं 
उन्हें अब भी डूँगर और रेत पसंद हैं 
कम पानी वाली जगहों और तमाम कच्चे रास्तों पर 
वे अपने आप उग आते हैं 
सिर्फ़ बकरियाँ और ऊँट उन तक पहुँच पाते हैं 
और वे जो स्कूलों में नहीं 
उमस भरी गर्मियों, मेलों और सरकारी स्कूलों के बाहर 
पार्कों के आवारा और बच्चे 
पानी में भीगे लाल बेर और मोटा नमक 
चटखारे ले-लेकर खाते 
आत्मा के उस छोर की ओर लौटते हैं 
जहाँ बीहड़ अब भी ज़िंदा हैं 

कोई नदी इस आमंत्रण पर उफान में आती है 
उसके किनारे गोता लगाना 
स्फिंक्स की प्रतिमा के ठीक नीचे पहुँचना है 
स्फिंक्स की नाक टूटी है और आँखों में दया नहीं 
है तो सिर्फ़ प्रचंड कौतूहल

उसकी पहेलियाँ अब भी 
उन रास्तों की ओर धकेलती हैं 
जहाँ घर छोड़ते हुए भी, 
घर ही की ओर लौटना है। 


कविता, जनपदों की परिभाषा है। यह 'मैटाबोलिक रिफ्ट' को भाषा के ज़रिए तोड़ते हुए लोकधर्मी संवेदना की ओर बढ़ना है। जब चेतना तक का पदार्थीकरण किया जा रहा हो, तब कविता ही स्त्रियों, किसानों, दलितों, श्रमिकों के हित में संवाद करती है। सत्तारूढ़ सामाजिक ताकतों के ख़िलाफ़ विरोध रचती है। कालजयी है। इसे नष्ट नहीं किया जा सकता। यह जीवनानुभव है और जीवंत तर्क भी है। हिमाचल में रहने वाले प्रदीप सैनी की एक कविता पढ़ें:

| या |

गातार गहराता है शीत
पहले से ज़्यादा गिरती है बर्फ़ हर रोज़
मैं धीरे-धीरे एक विराट और निर्जन हिमनद हुआ जाता हूँ

कुहरा घना है हर तरफ़
अँधेरा एक दूसरे अँधेरे से अँधेरे में मिलता है गले
उनकी आहट तो होती है शक्ल नहीं दीखती

बिना किसी प्रकाश के शापित है मेरी धवलता
या तो ऊष्मा का स्पर्श बचाएगा मुझे या फिर
किसी स्पर्श की ऊष्मा

उस बर्फ़ से बदनसीब कुछ भी नहीं
जिसकी क़िस्मत में नहीं है पानी होना।
   
इधर जब कविता - आलोचना कविता केंद्रित न होकर, चेहरा - केंद्रित हो चुकी हो। अधिकांश कवि इक - दूजे की ही पीठ खुजला रहे हों। तब मैं युवा - कविता की ओर देखता हूं और मुझे दिलासा मिलता है कि यह गहन अंधकार में दिए की लौ सा है। यहां मौलिकता है। नयी तर्ज़ व तमीज़ है। कहने के नए ढंग हैं और गहन जिजीविषा है। यह विषयों को छूकर ही नहीं निकलती, उनमें साधिकार दाखिल होती है तथा अपने लहजे में दो टूक है। यह कविता की नयी चेतना है, जो अपने संप्रेषण में मनुष्य के निकट है व उसे प्रत्येक फ्रेम में खोजती है। यह प्रकृति से सजीव जुड़ाव है। वस्तु - जगत का पुनः सृजन करती है यह हारे की उम्मीद है। इसके पाठ के साथ ही इसका सायास वरण होता है। यह हिंदी - कविता की ऐसी उम्मीद है, जो नैरेटिव बदल देती है। दिल-आकार के चेहरे वाली निम्न उद्धृत कविता तथाकथित चाँदों को आईना दिखा देती है:

| रात को होस्टल में एकदम अकेले रहते हुए
(कमल जीत चौधरी)

अँधेरे ने मुझे अपने सुरक्षित घेरे में ले रखा है
पेड़ पर बैठे उल्लू की आँखों में नई दुनिया खुल रही है...
दो सौ सत्तर डिग्री घूमती नज़र
दिल के आकार का चेहरा
चार उंगलियाँ
तेज़ कान
बाल
दाढ़ी
और जादुई आवाज़ों की यह रात

मैं डूबती जा रही हूँ...
पत्तों से छनकर 
मेरे बिस्तर पर आने वाले दिलफरेब चाँद,
देखो,
उल्लू की कलाओं ने मुझे कैसे बचा रखा है। 
  

मेरे निकट यदि कोई कवि अपनी ज़मीन, अपनी लोक - संस्कृति के साथ अंगीकार होता है, तो मौलिक उपस्थिति दर्ज़ कराता है। यहां कविता कलात्मक नक्काशी की फार्मूला - कविता से कहीं बाहर होती है। जम्मू-कश्मीर के कवि कुमार कृष्ण शर्मा की कविता उद्धृत कर रहा हूँ:
 

| उसका ज़िक्र

सके डोगरी लोक गीतों जैसे
चेहरे को पढ़ कर ही
मैंने लिखी है
कविता
उसकी तुबंकनारी* जैसी
गुफ़्तगू सुन कर ही
मैंने समझी है
ग़ज़ल

उसका
कविता गजल का वजूद
मानो
वितस्ता का ठंडा पानी
तवी के गर्म पत्‍थरों से
टकरा कर उछल जाए
जैसे
लल**
के वाख को
कोई भाख*** के सुरों में
पिरो कर गा दे
जैसे
डल के ठहरे पानी में
चिनाब का यौवन मिल जाए। 

उसकी
रोउफ**** जैसी चाल को
देख कर ही
मैंने किया है कुड*****
उसकी
बर्फ जैसी खामोशी को सुन
मैंने समझी है
गर्म हवाओं के थपेड़ों की भाषा

उसका रोउफ बर्फ जैसा सिरापा
जैसे
चिल्ले कलान की बर्फ में
ज्येष्ठ की लू मिल जाए
जैसे
शीन मुबारक
कोई बैसाखी के ढ़ोल की थाप पर दे रहा हो
मानो
पतझड़ के चिनार के तंबेई रंग में
कोई कच्चे आम की खटास मिला जाए 

उसको पढ़ लेना
उससे बात कर लेना
संग उसके चलना
उसकी खामोशी से गुफ्तगू करना
कविता पढ़ लेना है
गजल लिख लेना है
नाच उठना है
मुस्कुराना है...

*तुंबकनारी - कश्मीर  का लोक वाद्य यंत्र
**लल - कश्मीर की महान शिव भक्त
***भाख- डोगरों की लोक गायन शैली
****रोउफ- कश्मीर की लोक नृत्य शैली
*****कुड- डोगरों की लोक नृत्‍य शैली