Saturday, June 29, 2013
संगीत
17 दिसंबर को जन्मी संगीत ने फिलहाल किसी भी मंच से न ही कभी पढ़ा है और न ही उनकी कोई रचना किसी पत्रिका में प्रकाशित हुई है। संगीत का कहना है कि उन्होंने इस बारे में कभी सोचा नहीं क्योंकि उनको नहीं लगता कि उनकी कविताओं में कोई खास बात है। लेकिन उनकी कविताओं को पढ़ते समय ऐसा नहीं लगता। उनकी कविताओं को पढ़ना स्त्री की विभिन्न भावनाओं के साथ रूबरू होने जैसा है। संगीत का अपना व्यवसाय हैं। पिता स्व. जसवंत सिंह सेना में सेवारत थे जबकि मां पीके बाली पंजाबी की साहित्यकार हैं। अनंत शुभकामनाओं और इस डगर पर स्वागत के साथ प्रस्तुत हैं इनकी तीन कविताएं।
उत्तराधिकारी
क्षण प्रति क्षण
व्यतीत हुआ जाता है जीवन
व्यय हो रही हूं मैं।
इन सबके बीच
अभी भी समेट रखा है
मैंने कहीं
तुम्हारा प्रेम भरा वह पहला स्पर्श
कोमल
अपनत्व भरा
तुम्हारे देह की मादक गंध
श्वासों की सुगंध...
मेरे पूर्ण व्यय हो जाने के बाद
यही तो एक धरोहर है
जिसका कोई भी
उत्तराधिकारी नहीं होगा।
सुनहरी याद
कितनी सुदंर यादें समेटे
जिस्म पर जंग ही जंग लपेटे
आज खामोश खड़ी है
मेरे पापा की साइकिल
मेरे बचपन की संगिनी
कैरियर पर मेरा बस्ता बांध
स्कूल के लिए छोड़ती
घर का द्वार
स्कूल के बाहर पहुंचते ही
पापा की स्नेहिल पुकार
बिट्टू... क्या खाएगी दिन में
पापा झट से
अपने पैंट की जेब टटोल
रख देते मेरे नन्हें हाथों पर
एक अठन्नी (कुबेर के खजाने से भी ज्यादा)
मैं सरपट भागती स्कूल की ओर
अपनी आंखों से
ओझल हो जाने तक
पापा निहारते रहते थे
बस मेरी ओर...
जाने कब धूप छांव से गुजर गए दिन
मुट्ठी में रेत से सरक गए साल
यह लंबा अंतराल
दे गया मुझे
भूमि, भवन, सोना, चांदी, कार
हताश हो कर
मैं आज भी ढूंढती हूं
है कोई ऐसा
जो लेकर मेरा यह सब
बस लौटा सके मुझे
मेरे पापा की
जेब वाली
प्यारी सी अठन्नी
मैंने देखा है
उसे
मैंने
दोनों तरह से
खुश होते देखा
अपनी पत्नी का
मनचाहा गर्भ
पाने पर
अपनी प्रमिका का
अनचाहा गर्भ
गिराने पर
संपर्क -
sangeetbali08@gmail.com
(कुछ चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)
Sunday, June 16, 2013
तरुण
11 फरवरी 1977 को दिल्ली में सैनिक के घर जन्मे तरुण की रचनाओं में विरोध का स्वर बहुत तीखा होता है। कालेज से ही लेखन के कार्य में संलग्न रहे हैं। 'कवि बनने से पहले' कविताओं का लघु संग्रह 1998 में प्रकाशित हुआ। तरुण कवि के साथ साथ कहानीकार भी हैं।
प्रस्तुत कविताएं उनके काव्य संग्रह 'रात खामोश है' (अभियान प्रकाशन, हरियाणा) से साभार ली गई हैं। काव्य संग्रह 'रात खामोश है' लीबिया के राष्ट्रीय मुक्ति योद्धा उमर मुख्तार को समर्पित है।
असुरक्षित देश
मेरे देश की सुरक्षा ऐसी नहीं
जिसके लिए तोप टैंक या
आण्विक शस्त्र का निर्माण किया जाए
मेरा देश तब तक असुरक्षित है
जब तक कलुए का बाप बिना जुर्म थाने में
पिटता है
उसकी मां एक गठरी घास के लिए
जमींदार के यहां सोती है
और जब तक मेरे गांव के बच्चे
गोबर में से गेहूं को बीनते हैं
तब तक यह देश असुरक्षित है
और मेरे देश का दुश्मन सरहद पार नहीं
बल्कि खुद दिल्ली है
जो धोखा देने के लिए खुद दुश्मन दुश्मन चिल्लाती है।
गुजारिश
मैं नहीं कहता
आप कोई क्रांति करें
इस समाज को बदलें
या मार्क्सवाद पढ़ें
पर इतना जरूर कहूंगा
आंख, कान और जुबान होते हुए भी
अंधे, बहरे और गूंगे बने रहना
कोई अच्छी बात तो नहीं।
अब हम हाकिमों के गीत नहीं गाएंगे
अब हम हाकिमों के गीत नहीं गाएंगे
अब हम अपने ही गीत गाएंगे
क्योंकि
राजाओं की महफिलों में गाने वाले
कभी न गाएंगे
हमारी गुलामी हमारी उदासी हमारी पीड़ को
अपने गीतों से
इसलिए अपने गीत हमें खुद ही गाने होंगे
टूटे-फूटे, आधे-अधूरे बेशक बेसुरे
हम उन्हें गाएंगे
पर हम हाकिमों के गीत नहीं गाएंगे
महत्वकांक्षा
मैं कोशिश करता हूं
आकाश को अपने आगोश में लेने की
गिर जाता हूं जमीन पर
संभलने पर पाता हूं
आकाश की तरफ फैली बाहें
और उनमें हवा का एक छोटा सा टुकड़ा।
मैं और रात
खामोश और अकेली रातों में
मैं अक्सर उठ कर बैठ जाया करता हूं
जब सपनों की बौछारों से
आंखे भीग जाती हैं
मैं मन को समझाता हूं
इतने सपनों का क्या करोगे
पर मन कहता है
यह रात है
यहां चला नहीं जा सकता
जब तक रास्ते के ऊपर अंधेरा छाया है
इसिलए रात में
सिर्फ सपने देखे जाते हैं
रोशनी की जरूरत के बारे में
मैं फिर लेटकर सोने की कोशिश करता हूं
शायद सपने में कोई मुसाफिर मिल जाए
हाथ में मशाल लिए।
(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)
Saturday, June 8, 2013
मोहन सिंह
साहित्य अकादमी पुरस्कृत मोहन सिंह डोगरी साहित्य में जाना-पहचाना नाम है। साहित्यकार, रंगकर्मी और एक्टिविस्ट मोहन सिंह अपनी मिट्टी, डुग्गर, भेदभाव, अन्याय और हाशिए पर खड़े व्यक्ति की बात को हमेशा जोर से उठाते हैं। डुग्गर मंच के संस्थापक भी हैं। राजनीतिक चेतना इनकी रचनाओं का अहम हिस्सा है। नुक्कड़ नाटकों का मंचन एक ओर उपलब्धि। स्पष्ट और सीधी बात करना इनके व्यक्तित्व का सबसे अहम हिस्सा है। लिखने का अपना अलग अंदाज। इनकी रचनाओं को सुनना या पढ़ना गुप्प अंधेरी डरावनी रातों में सवेरे के आने या फिर हथियार एक तरफ रख थकावट से चूर गुरिल्ला यौद्धा में क्रांति का गीत सुन कर आने वाली नई जान के जैसा है।
मोहन सिंह की चौदह से ज्यादा रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें कविताएं, नाटक, गजल, नुक्कड़ नाटक, गीत आदि शामिल हैं। दो अनुवाद (मछेरे 1995, तषकी शिवशंकर पिल्ले के उपन्यास का डोगरी अनुवाद और मुक्तिबोध 2001, जैनेंद्र कुमार के हिंदी उपन्यास का डोगरी अनुवाद) और दो संकलन (वेदपाल 'दीप' रचना संसार 2003 और केहरि सिंह 'मधुकर' रचना संसार 2012) भी इनके नाम हैं।
हाल ही में उनकी कविताओं पर आधारित किताब 'लारें दे तबारें च' का विमोचन किया गया। उसी किताब में से प्रस्तुत हैं चार रचनाएं
(वह दोस्त जो डोगरी नहीं जानते हैं का सुझाव है कि डोगरी या अन्य भाषा की रचनाएं देते समय अगर उनका हिंदी में भावार्थ दिया जाए तो रचनाओं को ज्यादा लोग समझ पाएंगे और इन भाषाओं के साहित्यकारों की सोच, चिंताओं, चुनौतियों समेत अन्य पहलुओं से रूबरू हो पाएंगे। इसलिए डोगरी रचनाओं का हिंदी भाषा में भावार्थ दिया जा रहा है। यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।)
रवाज (रिवाज)
बब्ब मरै तां पुत्तर साम्भै
(बाप मर जाए तो बेटा संभाले)
पुत्तर नेईं तां धी।
(बेटा नहीं तो बेटी।)
धी नेईं तां नूंह् जां लाड़ी
(बेटी नहीं तो बहू या पत्नी)
बाकी जान तवी।
(बाकी जाएं तवी)
बाकी जान तवी ते भामैं
(बाकी जाएं तवी या फिर)
खड़िया खट्टा जान*।
(चारपाई को खड़ा करके जाएं।)
अड्डियां गोड्डे भन्नन अपने
(ऐडियां घुटने तोड़े अपने)
मुल्ख दुहाई पा।
(देश भर में दुहाई दें।)
चिड़ियां रौला पान ते तां केह्
(अगर चिड़ियां शोर डालें तो क्या)
टली जंदा ऐ बाज।
(बाज टल जाता है।)
लोकें दा ऐ राज एह् भाइया
(लोगों का राज है भैया)
लोकें दा ऐ राज।
(लोगों का है राज।)
लोकें दे इस राज च चलदा
(लोगों के इस राज में चलता)
इ'यै इक रवाज।
(यही है एक रिवाज)
(*डुग्गर में प्रचलित मुहावरा जिसका अर्थ है- हाथ में कुछ नहीं आना)
सब किश किन्ना अपना (सब कुछ कितना अपना)
घाह्
(घास)
मच्छर
(मच्छर)
मौंगनी।
(मौंगनी- मच्छर की एक किस्म।)
गिट्टे
(टखने)
डुंडू
(कलाईयां)
कन्न।
(कान।)
डींगू
(डैंगू)
वायरल
(वायरल)
टिक्कियां
(टिक्कियां)
टीके
(टीके)
पोस्टर।
(पोस्टर।)
फिल्टरड
(फिल्टरड)
मिनरलड
(मिनरलड)
टिनड।
(टिनड्)
संगोष्ठियां
(संगोष्ठियां)
सम्मेलन
(सम्मेलन)
कैंप।
(कैंप।)
अमला
(अमला)
गड्डियां
(गाड़ियां)
बोचर
(बोचर)
तस्वीरां
(तस्वीरें)
भाषण
(भाषण)
ब्यान
(बयान)
रकमां।
(रकम)
धामां
(दावतें)
डकार।
(डकार)
कूलर
(कूलर)
एसी
(एसी)
सप्रे।
(स्प्रे।)
नींद्रां
(नींद)
सुखने
(सपने)
निरोगता।
(निरोगिता)
घाह्
(घास)
चिक्कड़
(कीचड़)
सड़ैन।
(बदबू।)
सब किश किन्ना अपना
(सब कुछ कितना अपना)
सब किश किन्ना फायदेमंद।
(सब कुछ कितना फायदेमंद)
गिट्टें कोला कन्ने तोड़ी
(टखनों से लेकर कानों तक)
रखदा ऐ चतन्न
(रखता है चौकन्ना)
हुशियार
( होश्यिार)
खबरदार
(खबरदार)
ते दिंदा ऐ डरावे
(डराता है)
मलेरिया
(मलेरिया)
डींगू
(डैंगू)
ते वायरल दे।
(और वायरल से)
सब किश किन्ना अपना
(सब कुछ कितना अपना)
सब किश किन्ना परमानंद।
(सब कुछ कितना परमानंद)
बोचरें कोला लेइयै
(बोचरों से लेकर)
डकारें तोड़ी
(डकारों तक)
रखदा ऐ पूरा ख्याल
(पूरा ख्याल रखता है)
हर साल
(हर साल)
ते दिंदा ऐ बरदान
(और देता है वरदान)
होने दा मालामाल
(मालामाल होने का)
हर साल
(हर साल)
हर साल
(हर साल)
घाह्
(घास)
चिक्कड़
(कीचड़)
सड़ैन।
(बदबू)
मक्खी
(मक्खी)
मच्छर
(मच्छर)
मौंगनी।
(मौंगनी-मच्छर की एक किस्म)
संसद
(संसद)
सांसद
(सांसद)
मंत्री।
(मंत्री)
बोज्जे
(जेबें)
ढिड्ड
(पेट)
संदूख।
(संदूख)
तिकड़म
(तिकड़म)
सट्टे
(सट्टे)
फुरतियां।
(चालाकी)
शिक्षा
(शिक्षा)
अमन
(अमन)
विकास।
(विकास)
रिश्ते
(रिश्ते)
मित्तरो-कोठियां
(दोस्तियां)
झोल्ली-चुक्क दलाल।
(चाटुकार दलाल)
सब किश किन्ना सैह्ज
(सब कुछ कितना सहज)
सब किश किन्ना हेजला।
(सब कुछ कितना लाडला)
सांसद कोला मंत्री तोड़ी
(सांसद से लेकर मंत्री तक)
बख्शदा ऐ तेज
(बख्शता है तेज)
करदा ऐ मेहर
(करता है मेहरबानी)
दिंदा ऐ सकत
(देता है सामर्थ)
करने दी लैहर-बैहर
(खुशियां और बहार लाने की )
अपने अंदर-बाहर
(अपने अंदर और बाहर)
ते
(और)
समझांदा ऐ
(समझाता है)
अर्थ
(अर्थ)
अर्थ-व्यवस्था दा
(अर्थ-व्यस्था का)
अर्थ-परनाली दा
(अर्थ-परनाली का)
अर्थ-हीनता जनेई
(अर्थ-हीनता जैसी)
फाश गंदी गाली दा
(नंगी गंदी गाली का)
ते
(और)
अपने आले-दुआलै
(अपने आस-पास)
टैह्कदी
(बैठती)
खुशहाली दा
(खुशहाली का)
घुटाले
(घोटाले)
हवाले
(हवाले)
साम्मियां
(बपौतियां)
जनता दा बरलाप।
(जनता का विलाप)
सब किश किन्ना सम्मना
(सब कुछ कितना समाने वाला)
सब किश चौरे-पैहर।
(सब कुछ चारों पहर)
सब किश किन्ना अपना
(सब कुछ कितना अपना)
सब किश मेरै शैहर।
(सब कुछ मेरे शहर)
चिक्कड़
(चिक्कड़)
मच्छर
(मच्छर)
मलेरिया
(मलेरिया)
तिकड़म
(तिकड़म)
रिश्ते
(रिश्ते)
वोट...
(वोट...)
माऊ दी मनशा {एक} (मां की मंशा {एक})
मेरी मां नैं मिगी दस्सेआ हा
(मेरी मां ने मुझे बताया था)
जे मैं
(कि मैं)
निक्के होंदे थथलांदा हा
(छोटे होते हकलाता था)
ते गल्ल करते घबरांदा हा
(और बात करते घबराता था)
इसकरियै
(इसलिए)
रौंह्दा हा अक्सर घुमसुम
(अकसर गुमसुम रहता था)
जां दिखता रौंह्दा हा
(या देखता रहता था)
बिटबिट
(टिकटिकी लगाए)
हर कुसा पास्सै
(हर किसी की तरफ)
मेरी मां नैं मिगी दस्सेआ हा
(मेरी मां ने मुझे बताया था)
निक्के न्यानें
(छोटे बच्चे)
दुनियां भरा दे निक्के न्यानें
(दुनिया भर के छोटे बच्चे)
शुरू-शुरू च तुतलांदे न
(शुरू-शुरू में तुतलाते हैं )
ते फी तुरतुरे होई जंदे न
(और बाद में तेज-तरार्र हो जाते हैं)
एह् कुदरत दा नियम ऐं
(यह कुदरत का नियम है)
किश म्हातड़ थथलांदे न
(कुछ मेरे जैसे हकलाते हैं)
ते पूरी उम्र थथलांदे रौंह्दे न
(और सारी उम्र हकलाते रहते हैं)
गल्ल करने कोला घबरांदे रौंह्दे न
(बात करने से घबराते रहते हैं)
एह् शरीरिक कमजोरी ऐ
(यह शारीरिक कमजोरी है)
तत्वें दी कमी ऐ
(तत्वों की कमी है)
मधुकर* होर भी
(मधुकर {सम्मान के साथ} भी)
निक्के होंथे थथलांदे हे
(छोटे होते हकलाते थे)
एह् गल्ल
(यह बात)
मधुकर हुंदी मां नै
(मधुकर की मांग ने)
उ'नेंगी दस्सी होग
(उनको बताई होगी)
इ'यां गै जि'यां
(ऐसे ही जैसे)
मेरी मां नैं मिगी दस्सेआ हा
(मेरी मां ने मुझको बताया था)
जे मैं
(कि मैं)
निक्के होंथे थथलांदा हो
(छोटे होते हकलाता था)
ते कुतै
(और कहीं)
पूरी उमर थथलांदा गै नीं रमां
(पूरी उम्र हकलाता ही न रहूं)
इसकरियै सुक्खी ही जीभ ^
(इसलिए मेरी जीभ की मन्नत मांगी थी)
अपनी आस्था दे द्वार
(अपनी आस्था के दरवाजे पर)
तां जे मिगी जीभ थ्होई सकै
(इसलिए कि मुझे जीभ मिल सके)
जेह्डी बोल्लै साफ ते स्पश्ट
(जो साफ और स्पष्ट बोल सके)
सच्च ते बेबाक।
(सच्च और बेबाक)
मैं अपनी मां दा स्हानमंद आं
(मैं अपनी मां का अहसानमंद हूं)
जे उसदे यत्नैं
(कि उसके यत्नों से)
थ्होई मिगी एह् तौफीक
(मुझको यह सामर्थ मिल सका)
जे मैं बोल्ली सकां
(कि मैं बोल सकूं)
जुल्म दे खलाफ
(जुल्फ के खिलाफ)
नां-इंसाफी दे बरुध
(नाइंसाफी के विरुद्ध)
ते हक्का दे हक्का च
(और हक के हक में)
मेरी माऊ दी खुशवा इ'यै मनशा ही।
(मेरी मां की शायद यही मंशा थी)
* केहरि सिंह मधुकर - डोगरी के वरिष्ठ साहित्यकार
^ डुग्गर की मान्यता है कि अगर कोई बच्चा हकलाता या तुतलाता हो तो उसके अभिभावक देव स्थान पर जा कर मन्नत मांगते हैं। बच्चे की जुबान ठीक होने पर अभिभावकों को उसके बदले में देवता को चांदी या सोने (सामर्थ अनुसार) की जीभ अर्पित करनी होती है।
नांह्-नुक्कर (आनाकानी)
कदूं तक्कर
(कब तक)
आखर कदूं तक्कर
(आखिर कब तक)
करनी ऐं तूं नांह्-नुक्कर
(करनी है तुमने आनाकानी)
मेरे अधिकार कोला
(मेरे अधिकार से)
बड्डी नीं ऐ तेरी नांह्-नुक्कर
(तुम्हारी आनाकानी बड़ी नहीं है)
इक न इस दिन
(इक न इक दिन)
तुगी मननैं गै पौंनी ऐं
(तुमको माननी ही पड़ेगी)
मेरी गल्ल
(मेरी बात)
झुकना गै पौंना ऐं
(झुकना ही पड़ेगा)
मेरे निश्चे दे अग्गैं
(मेरे निश्चय के आगे)
की जे एह् पक्का ऐ
(क्योंकि यह पक्का है)
अटल ऐ असल ऐ
(अटल है असल है)
मेरे आंगरा
(मेरी तरह)
दुनियां दे कुसा बी
(दुनिया के किसी भी)
मेहनतकश दी मेहनत आंगरा
(मेहनतकश की मेहनत की तरह)
जंग जित्तने आस्तै जंदे
(युद्ध जीतने के लिए जा रहे)
कुसा सपाई दे
(किसी सिपाही के)
जजबे आंगरा
(जज्बे की तरह)
लैहरें कन्नै लड़ियै पार पुज्जने दी
(लहरों के साथ लड़ कर पार पहुंचने की)
कुसा मलाह् दी
(किसी मल्लाह की)
इच्छाशक्ति आंगरा
(इच्छाशक्ति की तरह)
तेरी नांह्-नुक्कर ते
(तेरी आनाकानी तो)
तेरे आंगरा गै
(तुम्हारी तरह ही)
खोखली ते अधारहीन ऐ
(खोखली और आधारहीन है)
आश्वासने ते प्रलोभने पर टिकी दी
(आश्वासनों और प्रलोभनों पर टिकी हुई)
टिकी नीं सकती मता चिर
(टिक नहीं सकती ज्यादा देर)
इक न इक दिन
(एक न एक दिन)
तुगी मननी पौंनी ऐ मेरी गल्ल
(तुमको माननी पड़ेगी मेरी बात)
आखर कदूं तक्कर
(आखिकर कब तक)
करगा ऐं तूं नांह्-नुक्कर
(करोगे यह तुम आनाकानी)
मेरे अधिकार कोला
(मेरे अधिकार से)
बड्डी नीं ऐ
(बड़ी नहीं है)
तेरी नांह्-नुक्कर।
(तुम्हारी आनाकानी।)
संपर्क -
124, डोगरा हाल
जम्मू
दूसरा पता
मंडी उड्ड (दरगाली)
गुढ़ा सलाथिया (181143)
फोन - 0-94-191-82817
(अनुवाद : कुमार कृष्णा शर्मा )
(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)
Friday, May 31, 2013
भगवती देवी
जन्म : घगवाल , साम्बा में
माँ : सुश्री कमला देवी
पिता : श्री सतपाल
शिक्षा : जम्मू वि० वि० में एम० फिल० हिन्दी की शोधार्थी
लेखन : इन्हीं कविताओं से शुरुआत
अन्य : हिन्दी विचार मंच , जम्मू की सक्रिय कार्यकर्ता
संगठन और सामूहिक सपनों को लेकर भगवती से संवाद अनिवार्य सा हो गया है। इनका आक्रोश और प्रतिबद्धता साथियों को प्रेरित करने वाली है। इन्होंने ये कविताएँ झिझकते हुए सुनाई और कहा ये कविताएँ नहीं बस एक बयान हैं। ऐसे बयान को सलाम। अनंत शुभकामनाओं और इस डगर पर स्वागत के साथ प्रस्तुत हैं इनकी तीन कविताएँ।
पृथ्वी का बयान
रबड़ के हाथ में रबड़ था
मेरे देखते ही देखते
रबड़ के हाथ
अकाश तक फैल गए
मुझे घेर कर खड़े हो गए
मैं देखती रही
देखते ही देखते
मेरी बच्ची की और बढ़ने लगे
अपना मंतव्य पूरा करने लगे
वह रोती रही
चिल्लाती रही ...
रबड़ के हाथ में इंजेक्शन थे
जिसे वे मेरी बच्ची की नस नस में
रोप देना चाहते थे
मैं असहाय मूक बन देखती रही।
रबड़ के हाथ में
मेरी बच्ची का जिन्दा गोश्त है
देखते ही देखते
निर्वासित स्त्रियों का समूह
क्रोध की ज्वाला उठाए
विवेक की मशाल जलाए
रबड़ के पास आ रहा है
रबड़ के हाथ का धर्म सिकुड़ने लगा है
समूह और पास आ रहा है।
मुझे नफरत है
मुझे नफरत है इस दुनिया से
क्यों आवाज़ उठाती नहीं
अन्याय के प्रति
मुझे नफरत है अव्यवस्था से
जो गले में फूलों का हार पहनाकर
आदमी को बुत बना रही है
क्यों सूखती आंतड़ियों में आक्रोश पैदा होता नहीं।
मैं चाहती हूँ
अव्यवस्था के लिए बनाना एक गटर
चुनना सूखी लकड़ियाँ
एक तिली
या धमाकेदार ब्लास्ट ...
मैं जानती हूँ
इन बुतों में से कुछ लोग
जिन्दाबाद के नारे लगाते - लगाते
इन्कलाब के नारे लगाने लग जाएँगे
मंच से धड़ नीचे गिरने लग जाएँगे
जिनको गिद्ध भी नोचने नहीं आएँगे
कैसे खाएँगे
गिद्ध भी हक की कमाई खाते हैं।
युद्ध
कभी था वह ज़माना
जब था हस्तिनापुर में एक द्रोणा
आज शहर - शहर में हैं उसके वंशज
ये काट रहे हैं पूरे हाथ अपने अर्जुनों के लिए ...
हे कटे हाथ वाले एकलव्यों !
अपनी कोहनियों को करो पैना
रक्त को बना दो रसायान -
युद्ध सिर्फ हाथों से नहीं लड़े जाते।
सम्पर्क : -
गाँव व डाक - घगवाल , नरसिंह मंदिर कॉलोनी
तहसील व जिला - साम्बा , जे० एंड के० {१८४१४१}
ई मेल - parul1286@gmail.com
(सारे चित्र गूगल से साभार लिए गए हैं)
प्रस्तुति : -
कमल जीत चौधरी
गाँव व डाक - काली बड़ी , साम्बा {जे० एंड के०}
ई मेल - kamal.j,choudhary@gmail.com
दूरभाष - 09419274403
Friday, May 24, 2013
हरभजन सिंह हुन्दल
जन्म - 10 मार्च 1934
शिक्षा - एमए, बीटी
संप्रति - पंजाब शिक्षा विभाग के स्कूल में अध्यापन से सेवानिवृत्त
रचनात्मक योगदान - कविता, गद्य और संस्मरणों की सत्तर से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित। सितंबर 1993 से पंजाबी त्रैमासिक 'चिराग' का संपादन। मायकोवस्की, पाब्लो नेरूदा, नाजिम हिकमत, महमूद दरवेज की कविताओं का अनुवाद।
उर्दू में 'पाकिस्तान विच दस दिन' और 'जंगनामा पंजाब' प्रकाशित। अंग्रेजी कविताओं की दो पुस्तकें प्रकाशित।
राजनैतिक वामपंथी आंदोलन में भी सक्रिय। इमरजेंसी में गिफ्तार किए गए।
महमूद दरवेश के नाम!
तुम भी अजीब चीज हो
महमूद दरवेश!
मैं पूछता हूं
'तुम्हारा गांव कहां है...
और कौन सा देश है
तुम्हारा?
कहां हैं तुम्हारी बहनें
और मां...
तुम्हारा माल-भंडार तुम्हारे खेत
तुम्हारी पुश्तैनी जायदाद?
तुम्हारे घर का नंबर क्या है...
गली का नाम
फोन नंबर...
कहां हैं तुम्हारी किताबें
तुम्हारा पासपोर्ट
कंधे से लटकता कारतूसों का झोला
तुम्हारी बंदूक?
क्या तुम्हारे पास संभालने लायक
कोई भी चीज नहीं है?
हां, तुम्हारे पास कविताएं हैं
विविधता से भरीं
जूझतीं
शहीद होतीं!
सच मानना
तुम सच में दरवेश कवि हो
मेरे पास तुम्हारी कविताएं
कई भेस बदल कर
गुरिल्ले-मित्रों की तरह पहुंचती हैं
कहते हैं-
'दरवेशों का कोई घर नहीं होता
प्रत्येक लंबी उदासी * के समय
वे कुछ भी
पल्लू में बांधकर
नहीं चलते!'
बताना जरूर
कि इस समय तुम लंदन में हो
या पेरिस में?
बेरूत में हो, या कि बसरा में या
बगदाद में...?
कुछ याद नहीं!
जहां कहीं भी हो
मेरी आवाज पर कान देना
कविता की रोशनी में
मुझे तुम्हारे रूबरू होना है
गुलाब की बात करनी है
सच की हाजिरी भरनी है
क्या है तुम्हारा और मेरा रिश्ता?
मैं जो अपनी जुबान का
एक गुमनाम कवि हूं
पर ऐसा लगता है मुझे
कि तुम तो
मेरी ही बोली के कवि हो
सूफी दरवेश
'बुल्ला' और 'बाहू'
कहां हैं तुम्हारे जैतून की शाखाएं...?
जख्मी परिंदे की गीत...
लहू भीगी, पैबंद लगी कमीज
तुम्हारे घर की दहलीज?
तंबू के सामने
चूल्हे पर खदकती दाल
जिसे खाते थे चाव के साथ तुम
तुम जिस शहर, महानगर में हो
मुझे आवाज देना
मैंने तुमसे कई राज
साझे करने हैं
मैं जो अपने ही प्यारे वतन में
निर्वासितों की तरह रहता हूं
देश का बागी बाशिंदा हूं
दूषण की काली बरसात में
भीगता परिंदा हूं
मुझे पूछना है तुमसे
कि कैसे मकई के आटे की तरह
तुम शायरी और सियासत को
गूंथकर पकाते हो
कैसे अपने दर्द को
खो गए वतन की पीड़ा में घोलकर
पीते हो, पिलाते हो?
कैसे जिंदा रहते हो?
कैसे जूझते हो?
कैसे मरते हो?
जरा बताना तो
सूली की नोक पर तुम्हें
कविता कैसे सूझती है?
ठोकरें खाते
चलते हुए
तुम्हारी कल्पना की कलम
कोरे कागज पर
कैसे चलती है?
{* गुरुनानक ने अपने जीवन में लंबी यात्राएं कीं। उन्हें दरवेश भी कहते हैं और उनकी ऐसी यात्राओं को बाबे की उदासियां लेना कहा जाता है} - अनुवादक
(अनुवाद - मनोज शर्मा, 17-10-2003 )
परीक्षा
मेरी प्रिय
सोना कुठारी में पड कर शुद्ध होता है
तो लोहा भट्टी में पड़ कर
गुलाब की रंगत भी रातों-रात नहीं चमक उठती
सरोपे लेने के लिए जवानी अर्पित करनी पड़ती है
कविता दिलों में ज्यों ही नहीं
बर्छी की तरह उतर जाती
बाल धूप में ही सफेद नहीं होते
आग के दरिया में कूदना कोई खेल नहीं
मान-पत्रों के पीछे वर्षों की कमाई होती है
जलती लाट में हाथ रखना कल्पना की बात नहीं
हमारी बोली में हथेली पर शीश रखना
सिर्फ मुहावरा ही नहीं
मेरी प्रिय
यदि मैं तुम्हारी नजर के काबिल हुआ हूं
तो तुम्हारी मेहरबानी
मैं तो अभी और भी प्रतीक्षा कर सकता हूं
(अनुवाद - तरसेम गुजराल )
पंजाब - एक बिंब
मैं शासकों की दाढ़ के नीचे कड़कती हड्डी हूं
समुद्री लुटेरों की प्रार्थनाओं पर मिला
सुनहरा मौका
घर में जन्मे हुए लोगों की कमअक्ली का
मुंह बोलता प्रमाण हूं।
देश की दुःखती हुई रग हूं
नीम-हकीमों का जानबूझकर बिगाड़ा हुआ मरीज हूं।
फौजी बूटों के नीचे कुचली हुई गेहूं की बाली
हत्यारे की गोली से मरा हुआ मासूम हूं
पुतलियों का तमाशा हूं
बेबसी के मुख से निकली चीख हूं
धारावाहिक पेश किया जा रहा दुःखांत नाटक हूं।
सड़क पर पड़ी लावारिस लाश हूं
पत्रकारों के लिए गर्मागर्म खबर हूं।
शासकों की आयु को लंबा करने का बहुत अच्छा नुस्खा हूं
मैं जो आज रिसता हुआ जख्म हूं
पहले से तो इस तरह नहीं था।
शेर की मूंछ
रात होते ही वह चौबारे की छत पर जा चढ़ता
बांस की सीढ़ी को ऊपर खींचकर
छत पर रख लेता
फिर वह सारे गांव को ललकारता
और कहता
है कोई माई का लाल तो बाहर आए
शेर की मूंछ को छूकर दिखाये।
शरीक सारे दरवाजे पर खड़े
ललकारते
और कहते -
अगर सूरमा है तो आ नीचे
पर वो इतना बेवकूफ नहीं
कि अनचाही मौत का स्वागत करे
थक-हार कर लोग लौट जाते हैं अपने घर।
इस तरह हर दूसरे-तीसरे दिन
शौर्य का अभ्यास करता है वह
कई बार जीता
और कई बार मरता है।
अच्छे दिन भी लौटेंगे
अधिक नहीं चलेंगे ऐसे दिन
छंट जायेंगे भय के बादल
मिट जाएगी आतंक की गर्द
प्रतिदिन सुर्खिओं में नहीं होगी
निर्दोष हत्याओं की खबर
उत्तेजित युवा हाथ
कब तक दागते रहेंगे गोलियां
मुस्कुराते चेहरे
फिर लौटेंगे सड़कों पर
फरीद की पंक्तियां
बतायेगी नमाज का समय
बुल्लेशाह के लयात्मक गीत
फिर मुग्ध कर लेंगे श्रोताओं को
और गुरुनानक पूछेंगे
पंजाबियों से
किसने बहकाया है तुम्हें
शांत-घरों को
कसाई-खाने में बदलने के लिए
'इंकलाब जिंदाबाद'
भगत सिंह का नारा
दस्तक देगा हर दरवाजे पर
और पूछेगा पंजाबियों से
'क्या अभी तक आपने नहीं की
सही दुश्मनों की पहचान'
भाईयों के खून में
हाथ धोने के दिन समाप्त हो जाएंगे
सीमाओं की दीवारों के किनारे
खिलेंगे लाल गुलाब और
दादी मां सुनायेगी बच्चों को
परियों की कहानियां और
कहेगी,
बच्चो! दीर्घजीवी हो
मेरी उमर तुम्हे लग जाए।
संपर्क -
गांव- फत्तू चक्क, पोस्ट ढिलवां
जिला- कपूरथला (144804)
फोन - 01822-273188
(इस्तेमाल किए गए कुछ चित्र गूगल से साभार लिए गए हैं)
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