Saturday, June 14, 2014

मुदस्सिर अहमद भट्ट


यह फर्क नए पंखों को तय करने दो -

अपने एक नए परिचित हुए कश्मीरी दोस्त मुदस्सिर अहमद भट्ट के लिखने का पता  चला। जिन्होंने २०१० में लिखना शुरू किया . इनका जन्म २५ नवम्बर १९८७ को हुआ। इनके पिता का नाम गुलाम रसूल भट्ट तथा माँ का नाम फातिमा है। जब उनसे कविताएँ मांगी तो उन्होंने सहर्ष एकदम प्रेषित कर दी।  कश्मीर पर कोई भी दृष्टी बहुत महत्वपूर्ण है। एक युवा इस पर क्या सोचता है यह  जानना ज़रूरी है। मेरी जानकारी में कश्मीर में रहकर हिन्दी कविता लिखने वालों में निदा नवाज़ और सतीश विमल के बाद यह तीसरा नाम है। मुदस्सिर कश्मीर वि० वि० के हिन्दी विभाग में एम० फिल० के शोधार्थी हैं। उनसे बात  करके यह अनुभव हुआ कि उनमें साहित्य का विद्यार्थी होने की अतिरिक्त संवेदनशीलता , पर्याप्त अपेक्षित समझ है। इनकी कविताओं में एक तरह की नाराज़गी है। व्यवस्था ने इनके बचपन को ठगा है। आतंकवाद के उतार चढ़ाव और राजनीतिक दलों की उठा पटक के बीच यह बड़े हुए। लिखने को लेकर उनका कहना है कि यहाँ हिन्दी कविता पर बात करने वाला कोई नहीं है लेकिन सोशल नेटवर्किंग से कुछ वातावरण बनता दिख रहा है। यहाँ मुदसिर की चार कविताएँ प्रस्तुत हैं जिनमें आप नए पंखों की उड़ान की प्रतिबद्धता देख सकते हैं। प्रेम के स्व संवाद देख सकते हैं।  निर्दोष होने के परिणाम देख सकते हैं। व्यवस्थाजनित पलायन की प्रवृत्ति को हावी होता भी देख सकते हैं।
'खुलते किवाड़' पर इनकी काव्य यात्रा का हार्दिक स्वागत व अनंत शुभकामनाएँ !



जानता हूँ

हाँ ! यह जानता हूँ
निर्दोष हूँ
निर्धन युवा की तरह
जिसे अक्सर
नकारा जाता है
नौकरी में
धनवान को देखते हुए.

हाँ ! यह जानता हूँ
निर्दोष हूँ
उस कन्या भ्रूण की तरह
जिसे अक्सर
नष्ट कर दिया जाता है
गर्भ में
लड़के को देखते हुए

हाँ ! यह जानता हूँ
निर्दोष हूँ
बूढ़े – बुजुर्ग  की तरह
जिसे  अक्सर
पीटा जाता है
घर में
पत्नी को देखते हुए

हाँ! यह जानता हूँ
निर्दोष हूँ
बगिया की कलियों की तरह
जिन्हें अक्सर
मसला जाता है
पैरों तले
धार्मिक अंधश्रद्धाओं में
बारात देखते हुए

हाँ ! यह जानता हूँ
निर्दोष हूँ
गंगा जल की तरह
जिसे अक्सर
मलिन किया जाता है
स्वार्थ  में
अपने हित को दखते हुए

हाँ ! यह जानता हूँ
निर्दोष हूँ
उस कश्मीरी की तरह
जिसे अक्सर
मरवा दिया जाता है
जंगल में
जंगल राज में
सोने की थाली देखते हुए  ...



मशाल

यह भारत का सिरमोर
यहाँ हावी है
लोक पर तंत्र

यहाँ गरीबों निरक्षरों
बेरोजगारों व असहायों पर
अभियोग हैं
संगबाजी के
अलगाववाद के
आतंकवाद के
इस असमान निष्ठुर
दुर्दशा की स्थिति में
सत्ताधारी
तिजोरियों को तोलते हैं
तो दूसरी ओर
आक्रमक गौण षड्यंत्रों से
फँस
रक्तपात पंजों में
कबूतर
सूली झूलते हैं
यहीं से
जलती आग ...

इस तंत्र में
संकोच है
राजा और रंक के बीच

राजा स्वच्छंद होकर
भय ,आतंक , संत्रास से
दलबंदी को
प्रोत्साहित  करते हैं
इस दलाली में
स्वछन्दपूर्वक  दलाल
अपने दल हेतु
आहत को बलि चढाते हैं
तथाकथित संगबाजों में से
किसी संगबाज के सीने को
गोली से छलनी करवाते हैं
इन्हीं दलालों ने कभी
शिक्षिकाओं के शरीर की
तो कभी
बहु-बेटियों के शरीर की
दलाली की
कभी
लहुलहान कर
दुष्कर्म कर
फेंक दिया
उफनती नदी के घाट
झाड़ झंखाड़ में
इस असीम
मर्मभेदी घटनाओं ने
जन्म दिया प्रगल्भता  को
जो समय – असमय
वार करता रहता
जिससे जली  है
भभकती आग
जो कांच तोड़ती,
वाहन जलाती
भवन जलाती
राख बनाती है
यह आग मासूम
बच्चों से लेकर
बूढ़ों तक के
लहू से उठती है
लोग कहते हैं
यह बुझ  न सकेगी
जलती रहेगी

हाँ !जलाती रहेगी
तब तक
जब तक आग और मशाल में फ़र्क नहीं समझा जाता -

यह फर्क नए पंखों को तय करने दो .




वह मेरी परिचित अपरिचित

वह मेरी परिचित अपरिचित !
अचानक जब भी कभी
नज़र आती है
जानकर
जानने से इनकार  करती है
कनखियों से देखती है !

अग्नि बन
लग जाती है भयंकर अंगार
जलने लगते हैं मेरे हृदय के चिनार

बरसते नैन
धुआंता दिल
चारों ओर मातम
चारों ओर सन्नाटा

पलटता  हूँ  फिर - फिर तेरे ही पास
हे मेरी परिचित अपरिचित !
पहचान मुझे
आकर समीप जान मुझे
आशा तू  अरमान तू  सर्वस्व तू
आरज़ू तू इंतज़ार भी ...

होना चाहिये जो कुछ
पास मेरे है
बस एक चीज
रिश्वत
नहीं है
होती यह पास मेरे
तो क्या अपरिचित
परिचित होती !
पास मेरे भी होती गाड़ी
कुर्सी ,बंगला ,हीरे ,मोती !

पर क्या तब भी मुझे
मेरे ज़मीर के बिना
कनखियों से देखती
वह मेरी परिचित अपरिचित !



चलो भाग चलें

चलो भाग चले
इस छोर से उस ओर
जहाँ न किसी टोपी का
भाषण हो
और न सत्ता की भूख की गुर्राहट

जहाँ आशाओं का
उन्मुक्त समुद्र
हिलोरें मारता हो
स्नेह प्रेम के
तराने गूँजते हो
चलो भाग चले

चलो भाग चले
उस शून्य की ओर
जहाँ न किसी धर्म का
बंधन हो
और न कोई फतवा हो
जहाँ स्वर -ताल ध्वनित हो
चलो भाग चले

चलो भाग चले
उस  शांति की ओर
जहाँ न कोई कारखाना हो
और न मयकदे का शोर हो
जहाँ नदियों का राग हो
सुषमा कलियों का साथ हो
कोयल की कूक हो
दिल में न कोई हूक हो
चलो भाग चले

चलो भाग चले
उस राह की ओर
जहाँ न किसी हमराह का
अभिनय हो
और न कोई मुखौटा हो
घर चाहे छोटा हो
पर दिल न कोई खोटा हो
चलो भाग चले

चलो भाग चले
उस भोर की ओर
जहाँ न किसी धन का
सम्मान हो
न धनवान का ही मान हो
बस इंसान ही पहचान हो
जहाँ केवल अपनत्व
साम्य सम्मान हो
आत्म – अभिमान चरम – उत्थान हो
चलो भाग चले...




सम्पर्क :-
मुदस्सिर अहमद भट्ट
खानागुंड , तराल
पिन कोड - १९२१२३
जिला - पुलवामा { जे० & के० }
दूरभाष - ०९६२२४९५९३७




प्रस्तुति :- 

 
कमल जीत चौधरी
काली बड़ी , साम्बा { जे० & के० }
दूरभाष - ०९४१९२७४४०३

ई मेल - kamal.j.choudhary@gmail.com


(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)

Thursday, May 15, 2014

कुलदीप कुमार 'किप्पी'




डोगरी भाषा के युवा कवियों में कुलदीप कुमार 'किप्पी' की अलग पहचान है। तीन अगस्त 1975 को जन्म कुलदीप की किताब 'कोसा पानी' छप चुकी है। मानव जीवन के विभिन्न आयामों के पर कुलदीप की अच्छी पकड़ हैं। कवि सम्मेलनों में अपनी मधुर आवाज में रचना को पढ़ना किप्पी की एक और विशेषता है। साइंस में स्नातक के अलावा उर्दू और पंजाबी में डिप्लोमा के साथ किप्पी डोगरी में शिरोमणि हैं। कुलदीप इस समय होड़ कैंप स्कूल में शिक्षक है। नई चार गजलों के साथ  'खुलते किवाड़' पर दूसरी बार कुलदीप का स्वागत है। 



गजल

चोर चलाकी चलनी नेइयों
(चोर चलाकी नहीं चलेगी)
ठग्गी ठौरी फलनी नेइयों।
(ठगी-फरेबी नहीं फलेगी)।

 
भामें किन्ने पुठ्ठ करी लै
(चाहे कितनी भी कोशिश कर लो)
होनी आखर टलनी नेइयों।
(होनी आखिर नहीं टलेगी)।


भाईचारे दी बंड कराऊ
(भाईचारे को जो बांट कराए)
लंबडदारी चलनी नेइयों।
(नंबरदारी नहीं चलेगी)।


गिल्ला बाल्लन लाई बट्हलै
(नीचे गिला जलावन लगा कर)
सौ फूकं बी बलनी नेइयों।
(सौ फूंक मारो आग नही जलेगी)।


कर हीला कोई भावें 'किप्पी'
(चाहे कितनी भी कोशिश करो किप्पी)
गल्ले तेरी गलनी नेइयों।
(बातों से दाल नहीं गलेगी)।




गजल

सौ ही'लें निं उस्सरै बोह्ड़
(सौ कोशिशें की लेकिन बरगद नहीं बढ़ा)
खबरै कुस गल्‍ल दी थोड़।
(पता नहीं किस चीज की रही कमी।)

माली शरमें पानी होआ
(माली शर्म के मारे पानी पानी हुआ)
सारा बाग त्रट्टी चौड़।
(सारे का सारा बाग बिगड़ा हुआ है)

खुरपी गैंती विलखै करदी
(खुरपा और कुदाल बिलख रही है)
बागे अ'ल्ल मुहारां मोड़।
(अपना मुहं बाग की तरफ मोड़।)

'किप्पी' अपनें उद्दम ही'लें
(किप्पी अपने प्रयास से ही)
चुनदा जा बत्ता दे रोड़।
(रास्ते के पत्‍थर उठाता जा।)




गजल

सोंचे दे घेरें की खोहल दना
(सोच की घेरे को खोलो थोड़ा)
चुप्पी त्रोड़ियै बोल दना।
(चप्पी तोड़ कर बोलो थोड़ा।)

भागे दी काहरें भरोसा बी केह्
(भाग्य की लकीरों पर क्या भरोसा)
करमें दी लस्सी गी छोल दना।
(करमों की लस्सी को मथ्‍ाना थोड़ा।)

बेला सदा लेई रौहना निं इक्क
(समय ने सदा एक सा नहीं रहना)
बेले दा किश ते ऐ मोल दना।
(समय का भी तो मूल्या है थोड़ा।)

जीवन दे पैंडे कटोने निं कल्ले
(जीवन का सफर अकेले नहीं काटा जाएगा)
कर हां तुम्मी ते रहोल दना।
(तुम भी तो मेरा साथ दो मेरा थोड़ा।)



गजल

अंदर मेरे मरदा रोज
(मेरे अंदर मरता है रोज)
तां बी जी-जी करता रोज।
(तब भी जीना जीना करता है रोज।)
 

मैं मेरी बेपर्दा करदी
(मेरी मैं मुझको बेपर्दा है करती)
ऊ'यां करना पर्दा रोज।
(वैसे पर्दा करता हूं रोज।)

तुगी केह् उसनै जित्त दुआनी
(वह आपको क्या जीत दिलाएगा)
आपूं शां जो हरदा रोज।
(जो खुद से हार जाता है रोज।)

मन मेरे सौ चानन करदा
(मेरे मन में वह चांदनी कर देता है)
मोर इक नचदा, मरदा रोज। 

(मोर एक नाचता और मरता है रोज।)




पता -  
होड़ कैंपपोस्ट आफिस हरिपुर मोड़ 
तहसील हीरानगर,  कठुआ (जम्मू व कश्मीर)
मोबाइल - 0-94192-74987

(अनुवाद : कुमार कृष्णा शर्मा 

Saturday, March 22, 2014

नरेश कुमार खजुरिया





जन्म : कठुआ के कटली गाँव में 10 जनवरी 1991 को
माँ : सुश्री राजकुमारी
पिता : बंसीलाल शर्मा
शिक्षा : जम्मू वि० वि० से हिन्दी विषय में परास्नातक
लेखन : 2008 में कविताओं से शुरुआत
अन्य : लोक मंच जम्मू से जुड़े हैं

हिन्दी कविता पर शोध कर रहे  नरेश शर्मा की कुछ नयी कविताएँ मिली। अच्छा लगा पढ़कर। यहाँ विचार नहीं आत्मीय भाव सुखद हैं . इसका ध्यान कवि को विशेष तौर पर रखना होगा। बिना किसी पृथक मुहावरे के भी इस बात की आश्वस्ति है कि अभाव , सच और प्रेम को जीता कवि प्रतिबद्ध दिखाई देता है। यह प्रतिबद्धता बनी रहे। इसी कामना के साथ प्रस्तुत हैं इनकी कविताएँ




यह फूल किसके लिए है

मैं अक्सर  जिसे
तोड़ लेता था
तुम्हारे लिए
आज मैंने फिर
तोड़ लिया है वह लाल फूल
आओ तुम
वैसे ही  पूरे  हक़ से
जैसे पहले आती थी
छीन लेती थी
भरी महफ़िल में
मेरे हाथों का फूल

वैसे ही पूछो
मेरी किताब के हाशिये पर लिखकर
यह फूल किसके लिए है ...



सचमैंने जब भी बोलना चाहा सच
तुमने मेरे होठों पर उंगली धर  दी
पर तुमने ही सिखाया है झूठ बोलना बुरी बात है ...

सच मेरा स्वभाव बन गया है
ऐसा सच
जो प्लेटो द्वारा कविता में तीसरी जगह बताया गया
मैं उसी जगह  से बोल रहा हूँ सच
तुम मुझे  रोक नहीं सकते
कैसे रोकोगे
तुम्हारी अपनी सचाई
जा दुबकी है
कई परतों में
तुम भावशून्य
मुखौटे पहनकर बड़े मंच से बोल रहे हो -

तुम  नेता
अभिनेता
धर्मनेता हो
अमन चमन स्वर्ग की बातें करते हो
पर आईने से डरते हो
इसलिए मुझे बार बार
सकुरात  चेताते हो !



माँ के लिए

मेरी झोपड़ी में लट्टू नहीं
जलती थी ढिबरी
हवाओं से डरती ...

खाना परोसते - परोसते
माँ कितनी ही बार ढिबरी को हाथों से ढक
बुझने से बचाती थी
डगमगाती रोशनी में
माँ  मुझे  'क' से कबूतर
'ख' से खरगोश पढ़ाती थी

झोपड़ी आज मकान हो गई है
रंग बिरंगे बल्ब टयूब लाइट्स हैं
ढिबरी न जाने मकान की नीव या दीवार की
किस ईंट के नीचे दब चुकी है
जिसकी रोशनी में मैंने सीखा
'क' से कबूतर
और लिख रहा हूँ 'क' से कविता
मुझे कविता लिखता देख
माँ खुश है
झुर्रियों भरे चेहरे पर कुलांचे भरती हँसी को देख
मेरा कवि हृदय मुग्ध है
मैं सौभाग्यशाली हूँ
अभी सलामत हैं
मुझे रोशनी देने की खातिर
हवाओं से संघर्ष करते हाथ !
  

पड़ोसी के लिए

उसके चूल्हे आग जली
मेरे कलेजे ठण्डक पड़ी ...


सम्पर्क :-
नरेश कुमार खजुरिया
गाँव व डाक - कटली
तह० - हीरानगर , जिला - कठुआ
जम्मू व कश्मीर [१८४१४४]
दूरभाष - ०९८५८२४७३२९






प्रस्तुति :-
कमल जीत चौधरी
काली बड़ी , साम्बा [१८४१२१]
दूरभाष - ०९४१९२७४४०३
ई मेल - kamal.j.choudhary@gmail.com





(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)

Wednesday, March 5, 2014

कुंवर शक्ति सिंह


जन्म- 10 जनवरी 1977, अखनूर (जम्मू व कश्मीर)
शिक्षा- यूनिवर्सिटी आफ जम्‍मू से फाइन आर्ट्स में पांच वर्षीय प्रोफेशनल डिग्री
पहचान- जर्नलिस्ट और कालमनिस्ट
 

दैनिक कश्मीर टाइम्स को सन 1994 में पत्रकार के रूप में ज्वाइन किया। सन 1998 में साप्ताहिक कालम 'दस्तक' को शुरू किया। उसके बाद सन 1996 से 1999 तक सब एडिटर के तौर पर कार्यरत रहे। सन 1999 में दैनिक जागरण के साथ पत्रकार के तौर पर काम भी किया।
फ्रीलांसर के तौर पर जम्मू से जुड़े मामलों और अनुभव कई पत्रिकाओं जैसे आटउलुक और द संडे इंडियन आदि में सन 2004  से साझा कर रहे।
 

दूरदर्शन जम्मू, श्रीनगर और दिल्ली के लिए नो वृतचित्रों को लिख चुके। आकाशवाणी के भी कई कार्यक्रमों में‌ शिरक्त।

छपे साक्षात्कार- वीपी सिंह, डा. असगर वजाहत, निदा फाजली, उस्ताद अहमद हुसैन, उस्ताद मोहम्‍म्द हुसैन, पद्मा सचदेव, अमृता प्रीतम, मधुकर, पंडित शिव कुमार शर्मा, जगजीत सिंह, उमर अब्दुल्ला, सईद अली शाह गिलानी, राजेंद्र यादव आदि
 

परिचर्चा- राम जेठमलानी, डा. फारूक अब्दुल्ला, उस्ताद अल्लाहरखा खान, उस्ताद जाकिर हुसैन, नक्‍श लायलपुरी, रामानदं सागर, डा. कर्ण सिंह, खुशवंत सिंह, महीदा गौहर आदि।


चिनाब के किनारे बसे खूबसूरत और ऐतिहासिक शहर अखनूर निवासी कुंवर शक्ति सिंह को पढ़ना या सुनना अपने आप को आइने में देखने जैसा है। सरल लहजे में सीधी और सटीक बात अपने अलग मुहावरे में कहना विशेषता है। इनकी कविताओं का अपना अलग मिजाज और महक है। यह शायद चिनाब के पानी की देन है। शक्ति सिंह की कविताएं साहस के साथ कई कठोर सवाल खड़े करती हैं। ऐसे सवाल जिनसे अकसर लोग पीछा छुड़ाना या जान कर भी अंजान बने रहना चाहते हैं। जब अंधी राष्ट्रभक्ति के नाम पर कुछ भी किया जा सकता हो या किया जा रहा हो, जब देश प्रेम की परिभाषा सत्ता के केंद्र में बैठे कुछ लोग तय कर रहे हों, जब राजनीति ने धर्म, जातियों, रंग, भाषाओं और क्षेत्रवाद का लबादा ओढ़ रखा हो, जब सच्ची बात कहने पर जीभ और होंठ काट लिए जा रहे हों, जब राजनीति ‌की चालों पर सवाल करना अपराध माना जा रहा हो, जब किसी को भी राष्‍ट्रद्रोही, आतंकवादी या माओवादी का लेबल चिपका कर सलाखों के पीछे ठोका जा रहा हो, ऐसे इस दौर में शक्ति सिंह की कविताएं ऐसे क्रूर समय से आंख मिलाती, दो दो हाथ करती, मनोबल बढ़ातीं और विद्रोह का बिगुल बजाती हैं। सच्ची बात और हाशिए पर खड़े व्यक्ति के साथ खड़े होने का संस्कार कुंवर शक्ति सिंह को उनके कवि (डोगरी के प्रसिद्ध साहित्यकार) पिता स्व. पद्मदेव सिंह निदोर्ष और माता कृष्णा ठाकुर से मिला हुआ है। 

'खुलते किबाड़' पर पहली बार सहर्ष उनकी कविताएं प्रस्तुत कर रहा हूं




नबील अहमद के लिए

मेरे दोस्त, पाकिस्तान!
मैंने हमेशा तुम्हें चाहा है दिल की गहराईयों से
और इन गहराईयों की टूटती सांसों से

जब मैं बहुत छोटा था
दादी ने बारादरी की छत्त से दिखाई थीं
जुगनुओं की तरह टिमटिमाती मुनावर की सड़कें
दादी सियालकोट की थीं
जहां अब मेरा दोस्त नबील अहमद रहता है
जिसका कई महीनों से फोन नहीं आया
यार नबील! तुम्हारे लहजे-तुम्हारी जवानी की कसम
तुम से जब मिला था
तो तुम में नजर आई थी एक मुक्कमल संस्कृति।
भारत की जमीन पर पांव रखते ही
भले ही कस्टम वालों ने
तुम्हारा लैपटाप खाली कर दिया था
मगर तुम्हारी सबसे अहम चीज
फिर भी तुम्हारे साथ रही

कई बार सोचता हूं
मैं क्यों भुला दूं नबील को
सियालकोट को
या तुम्हें पाकिस्तान?
मैं क्यों भुला दूं मेहदीं हसन, फहमिदा रियाज
या मुल्लिका पुखराज को?

अब समय आ गया है
हम जो चाहते हैं उसे खुल कर बयां किया जाए
हम नहीं चाहते दो एक जैसे पहाड़ों के बीच के फासले को
समझा जाए अंतरराष्ट्रीय सीमा
या अमन और मिलन का भविष्य टिका हो
राजनीति की गंदी चालों पर
या चंद जलती हुई मोमत्तियों पर
हमें लड़ना चाहिए अब
हम लड़ना चाहते भी हैं अब
हर हथियार से
दिल्ली और इस्लामाबाद में लहराते अधरम के विरुद्ध
वैसे भी हमारे बुजुर्गां ने कहा है
'अपने हक के लिए लड़ना जायज है'
या
'जंग और इश्क में सब जायज है'
सरहद पर बीड़ियां बदलते दो किसानों की खातिर
फैज की गजलों और लाहौर की गलियों की खातिर
अगर मैं कह भी दूं
पाकिस्तान जिंदाबाद
तो लोगों को क्यों लगे
कि मैंने
भारत को गाली दी है।



अंधेरे से सनसेट तक, एक मुक्ति यात्रा

सदी के जितनी लंबी
गहरी सुनसान रात में
रोशनी का एक छेद हो गया
समय! जिसकी खबर ही नहीं थी
जमी बर्फ में से निकले लगा
निकल आया मैं भी उस कारावास से
मालूम नहीं था किधर है जाना!
मुक्ति के लिए किधर होता है जाना
पिंजरे से आजाद पक्षी किधर है जाता
कच्चे चूल्हों का धुआं किधर है जाता

एक टूटी फूटी सड़क के किनारे
ठिठुरते हुए कुछ लोग बस का इंतजार कर रहे थे
सोचा, इन्हें पूछूं - जाना है किधर?
फिर रहने दिया
यह जो घड़ियाल लटका है मंदिर के भीतर
कहीं गिर न जाए पुजारी के सिर पर
सोचा, बता दूं, फिर रहने दिया
रहने दिया सारा काम अधूरा ही
रात, जो रातभर
अपने दुपट्टे से आसमान पौंछती रहती
रहने दी।

कहते हैं
जहां वास्तव में होता है सन-सेट
वहीं समाया है समय का भेद
कई जलसमाधियों और अग्निसमाधियों
से होता हुआ उतर आया हूं इस जगह
यहां एक साथ होते रहते हैं
कईं सन-सेट।




शहर जब सो जाता है

शहर जब सो जाता है
मैं सुबह तक पढ़ता हूं तेरे खत
किस्सों के पुतले बनाकर रखता हूं सामने
और दिल से कहता हूं
तुम्हारा न कहा हर शब्द

जिंदगी इसे ही कहते हैं तो
एक टेढ़ी-मेढ़ी
लंबी-छोटी लकीर
अगर कोई बच्चा ही खींच दे
तो क्या करें खुदाओं का

शहर जब सो जाता है
मैं तब सच से पीठ लगाए
देखता हूं झूठ
शहर जब जाग जाता है
मैं तब एक सड़क होता हूं।


अंतिम गृहयुद्ध

इस भारत की कसम
जो हमें कभी हजम नहीं हुआ
भले ही हम मुट्ठी भर बच गए हैं
कभी हाथ नहीं खड़े करेंगे
तुम्हारे किसी भी तंत्र के आगे
हमारा विचार सड़ा गला देगा
तुम्हारी व्यवस्‍था, तुम्हारा युग

इस भारत की कसम
जो भगत सिंह के बाद मर गया
हमारा कोई मसला नहीं
हम किसी मसले का हल नहीं चाहते
हम चाहते हैं सर्वनाश
जिस तरह किसान नई फसल से पहले
आग लगाता है अपनी जमीन को
ताकि धरती सजरी हो
और इस पर हो नया जीवन
इस भारत की कसम
जिसका सफेद साहफा रौंद दिया है
संसद की तरफ जाती गाड़ियों ने
कामरेड कोई विंटेज कार नहीं
तुम्हारी खिलाफत से भरा
परमाणु हथियार है
जो बना है किसानों के जत्‍थों से
भूख के तांडव से
धिक्कार और अपमान की जुल्मत से
कभी तो होगा अंतिम गृहयुद्ध
कभी भी हो सकता है अंतिम गृहयुद्ध




अब यहां नहीं रहता

कईं भजन, गंगा जल
और पूजा के फूल थे
उसकी आंखों में
बांसुरी की एक तान के जैसी थी
उसकी पूरी उम्र, उसका ‌अस्तित्व
उसका जिस्म था
जैसे हवा में उड़ता रंग रुहानी
उसका हर प्रेमी
अज्ञातवास में मोक्ष पा लेता था
अजीब जादुई किरदार था
सबको अपनी मंजिल सा लगता था
डूबते हुए सूरज की कोई किरण
तोड़ लेता था रात भर के लिए
सपनों की पूरी दुकान थी उसकी
और सांसें किराए पर देता था
कोई कहता है लाहौर की गलियों से आया था वो
कोई कहता है बनारस के घाट से आया था
यहीं इसी जगह रहता था
अब यहां नहीं रहता

लोग कहते हैं
जिन्न था, लौट गया चिराग में
कोई कहता है दिल्ली की झिलमिलाती सड़क पर
स्ट्रीट लाइट के नीचे खड़ा दिखा था

समय के निर्वात से धूल तो उतरे
तलाश जारी है!


संपर्क 

हाउस नंबर 48, वार्ड नंबर 2
अखनूर- जम्मू व कश्मीर
मोबाइल - 94196-31196
ई-मेलः  dastak.kt@rediffmail.com


(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)

Sunday, February 9, 2014

अनामिका शर्मा


जन्म :- ०६ अक्तूबर १९९१ में शाहजहांपुर ,उत्तरप्रदेश में 
शिक्षा :- उत्तरप्रदेश तकनीकी वि०वि० लखनऊ से स्नातक 
लेखन :- १९९९ में लघु कथा से आरम्भ , बाद में कविताओं और आलेख की और भी अग्रसर 
प्रकाशित :- अमर उजाला , स्वतन्त्र भारत , जन जन तक आदि पत्र - पत्रिकाओं में कविताएँ तथा आलेख प्रकाशित
प्रिय लेखक / कवि :- तसलीमा नसरीन , सआदत हसन मंटो , जय शंकर प्रसाद , निराला आदि 
अन्य :-  समकालीन कलाओं में भी रूचि , साहित्य के प्रचार प्रसार हेतु सोशल नेटवर्किंग को बहुत उपयोगी मानती हैं
 
अनामिका की यह कविताएँ प्रेम और आलोकिकता की सच्ची आंकाक्षा व्यक्त करती हैं। यह प्रेम धुएं से दूर जिस राजकुमार के महल की कल्पना करता है वह किसी क्रूर शासक और सत्ता की सहभागिता की इच्छा नहीं है। कद्धू का रथ और चूहों के घोड़े जैसा बिम्ब एक आम लड़की के प्रेम का सच्चा प्रतिनिधित्व करता है। जो इस बाज़ारवाद में अपने लम्हों तक को कैद होने देने  से बचाना चाहता है। अपना अस्तित्व तलाशती इस युवा कवयित्री को अनंत शुभकामनाओं सहित प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताएँ। 


सिन्ड्रेला 

सिन्ड्रेला..!
तुम आती रहना
सपनों, कल्पनाओं और आशाओं के घर में
पतझड़ में वसन्त की उम्मीद की तरह
ताकि लगता रहे मुझे
कि कद्दू बन जाएगा रथ
चूहे घो़ड़े बन उसे चलायेंगे
ले जायेंगे समय से पार
चूल्हे के धुएँ से दूर
किसी राजकुमार के महल में
उस समारोह में
जिसके चर्चे सुने हैं
हर किसी ने लम्बे समय से
और चमकनें लगेंगी मेरी जूतियाँ..


अस्तित्व
आती थी
समन्वय के समय में
वसन्त लेकर 
पतझड़ के बीतने पर
खिलतें थे
नवागंतुक
कोमल बागों की
सब्ज शाखों पर मिलती थी
नव ऊर्जा
प्राणिमात्र को
प्रकृति के इस परिवर्तन पर
परिवर्तित हुए
पृष्ठ
परिवर्तन के निमित्त
समय की पुस्तिका पर
विलुप्त हुए चिन्ह
मधुमास के सभी
अचानक प्रस्थान पर
प्रतीत हुआ
अस्तित्व
जीवन का
अग्रसर लुप्तता के पथ पर
दृष्टिगत हुआ
अवशेष
चिन्ह जीवन का
मस्तिष्क एवम् दृष्टिपटल पर
प्रतीत हुआ
प्रयासरत
वो शजर अस्तित्व हेतु
आज भी अपनी जगह पर।


लड़की, फ्रेम और यादें

वो लड़की कहती थी
तस्वीरें लेने से लम्हें ज़िन्दा नहीं रहते
उस ज़िन्दादिली के साथ
यादें फ्रेम हो जाती हैं

खुलकर जी नहीं पातीं 
हँसती हुई बड़ी-बड़ी आँखों से
रोती थी छिप-छिप कर
वो लड़की कहती थी
कैसे गल़त हूँ मैं
जो किसी और से तुम्हें माँगा है
मैनें भी तो अपना हिस्सा बाँटा है
अकेले में पहनती थी कभी साड़ी
सिंदूर लगा माथे पर
खामोशी से खुद को देखती जाती थी 
वो लड़की अक्सर यूँ ही
कल्पना के आईने पर
उतारी बिंदिया लगाती थी,
वो लड़की कहती थी 
तस्वीरों में मत कैद करो
मेरी तरह मेरे लम्हों को
मुझे तो न दे सके
इन्हें तो आजादी दो 

सिलती थी चादर
भावनाओं की कतरनों से
और ओढ़कर उसे मिलनें आती थी
इस तरह लड़ती-झगड़ती खुद से
हँसती हुई सिसकियों में
वो लड़की जीती जाती थी।


तुम्हारी आँखें

तुम्हारी ये आँखें
जब भी कोशिश करती हूँ
इनमें देखने की
इन्हें समझने की
तो दिखता है इनमें मुझे सम्पूर्ण सागर
जिसमें कुछ कश्तियाँ
छोटी-बड़ी
अपने गन्तव्य को अग्रसर
कुछ मंजिल को पाती हुई
कुछ विनष्ट होती हुई
कुछ अब भी अग्रसर अपने पथ पर
दिखते हैं कुछ माँझी
हौसला देते हुए
पहुँचने का तट पर
दिखती हैं कुछ लहरें
या लहरों का भ्रमजाल
खो जाती हूँ मैं इनमें कहीं
देखने लगती हूँ मैं खुद को इनमें
कि झुका लेते हो तुम अपनी पलक
और सिमट जाता है सब कुछ
नाट्यशाला के परदे की तरह ।


अपारगम्य

सावन के महीने में
जब फुहार बरसी
खिंच आई मैं आँगन में
बचपन की उत्सुकतावश किसी
भीग गया तन मेरा फुहार में
पहुँच सकी परन्तु आत्मा तक वो नहीं
बचपन की सहजता से...
जैसे बन गई है एक दीवार कहीं
शरीर और आत्मा के बीच
एक परत अपारगम्य...


सम्पर्क :-
नज़दीक कबीर धन बाबा मन्दिर
मोहल्ला - गढ़ी 
पोवायाँ , शाहजहांपुर , उत्तर प्रदेश 
दूरभाष - +91-9999-103-420

प्रस्तुति :-
कमल जीत चौधरी 
काली बड़ी , साम्बा [ जे०& के० ]
दूरभाष - ०९४१९२७४४०३ 


(कुछ चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)