Monday, September 15, 2014

कमल जीत चौधरी

पाठक पैदा किए जा सकते हैं , कवि नहीं !




किसी आयु सीमा से परे प्रगतिशील कविता को ही युवा कविता मानना चाहिए. जम्मू की युवा कविता पर बात करते हुए भी यही पैमाना रखना सही होगा .जम्मू की युवा कविता को एक साथ तीन पीढ़ियाँ समृद्ध कर रही हैं. अपनी प्रवृत्तियों से यह किसी भी प्रकार केवल स्थानीय कविता नहीं कहला सकती . विस्थापन की पीड़ा , जनपक्षधरता , तीखा व्यंग्य , राजनीतिक स्वर , आत्मीय  बिम्ब तथा संवाद इस कविता की ताकत है तो सपाटबयानी , गद्य शैली और नारेबाजी इसकी कमजोरी है . यहाँ का स्त्री स्वर मुख्यधारा के फैशनबल स्त्री विमर्श से परे एक मौलिक और मुखर भावजगत के गवाक्ष खोलता है . २०१० में वरिष्ठ कवि अशोक कुमार द्वारा सम्पादित जम्मू के प्रतिनिधि काव्य संग्रह ' तवी जहां से गुज़रती है ' के सन्दर्भ में डॉ० नामवर सिंह व  सुप्रसिद्ध कवि अरुण कमल ने भी जोर देकर इस युवा कविता को रेखांकित किया. यह संग्रह निश्चित ही जम्मू की कविता का प्रामाणिक इतिहास होता अगर इसमें युवा कवि कुँवर शक्ति सिंह , योगिता यादव और अरुणा शर्मा की कविताएँ भी होती तथा इसका सम्पादकीय भी लिखा जाता . खैर , मुंबई से निकलने वाली त्रैमासिक पत्रिका सृजन सन्दर्भ के मनोज शर्मा द्वारा सम्पादित अप्रैल - जून २०१० के जम्मू विशेषांक ने यहाँ की युवा अभिव्यक्ति को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा मंच दिया . लेखक व धरती के सम्पादक शैलेन्द्र चौहान द्वारा अभिव्यक्ति के अंक ३७ जुलाई २०११  में जम्मू के  पांच कवियों की विशेष प्रस्तुति भी एक खाका खींचती है . इस स्तम्भ में उन्होंने कृष्ण कुमार शर्मा , अमिता मेहता , डॉ० शाश्विता , कमल जीत चौधरी , शेख मोहम्मद कल्याण की कविताओं को प्रकाशित करते हुए लिखा - 'इनकी कविताओं में एक और स्थानीयता की सौंधी महक है तो वही राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों की प्रतिक्रियाएँ भी हैं . '  यानि यहाँ का युवा स्वर समय समय पर नोटिस होता रहा  है . फिर भी  यहाँ के ज्यादातर कवि जम्मू से बाहर बहुत कम पहचाने जाते हैं . वरिष्ठ कवि रमेश मेहता ,  डॉ० अग्निशेखर व कुछ अन्य तथा ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कृत युवा कहानीकार कवि योगिता यादव और कमल जीत चौधरी , कृष्ण कुमार शर्मा आदि कुछ नाम अपवाद अवश्य हैं .इन्होंने खासकर देश भर में केंद्र से इतर हाशिए पर लिखी जा रही कविता से संवाद कायम किया है . यही आवश्यक है . हिन्दी कविता का समग्र मूल्यांकन इसी कविता से होगा . इससे जुड़ना एक वर्गबोध भी दर्शाता है . २०१३ में वरिष्ठ कवि सम्पादक प्रभात पाण्डेय द्वारा दिल्ली से इतर अखिल भारत सेचयनित ग्यारह कवियों के कविता संग्रह ' स्वर एकादश ' में कमल जीत चौधरी और अग्निशेखर का होना जम्मू के लिए सुखद है .वैसे राजकुमार शर्मा , महाराज कृष्ण संतोषी , कुँवर शक्ति सिंह , कपिल अनिरुद्ध , पवन खजुरिया , संजीव महाजन , संजीव भसीन , अरुणा शर्मा , श्याम बिहारी ,निर्मल विनोद जैसे नाम भी जम्मू के काव्य परिदृश्य में अलग चमक रखते हैं. फिर भी बात घूम फिर कर वही आठ दस कवियों पर आ जाती है तो कुछ सवालों का उठना स्वाभाविक और अनिवार्य हो जाता है . क्या कम पहचाने जा रहे जम्मू के कवि भूख , बेरोज़गारी , शोषण , राजनीतिक भेदभाव , सीमारेखा पर तनाव धर्म की राजनीति से त्रस्त जनता की आवाज़ बन पाए हैं ? क्या कला अकादमी व इससे अनुदान प्राप्त कर रही संस्थाएँ अपनी भूमिका सही निभा पा रही हैं ? काव्यगुरू का ध्यान सतत इस ओर क्यों एकाग्र है कि कैसे किसी नवोदित कवि पर मोहर लगा दी जाए ? यह बात मैं कला अकादमी की पत्रिका शीराज़ा में प्रकाशित नवांकुरों के सन्दर्भ में कह रहा हूँ . इन्हें ही दिशा देने के लिए पत्रिका का न्यून स्तर बनाए रखना ज़रूरी है न कि उनमे छपास की प्रवृत्ति को बढ़ावा देना . ऐसे ही कुछ मठाधीश किसी युवा के बढ़ते कदमों को देख जगह जगह उसकी कटु आलोचना तो करते हैं ...क्यों ?? पर उन्हें पाठकों और कविता के प्रसार की आवश्यकता कभी ज़रूरी  नहीं लगती ? आदि आदि .





समय को पहचान कर जम्मू के कवियों को छपास और संवाद की तरफ ध्यान देना होगा. प्रिंट में अगर किसी कारण ये छपने से वंचित हैं तो चिठ्ठा जगत और सोशल नेटवर्किंग का सही उपयोग इनको बाहर की कविता से जोड़ सकता है . यहाँ पर इनकी उदासीनता समझ से परे है . जबकि इधर की हिन्दी कविता ब्लॉग्स पर नया इतिहास रच रही है . इधर कृष्ण कुमार शर्मा और कमल जीत चौधरी द्वारा संचालित जम्मू कश्मीर के पहले साहित्यिक ब्लॉग ' खुलते किवाड़ ' ने खासकर जम्मू की युवतर कविता को सामने लाया है . इस पर भगवती देवी , शालूप्रजापति , रिपुदमन परिहार , नरेश कुमार खजुरिया , मुदासिर अहमद भट्ट ,संगीत , पम्मी शर्मा आदि की प्रस्तुति इस बात की प्रमाण है .सांस्कृतिक अकादमी के साथ पच्चीस साल पुरानी साहित्यिक संस्था युहिले और दो साल से सक्रिय लोक मंचक्रमशः कवियों व सांस्कृतिक कर्मियों के लिए भाव और कर्मभूमि सिद्ध हो रहे हैं . साहित्यिक पत्रिकाओं के अभाव में पिछले सालों दैनिक जागरण के साहित्यिक पन्ने ने सार्थक भूमिका निभाई . इस पन्ने को योगिता यादव देखती है . अब सामग्री की कमी के कारण यहाँ जम्मू की भागीदारी न के बराबर हो गई है .
नीरू शर्मा के संपादन में राष्ट्र भाषा प्रचार समिति ने सेतु नाम की पत्रिका का अंक निकाला है . कामना है कि यह निकलता रहेगा . कविता के क्षेत्र में अग्निशेखर को प्राप्त सूत्र सम्मान , अरुणा शर्मा को पृथ्वियां पर और पृतपाल बेताब  को शहरे गज़ल  कविता संग्रह पर केंद्रीय हिन्दी निदेशालय का हिन्दीतर सम्मान आश्वस्त करता है . 

अंत में एक दो ज़रूरी बातें  कि आज के परिदृश्यपर कविता से अधिक कवि हावी न हो यह ध्यान रहे. पुरस्कार , जोड़ - तोड़ , आपसी ईर्ष्या  - द्वेष , सरकारी काव्य यात्राएँ , मंचीय प्रशंसा , कला अकादमी , अनुदान और ३१ मार्च से बचना होगा . और हाँ पाठक पैदा किए जा सकते हैं , कवि नहीं !


(दैनिक जागरण से साभार)




 
कमल जीत चौधरी
काली बड़ी , साम्बा { जे० & के० }
दूरभाष - ०९४१९२७४४०३

ई मेल - kamal.j.choudhary@gmail.com

(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)

Wednesday, August 13, 2014

शेख मोहम्मद कल्याण


जम्मू कश्मीर में जब बात हिन्दी कविता की हो तो शेख मोहम्मद कल्याण एक स्वाभाविक सा लिया जाने वाला नाम है . कल्याण ने दो दशकों से  ' समज ' और ' युहिले ' जैसी संस्थाओं से जुड़कर  सांस्कृतिक व साहित्यिक भूमिका से जम्मू के कला परिदृश्य को समृद्ध किया है . इन्होंने अपनी शुरूआत नुक्कड़ नाटक और अभिनय से की .
२००३ में प्रकाशित इनका कविता संग्रह ' समय के धागे ' चर्चित तो रहा है पर जितनी बात इस पर होनी चाहिए थी नहीं हुई . कवि आलोचक विजेंद्र ने उनको अवश्य रेखांकित किया है . आजकल विशेषांक , चिट्ठों और सोशल नेटवर्किंग के तथाकथित विशेज्ञ आलोचक समीक्षक हिन्दी कविता का नकली परिदृश्य बना रहे हैं .  इधर जब वे नब्बे के बाद की कविता पर चर्चा कर रहे हैं . वे कभी भी अल्पचर्चित गैरहिन्दी भाषी प्रदेशों की हिन्दी कविता का नाम तक नहीं लेते  . जबकि इस हाशिये की कविता के बिना हिन्दी कविता का समग्र मूल्यांकन नहीं किया जा सकता . न किया जाना चाहिए . मैं कल्याण जैसे कवियों को पढ़े जाने पर जोर दूंगा . यहाँ प्रस्तुत कविताओं में पहली दो कविताएँ  इनके संग्रह से हैं और अगली  तीन कविताएँ नयी हैं . निश्चित विचार से युक्त इनकी कविताएँ अपने आत्मीय भावों से घर , आँगन , गाँव , कस्बे व शहर को उकेरती 
हैं . आदमी को अपने हक़ के लिए लड़ना सिखाती हैं . प्रेम कविताओं और प्रकृति के मानवीय बिम्बों के लिए कल्याण खास पहचाने जाएंगे . अभी उनकी श्रेष्ठ अभिव्यक्ति की हमें प्रतीक्षा है . शुभकामनाओं सहित उनका हार्दिक आभार कि उन्होंने ये कविताएँ उपलब्ध करवाई. 


(अपरिहार्य कारणों के चलते पोस्ट करने में देरी हुई, उसके लिए खेद है।)





उठो मेरे भाई

उठो मेरे भाई उठो
सम्भालो अपनी - अपनी कुदाल
सूरज ने विद्रोह कर दिया है

जितना भी हो सके
इसे दफन होने से बचाना है
और
उससे पहले खुद को भी
क्योंकि
दफन होता जा रहा हैं विद्रोह सदा
ऊँची लम्बी मीनारों के नीचे
अब के भी यही होगा क्या ...?




बादलों में आग

उसकी आँख में
कौव्वे सी चतुरता है
लोमड़ी सी चालाकी
और कभी - कभी
झपटने के लिए
बिल्ली से तेवर

वह झांकता है
हमारे भीतर
अँधेरे कमरे में बह रही नदी को
खूब आता है उसे
रिसते घावों पर मरहम लगाना ...

आओ
तुम भी आओ
वक्त आ गया है कि
हवा का रुख पहचान
बादलों में आग भर दें .



स्कूटर चलाती बेटी

स्कूटर चलाती
तेज दौड़ाती बेटी
हवा संग बतियाती
बढ़ रही है आगे
परम्पराओं के सारे बंधन
तोड़ देना चाहती है
इतनी तेजी से चला रही है स्कूटर
कि जैसे नाप लेना चाहती है
धरती का आखरी छोर
उसे मालूम है
कैसे लांघने हैं मर्यादाओं के चौक
समय कि रफ़्तार को भी
लांघ सकती है
स्कूटर चलाती बेटी...

उसे खूब आता है
मौसम के बदले मिजाज से लड़ना
अपने दुपट्टे मे बाँध लेती है
खट्टे मीठे अनुभव
समय के पहिये नहीं
रोक पाते उसकी उड़ान
इसी समय के बीच
वह बादल हो जाती है
उलांघती अँधेरे
 दौड़ाती स्कूटर
मंजिल पहुँचती आती है उस तक
गति  को बनाती है हथियार
स्कूटर चलाती, बादल होती
हरियाली हो जाती है

स्कूटर चलाती बेटी ...




चीख और आदमी

वह चीखते रहे
हम सुनते रहे

हम सुनते रहे
वह चीखते रहे...

इस चीखने और सुनने के बीच
गुज़र गयीं
कई सदियाँ
और हम आज भी वहीं खड़े हैं
आवाज़ों को पहचानने के लिए
चीखें तो वही हैं
बस
गले बदल गए हैं ...


वह

वह तौल रहा है हमें
मुझे , तुझे , इसे , उसे
अपनी तेज़
चालाक आँखों से
 वह तौल सकता है
तौलना उसे भलीभाँति आता है
वह ज़बरदस्ती घुस जाता है
हमारी रसोई
हमारे सपनों में
वह हमारी उंगली पर लगे निशान से करता है
अपना जीवन निर्माण
उसे आता है
हमारी उंगली पर
अपने हक़ में
निशान लगवाना ...

वह दिखाता है
हमारे चूल्हे को रंग बिरंगी आग

हमारी उंगली पर लगे
निशान की कीमत

इन दोनों के बीच
वह ...
वह हो जाता है
और हम
रह जाते हैं उंगली के निशान को देखते ...



सम्पर्क :-

नरवाल पाई , सतवारी
जम्मू , जे० & के०
दूरभाष - ०८७१३०९९९२६
ई मेल - smkalyan2010@gmail.com



प्रस्तुति :- 
 
कमल जीत चौधरी
काली बड़ी , साम्बा { जे० & के० }
दूरभाष - ०९४१९२७४४०३

ई मेल - kamal.j.choudhary@gmail.com

(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)


Saturday, June 14, 2014

मुदस्सिर अहमद भट्ट


यह फर्क नए पंखों को तय करने दो -

अपने एक नए परिचित हुए कश्मीरी दोस्त मुदस्सिर अहमद भट्ट के लिखने का पता  चला। जिन्होंने २०१० में लिखना शुरू किया . इनका जन्म २५ नवम्बर १९८७ को हुआ। इनके पिता का नाम गुलाम रसूल भट्ट तथा माँ का नाम फातिमा है। जब उनसे कविताएँ मांगी तो उन्होंने सहर्ष एकदम प्रेषित कर दी।  कश्मीर पर कोई भी दृष्टी बहुत महत्वपूर्ण है। एक युवा इस पर क्या सोचता है यह  जानना ज़रूरी है। मेरी जानकारी में कश्मीर में रहकर हिन्दी कविता लिखने वालों में निदा नवाज़ और सतीश विमल के बाद यह तीसरा नाम है। मुदस्सिर कश्मीर वि० वि० के हिन्दी विभाग में एम० फिल० के शोधार्थी हैं। उनसे बात  करके यह अनुभव हुआ कि उनमें साहित्य का विद्यार्थी होने की अतिरिक्त संवेदनशीलता , पर्याप्त अपेक्षित समझ है। इनकी कविताओं में एक तरह की नाराज़गी है। व्यवस्था ने इनके बचपन को ठगा है। आतंकवाद के उतार चढ़ाव और राजनीतिक दलों की उठा पटक के बीच यह बड़े हुए। लिखने को लेकर उनका कहना है कि यहाँ हिन्दी कविता पर बात करने वाला कोई नहीं है लेकिन सोशल नेटवर्किंग से कुछ वातावरण बनता दिख रहा है। यहाँ मुदसिर की चार कविताएँ प्रस्तुत हैं जिनमें आप नए पंखों की उड़ान की प्रतिबद्धता देख सकते हैं। प्रेम के स्व संवाद देख सकते हैं।  निर्दोष होने के परिणाम देख सकते हैं। व्यवस्थाजनित पलायन की प्रवृत्ति को हावी होता भी देख सकते हैं।
'खुलते किवाड़' पर इनकी काव्य यात्रा का हार्दिक स्वागत व अनंत शुभकामनाएँ !



जानता हूँ

हाँ ! यह जानता हूँ
निर्दोष हूँ
निर्धन युवा की तरह
जिसे अक्सर
नकारा जाता है
नौकरी में
धनवान को देखते हुए.

हाँ ! यह जानता हूँ
निर्दोष हूँ
उस कन्या भ्रूण की तरह
जिसे अक्सर
नष्ट कर दिया जाता है
गर्भ में
लड़के को देखते हुए

हाँ ! यह जानता हूँ
निर्दोष हूँ
बूढ़े – बुजुर्ग  की तरह
जिसे  अक्सर
पीटा जाता है
घर में
पत्नी को देखते हुए

हाँ! यह जानता हूँ
निर्दोष हूँ
बगिया की कलियों की तरह
जिन्हें अक्सर
मसला जाता है
पैरों तले
धार्मिक अंधश्रद्धाओं में
बारात देखते हुए

हाँ ! यह जानता हूँ
निर्दोष हूँ
गंगा जल की तरह
जिसे अक्सर
मलिन किया जाता है
स्वार्थ  में
अपने हित को दखते हुए

हाँ ! यह जानता हूँ
निर्दोष हूँ
उस कश्मीरी की तरह
जिसे अक्सर
मरवा दिया जाता है
जंगल में
जंगल राज में
सोने की थाली देखते हुए  ...



मशाल

यह भारत का सिरमोर
यहाँ हावी है
लोक पर तंत्र

यहाँ गरीबों निरक्षरों
बेरोजगारों व असहायों पर
अभियोग हैं
संगबाजी के
अलगाववाद के
आतंकवाद के
इस असमान निष्ठुर
दुर्दशा की स्थिति में
सत्ताधारी
तिजोरियों को तोलते हैं
तो दूसरी ओर
आक्रमक गौण षड्यंत्रों से
फँस
रक्तपात पंजों में
कबूतर
सूली झूलते हैं
यहीं से
जलती आग ...

इस तंत्र में
संकोच है
राजा और रंक के बीच

राजा स्वच्छंद होकर
भय ,आतंक , संत्रास से
दलबंदी को
प्रोत्साहित  करते हैं
इस दलाली में
स्वछन्दपूर्वक  दलाल
अपने दल हेतु
आहत को बलि चढाते हैं
तथाकथित संगबाजों में से
किसी संगबाज के सीने को
गोली से छलनी करवाते हैं
इन्हीं दलालों ने कभी
शिक्षिकाओं के शरीर की
तो कभी
बहु-बेटियों के शरीर की
दलाली की
कभी
लहुलहान कर
दुष्कर्म कर
फेंक दिया
उफनती नदी के घाट
झाड़ झंखाड़ में
इस असीम
मर्मभेदी घटनाओं ने
जन्म दिया प्रगल्भता  को
जो समय – असमय
वार करता रहता
जिससे जली  है
भभकती आग
जो कांच तोड़ती,
वाहन जलाती
भवन जलाती
राख बनाती है
यह आग मासूम
बच्चों से लेकर
बूढ़ों तक के
लहू से उठती है
लोग कहते हैं
यह बुझ  न सकेगी
जलती रहेगी

हाँ !जलाती रहेगी
तब तक
जब तक आग और मशाल में फ़र्क नहीं समझा जाता -

यह फर्क नए पंखों को तय करने दो .




वह मेरी परिचित अपरिचित

वह मेरी परिचित अपरिचित !
अचानक जब भी कभी
नज़र आती है
जानकर
जानने से इनकार  करती है
कनखियों से देखती है !

अग्नि बन
लग जाती है भयंकर अंगार
जलने लगते हैं मेरे हृदय के चिनार

बरसते नैन
धुआंता दिल
चारों ओर मातम
चारों ओर सन्नाटा

पलटता  हूँ  फिर - फिर तेरे ही पास
हे मेरी परिचित अपरिचित !
पहचान मुझे
आकर समीप जान मुझे
आशा तू  अरमान तू  सर्वस्व तू
आरज़ू तू इंतज़ार भी ...

होना चाहिये जो कुछ
पास मेरे है
बस एक चीज
रिश्वत
नहीं है
होती यह पास मेरे
तो क्या अपरिचित
परिचित होती !
पास मेरे भी होती गाड़ी
कुर्सी ,बंगला ,हीरे ,मोती !

पर क्या तब भी मुझे
मेरे ज़मीर के बिना
कनखियों से देखती
वह मेरी परिचित अपरिचित !



चलो भाग चलें

चलो भाग चले
इस छोर से उस ओर
जहाँ न किसी टोपी का
भाषण हो
और न सत्ता की भूख की गुर्राहट

जहाँ आशाओं का
उन्मुक्त समुद्र
हिलोरें मारता हो
स्नेह प्रेम के
तराने गूँजते हो
चलो भाग चले

चलो भाग चले
उस शून्य की ओर
जहाँ न किसी धर्म का
बंधन हो
और न कोई फतवा हो
जहाँ स्वर -ताल ध्वनित हो
चलो भाग चले

चलो भाग चले
उस  शांति की ओर
जहाँ न कोई कारखाना हो
और न मयकदे का शोर हो
जहाँ नदियों का राग हो
सुषमा कलियों का साथ हो
कोयल की कूक हो
दिल में न कोई हूक हो
चलो भाग चले

चलो भाग चले
उस राह की ओर
जहाँ न किसी हमराह का
अभिनय हो
और न कोई मुखौटा हो
घर चाहे छोटा हो
पर दिल न कोई खोटा हो
चलो भाग चले

चलो भाग चले
उस भोर की ओर
जहाँ न किसी धन का
सम्मान हो
न धनवान का ही मान हो
बस इंसान ही पहचान हो
जहाँ केवल अपनत्व
साम्य सम्मान हो
आत्म – अभिमान चरम – उत्थान हो
चलो भाग चले...




सम्पर्क :-
मुदस्सिर अहमद भट्ट
खानागुंड , तराल
पिन कोड - १९२१२३
जिला - पुलवामा { जे० & के० }
दूरभाष - ०९६२२४९५९३७




प्रस्तुति :- 

 
कमल जीत चौधरी
काली बड़ी , साम्बा { जे० & के० }
दूरभाष - ०९४१९२७४४०३

ई मेल - kamal.j.choudhary@gmail.com


(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)

Thursday, May 15, 2014

कुलदीप कुमार 'किप्पी'




डोगरी भाषा के युवा कवियों में कुलदीप कुमार 'किप्पी' की अलग पहचान है। तीन अगस्त 1975 को जन्म कुलदीप की किताब 'कोसा पानी' छप चुकी है। मानव जीवन के विभिन्न आयामों के पर कुलदीप की अच्छी पकड़ हैं। कवि सम्मेलनों में अपनी मधुर आवाज में रचना को पढ़ना किप्पी की एक और विशेषता है। साइंस में स्नातक के अलावा उर्दू और पंजाबी में डिप्लोमा के साथ किप्पी डोगरी में शिरोमणि हैं। कुलदीप इस समय होड़ कैंप स्कूल में शिक्षक है। नई चार गजलों के साथ  'खुलते किवाड़' पर दूसरी बार कुलदीप का स्वागत है। 



गजल

चोर चलाकी चलनी नेइयों
(चोर चलाकी नहीं चलेगी)
ठग्गी ठौरी फलनी नेइयों।
(ठगी-फरेबी नहीं फलेगी)।

 
भामें किन्ने पुठ्ठ करी लै
(चाहे कितनी भी कोशिश कर लो)
होनी आखर टलनी नेइयों।
(होनी आखिर नहीं टलेगी)।


भाईचारे दी बंड कराऊ
(भाईचारे को जो बांट कराए)
लंबडदारी चलनी नेइयों।
(नंबरदारी नहीं चलेगी)।


गिल्ला बाल्लन लाई बट्हलै
(नीचे गिला जलावन लगा कर)
सौ फूकं बी बलनी नेइयों।
(सौ फूंक मारो आग नही जलेगी)।


कर हीला कोई भावें 'किप्पी'
(चाहे कितनी भी कोशिश करो किप्पी)
गल्ले तेरी गलनी नेइयों।
(बातों से दाल नहीं गलेगी)।




गजल

सौ ही'लें निं उस्सरै बोह्ड़
(सौ कोशिशें की लेकिन बरगद नहीं बढ़ा)
खबरै कुस गल्‍ल दी थोड़।
(पता नहीं किस चीज की रही कमी।)

माली शरमें पानी होआ
(माली शर्म के मारे पानी पानी हुआ)
सारा बाग त्रट्टी चौड़।
(सारे का सारा बाग बिगड़ा हुआ है)

खुरपी गैंती विलखै करदी
(खुरपा और कुदाल बिलख रही है)
बागे अ'ल्ल मुहारां मोड़।
(अपना मुहं बाग की तरफ मोड़।)

'किप्पी' अपनें उद्दम ही'लें
(किप्पी अपने प्रयास से ही)
चुनदा जा बत्ता दे रोड़।
(रास्ते के पत्‍थर उठाता जा।)




गजल

सोंचे दे घेरें की खोहल दना
(सोच की घेरे को खोलो थोड़ा)
चुप्पी त्रोड़ियै बोल दना।
(चप्पी तोड़ कर बोलो थोड़ा।)

भागे दी काहरें भरोसा बी केह्
(भाग्य की लकीरों पर क्या भरोसा)
करमें दी लस्सी गी छोल दना।
(करमों की लस्सी को मथ्‍ाना थोड़ा।)

बेला सदा लेई रौहना निं इक्क
(समय ने सदा एक सा नहीं रहना)
बेले दा किश ते ऐ मोल दना।
(समय का भी तो मूल्या है थोड़ा।)

जीवन दे पैंडे कटोने निं कल्ले
(जीवन का सफर अकेले नहीं काटा जाएगा)
कर हां तुम्मी ते रहोल दना।
(तुम भी तो मेरा साथ दो मेरा थोड़ा।)



गजल

अंदर मेरे मरदा रोज
(मेरे अंदर मरता है रोज)
तां बी जी-जी करता रोज।
(तब भी जीना जीना करता है रोज।)
 

मैं मेरी बेपर्दा करदी
(मेरी मैं मुझको बेपर्दा है करती)
ऊ'यां करना पर्दा रोज।
(वैसे पर्दा करता हूं रोज।)

तुगी केह् उसनै जित्त दुआनी
(वह आपको क्या जीत दिलाएगा)
आपूं शां जो हरदा रोज।
(जो खुद से हार जाता है रोज।)

मन मेरे सौ चानन करदा
(मेरे मन में वह चांदनी कर देता है)
मोर इक नचदा, मरदा रोज। 

(मोर एक नाचता और मरता है रोज।)




पता -  
होड़ कैंपपोस्ट आफिस हरिपुर मोड़ 
तहसील हीरानगर,  कठुआ (जम्मू व कश्मीर)
मोबाइल - 0-94192-74987

(अनुवाद : कुमार कृष्णा शर्मा 

Saturday, March 22, 2014

नरेश कुमार खजुरिया





जन्म : कठुआ के कटली गाँव में 10 जनवरी 1991 को
माँ : सुश्री राजकुमारी
पिता : बंसीलाल शर्मा
शिक्षा : जम्मू वि० वि० से हिन्दी विषय में परास्नातक
लेखन : 2008 में कविताओं से शुरुआत
अन्य : लोक मंच जम्मू से जुड़े हैं

हिन्दी कविता पर शोध कर रहे  नरेश शर्मा की कुछ नयी कविताएँ मिली। अच्छा लगा पढ़कर। यहाँ विचार नहीं आत्मीय भाव सुखद हैं . इसका ध्यान कवि को विशेष तौर पर रखना होगा। बिना किसी पृथक मुहावरे के भी इस बात की आश्वस्ति है कि अभाव , सच और प्रेम को जीता कवि प्रतिबद्ध दिखाई देता है। यह प्रतिबद्धता बनी रहे। इसी कामना के साथ प्रस्तुत हैं इनकी कविताएँ




यह फूल किसके लिए है

मैं अक्सर  जिसे
तोड़ लेता था
तुम्हारे लिए
आज मैंने फिर
तोड़ लिया है वह लाल फूल
आओ तुम
वैसे ही  पूरे  हक़ से
जैसे पहले आती थी
छीन लेती थी
भरी महफ़िल में
मेरे हाथों का फूल

वैसे ही पूछो
मेरी किताब के हाशिये पर लिखकर
यह फूल किसके लिए है ...



सचमैंने जब भी बोलना चाहा सच
तुमने मेरे होठों पर उंगली धर  दी
पर तुमने ही सिखाया है झूठ बोलना बुरी बात है ...

सच मेरा स्वभाव बन गया है
ऐसा सच
जो प्लेटो द्वारा कविता में तीसरी जगह बताया गया
मैं उसी जगह  से बोल रहा हूँ सच
तुम मुझे  रोक नहीं सकते
कैसे रोकोगे
तुम्हारी अपनी सचाई
जा दुबकी है
कई परतों में
तुम भावशून्य
मुखौटे पहनकर बड़े मंच से बोल रहे हो -

तुम  नेता
अभिनेता
धर्मनेता हो
अमन चमन स्वर्ग की बातें करते हो
पर आईने से डरते हो
इसलिए मुझे बार बार
सकुरात  चेताते हो !



माँ के लिए

मेरी झोपड़ी में लट्टू नहीं
जलती थी ढिबरी
हवाओं से डरती ...

खाना परोसते - परोसते
माँ कितनी ही बार ढिबरी को हाथों से ढक
बुझने से बचाती थी
डगमगाती रोशनी में
माँ  मुझे  'क' से कबूतर
'ख' से खरगोश पढ़ाती थी

झोपड़ी आज मकान हो गई है
रंग बिरंगे बल्ब टयूब लाइट्स हैं
ढिबरी न जाने मकान की नीव या दीवार की
किस ईंट के नीचे दब चुकी है
जिसकी रोशनी में मैंने सीखा
'क' से कबूतर
और लिख रहा हूँ 'क' से कविता
मुझे कविता लिखता देख
माँ खुश है
झुर्रियों भरे चेहरे पर कुलांचे भरती हँसी को देख
मेरा कवि हृदय मुग्ध है
मैं सौभाग्यशाली हूँ
अभी सलामत हैं
मुझे रोशनी देने की खातिर
हवाओं से संघर्ष करते हाथ !
  

पड़ोसी के लिए

उसके चूल्हे आग जली
मेरे कलेजे ठण्डक पड़ी ...


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नरेश कुमार खजुरिया
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प्रस्तुति :-
कमल जीत चौधरी
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