Sunday, June 14, 2020

परवीन कुमार

प्रिय पाठको, 
परवीन कुमार मेरे दोस्त हैं। लेखन की दुनिया में उनका यह पहला कदम है। वे राजनीति शास्त्र के व्याख्याता हैं। दस साल पहले बिलावर,भड्डू में एक साथ नौकरी करते हुए हम एक ही घर में रहते थे। आज भी हमारा नियमित संवाद है। वे किसी भी संवाद में प्रेम, राजनीति और कविताई को रेखांकित करने से नहीं चूकते। इन कविताओं में भी वे शिनाख़्त व तसदीक करने की भूमिका में हैं। उनकी भूमिकाएँ बनी रहें। 
मेरी टिप्पणी से अधिक आपकी टिप्पणियाँ महत्त्वपूर्ण हैं। पढ़ें और बताएँ कि यह पाठ कैसा है।


अँगूठा 
          
अँगूठा उठा तो उठ गए
जोश से
विजय से
अँगूठा झुका तो झुक गए
निराशा से
एक अँगूठा बढ़ा
काले अक्खर की भैंस चराने
खत्म हो गई चरागाहें
एक अँगूठा बढ़ा गुरु यश बढ़ाने के लिए
एक अँगूठा घुमाए सोने के कंगन...

अँगूठों की कथा में
किसका अँगूठा बड़ा?


मैं आज खुश हूँ

मैं आज खुश हूँ
क्यों!
तुम्हें आज खुश देखा
खुश महसूस किया
खुश सुना
खुश जाना

मैं आज खुश हूँ
क्यों!
मेरा कवित्व खुश है
तुमसे बात करके
तुमसे मुलाकात करके

मैं आज खुश हूँ
क्यों!
आज पहली बार तुमने झूठ बोला
यह सच है झूठ नहीं

मैं आज खुश हूँ
क्यों!
तुमने एक और सम्पर्क सूत्र दिया
सिर्फ सूत्र ही नहीं
समीप आने के लिए एक पुल भी दिया।


क्या हुआ

क्या हुआ जो मेरा सिर सरहद पर कट गया
कुर्सी, कार, लश्कर तुम्हारा बंगला तो बच गया
क्या हुआ जो फूल मुरझा गया मिट्टी का
तेज़ाब खार पागलपन का कांटा तो बच गया
क्या हुआ जो मैं धूप, ट्रेन, प्लेटफॉर्म या पटरी पर मर गया
तुम्हारे कंक्रीट का जंगल, शर्म का शामियान तो बच गया ...




चरित्र

गाड़ियों पर पढ़ी जा सकती हैं
देशभक्ति, प्यार, वफ़ा, नैतिकता को दर्शाती 
तुकबंदियाँ
मैंने लगभग हर गाड़ी पर लिखा देखा -
'सामान' पीछे से उतारें

सामान तो आगे सेे भी उतरता रहा
मगर 'पीछे' को हमने अपना चरित्र बना लिया।
  



रखकर देखेंं

मेरे मित्र के पास लाइसेंस है
मगर वह गाड़ी चलाना नहीं जानता
मेरे पास लाइसेंस नहीं है
मगर मैं गाड़ी चलाना जानता हूँ

मुझे पता है 
आप 'लाईसेंस' और 'ड्राइविंग' की जगह
'लाईसेंस' और 'बंदूक' रखकर नहीं देखेंगे
आप 'बी.पी.एल. कार्ड' और 'राशन' रखकर ही देख लें।


चिट्ठी पत्र- 
गाँव- सल्लन, 
तहसील- याला चक, जिला- कठुआ
पिन कोड- 184144
दूरभाष-7006229144
मेल आई. डी.- Pk11977777@gmail.com



प्रस्तुति :- 

कमल जीत चौधरी
काली बड़ी , साम्बा { जे० & के० }
दूरभाष - ०९४१९२७४४०३
ई मेल - kamal.j.choudhary@gmail.com


फोटोग्राफ: कुमार कृष्‍ण शर्मा

Sunday, June 7, 2020

पीयूष कुमार


निवासी: बागबाहरा, छत्तीसगढ़
उपसंपादक: सर्वनाम
संप्रति: सहायक प्राध्यापक
साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशन
संपर्क: 8839072306
मेल: piyush3874@gmail.com

छत्तीसगढ़ निवासी पीयूष जितने अच्छे कवि हैं उतने ही अच्छे  इंसान भी हैं। सरलता, सहजता, संवेदना और पंक्ति में सबसे पीछे खड़े व्यक्ति की चिंता करना इनके मानवीय व्यक्तित्व का हिस्सा है। चिंता इतनी कि लॉक डाउन के दौरान जब इनको पता चला कि कश्मीर के एक हिस्से में छत्तीसगढ़ के कुछ मजदूर फंसे हुए हैं तो चिंतित हो कर मुझे जम्मूे में फोन किया कि अगर किसी प्रकार से मदद हो सकती है तो की जाएं। खैर, कश्मीर के मेरे मित्रों ने हमेशा की तरह मुझे इस बार भी निराश नहीं किया। पीयूष 
छत्तीसगढ़  की लोक संस्कृति के साथ साथ अन्य  मुद्दों और विभिन्न पहलुओं की जानकारी नियमित रूप से सोशल मीडिया के माध्यकम से देते रहते हैं। इनकी अपनी रचनाओं में अगर रोजमर्रा के घटनाक्रमों को लेकर रोष और लूट व मुनाफे की नींव पर टिके बाजार के खिलाफ खड़े होने का साहस है तो वहीं प्रेम के लिए सूक्ष्मता और संवेदना भी। छत्तीसगढ़ के लोक  बिंबों के साथ साथ आधुनिक जीवन शैली को पीपूष अपनी रचनाओं में पिरोना बहुत अच्छे तरीके से जानते हैं। हार्दिक शुभकामनाओं के साथ ‘खुलते किबाड़’ पर पहली बार सहर्ष प्रस्तुत हैं उनकी कुछ रचनाएं।


 
बारिश मे सेमरसोत

हर साल
आषाढ़ की पहली नमी सोखकर
सेमरसोत का प्यासा जंगल
बिखेर देता है जमीन पर 'पुटू'
ताकि सोनापति उसे दोने में लेकर
पाढ़ी के मोड़ पर
चालीस रुपये में बेच सके

सवारी बस की रफ्तार
कम होती है पाढ़ी मोड़ पर
खिड़की से सिर निकालकर
जोर से पूछता है कंडक्टर
बीस में देगी ?
महुए के नीचे भीगती बैठी सोनापति
इनकार में सर हिलाती है
किराए में पांच रुपये भी
कम नही करनेवाला कंडक्टर बडबडाता है
इन लोगों का भी भाव बढ़ गया है

बस में बैठा कवि सोचता है
विकसित सभ्यता की चमक में
सस्ते में मिले संसाधनों
और श्रम के लूट का
मिट्टी और पसीना शामिल है
ऐसे वक्त में सोनापति का
इनकार में सिर हिलाना
एक जरूरी घटना है

मंथर सेमरसोत से कवि पूछता है
यह इनकार जरूरी था ?
वह सहमति में सिर हिलाती
उछाह लेने लगती है
और भीगता हुआ जंगल मुस्कुराता है
आषाढ़ की इस बारिश में

(सेमरसोत वन अभ्यारण्य छत्तीसगढ़ के उत्तरी हिस्से सरगुजा मे अवस्थित है। इसका
नाम यहाँ बहनेवाली सेमरसोत नदी पर पड़ा है। 'पुटू' साल के जंगलों में आषाढ़ में
उगनेवाला एक फंगस है जिसकी सब्जी बनती है और यह बहुत महंगा बिकता है।)


 
वापसी

काश! मुमकिन हो पाता
मेहनतकश के लिए भी
तीन पग में तीन लोकों को नापना
और स्वामी बन जाना सकल का
पर वह नहीं हो सकता
उनका मालिक जरूर हो सकता है
जिसने लौटा दिया है उन्हें

स्पंज आयरन फैक्ट्री के
बन्द दरवाजे के बाहर खड़े रहकर
किया होगा जब फैसला वापसी का
आंख धुंधली हुई होगी लोहे से उड़ी राख सी
पिघले लोहे सा हो गया होगा मन
जो पसर गया होगा देह में
कि अब लौटना ही है

दिल्ली से देवरिया अलीगढ़ आरा जहानाबाद
या राजस्थान के किसी गांव के लिए
लौट रहे हैं जत्थे
रायपुर बिलासपुर कोरबा रायगढ़ से भी
निकल पड़े हैं
गढ़वा रंका और डाल्टनगंज के लिए
एक - एक जोड़ी बहुत से पांव
मुंह फेर लिया है कर्मभूमि ने
यहां मिट्टी भी अपनी न रही
जो देह को थाम ले मरने के बाद
पर जन्मभूमि तो थाम ही लेगी
इसी भरोसे का लहू पैरों में लिए
चल निकले हैं वे
पांच सौ - हजार किलोमीटर के लिए

यहां और वहां की मौत के बीच की
बाकी जिंदगी में चल रहे हैं कदम
इन कदमों के कई इम्तहान अभी बाकी है
कहीं मुर्गा बना दिये जाने का
या मां बहन की गालियों के साथ
दौड़ा दिए जाने का
वे सह लेंगे यह सब बुद्ध की तरह
संसाधनों और श्रम की लूट से चमचमाती
इस सभ्यता में
बुद्धत्व के लिए ज्ञान नही
मजबूर कमजोर और लाचार होना जरूरी है

जिस शहर को बनाया संवारा
उसकी गलियों से जाना मुमकिन नही
इसलिए शहरों के बाईपास से होकर
वापस जा रहे हैं कामगार
शहर गुजरा तो गांव आये
गांव आया तो घर आये
घरों के सामने खेलते हंसते बच्चों को देखकर
काँधे पर लदा उधड़े सीवन वाला पिट्ठू बैग
आह भरता है
जिसके भीतर इस बार
बीस रुपये की मिठाई भी नहीं है
न कोई छोटा खिलौना
और न ही किसी नन्हे का कपड़ा

वापसी नियम है
लाखों सालों में पानी वापस आ जाता है
युद्ध से भी लौट आता है जीवित बचा सैनिक
निकल आती है कटे पेड़ से कोंपल
आ ही जाता है जहाज का पंछी
बच्चों की शक्ल में आ जाते हैं पूर्वज
पेड़ का बीज जमीन पर गिरकर
उग ही जाता है फिर से

कमबख्त भूख भी आ ही जाती है बार बार
मरती नही यह
कहीं बन्द नही होती
काश भूख पर ताला लगाया जा सकता
ताकि न लौटे
कभी कोई इस तरह



गार्गी !

गार्गी !
कभी जनक की सभा में
जब याज्ञवल्क्य से
प्रतिप्रश्न किया था तुमने
ऋषि क्रोधित हो उठे थे एक बार
पर शास्त्रार्थ समुचित संम्पन्न हो गया था

गार्गी !
आज प्रश्न करके देखो
कहो - आसमान से ऊंचा
और पृथ्वी के नीचे क्या है?
तुम्हारे प्रश्न के उत्तर में
आसमान से ऊँची पताका लिए
पृथ्वी के नीचे
पतन की अनन्त गहराइयों तक
कुत्सित अट्टहास के साथ
प्रतिप्रश्न लिए
एक विराट कुपुरुष
नग्न खड़ा है

अभी व्यस्त हैं जनक
उनकी ओर उम्मीद से मत देखो
इधर देखो
याज्ञवल्क्य लिख रहे हैं
वृहदाराजक उपनिषद
नवीन आर्यावर्त का !

 


ऑनलाइन मन

जाड़ों की इन रातों में
मैं गले तक खींचता हूँ
तुम्हारी हंसी का कम्बल
और व्हाट्स एप्प में
देखता हूँ तुम्हे ऑनलाइन
पर कुछ नही कहता
तुम भी चुप ही रहती हो
यह ऑनलाइन
हमारे बीच का पुल है

उधर जंगल में
नदी सिमट रही खुद में
और किनारों पर
छोड़ जा रही मन की नमी
ताकि सुबह
वहां तुम्हारा नाम लिख सकूं
प्रेम की यह नदी
नहीं सूखेगी गर्मियों में भी
वह भी रहेगी हमेशा
ऑनलाइन

तुम्हारा स्टेटस देखता हूँ
इमोजी में मुस्कुराता हूँ
तुम भी वैसी ही मुस्कुराती हो
दो बार...
सोचता हूँ
इस चित्रलिपि ने
क्या सिंधु सभ्यता में भी इसी तरह
इमोशन को जाहिर किया होगा ?

तुम्हारा लास्ट सीन दिख रहा है
मैं भी तीन डॉट्स छोड़कर
मोबाइल डाटा ऑफ करता हूँ
तुम्हारे ख्वाब संजोए हुए हूँ
कोई स्क्रीन शॉट लेकर
गैलरी में संजोता हो जैसे

मन रे !
हमेशा ऑनलाइन ही रहना




ढिंग एक्सप्रेस

धान के खेतों से उपजी
टखने भर मिट्टी पानी की ऊर्जा
उसकी रगों से होकर
ट्रेक पर सनसनाती भाग रही है
और उसके कदमो के नीचे की जमीन
सुनहरी होती जाती है

गूगल में खोजकर उसकी जाति
कुछ लोग निराश हो रहे हैं
उधर उत्तरकाशी में अभी तीन महीनों में
एक भी लड़की ने जन्म नही लिया है
इधर एक पूंजीवादी खेल हार कर
सुस्ता रहा है अभी
इसी समय जमीन से जुड़े दस लोग
मार दिए गए हैं जमीन की खातिर

उसके अंग्रेजी नही बोल पाने को
कमजोरी बतानेवाला प्रवक्ता चुप है आज
हैरान हैं अभिजात्य मीडिया के कैमरे
एक दुबली सांवली फर्राटा भरती देह
उन्हें खींच रही बार बार
उसकी गति इतनी तेज है कि
उनके बने बनाये फ्रेम से बाहर हो जाती है

गोल्डन गर्ल दौड़ रही है पटरियों पर
चन्द्रयान भी भेद रहा अनंत को
यह दो दृश्य एक साथ हैं
राष्ट्रगान बज रहा है
मैडल लटकाए बिटिया मुस्कुरा रही है
लड़कियां तैयार हो रही हैं भागने को
ढिंग एक्सप्रेस की तरह

(हिमा दास को ढिंग एक्सप्रेस कहा जाता है।)


प्रस्तुति: कुमार कृष्ण  शर्मा




Wednesday, June 3, 2020

शेख मोहम्मद कल्याण


निश्चित विचार से युक्त शेख मोहम्‍मद कल्‍याण की कविताएँ अपने आत्मीय भावों से घर , आँगन , गाँव , कस्बे व शहर को उकेरती हैं। यह आम आदमी की कविताएं हैं। आदमी को अपने हक़ के लिए लड़ना सिखाती हैं। प्रेम कविताओं और प्रकृति के मानवीय बिम्बों के लिए कल्याण खास पहचाने जाएंगे। प्रस्तुत कविताएं उनके काव्‍य संग्रह 'पहाड़ अपनी जगह छोड़ रहे हैं' से साभार ली गई हैं।
 
(अपरिहार्य कारणों के चलते नई पोस्‍ट करने में जरूरत से ज्यादा देर हुई, उसके लिए खेद है।) 



पहली तारीख

पहली तारीख का काला साया
जब-जब भी मंडराने लगता
घुमड़ आते हैं काले बादल
आज फिर पहली तारीख है
पिता के हाथ में
खुजली हुई होगी
मोल भावों में तुली होगी पेंशन की रकम
बूढ़ी मां ने फिर दोहराया होगा
नए सूट का पुराना स्‍वप्‍न
और नन्‍हें पैरों ने भी नापी होंगी
जूतों की कई दुकानें
और मकान के झड़ते
पलस्‍तर से झांकती ईंटें
आज फिर खूब हंसी होंगी
क्‍योंकि
आज पहली तारीख है
सपनों के जिंदा और मर जाने का दिन

आज पहली तारीख है।





बहुत दिनों बाद

बहुत दिनों बाद
कोयल ने सुर में गाया
बागों में नाचे मोर
और कवियों ने रचीं
प्रेम कविताएं
बहुत दिनों बाद
रंगीन तितलियों ने नापा आसान
और दुबके खरगोशों ने जमीन
समय के खिलाफ
कइयों ने मारीं चीखें
एक साथ
बहुत दिनों बाद। 




तुम्‍हारे ही बहाने से... 

शाम का किया इंतजार
ढलते सूरज की तरफ
चेहरा घुमा बनाई कई आकृतियां
समय को झिंझोड़ा कई बार
तुम्‍हारे ही बहाने से...
रात को देखा
खुद से भी व्‍याकुल
तड़पते शब्‍द देखे
कागज पर आने को
शरारती हवा जो छूकर निकल गई
पास से
फैल गई ब्रह्मांड में
तितलियों के रंग चुराने चाहे
उड़ना चाहा आसमान की ओर
लौट लौट जाना चाहा
बचपन में
किताबों को गटगट पी जाना चाहा
लैला-मजनू
शीरी-फरहाद के किस्‍से
फिर
फिर चाहे पढ़ने
तुम्‍हारे ही बहाने से...
यही नही प्रिय
काम से लौटतीं महिलाओं की पीड़ाओं को
महसूस किया
मजदूर के हाथों से रिसते लहू की
बाजारबाद में, रोटी तक पहुंचने की यात्रा को
महसूस किया
तुम्‍हारे ही बहाने से।






बोल के लब आजाद हैं तेरे
(फैज अहमद फैज को समर्पित)

माना की बोलने पर बंदी लगी है
माना कि राजा के आदमी
खींच लेंगे तुम्‍हारी जुबान कभी भी
बह रही
यह मनमोहक हवा भी
तुम्‍हारी चुगली कर देगी राजा के दरबार में
लेकिन तुम सपने देखना मत छोड़ना
हालाांकि
तुम्‍हारी रातों में घुस आएगा
लंबे दांतों वाला काला दैत्‍य
चाह कर भी भाग नहीं  पाओगे तुम
मेरे बच्‍चे
कह रहे हैं सारे
राजा की बिछी बिसात में
बहुत से मोहरे हैं
जो राजा के कहने पर चलते हैं
तुम उलझ जाओगे
शतरंज के इस व्‍यूह में
इस व्‍यूह केवल राजा ही तोड़ सकता है
मेरे बच्‍चे
कह रहे हैं सारे
बेशक तुम्‍हारे हाथ में तिरंगा है
बेशक तुमने गाया है राष्‍ट्रगीत
तुमने बेशक सींचा है
इस देश का बगीचा
अपने लहू से
तुमने उड़ाई है पतंग बेशक
काटे जा सकते हैं तुम्‍हारे हाथ
यह वक्‍त के हाकिम हैं
कह रहे हैं सारे
राजा कहां देखता है आईना
उसे मत भेंट करो
उसे आईनों से सख्‍त नफरत है
आईना दिखाता है चेहरा
असली चेहरा
राजा को लगता है
समय पड़ा है उसकी जेब में
कह रहे हैं सारे
लेकिन मैं कहता हूं मेरे बच्‍चे
जुल्‍म के खिलाफ बोलने की
जितनी आज जरूरत है
शायद इससे पहले कभी नहीं थी
कि हम सब की आजादी
बचाए रखने के लिए
हम सब का बोलना जरूरी है
बोल कि लब आजाद हैं तेरे। 



सम्पर्क :-
नरवाल पाई , सतवारी
जम्मू , जे० & के०
दूरभाष - 08825063844
ई मेल - smkalyan2010@gmail.com
प्रस्‍तुति और फोटोग्राफ: कुमार कृष्‍ण शर्मा


Saturday, July 1, 2017

विद्या रत्न आसी



हाल
ही में पंडित विद्या रत्न आसी के गजल संग्रहजिंदगी के मारे लोग’ (चेतना प्रकाशन लुधियाना) का विचोमन जम्मू में अभिनव थिएटर में किया गया। जिस संख्या में लोगों ने कार्यक्रम में हिस्सा लिया, उसने दिखा दिया कि आसी हर दिल अजीज शायर हैं, उनका कितना सम्मान किया जाता है। 152 पन्नों के संग्रह में कुल 93 गजलें हैं।
‘खुलते किबाड’ पहली बार आसी की गजलों को सहर्ष प्रस्तुत कर रहा है। गजलें इसी संग्रह से हैं। प्रस्तुति के लिए बेहद छोटी बहर की गजलों का ही चयन किया गया है।




गजल

जरा सा आदमी हूं
बला का आदमी हूं

कहा ना आदमी हूं
सुना क्या आदमी हूं

कहां का आदमी हूं
मैं दिखता आदमी हूं

तेरे ही फजल से मैं
खुदाया आदमी हूं

जिंदा मुर्दा
डरा सा आदमी हूं

मुझे क्या जाब्तों से
मैं घर का आदमी हूं

खुदा वाले तो तुम हो
मैं सीधा आदमी हूं

निहायत कम हूं इंसा
जियादा आदमी हूं

जुबां, किरदार कुछ है
मैं कैसा आदमी हूं

यह दो ही सूरतें हैं
खुदा या आदमी हूं

कभी मिल कर तो देखो
मैं अच्छा आदमी हूं

मगर बा होश मिलना
मैं जिंदा आदमी हूं

सिवाए सब्र आसी
करूं क्या आदमी हूं




गजल

यह हाहाकार कुछ है
गलत सरकार कुछ है

सियासत, यार कुछ है
वतन से प्यार कुछ है

मुहब्बत, प्यार कुछ है
हमें दरकार कुछ है

ये इस उस पार कुछ है
मजा मंझदार कुछ है

कहीं इसरार कुछ है
उफक के पार कुछ है

दवा, तीमार कुछ है
मुझे आजार कुछ है

तुम वो हो मैं हूं
समय की मार कुछ है

किसे तेरी खबर दूं
कहीं घर बार कुछ है


दिलों में रब्त--बाहम
अगर दुशवार कुछ है

सुकुं से, चैन से हूं
यकीनन हार कुछ है

मुहब्बत और आसी
पस--दीवार कुछ है






गजल

तेज रफ्तारियां
भूख बीमारियां

नेक किरदारियां
झूठ मक्कारियां

इक सुकूं के लिए
उम्र भर ख्वारियां

चांदनी धूप में
कब रही यारियां

जिंदगी जी के मर
छोड़ लाचारियां

आसमां से उतर
छोड़ सरदारियां

हम भले या बुरे
तेरी फनकारियां

घर से उंची कर
चार दीवारियां

कुछ मुसाफिर गए
कुछ की तैयारियां

तू भी आसी संभल
छोड़ खुद्दारियां





गजल

रात अच्छा लगा
चांद तुम सा लगा

गया जिस पे दिल
कौन कैसा लगा

हीर रांझा लगी
हीर रांझा लगा

जिस किसी से मिले
कम जियादा लगा

खुद को पहचानते
इक जमाना लगा

अपनी अपनी नजर
कौन कैसा लगा

कुछ पकड़ में नहीं
सब हवा सा लगा

खेल खेला कोई
घर किसी का लगा

बस कि रिसता रहे
जख्म ऐसा लगा

कल की छोड़ो मियां
आज कैसा लगा

तुम मेरे हो गए
वक्त कितना लगा

जब कि तैराक तुम
पार मैं जा लगा

शख्स आसी फजूल
शायर अच्छा लगा



गजल

इक जमाना था
आशियाना था

क्या छुपाना था
गुम पुराना था

दिल से मिलते थे
क्या जमाना था

जान भी देते
आजमाना था

फूल कर रोए
मुस्कुराना था

जी लिया जब तक
आब--दाना था

जान जानी थी
दिल को आना था

क्या गिले शिकवे
दोस्ताना था

आबरू कैसी
घर बचाना था

इश्क करतब था
कर दिखाना था

हम तो थे नादां
तू तो दाना था

सौ ठिकाने थे
बे-ठिकाना था

कौन क्या आसी
इक दीवाना था



गजल

वो भूलता थोड़े ही है
इतना बुरा थोड़े ही है

तेरा नसीब, मेरा नसीब
मेरा तिरा थोड़े ही है

जिंदगी है जिंदगी
कब करबला थोड़े ही है

शायर बला का तू सही
लेकिन चला थोड़े ही है

आसी मियां, मोमिन गलत
पागल हुआ थोड़े ही है

मंदिर में तू मस्जिद में तू
तू, हर जगह थोड़े ही है

तेरा खुदा, तेरा खुदा
मेरा खुदा, थोड़े ही है

दूर का ढोल सुहाना मैं
पाला पड़ा थोड़े ही है

दोजख से जन्नत मुंतकिल
आसी मरा थोड़े ही है




गजल

क्या कहा, जिंदगी
बद्दुआ जिंदगी

इब्तदा, जिंदगी
इंतहा, जिंदगी

जिंदगी है खुदा
है खुदा जिंदगी

बेखुदी चाहिए
कुछ पिला जिंदगी

जिस बहाने से
रास , जिंदगी

तेरा आशिक हूं मैं
कुछ सुना जिंदगी

छोड़ शिकवे गिले
खिलखिला जिंदगी

बताएं तुझे
है ये क्या जिंदगी

कूचा गर्दी ये छोड़
मेरे जिंदगी

झूठ सच ही सुना
कुछ सुना, जिंदगी

तेरा मकरूज हूं
मैं तिरा, जिंदगी

खूब नाचूंगा मैं
तू नचा, जिंदगी

अपना आसी संभाल
मैं चला, जिंदगी




साभार
जिंदगी के मारे लोग, चेतना प्रकाशन लुधियाना
फोटो: राजकुमार बहरूपिया के फेसबुक पेज से