Tuesday, September 20, 2022

पुलकित शर्मा

युवा शायर पुलकित शर्मा 28 साल के हैं और अमृतसर(पंजाब) से नाता रखते हैं। पुलकित पुणे में एक आईटी कंपनी में बतौर सीनियर साफ्टवेयर इंजीनियर कार्यरत हैं। पुलकित ने 2018 से ग़ज़लें, नज़्में कहना शुरू किया है और अदब के जानकारों से, अदीबों से उन्हें बहुत मुहब्बत मिली है। पुलकित अब तक पुणे, मुम्बई और पंजाब में कई जगह कविता पाठ कर चुके हैं।
पुलकित अपने अंदर शायरी की कला के होने का श्रेय अपने पूज्य पिता जी को देते हैं और इसे अपने पिता जी का आशीर्वाद ही मानते हैं। पुलकित के पिता जी, स्वर्गीय "पंडित किशोर शर्मा जी" एक थिएटर कलाकार थे जिन्होंने अपने जीवनकाल में कई पंजाबी और हिंदी फ़िल्मों में बतौर अभिनेता काम किया था।
पुलकित से मेरी मुलाकात लुधियाना के हरदिल अजीज शायर मुकेश आलम के घर पर हुई थी। सादा तबयित, बेहद मिलनसार और बहुत संवेदनशील पुलकित की कुछ रचनाएं अनंत शुभकामनाओं के साथ आपके साथ साझा कर रहा हूं। गजल और नज्म से पहले उनके कुछ अशआर 
 

चारागर इक अर्ज़ करूँ मैं? मेरी नब्ज़ न देख..
तेरा इल्म सलामी लाएक़, मेरा ज़ख़्म फ़रेब

देख के अपनी चादर पैर पसारे मैंने
एक फटी चादर थी, ख़ैर पसारे मैंने

राम  लिखो  पत्थर  पर  तो  पानी  क़ाबू  में  रहता  है 
ऐसा ही इक पत्थर मेरी आँख पे रख दो आज के आज

क़ब्ल इसके ज़िन्दगी से राब्ता हरगिज़ न था
मौत देखी घर में जब तो ज़िन्दगी महसूस की

साँस अपनी दौड़ती है उम्र भर
मुँह के बल जब गिर पड़े तो मौत है




गजल

काम चलाया कुछ दिन मैंने जैसे तैसे
दिल न लगाया कुछ दिन मैंने जैसे तैसे

दिल मेरा हिज्राँ में रोया छटपट छटपट
चुप न कराया कुछ दिन मैंने जैसे तैसे

ज़ीस्त खड़ी थी डमरू, डफ़ली, चिमटा लेकर
नाच दिखाया कुछ दिन मैंने जैसे तैसे

ख़ुश होकर जिस तन्हाई को दूर किया था
पास बुलाया कुछ दिन मैंने जैसे तैसे

मुझको पाना सब के बस की बात नहीं थी
दाम घटाया कुछ दिन मैंने जैसे तैसे



गजल

खेल रहे जो इतना तनकर खेल रहे..
जाने आख़िर किस की शह पर खेल रहे..

खेल था क्या ये इनके बाबा दादा का ?
कौन हैं जो यूँ अफ़सर बनकर खेल रहे ?

कुर्सी पर तशरीफ़ न रख दे नस्ल नयी
कुर्सी वाले कितना जमकर खेल रहे..

इस रस्ते पे वो जो थोड़ा आगे हैं
पिछलों को बस ठोकर देकर खेल रहे..

बाहर वाला अंदर कैसे आएगा ?
अंदर वाले अंदर-अंदर खेल रहे..




गजल

काश  होता  'चुटकियों से',  चुटकियों में  खेल ऐसा
याद घर की जब भी आती चुटकियों में जा पहुँचता

मन  मिरा  क़ाबू  से  बाहर  मनचला  हो  घूमता  है
काश सातों चक्र खुलते मन का दरिया पार होता

बाँध  पट्टी  आँख  पर  मुझको  ख़ुदा  को  ढूँढना  है
गर ख़ुदा मुझ को घुमाकर खेल में वापिस न लौटा ?

काश होते 'तुम' कहानी में मिरी किरदार कोई !
काश मेरी ज़िन्दगी का एक नाटक पेश होता..

काश 'मैं' हर इक कहानी में बनूँ किरदार कोई !
हाँ अगर ऐसा हुआ, मेरा ख़ला का रोल होगा..



गजल

आँख नम थी, ग़मज़दा थी, सिसकियाँ लेने लगी
पतझडों में एक तितली, सिसकियाँ लेने लगी

अब तलक जो ख़ुश बहुत थी रौनकों को देख कर..
गुम हुई मेले में, बच्ची, सिसकियाँ लेने लगी

फिर लबालब इक समंदर वहशतों से भर गया
और इक सहमी सी कश्ती, सिसकियाँ लेने लगी

हम हुए आज़ाद, दोनों ही तरफ़ लाशें थीं बस
लाश ढोती.. रेल-पटरी, सिसकियाँ लेने लगी

एक शायर बज़्म में इक शेर कहता रो पड़ा
साथ उसके बज़्म सारी सिसकियाँ लेने लगी




गजल

दरिया का मन 'भरा हुआ' तो क्या होगा ?
गर मैं उस में 'डूब गया' तो क्या होगा ?

रक़्स करें हैं जो यह 'लहरें' दरिया पर..
दरिया 'इन में' डूब गया तो क्या होगा ?

'सहरा', जिसके हर ज़र्रे में रेत बसी..
इसने गर चोला बदला तो क्या होगा ?

रेत कहे सहरा में तन्हा रहती है..
रेत का मन हो रोने का तो क्या होगा ?

पूछ रही बुतकार को मिट्टी सच कहियो..
इतने बुत हैं.. एक घटा तो क्या होगा ?




गजल

हम तितली को हाथ लगाने वाले लोग
या'नी हम हैं बाज़ न आने वाले लोग

हम दीवार बना कर ख़ुश हो जाते हैं
हम रिश्तों से जान छुड़ाने वाले लोग

'इक किरदार' से पूरी उम्र नहीं कटती
हम चेहरों का खेल बनाने वाले लोग

हमसे पूछो कौन ग़लत है फिर देखो
हम उँगली का नाच दिखाने वाले लोग

रंग बना कर.. रब ने हम पर रहमत की..
हम..रंगों से ज़ात बनाने वाले लोग..




नज्‍म

ख़ुदा की चाल

अगर सोचो हक़ीक़त में,
ख़ुदा की चाल निकली तो..
हमारा साँस लेना क्या पता मालूम करना हो !
कि जैसे हम..
हर इक शय जाँचते हैं औ' परखते हैं..
ख़ुदा हमको बनाकर उम्र भर बस देखता हो तो !

अगर उसकी निगाहों में ग़लत शय हम भी निकले तब !
हमारे साँस लेने का कोई मतलब न निकला जब !
ख़ुदा जो देख कर सोचे,
नहीं वो बात रचना में,
तभी साँचा बदल दे वो,
हमें फिर से बनाने को..

किसी दिन रोज़ के जैसे..
भरी लेकिन न छोड़ी तो,
हमारी साँस का पैंडा अधूरा ही रहेगा तब।

मगर जो जी रहे थे हम,
जिसे जीवन समझते थे,
था जीवन ही नहीं वो तो
ख़ुदा का खेल था सारा..

कहे कोई ख़ुदा से ये,
हमें फिर से नहीं बनना,
सफ़र फिर से नहीं करना,
सफ़र में क्या नहीं देखा,
कई रातें भयानक थीं,
कई दिन थे जो क्यूँ ही थे,
सभी रिश्ते, सभी नाते, निभाए हैं मगर अब बस,
ख़ुशी से आज तक ग़म को सहा लेकिन न जाना था,
कि सारे ग़म तो हमको जाँचने का एक ज़रिया थे,
कि हम जो सोचते थे वो ख़ुदा सब नोट करता था,
तभी इक दिन, तभी इक दिन..
हुआ ऐसा कि वो आई जिसे सब मौत कहते हैं..
कि मतलब हम ख़ुदा के टेस्ट में अब फ़ेल होकर फिर..
चले थे दूसरे साँचे..ख़ुदा ने ली नई मिट्टी..नए साँचे में भर कर के..
लगा फिर से मुसीबत को तरीक़े से बनाने वो..

अगर सोचो हक़ीक़त में, 
ख़ुदा की चाल निकली तो..

अगर वो जान कर के..बूझ के.. करता हो ऐसा तो !
पुरानी मिक्स करता हो, नई मिट्टी में तो सोचो,
ज़रुरी तो नहीं उसका हमेशा ही लगे रहना,
उसे क्या फ़र्क पड़ता है, कि हम कैसे भी निकलें.. पर..
उसे करना वही है जो भी उसने सोच रक्खा है..
उसे फिर से बनाना है, हमें फिर से बनाना है, बनाते ही तो जाना है..
किसे मालूम उसको क्या मज़ा आता है ये कर के..
मगर ये भी हो सकता है...कहीं ये बात निकली तो ?
उसे गर बस यही इक काम करने का पता हो तो ?
तो फिर अब बात ऐसी है..
ज़रा सोचो तो सीधी है..
सभी जीवन हमारे बस कटे हैं फ़ेल हो कर के..
ख़ुदा करता नहीं है पास, अपने पेट की ख़ातिर..
चलो इस बात को मानें कि ये जीवन नहीं जीवन..
नहीं होगा कभी कोई हमारा अस्ल में जीवन..
ख़ुदा शतरंज-ए-हस्ती में हमेशा 'चेक' ही देता है,
रखें हम पाँव जिस ख़ाने, वहीं पर मात निश्चित है।

अगर सोचो हक़ीक़त में,
हमारा सोचना ऐसा भी उसकी चाल निकली तो !
ख़ुदा ने सोच रक्खा हो अलग जीवन हमारा तो !
ख़ुदा की सम्त को मंज़र अज़ल ही से तो ऐसा है..
क़लम पकड़े वो हर दम ही ज़मीं की ओर तकता है..
ख़ुदा लेकर के बैठा है,
'पुरानी औ' नई मिट्टी'।


पुलकित शर्मा
अमृतसर, पंजाब
9834923481


प्रस्‍तुति और फोटाेग्राफ- कुमार कृष्‍ण शर्मा
94191-84412

Sunday, August 28, 2022

मुझे मंदिर मस्जिद के बीच रोटी चाहिए



दिसंबर माह की 11 तारीख का सर्द दिन था। मैं अपनी बाइक पर विक्रम चौक जम्‍मू से जल्‍द से जल्‍द झेलम रिजार्ट पहुंचना चाहता था। कारण भी साफ था। मेरी पसंदीदा शायरों में से एक निदा फ़ाज़ली से मुलाकात की संभावना थी। फाजली जश्‍न-ए-फैज़ में हिस्‍सा लेने के लिए जम्‍मू पहुंचे हुए थे।

झेलम रिजार्ट में कुछ इंतजार करने के बाद फ़ाज़ली साहब पहुंचे और हम पत्रकारों से बात करने के लिए सहमत हो गए। दैनिक जागरण के वरिष्‍ठ पत्रकार और बड़े भाई अशोक कुमार, मौजूदा समय में आउटलुक के लिए काम कर रहे पत्रकार भाई आशुतोष शर्मा भी मेरे साथ थे। हालांकि निदा फ़ाज़ली जम्‍मू में बाहरी राज्‍य के मोबाइल फोन सिम के काम नहीं करने पर वह खासे गुस्‍से में थे। उनके इसी गुस्‍से ने उनसे साथ होने वाली करीब आधे घंटे की मुलाकात को जरूरी तपिश भी बख्‍शी। देश की राजीनति और राजनेता खासतौर पर फ़ाज़ली की तपिश के निशाने पर रहे।

 


मुझे मंदिर और मस्जिद के बीच रोटी चाहिए

निदा फ़ाज़ली जी ने बिना किसी औपचारिकता के अपने अहसासों को शब्‍द देना शुरू किया। उनका कहना था कि आप जिस वर्ग के हाते हैं, आपके लेखन में, सोच में, आपके शब्‍दों में वो वर्ग झांकता है। सिर्फ कुर्सी के लिए राजनीति ने इतिहास के साथ, भूगोल के साथ और आम आदमी के साथ मजाक किया है। हमें बांट के रख दिया है। आम आदमी जो रिक्‍शा चला रहा है उसे उलझा दिया है। देख यह मजिस्‍द है और यह मंदिर है, तू बीच में खड़ा है। मुझे मंदिर और मस्जिद के बीच रोटी चाहिए। उन्‍होंने अपनी बात कुछ इस तरह से कही-

बच्‍चा बोला देख कर मस्जिद आलीशान

अल्‍लाह, तेरे एक को इतना बढ़ा मकान।



देश को दो बार बांटा गया

फ़ाज़ली का कहना था के राजनीति ने देश को दो बार बांटा। पहले भारत-पाकिस्‍तान के रूप में और दूसरा बहुसंख्‍यक और अल्‍पसंख्‍यक बना कर। इसने पूरे देश को अपाहिज बना दिया है। अब तो साहित्‍य में भी धर्म आ गया है। जो आदमी हाशिए पर था, वह अब भी हाशिए पर खड़ा है। उन्‍होंने अपनी बात कुछ इस तरह से कही-

हमको कब जुड़ने दिया जब भी जुड़े बांटा गया

रास्‍ते से मिलने वाला हर रास्‍ता काटा गया।

कौन बतलाए सभी अल्‍लाह के धंधों में हैं

किस तरफ दालें हुईं रुखसत किधर आटा गया।

वो लुटेरा था मगर उसका मुसलमां नाम था

बस इसी एक जुर्म पर सदियों मुझे डांटा गया।

 


फराज अहमद ने बताई पाक की हकीकत

फ़ाज़ली जी देश के बंटवारे से भी काफी दुखी थे। उनका कहना था कि दोनो देशों में कोई अंतर नहीं है। दोनों का एक ही हाल है। उनका कहना था कि वह एक बार पाक के मशहूर उर्दू शायर अहमद फराज़ के साथ पटना से दरभंगा जा रहे थे। सड़क बहुत खराब थी। मैंने फराज़ से कहा कि आय एम सॉरी, सड़क बहुत खराब है। इस पर फराज़ कहने लगा कि वहां भी यही हाल है। फ़ाज़ली ने सवाल किया कि अगर दोनों का यही हाल है तो बीच में लकीर क्‍यों खींची।

 


शब्‍दों का हो रहा सबसे बड़ा अनादर

फ़ाज़ली जी का कहना था कि आज की समस्‍या बहुत बड़ी है। जिस देश में रामायण पढ़ी जाती है, गीता, बाइबिल, कुरान पढ़ी, उसी देश में सबसे बड़ा अनादर शब्‍द का हो रहा है।

क्रिकेटर, नेता, एक्‍टर हर महफिल की शान

स्‍कूलों की किताबों में कैद है गालिब का दीवान।

उनके अनुसार रही सही कसर अखबारों ने पूरी कर दी है। अब समाचार पत्र अपने मकसद से भटक गए हैं। हाल यह है कि आज  की अखबारों में बेशक्‍ल लीडरों की शक्‍लें नजर आती हैं। क्‍या किसी अखबार ने हब्‍बा खातून की नज्‍़म छापी, क्‍या किसी ने यह बताने की कोशिश की कि ललेश्‍वरी देवी शेख-उल-आलम की गुरु थी।

 


मानवता में मेरा विश्‍वास और पक्‍का हो जाता है

गिरते राजनीति के स्‍तर, कट्टरवाद, उन्‍माद, यु्द्ध की आशंका, असहमति के खतरे की चिंता के बावजूद फ़ाज़ली का कहना था कि जीवन खूबसूरत है। उनका हंसते हुए कहना था कि जब मैं किसी को सुबह कबूतरों को दाना खिलाते, पूरे चांद को ताज महल पर रोशनी लुटाते या मां की गोद में किसी बच्‍चे को मुस्‍कुराते हुए देखता हूं तो प्रेम और मानवता में मेरा विश्‍वास और पक्‍का हो जाता है।

 

प्रस्‍तुति- कुमार कृष्‍ण शर्मा

94191-84412

(अंतिम दो चित्रों के लिए सृजन शर्मा का आभार)


Sunday, August 14, 2022

मुकेश आलम


लुधियाना में रहने वाले शायर मुकेश आलम से मेरा पहली बार मिलना मलेरकोटला में आयोजित होने वाले मुशायरे में  हुआ। पहली ही मुलाकात में उन्‍होंने ऐसे गले लगाया जैसे कोई बरसों पुराना दोस्‍त मिल गया हो। ऐसा जीवन में बहुत कम होता है कि कोई पहली बार मिले और ऐसा लगे कि हम लोग पहले से परिचित हैं। पंजाब में पटियाला यूनिवर्सिटी के पंजाबी विभाग के प्रो. सुरजीत सिंह, उर्दू के शायर अमरदीप‍ सिंह और मुकेश आलम ऐसे ही दुर्लभ व्‍यक्तित्‍व हैं। यह मेरा सौभाग्‍य है कि ऐसे लोग मेरे मित्र हैं। बड़ी सरलता और सहजता के साथ गहरी और सूक्ष्‍म बात कह जाना मुकेश आलम की विशेषता है। 

आज दरवेश शायर मुकेश आलम के जन्‍मदिन पर पूरे सम्‍मान के साथ उनकी कुछ गजलें साझा कर रहा हूं।


 
गजल

ऐ मेरी आवारगी! ये क्या तमाशा कर दिया

तूने मुझको रास्ता करना था, छाला कर दिया

 

बर्फ़ इतनी मुश्किलों से हो के भी सागर हुई

मुझको इस पेचीदगी ने और सादा कर दिया

 

ख़ाक होकर भी रही इक जुस्तजू तेरी मुझे

देख! कूज़ागर ने मुझको तेरा प्याला कर दिया

 

सीप अपने दर्द को मोती बना देती है यार

ज़िन्दगी की तल्ख़ियों ने मुझको मीठा कर दिया

 

यूँ तो आलम में कोई है ही नहीं तुझ सा मगर

इक मुहब्बत की नज़र ने सबको तुझसा कर दिया


 
गजल

 

सुन दिले-बेकार सुन! काफ़ी है क्या?

उसको पाने ही की धुन काफ़ी है क्या?

 

अपनी इक दुनिया बनानी है मुझे

सोचता हूँ लफ़्ज़े-कुन काफ़ी है क्या?

 

दर्द कैसे बांधना है शाइरो..!

फ़ाइलातुन फ़ाइलुन काफ़ी है क्या?

 

घर से निकला हूँ मैं उसको चूमकर

ऐ मुक़द्दर! ये शगुन काफ़ी है क्या?

 



गजल

 

देख न पाई बीनाई जो बैठ के साये रंगों के

नाबीना लोगों ने ऐसे ख़ाब सुनाए रंगों के

 

तुझसे बिछड़कर मैंने तेरी इक तस्वीर बनाई है

पसमंज़र में कुछ उड़ते पंछी हैं पराये रंगों के

 

बाग़ीचे में फूल खिले तो उसकी आँखें भर आईं

माली की बेटी को जैसे रिश्ते आए रंगों के

 

दर्द, मसर्रत, याद, मुहब्बत, नफ़रत, ग़ुस्सा, हैरानी

बेरंगे अश्कों ने सातों रंग दिखाए रंगों के

 

अब तो सारा आलम ही इन रंगों से शर्मिंदा है

मज़हब वालों ने कुछ ऐसे फ़र्क़ बताए रंगों के

 



 गजल

 

बचपन के पीछे दौर-ए-जवानी चला गया

जिस-जिस ने भी ठहरने की ठानी चला गया

 

कुछ वक़्त तो उदास रहा हूँ मैं तेरे बाद

फिर यूँ हुआ कि रेत में पानी चला गया

 

इक लफ़्ज़ ज़िन्दगी है जिसे रट रहे हैं हम

ये और बात लफ़्ज़ से मा'नी चला गया

 

ऐ रास्तो बढ़ा दो तुम्हीं अपने पेच-ओ-ख़म

मेरी तो उसने एक न मानी, चला गया

 

सा रे गा मा की लय मे जो आए हैं सारे ग़म

ज़ख़्मों पा इक जो रंग था धानी, चला गया

 

मैं दर्द हूँ तो वो है हुनर-मंद नस्र का

सो करके मेरे दुख को कहानी चला गया

 


गजल

 

किसे ख़बर थी हवा राह साफ़ करते हुए

मेरा तवाफ़ करेगी तवाफ़ करते हुए

 

मैं ऐसा हंस रहा था ऐ'तराफ़ करते हुए

कि वो तो रो पड़ा मुझको मुआफ़ करते हुए

 

अब इससे बढ़ के मुहब्बत का क्या सिला मिलता

वो मेरा हो गया सबको ख़िलाफ़ करते हुए

 

बस एक प्यार ने सालम रखा हमें यारो

रक़ीब मर गये हम में शिगाफ़ करते हुए

 

उसे मनाने में हमने गंवा दिया उसको

कि शीशा टूट गया धूल साफ़ करते हुए

 


गजल

 

किसे पता था ज़िन्दगी करेगी ऐसे काम ख़त्म

अभी तो कुछ सुरूर भी नहीं था और जाम ख़त्म

 

 हुज़ूर बस चले तो पूरा-पूरा ताम-झाम हो

हुज़ूर चल बसे तो पूरा-पूरा ताम-झाम ख़त्म

 

ये फ़ासले मुहब्बतों की पेशगी रसीद हैं

ये फ़ासले न हों अगर तो सारा एहतराम ख़त्म

 

हमारा तुझसे रब्त बिजली और बल्ब जैसा है

उधर तू फेर ले नज़र, इधर तेरे ग़ुलाम ख़त्म

 

जिसे तराशने, निखारने में उम्र लग गई

चला तो चार नस्ल तक चलेगा और नाम ख़त्म

 

यहाँ से आगे रस्ता चुनना ख़ुद तुम्हारा काम है

चराग़ ने तो कर दिया उजाला, उसका काम ख़त्म


मुकेश आलम

मोबाइल नंबर: 70096-17712

 

प्रस्‍तुति- कुमार कृष्‍ण शर्मा

94191-84412


Sunday, August 7, 2022

दिल्‍ली ने बहुतों को खराब किया है

सन 2010 की बात है। मौका था जम्‍मू कश्‍मीर की कला, संस्‍कृति और भाषा अकादमी के केएल सहगल हाल पर आयोजित होने विमोचन समारोह का। किताब थी अशोक कुमार के संंपादन में छपने वाले काव्‍य संग्रह 'तवी जहां से गुजरती है' और विमोचन समारोह में मुख्‍य अतिथ‍ि थे नामवर सिंह। यह मेरा दूसरा मौका था जब मैं नामवर सिंह को सुनने वाला था। इससे कुछ साल पहले (साल याद नहीं) नामवर सिंह जम्‍मू यूनिवर्सिटी में आयोजित होने वाले एक कार्यक्रम में मुख्‍य वक्‍ता के रूप में उपस्थित थे। साइंस का छात्र होने और उर्दू साहित्‍य के साथ लगाव के चलते मुझे नामवर सिंह के बारे में कुछ पता नहीं था। वह वही समय था जब मैंने अमर उजाला को पत्रकार के तौर पर ज्‍वाइन किया था और जम्‍मू यूनिवर्सिटी मेरी बीट थी। मैं उस कार्यक्रम में थोड़ी देर बैठा और चला आया।  शाम को आफिस पहुंचा। तत्‍कालीन संपादक ने जब कार्यक्रम के फोटो देखे तो मुझे पूछा कि क्‍या मैंने नामवर सिंह से अलग से बात की है। जब मैंने ना कहा तो संपादक ने मुझसे पूछा कि नामवर सिंह के बारे में जानते हो या नहीं। मैंने कहा नहीं, अगर जानता होता तो जरूर अलग से बात कर लेता। उसके बाद संपादक ने अपने कैबिन में अपने सामने बिठा पहली बार मुझे नामवर सिंह के नाम से रूबरू करवाया। 2010 में यह दूसरा मौका था।

केएल सहगल हाल में 'तवी जहां से गुजरती है' के विमोचन समारोह के मौके पर अपने संबोधन में नामवर सिंह ने खुलकर अपने विचार रखे और दिल्‍ली व महानगरों से बाहर लिखने वाले कवियों का उत्‍साह बढ़ाया। उनके संबोधन का कुछ हिस्‍सा पाठकों के समक्ष रख रहा हूं- 


छोटी पगडंडी निकालना ज्‍यादा बढ़ा काम

साफ साफ कहना चाहूं तो जिस बात से मुझे आकृष्‍ट किया वह यह है कि बनी बनाई पक्‍की सड़क पर चलने की अपेक्षा उससे हट कर छोटी पगडंडी निकालना ज्‍यादा बड़ा काम है।

हर दौर की कविता का एक मुहावरा बन जाता है। अच्‍छे या बुरे लोग देर तक उसे चलाते हैं और वह चल पड़ता है। जैसे छायावाद हुआ, प्रगतिवाद हुआ, प्रयोगवाद हुआ, नई कविता हुई। जैसे हिंदी में री‍त काल में दोहे लिखे गए। आप देखेंगे कि उनमें चीनियों के चहरे की तरह पहचनना मुश्किल होता है, कौन क्‍या लिखा है। जैसे उर्दू गजल का एक मुहावरा बना हुआ है। हर कोई मीर और गालिब तो नहीं हो सकता है। लेकिन आप देखेंगे तो सारी गजलें एक ही जैसी मालूम होती हैं। बहुत मुश्किल काम होता है रास्‍ता निकालना। यह काम जम्‍मू कश्‍मीर के हिंदी कवियों ने किया है। गौरतलब है कि 'तवी जहां से गुजरती है' में जम्‍मू के 13 कवियों की कविताएं शामिल हैं। इनमें मनोज शर्मा, महाराज कृष्‍ण संतोषी, कमल जीत चौधरी, शेख मोहम्‍मद कल्‍याण, राज जम्‍वाल, अशोक कुमार, अमिता मेहता, शकुंत दीपमाला, डा. पवन खजूरिया, संजीव भसीन, कपिल अनिरुद्ध, सुधीर महाजन और कुमार कृष्‍ण शर्मा की कविताएं शामिल हैं।   


दिल्‍ली ने बहुतों को खराब किया है

इस समय कविता जो शहरों में रहने वाले लोग लिख रहे है, ठप्‍पा लगी हुई कविताएं हैं। खासतौर पर दिल्‍ली में कवियों की बस्‍ती है। जितने पच्‍चीस तीस दिखते हैं, सब एक ही बोली बोलते है। कई खराब हुए हैं दिल्‍ली आ कर। दिल्‍ली ने बहुतों को खराब किया है। हम जानते हैं, पालिटिक्‍स को तो खराब कर ही रही है दिल्‍ली, साहित्‍य को भी खराब किया है। अच्‍छी कविताएं दिल्‍ली के बाहर के लोग ही लिखते हैं।

'तवी जहां से गुजरती है' और इस दमखम के साथ कि तवी जहां से गुजरती है, तुम गुजरे हो वहां से या नहीं। गुजरों तो देखों, तवी कहां से गुजरती है। कविता की तवी। एक नई भाषा, एक नया मुहावरा, नया निखार। यह देख कर खुशी हुई। जो कविताएं मुझे सुनाई गईं, आपने पहचाना होगा कि यह पक्‍की सड़क पर चलने वाली हिंदी कविताओं से अलग है। जिसकी भाषा, जिसके मुहावरे, जिसकी कविता कहने का अंदाज ही बहुत अलग है।

बुरे दौर में लिखा गया अच्‍छा साहित्‍य

कविता का इतिहास दखें, पढ़ें तो चीजें साफ हो जाएंगी। गालिब का जमाना कोई शानदार जमाना नहीं था। मुगलिया सल्‍लनतन करीब करीब खत्‍म हो रही थी। अंधेरा था उस समय। कबीर का जमाना कौन सा शानदार जमाना था। दिल्‍ली सल्‍लतनत का जमाना था। लोगों की आर्थिक स्थिति बहुत अच्‍छी नहीं थी। सच पूछिए तो भारतीय भाषाओं को भी सर्वोत्‍तम साहित्‍य लिखा गया, वो गुलामी के दौर में लिखा गया। इसलिए रियासत के कवियों की रचनां उस चुनौती का जबाव हैं और यह रोशनी की तरह हमारे सामने आता है। जरूरी नहीं है कि बेहतर कविताएं महानगरों या देश की राजधानी में लिखी जाए।

मैं अकसर महसूर करता हूं अगर कभी बड़ी जगहों से, मशहूर जगहों से हटकर हम जाएं, देखें तो यह महसूस होता है यह वरजिन सॉयल है जो बड़ी जगहो की खराबियों से बची रही हैं। इन जगहों में जिन लोगों ने लिखा है, वह बड़े नाम नहीं हैं, लोकल हैं, लेकिन यह जो प्रतिभाएं हैं ने हर कविता में अपने को दोहराया नहीं है।


दिल काला है, इसलिए उम्‍मीद है

मुझे लगा जम्‍मू, जो वरजिन सॉयल है, अभी जोती नहीं गई है, की प्रतिभाएं बूढ़ी नहीं हैं। यह पके लोग नहीं हैं। बाल सफेद नहीं हुए है। अभी इन लोगों का दिल काला है और इसलिए उम्‍मीद है। जिस दिन बाल सफेद हों या नहीं हों, दिल सफेद हो जाएगा, कविता नहीं लिख पाएंगे। इसलिए जो काला दिल है, उसे बचा कर रखो। उससे कविताएं निकलेंगी। जो कच्‍चापन यहां की कविता में है, वही उसकी खूबी है। पका फल सड़ जाता है। अगर बड़ी बनी ठनी कविता हो तो संभावना नहीं है। बहुत सी कविताओं में खुरदरापन है या ज्‍यादा लंबी हो गई छोटी हो सकती थी आदि। अब उस्‍ताद का जमाना गया। अब आप खुद अपने उस्‍ताद है और रास्‍ता आपको खुद तय करना है।


प्रस्‍तुति: कुमार कृष्‍ण शर्मा 

94191-84412

Sunday, July 31, 2022

अमरदीप सिंह


युवा उर्दू शायरअमरदीप सिंह से मेरी पहली मुलाकात इसी साल 26 मार्च को पटियाला में हुई। हालांकि पंजाबी के कवि और मित्र स्‍वामी अंतरनीरव से अमरदीप के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था। 26 मार्च को जब अमरदीप मुझे और स्‍वामी को मलेरकोटला में आयोजित होने वाले मुशायरे में ले जाने के लिए दोपहर बाद पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के पंजाबी विभाग के प्रोफेसर सुरजीत सिंह के आवास स्‍थान पर पहुंचा तो तभी स्‍वामी ने मेरा परिचय अमरदीप से करवाया। अमरदीप इतना सहज, सरल और मिलनसार है कि मुझे लगा ही नहीं कि मैं पहली बार उससे मिल रहा हूं। दोस्‍त ऐसा ही जब उसको पता चला कि हम लुधियाना में 16 जुलाई को हो रहे कार्यक्रम में हिस्‍सा लेने आ रहें हैं तो हमें बिना बताए ही मिलने पहुंच गया। आज पाठकों के सामने अमरदीप की कुछ गजलों को सम्‍मान के साथ पोस्‍ट कर रहा हूं।अमरदीप की गजल का कैनवास इतना बड़ा है कि इसमें गजल के शौकीन लोगों को सभी जरूरी रंगों से रूबरू होने का मौका मिलेगा। शुरूआत इस शे'र के साथ

वो साफ़-गो है मगर बात का हुनर सीखे,
बदन हसीं है क्या बे-लिबास आएगा!



गजल

जो भी था अफ़्लाक पे रक्खा
हम ने उठा कर ख़ाक पे रक्खा

मिट्टी थे हम और फिर हम को
कूज़ा-गर ने चाक पे रक्खा

हम ने सारी दुनिया रक्खी
उस ने हम को धाक पे रक्खा

मेरा सर फोड़ेगा इक दिन
गुस्सा तेरी नाक पे रक्खा

चमक-दमक की मारी दुनिया
ख़ाक न देखे ख़ाक पे रक्खा

इल्म-ओ-अदब की बज़्म में सब ने
ध्यान मेरी पोशाक पे रक्खा

उलझ रहा है कौन-ओ-मकाॅं से
ज़हन हद-ए-इदराक पे रक्खा

दुनिया देखी मगर अक़ीदा
हुस्न-ए-शह-ए-लौलाक पे रक्खा

रहने दे कुछ देर ऐ जानाॅं
हाथ दिल-ए-सद-चाक पे रक्खा

हाथ नहीं आता अब मेरे
ख़ुद ही जीवन ताक पे रक्खा



गजल
ख़ुद अपने ही ख़्वाबों-ख़यालों से भागे
हम अहल-ए-ज़मीं आसमानों से भागे

कभी ग़ैर से जी चुराते रहे हम
बचा कर कभी ऑंख अपनों से भागे

हमें अपने दिल की नदामत पता थी
सो हम उस नज़र के सवालों से भागे

यहाँ मस'अला दूसरों का नहीं था
हम अपने ही वादों-इरादों से भागे

हुए फ़िक्र-ए-फ़र्दा में गुम उस घड़ी हम
कि जब अपने माज़ी की यादों से भागे

है बस तिश्ना-कामी की इतनी हिकायत
शराबों में अटके सराबों से भागे

'अमर' ख़ुद से हो कर परेशान इक दिन
हमें भागना था सो ज़ोरों से भागे



गजल
बुरे दिनों में सलामती की दुआओं जैसा
कहाँ से लाऊँ वो शख़्स जो हो ख़ुदाओं जैसा

मैं दिल से बढ़ कर दिमाग़ से मुत्तफ़िक़ हूँ लेकिन
ये फ़ैसला मुझ को लग रहा है ख़ताओं जैसा

कहीं वो मेरा ही दिल न हो जो पस-ए-फ़लक है
ख़ला में रहने से हो गया जो ख़लाओं जैसा

वो फूल सा इक बदन मुहाफ़िज़ है ख़ुशबुओं का
कि जिस की हसरत में शख़्स है इक हवाओं जैसा

बदलती रुत ने भी आख़िर अपना लिया है जानम
वो बाॅंकपन जो है ऐन तेरी अदाओं जैसा

इस अज्नबिय्यत के दौर में जुर्म है ये शायद
अगर किसी से करो सुलूक आश्नाओं जैसा

मैं ज़ब्त-ए-ग़म के हज़ार दावे करूँ भी लेकिन
न पास मेरे वो दिल न वो सब्र माँओं जैसा


गजल

यही मंज़र मेरी तकमील का है
उदासी ने बदन पहना हुआ है

मुकम्मल कर मेरी अफ़्सुर्दगी को
तू उस से मिल जो तुझ को भा गया है

बहाना चाहिए दिल टूटने का
सभी सामान इकट्ठा कर लिया है

अचानक सामने से मिल गए थे
वगरना कौन किस को पूछता है

हमारी ऑंख से मंज़र निकालो
ये काॅंटा ज़ेहन में चुभने लगा है

हवा बाॅंधी हुई है इस ने वरना
ये पेड़ अंदर से बिल्कुल खोखला है

कोई तदबीर भी करता हूँ ठहरो
अभी तो सिर्फ़ मेरा दिल किया है

हवस-अंगेज़ है तेरी जवानी
मगर ईमान आड़े आ रहा है

जहालत चुप नहीं होती किसी की
किसी का इल्म गूॅंगा हो चुका है

जहाँ ख़ुद को सभी कहते हों मुंसिफ़
वहाँ हर जुर्म का मुजरिम ख़ुदा है

गजल

ये पल ये शब ये माह-ए-तमाम आख़िरी समझ
मुझ से लिपट जा और ये मक़ाम आख़िरी समझ

कोई जवाज़ भी तो नहीं अपने वस्ल का
तू सुब्ह-ए-अव्वलीं मैं हूँ शाम आख़िरी समझ

मुझ को निकालनी है तेरे दिल से अपनी याद
काम आख़िरी है तो ये कलाम आख़िरी समझ

पी कर भी गर दिमाग़ से लेना है काम दोस्त
अच्छा तो अलविदा'अ ये जाम आख़िरी समझ

इक लफ्ज़-ए-कुन ही अब तलक आया नहीं समझ
उस पर ये फ़र्ज़ है कि पयाम आख़िरी समझ

शायद मैं लौट कर न कभी आ सकूँ ऐ दोस्त
मेरे सलाम को तू सलाम आख़िरी समझ

बाद अज़ 'अमर' कोई भी नहीं सरफिरा मज़ीद
शहर-ए-जुनूॅं में बस यही नाम आख़िरी समझ



गजल

मंज़िलों की जुस्तजू में रास्तों से भी गए
मशवरे इतने मिले हम फ़ैसलों से भी गए

रास भी आई न राह-ए-शौक़ उन को दूर तक
हाए वो बद-बख़्त जो अपने घरों से भी गए

ख़ैर ये अच्छा हुआ कुछ रंजिशें तो कम हुईं
ये मलाल अपनी जगह हम दोस्तों से भी गए

इस कदर बे-फ़ैज़ कब थी ज़िंदगी पहले कभी
मौजज़ों के मुंतज़िर हम हादसों से भी गए

और फिर इक रोज़ उदासी भी उन्हें खलने लगी
हाँ वही कुछ लोग अब जो क़हक़हों से भी गए

वो कि जिन पर था यक़ीं मझदार में आ जाएंगे
वक़्त पड़ते ही मगर वो साहिलों से भी गए

चल 'अमर' घर चल कि अब तो रात आधी हो चुकी
लोग उठ-उठ कर सभी अब मै-कदों से भी गए

अमरदीप सिंह
मोबाइल: 9888194765



प्रस्‍तुति:
कुमार कृष्‍ण शर्मा
9419184412