Wednesday, March 13, 2024

आदित्‍य शर्मा


अरिजीत सिंह और जसलीन रॉयल के गाए हिट गीत
'हीरिए हीरिए' 
 के अलावा अन्‍य कई हिट गानों की रचना करने वाले गीतकार आदित्‍य शर्मा जम्‍मू में रहते हैं। बेहद सादा, सौम्‍य और मिलनसार आदित्‍य मूलत: इंजीनियर हैं। उन्‍होंने  सन 2007 में पहली कविता लिखी। सन 2016 से फिल्‍मी गीतोंं को लिखना शुरू किया। मौजूदा समय में आदित्‍य एक फिल्‍म की पटकथा, कुछ धुनों पर गीत और एक किताब की बुनतर का काम कर रहे हैं। 

'खुलते किवाड' के पाठकों के लिए प्रस्‍तुत हैं आदित्‍य की कुछ रचनाएं

■ 
जो मरा
वो मैं नहीं,
मेरा नहीं,
मुझसे दूर, बहुत दूर मरा

उसके बैन, चीखें,
आँसू, आँसुओं के सेक नहीं पहुँचे इधर
जो मरा 
वो इंक़लाब था या ख़्वाब मैं नहीं जानता
वो कुफ़्र था या सवाब, 
रजं था या अहबाब मैं नहीं जानता 
वो तस्वीर था या नाम 
या चुप था अख़बारों में, 
द्रोही था भाषणों में, 
दोस्त था उदासियों में 
पर वो दूर था, बहुत दूर मुझसे
ना मेरा था, ना होता कभी
फिर भी 
मुझे मुझसे मौत की बू आ रही है
ये चुप्पी मेरी, तुम्हारी मुझे खा रही है


र मन औपचारिकताओं से बीमार 
हम सब इश्तिहार बेचते हुए इश्तिहार 
सिफ़त की भूख से तिलमिलाए हुए
कसमसाते शोर के डब्बे 
हम सब 
नाचते गाते 
तस्वीरों में दर्ज करते लम्हा लम्हा अपनी हस्ती
हम सब 
टटोलते अपनी ज़रूरत रिश्तों की मे’यार में
ढेर होते आस का, कयास का, सोच का
हम सब 
हो जाने चाहते कुछ ओर, कहीं ओर, कैसे भी
कुछ अलग, भव्य, विशाल
ऐसे के जैसे कोई नहीं था, कोई नहीं होगा
अपने व्यक्तित्व के परायेपन से अनजान
हम सब बहुत वहमों से लदे
ख़ुद के मोह में डूबे भूले भूले ये सच के 

हम सब समय की हथेली पे आये छाले से हैं 
जो धीरे धीरे भर रहा है |

क दाव लगा 
कमर से उठाया, पलटा
पटक के ज़मीं पर थपेड़ दिया
एक सीटी बजी
दो पॉइंट 
और तालियाँ
बहुत तालियाँ
दूर दूर तक गूंजती तालियाँ.. .. ..

फिर एक सीटी बजी
और लाठियाँ
धक्के, मुक्के
चीखें
और 
सन्नाटा पसर गया

यूँ लगा…
पर खेल ख़त्म हुआ नहीं अभी 
उसके दाव पेच अभी बाक़ी है
होनी ज़र्द तुम्हारी ख़ाकी है

यूँ ही अकस्मात्
मेरी आँख में जब
तुम्हारी याद की उँगली लग जाती है
लाल-सी ढल जाती है शाम मुझमें
भर जाती है एक झील
और तैरने लगता है उसमें बहुत पतला-सा
एक चाँद तुम्हारे जाने के कारण का
मैं पोंछ भी नहीं पाता हूँ उसको
वो दाग़-सा जो मेरे अंदर धड़कता रहता है
 
दर्द की घड़ी पर अलार्म-सा लगा के रख दिया था
तुमने सीने की ख़ला में याद है?
वो गूँजता रहता है दम-ब-दम मुझमें
अब वो बजेगा जिस रोज़
मैं जाग जाऊँगा

दीवारों से मैल खुरचने से
रंग पोतने से नया-सा नहीं हो जाता घर
पुराने दिनों के दुख
मृत्यु का रुदन
झगड़ों के काँच
सब रहते हैं
सिर्फ़ ब्याह का स्वस्तिक रंगे दीवारों पर हाथ
रिसती लालिमा शगुन की ही नहीं रहती
घर की दीवारों में सेंध से रेंगते रहते हैं
खिड़कियों को दीमक-सी चाटती रहती है
पीड़ा
गुप्त कोनों में बहाए आँसुओं की नमी से
पपड़ियाँ निकल आती है दीवारों के मुँह पर
घर में कहीं अनदेखे हुए बुज़ुर्ग की व्यथा-सा
उग आता है पिछली दीवार की पीठ पर
एक बड़ का पौधा
 
धीरे-धीरे फैलता है हर ओर
जिससे अनजान सब लोग
घर की करवाते रहते हैं साफ़-सफ़ाई
दीप जलाते रहते हैं पाठ करवाते रहते हैं
धीरे-धीरे
घर छोड़ देता है प्राण
केवल वो 'बड़' जीवित रहता है

न्होंने कहा कि
उनके अलावा उनके सिवाय
और जो कोई भी हैं यहाँ
वो सब के सब निर्मम हैं निर्दयी हैं, अमानवीय हैं
इसलिए उनके प्रति कोई भी
किसी भी प्रकार का दया भाव रखना
प्रेम मोह वात्सल्य रखना
स्वयं व समाज के साथ द्रोह होगा
ऐसा कहा उन्होंने और ठीक तभी
प्रतिध्वनि में
ऐसा सुना (उन्होंने)
 
मारा दिन
उसकी सोच का एक हाला है
सोचो कितनी पास उसके उजाला है
कि वो दिखता ही नहीं
बहुत रोशनी से भरा वो
तुम ही तो हो
आँख मूँदो
और देखो ज़ेहन की खिड़की पे
एक हल्की गुलाबी रोशनी
नसों में भर के
हाँफती-दौड़ती है
 
दिल बौछार है
रोशनी का आबशार है
ओत-प्रोत हो तुम उससे
 
उजली-उजली धूप-सी
पोशाक पहने तुम हो
बहुत साफ़, बहुत पाक
बहुत नज़दीक बहुत पास
उसके
जो ज़रा-सी मिट्टी खा के
ब्रह्मांड रचा देता है।


■ 
आदित्‍य शर्मा
9419251307
inquireaditya@gmail.com

Thursday, March 7, 2024

ज्योति रीता



जन्म : 24 जनवरी [बिहार]
शिक्षा : एम. ए. ,एम.एड. (हिन्दी साहित्य)
सम्प्रति :  अध्यापन  (बिहार सरकार)

प्रकाशन : प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लगातार कविताएँ प्रकाशित , महत्वपूर्ण ब्लॉग्स पर भी कविताएँ प्रकाशित।
कई भाषाओं में कविता का अनुवाद। 
कविता संग्रह : मैं थिगली में लिपटी थेर हूॅं संभावना प्रकाशन हापुड़ से प्रकाशित हुई है।


 कितना जानते हो तुम स्त्रियों को

कितना जानते हो तुम स्त्रियों को 

हाँफते पसीने से तरबतर 
जब तुम आसमान से उतरकर 
पीठ-करवट चैन से सोते हो 

स्त्री घुटने पर सर रख रात-रात भर रोती है
घुटन में नोचती है चमड़ी 
खींचती है बाल
चरमराती है देह 
सूखते हैं होंठ 

उसी वक़्त खोल देती है
सड़क किनारे की ओर बंद पड़ी खिड़की 
तमाम फसादों को चुन्नी में लपेटकर भागती है नई सड़क पर
चुन लेना चाहती है कोई नई माँद 
याकि कोई नया प्रेमपात्र
जो देह से ज़्यादा मन पर चरस बोता है 

बदन से छाल छिलवाती स्त्री खोजती है कोई मलहम 
कोई ज़नाना मर्द 
जो होंठ-गर्दन पर दाग़ से पहले 
उगा दे तलवों पर सफ़ेद गुलबहार के फूल 

खुशबू से महका दे बदन 
ह्रदय की दीवार पर रख दे अपना हाथ 
पलकों पर छोड़ दे कुछ स्वप्न 
ज़िबह से पहले पिला दे घूंट भर पानी 

चरमोत्कर्ष के वक़्त तक छोड़े ना उसका केश 
शिथिलता की अवस्था में छाती से लगा चूम ले माथा 
और धीरे से पूछे ज़ियारत (तीर्थयात्रा) उसकी 

कितना जानते हो तुम स्त्रियों को 
इतिहास में स्त्रियों को जितना लिखा गया उसमें आधा झूठ था 

नाफ़रमानी स्त्री छुपाती रहीं नाभि में रहस्य 
नापती रहीं हाथ के बित्ते से निगेटिव रील 

36-26-36 के क्रूर आंकड़े में फंसी स्त्री 
कठुवाई रही 

अब जब स्त्री काठ से मांस-मज्जा में परिवर्तित हुई है 

मांगती है हिसाब 
करती है सवाल 

तब तुम ग्रीवा में दर्द महसूसते हो 

हमें खेद है।।


 जब ज़रूरी था बोलना 

ब ज़रूरी था बोलना 
हम तल्लीन थे कई दूसरे कामों में 
हमने कभी जरूरी नहीं समझा बोलना
चुप्पी को हम ख़ाला का घर समझते रहे

बोलना जरूरी था तब भी 
जब हम चुप थे 
बोलना ज़रूरी है अब भी
जब हम चुप हैं 

यह भी दौर है
जब ज़रूरी है बोलना
हम साम-दाम-दंड-भेद से शांत रहने के नुस्ख़े ईज़ाद किए जा रहे हैं 

जिस दिन हम सीख जाएंगे 
घर से लेकर बाहर तक बोलना

एक नई दुनिया उसी दिन स्थापित होगी।।


 बम के गिर्द लिपटा मुलायम रिबन

स्‍त्री की चाहनाएं  
मृत देह पर भिनभिनाती मक्खियों सी थी 

जिन्हें बार-बार 
किसी फटे पुराने गमछे से उड़ा दिया जाता 
वे बार-बार बैठने की कोशिश करतीं
बार-बार स्त्री उन्हें उड़ाने की कोशिश करती 

इस कोशिशों में गहन चुप्पी थी 
अंतस की आंधी का पता तब चला जब आधी रात स्त्री जागती 
उसी वक़्त स्त्री जीती थी अपने अंदर की आग 

गहन भ्रामक रहा वह रास्ता 
जिस पर चलकर मूक बनी स्त्री
कानों से सुनते हुए भी वह बधिर थी
उसका बोलना गौरैया के ची जितना था 

कनेर के बागों में मन का कोना सहलाती
खोंस आती वहां मन के उभरे तंतु 
कुमार्गी होने से सहज था 
चुपचाप सह जाना 

श्वास के रोकने जितना बेढ़ब था 
अनचाहे रिश्ते को दो टांगों के बीच ज़गह देना 

जलकुंभी सा देह को कुंभलाती रही
ग्रास बनती रही देह अपनी ही देह की

गाँठें और गहरी हुईं 
बम बारूद के बीच बीच सेल्‍फ पाॅटरेट बनाती रहीं

कूल्हे और जांघों पर नीले निशान के बावजूद उगाती रहीं चांद पर सेमल के फूल 

स्त्री अपार सौंदर्य का एक धड़कता हुआ जिंदा प्रतीक है 
आंदरे ब्रेतों ने यूं ही फ़ीदा काहलो(स्त्री) को बम के गिर्द लिपटा मुलायम रिबन नहीं कहा था।।


■ जिन औरतों ने कुछ अलग सोचा
वे अकेली हो गई थीं 
उनके लौट आने का इंतज़ार किसी ने नहीं किया 

दो कप चाय बनाकर 
आमने-सामने की कुर्सी पर बैठकर 
बारी-बारी से सुड़कती
अहमद फ़राज़ को पढ़ती 
आबिदा परवीन को सुनती 

देर रात 
उदास बिस्तर पर दोनों पैरों को सीने तक सिकोड़कर सोतीं 

उन औरतों को लोग कौतुक से देखते
उन औरतों ने किसी को नहीं कोसा 
ना ही बताई किसी को असल भूख (चाह)

उनका प्रेमी ख़ासा प्रसिद्ध था 
वह उसकी नाभि पर फ़िदा था 
नशे के चरम बिंदु पर 
वह चीख़ते हुए कहता था- तुम बेहद अलग हो! 
खंजर-सी उतर जाती हो भीतर

उन औरतों का भविष्य तय नहीं था 
लड़ती खटती वे औरतें अमलतास हो गई थीं 

उनके उदास मौसमों पर किसी ने नहीं लिखी कोई कविता 
ना ही फ़रवरी माह में उनके गमले में उगा कोई गुलाब।।


  नमकीन औरतें

रतों को अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए गहन परीक्षणों से गुजरना पड़ा
औरतों ने अपनी योग्यता को सिद्ध करने का जरिया अपनी देह को बनाया 

ऐसा कार्य स्थल पर बार-बार सुना गया

औरतों की तरक्की उसकी देह से होकर गुज़रती है
औरत का सुंदर होना 
उसके आगे बढ़ने के औजार हैं

अपने हक़ के लिए बोलने वाली औरतों को चरित्रहीनता के पैमाने से देखा गया
औरतों को अपने हक़ की बात दबी ज़ुबान से बंद कमरों में करनी थी

खुलकर बोलने वाली औरतें हमेशा नागवार रहीं
उन्हें कई-कई परतों में बंद करने के हथकंडे अपनाए गए

घर की इज़्ज़त को औरतों के पल्लू से बांध कर देखा गया
सिर से पल्लू का सरकना पौरुषय इज़्ज़त के साथ खिलवाड़ था

बंद कमरों में खुलकर जीने वाली औरतें पति के लिए मसाला थीं
खुले दरवाज़ों पर उन्हें चुप रहने की सलाह दी जाती

गहनों से लदी औरत परंपरा थी
किताबों से संगत करती औरत परम्परा विरोधी थी/
खिलन्दर थी

इन खिलन्दर औरतों से
दूसरे घर के बुजुर्गों ने
अपनी बहु-बेटियों को हमेशा बचाया
दूर रहने की हिदायत दी

खिलन्दर औरतों के किए गए कार्य 
उनकी रीढ़ से रिसता नमकीन जादू था

इन औरतों ने जब प्रेम किया तो उन्हें जादूगरनी कहा गया
इन औरतों ने बल्कि प्रेम नहीं किया
प्रेम में किसी को फांसा था

इन औरतों पर पहली अंगुली उठाने का तमगा औरतों को ही मिला
पुरुष चटखारे लेकर इन पर हाथ उठाते
इन औरतों को काबू में रखने की तरकीब सूझाते

सफल पुरुष वही रहा 
जिनकी औरतें लगाम में रहीं 

बे-लगाम औरतों के पुरुष को 
प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा गया

 औरतों के लिए नियम कौन तय करता रहा
 यह किसी को नहीं पता था
 इन नियमों को तोड़ने का पाप हमेशा औरत के सिर रहा

औरत घर की तरफ़ जाने का ठहराव है 
यह बात दादी के मुंह से अक्सर सुनती

मेरे उग्र स्वभाव पर वह चिंतित रहती
परंतु मैं 
दादी की इन बातों को कंठस्थ कभी नहीं कर पाई

औरतों का उग्र होना  
उनके जीने का नमक है।।




 कितना आसान है 
युद्ध छेड़ देना

कितना मुश्किल है 
छिड़े युद्ध को रोककर मनुष्यता बचा लेना

हर युद्ध के बाद अंतत: मनुष्यता हारती है।।


 तुम बीत गए हो 
याकि तुम्हारा बीत जाना बाक़ी है 

विरक्त समय के दुपहिये पर सवार होकर आए थे 
उदितयौवना- सा मन ओज से भर गया था 

ओढ़ लिया था कज्जलित ओढ़ना 
कथा आरंभ से पहले तुमने तय किया अंत 

कटु स्वाद-सा जीभ पर आते ही ऑंख मूॅंदकर निगल लिए कसैले दिन
दूषित भोजन को पाया जैसे प्रसाद 

तुम्हारे कठोर शब्दों को ऐसे ग्रहण किया 
जैसे श्रद्धा भाव में लीन विद्यापति के पद

प्रेम की कीमत में 
तुमने ठोक दी हृदय दीवार पर कील

जीवन से भरे दिन में तुमने
क़ब्र पर रख दिए कुछ सफ़ेद फूल 

क़बूल के रस्म में 
तुमने तोहफ़े में दिए कफ़न के वस्त्र 

पकाए हुए माॅंस को तुमने छोड़ा 
जैसे शिकार से अधमरा हिरण 

अभागे तुम थे या वक्त 

एक कवि या पाठक पढ़ते हुए इसे आह या वाह शब्द से नवाजेगा!
परंतु 
जलाशय में खिला कमल 
जो पीलिया रोग से पीड़ित है
मृत्यु चाहता है ।।


 तुमने बचे रहने के कई जद्दोजहद बताए
ख़त्म हुए तो जीवन कहाॅं 
बचे होने में ही जीवन है 

अगर बचे रहे 
तो बंद लिफ़ाफ़े में प्रेम भेजना 
इन दिनों प्रेम का मर्तबान खाली पड़ा है।


 परित्याग की स्थिति में

तुम्हारे आस-पास अनगिन लोगों का जमावड़ा था 
तुम पलटने की स्थिति में भी टकरा सकते थे 

दूर से आता कोई धुँधला चेहरा तुम्हें दिख भी जाता 
कुछ करने की स्थिति से पहले वह ओझल था 

ख़ैरियत कि तुम सलामत रहे 
यहाँ की आबोहवा में दु:ख जकड़ा रहा 

रात की बेचैनी की अवस्था उससे पूछो 
जिसने अलस्सुबह से तुम्हारा इंतज़ार किया 

और तुम आधी रात तक नहीं लौटे 
भ्रम टूटने में वक़्त तो लगता है 

इंतज़ार में सारे गुलाबों की सुगंध बासी हो चली थी 
भोग के दिनों में तुमने मुझे भूखा रखा 

फेंटे हुए अंडे का पकवान धीमी आँच पर पकाना चाहिए 
तेज़ आँच पर जलने की बू आती है 

किसी देश में आकर रुकने से 
वह देश कब उसका हुआ है 

शरणार्थी की तरह हम दु:ख के दिनों में आए 
हमारे सोने का कमरा पानी से भरा था 
और भोजन अधपका 

रोज़नामचे में लिखा जाता रहा तुम्हारा पता 
चाहा हुआ हथेली पर आता ही कब है 

परित्याग की स्थिति में सोचती हूँ 
कहीं पहाड़ पर जाऊँ 
याकि लिख दूँ कोई उलटबाँसी कविता 

जिसे अतृप्त रखा गया बारहों मास 
वह प्रेम के चुंबन को क्या ही समझेगा 

प्रेम में जब आत्मसम्मान की बलि देनी पड़े 
तब
प्रेम वहीं स्थगित कर देना ।।


 माॅं की दुनिया

माॅं ने एक संपूर्ण जीवन कभी नहीं जिया
माॅं का जीवन हमेशा खोखला ही रहा

माॅं खूब पढ़ना लिखना चाहती थी
परंतु 
माॅं के पिता को नहीं पसंद था उनका पढ़ना लिखना
16 साल की उम्र में ब्याही गई थी माॅं 
माॅं की कच्ची उम्र के बारे में ना तो किसी ने सोचा 
ना ही उनसे सहमति ली गई
ससुराल में चार अनब्याही ननदें एक विधवा सास और एक छोटा देवर था

माॅं जो बहुत बड़े घर की बेटी थी 
अचानक से एक झूलते हुए घर में आ गई
तब से आज तक बिना रुके घर की नींव को संभाले हुए है

कितना कठिन था 
माॅं को यह समझना कि यही अब उसका घर है 
यही लोग अब उनके अपने हैं

माॅं बचपन में ही बचपन भूल चुकी थी
माॅं बताती है- पिताजी ने उन्हें रेडियो दिया था 
वह लगातार काम करते हुए विविध-भारती सुना करती
माॅं के एकांत का साथी वही रेडियो था

पिता शादी से पहले ही घर के अजन्मे पिता बन चुके थे
घर की जिम्मेदारियां का झोला आज तक उनके हाथ से नहीं छूटा

हालांकि माॅं की हड्डियों से अब चरमराने की आवाज़ें आती हैं
बीपी हाई लेवल पर है 
और मधुमेह की गोलियां लेती है
दो बार अटैक आ चुका है बावजूद इसके माॅं सुबह 4:00 बजे बिस्तर से उठ जाती है
मेरे ज़हन को याद नहीं कि माॅं के लिए कोई रविवार सुनिश्चित था या है

माॅं नौकरी पर जाने से पहले पूरा घर समेत लेती है
लंच बॉक्स में नहीं डालना भूलती सलाद और कुछ फल
माॅं को ज्ञात है बीमार होने का दुःख
आदतन काम करते हुए माॅं ज़्यादा सुख भोगती है

माॅं ने जीवन में जो चाहा वह कभी नहीं मिला
अब माॅं चाहती है 
उनका बचा हुआ जीवन बच्चों के साथ बीते 
बच्चों के सुख में वह सुख ढूंढती है 
कभी-कभी खीझकर माॅं चिल्ला देती है 
माॅं चिल्लाते हुए अपनी ऑंखों में पानी छुपाए रहती है

माॅं ने कभी हार नहीं मानी 
हर दुखों के पहाड़ को अपने कंधे पर उठाते हुए 
यही कहती रही, एक दिन सब ठीक हो जाएगा

माॅं इन दिनों रेडियो की जगह मोबाइल पर भजन सुनती है
भजन सुनते हुए वह घर के काम को निपटाती रहती है
माॅं जानती है , इस बार अटैक आया तो वह नहीं बच पाएगी

कभी मुझे पापड़ बनाना सिखाती है  
कभी अचार 
कभी घर का मसाला
माॅं चाहती है , जब वह जाए तो घर में वही स्वाद बचा रहे 
जो उन्हें उनकी माॅं से मिला

माॅं को अपनी माॅं का चेहरा याद है
कभी-कभी कहती है - नानी की तरह मुझे भी विदा करना

हर वह बात जो उनका अपना था 
अब वह बताने लगी है।।


 मेरे बच्चे

मेरे बच्चे 
मैं ढूॅंढ रही हूॅं वह कोना 
जहाॅं तुम्हें सुरक्षित कर सकूॅं 

जहाॅं तुम्हें देखनी ना पड़े 
ध्वस्त ज़मीनें  

जहाॅं तुम्हें देखनी ना पड़े 
वह टूटी इमारत 
जिसे तुमने तुतलाकर कभी घर कहा था 

माॅं के ठंडे पड़ चुके शरीर 
जिसके आगोश में कभी गर्माहट महसूसते हुए 
तुम सबसे ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते थे 

पिता की वह चुप्पी 
जो तुम्हें लोरी सुना कर कभी सुलाया करती थी 

तुम नींद में भी मिसाइल-बम-बारूद के डर से भाग रहे हो
ज़मीन की कई-कई परतों के नीचे समा गया तुम्हारा बचपन  

तुमसे तुम्हारी सबसे सुरक्षित गोद छीन ली गई 
वह मजबूत कंधा 
खुद कंधे पर सवार होकर कोई दूर देश जा रहा है

तुम चिल्ला-चिल्ला कर अपने ही भाई-बहनों को ढूॅंढ रहे हो
तुम भूख में भी गोली खा रहे हो
तुम नींद में राख चबा रहे हो

मज़हब-ज़मीन-जंग में मनुष्यता की मृत्यु पर
तुम्हें भी बिना किसी गुनाह के यह सज़ा मिली है

तुम्हारे मन के भीतर रोप दिया गया आतंक
आतंकित मन लिए दिखावे की देह में 
तुम जीना सामान्य जीवन

मेरे बच्चे!
आज मनुष्यता शर्मिंदा है
परंतु 
कहीं तो कोई ज़मीन होगी 
जहाॅं तुम सुरक्षित जी सको अपना जीवन
जहाॅं तुम भय और आतंक को कह सको अलविदा!


ज्योति रीता 
8252613779
 
 

Saturday, March 2, 2024

योगेश कुमार ध्यानी


जन्मतिथि- 3 सितम्बर 1983

सम्प्रति – मैरीन इंजीनियर

साहित्य मे छात्र जीवन से रुचि। वागर्थ ,आजकल, परिन्दे, कादम्बिनी, कृति बहुमत, बहुमत, प्रेरणा अंशु, वनप्रिया, देशधारा आदि पत्रिकाओं मे रचनाएं प्रकाशित
पोषम पा, जानकीपुल, इन्द्रधनुष, अनुनाद, लिखो यहां वहां, मलोटा फोक्स, कथान्तर-अवान्तर, हमारा मोर्चा आदि साहित्यिक वेब साइट्स पर कविताएं तथा लेख प्रकाशित
प्लूटो तथा शतरूपा पत्रिकाओं मे बाल कहानियां प्रकाशित
नोशनप्रेस की कथाकार पुस्तक मे सन्दूक कहानी चयनित, एक अन्य कहानी गाथान्तर पत्रिका मे प्रकाशित
पोषम पा पर कुछ विश्व कविताओ के अनुवाद प्रकाशित
कृति बहुमत पत्रिका मे चेखव की एक कहानी का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित

कविताओं की किताब “समुद्रनामा” दिसम्बर 2022 मे प्रकाशित



अधूरापन

म सब उस उदास टैडी की तरह हैं

जिसे हमेशा लगता रहता है

कि उसके भीतर

थोड़ी सी कम रह गई है

रूई । 





आदिमभाषा

बे
हूदा बहसों के लिये

ढेरों मिल जाते हैं शब्द

कुछ अपनी

कुछ दूसरी भाषाओं से उधार लिए

कितने तो नये शब्द भी गढ़ लिए हमने

बहस को जारी रखने के लिये

जैसे आग हो बहस

और होम होती जाती हो भाषा

पर ठीक उस वक्त

जब कहे जाने की

सबसे ज्यादा होती है ज़रूरत

शब्द छोड़ देते हैं साथ

तब काम आती है

सिर्फ दो शब्दों की

संसार की सबसे आदिम भाषा

जिसका पहला शब्द है चीख

और अंतिम आंसू। 




चौथ का चांद

वे
इमारतें जो सबसे ऊंची और भव्य थीं

वहां सबसे पहले पहुंचा चौथ का चांद

जिनके पास थी बालकनी या चहल-कदमी वाली छत

फिर वहां उतरी उसकी छवि

ऊंचाई से गहराई की तरफ रहा

उसका दिखना

ओहदे के हिसाब से

भव्यता के घटते हुए क्रम में

बहुत से लोगों ने प्रतीक्षा की चांद की

बहुत सी स्त्रियां किवाड़ों पर देर तक

लगाये रहीं टक-टकी

सबसे आखिर मे देखा

उस स्त्री ने चांद

जिसका पति दिन भर के श्रम के बाद

सुनिश्चित कर के आया

कि परिवार में सबकी थाली मे हो

चांद के आकार सी रोटी ।



तुम्हारी और मेरी भाषा के भेद

मैं
 जब लाज कहती हूँ हौले से

तुम मूंछों पर बल देते हुए इज्जत पढ़ते हो

जो परंपरा मेरे लिये

तुलसी की पूजा होती है

वो तुम्हारे लिये

मेरे चेहरे का घूंघट हो जाती है

जो प्रेम मेरे लिये रिश्ते के बीज के

बोने, सींचने और पल्लवित होने तक अनन्त है

वही प्रेम तुम्हारे लिये सीमित हो जाता है

कमरे की चारदीवारी तक

पता नही कब और किसने दे दिये

हमें ये अलग-अलग शब्दकोश

जिस मे हर शब्द के दो अर्थ हैं

सिर्फ मेरा जिस्म छूकर नही

पुरुष, तुम तब तक नही समझ सकते मुझे

जब तक कठंस्थ नहीं कर लेते

मेरा शब्द कोश ।


वह एक लय के लिये लड़ा

वो
समाज के सबसे निचले खांचे मे था

बैठना नसीब मे नही था उसके

उसका हाथ वाला रिक्शा इतना आदिम था

जिसने खुद उसके लिये नही बनायी कोई सीट

खींचने के लिये दो हत्थे थे बस

कई बार वो परिवार के लिये लड़ा

कई बार अधिकार के लिये

कई बार अत्याचार के खिलाफ

तो कई बार भ्रष्टाचार के

बाढ़ में

सरकार की तरफ से फेंके जा रहे

फूड पैकट लपकने मे तो महारत थी उसे

उसके लिये हर दिन एक आपदा था

जीवन भर इस लड़ाई इस चीख मे

उसका चिड़चिड़ा हो जाना स्वाभाविक था

भूख के प्रबन्ध के सिवा

कुछ नहीं था उसके पास

उसने कई बार बिना कुछ समझे

नारे लगाती भीड़ के साथ नारे लगाये

संगीत के नाम पर उस रिक्शे की खट-खट

और लोगों का शोर भर था उसके पास

किसी को नही पता

उसकी चिड़चिड़ाहट की असल वजह

उसकी दिनचर्या से गायब वह लय थी

जिसे जीवन कहा जाता

कई बार एकान्त में

वह ईश्वर से लड़ा

सिर्फ उस लय के लिये........। 



नदी की चिंता मत करो

दी की चिंता मत करो

नदी को मारा नहीं जा सकता

बना लो कितने भी बांध

उसे सदा के लिये बांधा नहीं जा सकता,

जहाँ कभी निर्बाध नदी थी

अब वहाँ सिर्फ नमी है

इसे नदी की मृत्यु मत समझना

नदी के लिये मत बहाना आंसू

नदी सदियों तक जीवित रह सकती है

रोक कर अपनी सांस

सदियों बाद ही सही

नदी में लौट आयेगा प्रवाह,

नदी की चिंता मत करो

चिंता करो अपनी

कि नदी के सांस रोक लेने के कितने साल बाद तक

चलती रह सकती है

मनुष्य की सांस !



नदी पार

चा
हा और सोचा हुआ

सब है

नदी के उस पार

हमारे पास नाव नहीं है

नदी पर भी नहीं बंधा

कोई पुल

अपनी नस्ल की शुरुआत से ही

हम मानव

खाली कर रहे हैं नदी को

अपने-अपने पात्रों में भरकर।



आदमी और शहर

सबसे पहले शहर चुभता है

शहर गया हुआ नया नया आदमी

जब देखता है किसी मस्तिष्क का चित्र

तो उसे दिमाग की नसें नही

शहर की गलियां दिखती हैं

धीरे-धीरे लेता है शहर आदमी को अपनी जकड़ मे

घर-परिवार, गांव या सम्बन्ध नही

चौक-सड़कों और दुकानो के नाम रटता है

अकेले मे नया आदमी

शहर के पुराने आदमी से उसे

अपने नये होने को छुपाते हुए मिलना है

वह जानता है अजगर सी होती है

शहर की जकड़

मगर वह उसमे फंसना चुनता है

क्योंकि उसी अजगर की कुंडली के

सबसे भीतर रख दिया गया है

आदमी का भोजन

फिर एक दिन इतने अपृथक हो जाते हैं दोनो

कि आदमी से पूछे जाने पर उसका नाम

आदमी अपनी बेहोशी मे बोलता है

शहर का नाम.........।



योगेश कुमार ध्यानी
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