Sunday, May 12, 2024

ललन चतुर्वेदी

जन्म: मुजफ्फरपुर (बिहार) के पश्चिमी इलाके में नारायणी नदी के तट पर स्थित बैजलपुर ग्राम में 
शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी), बी एड., विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की नेट जेआरएफ परीक्षा उत्तीर्ण 

प्रकाशित कृतियाँ : प्रश्नकाल का दौर (व्यंग्य संकलन), ईश्वर की डायरी तथा यह देवताओं का सोने का समय है (कविता संग्रह)  एवं साहित्य की स्तरीय पत्रिकाओं तथा प्रतिष्ठित वेब पोर्टलों पर कविताएं एवं व्यंग्य प्रकाशित। 
संप्रति : राजभाषा हिन्दी एवं अनुवाद कार्य में संलग्न और सेवारत।

लंबे समय तक राँची में रहने के बाद पिछले पाँच वर्षों से बेंगलूर में निवास ।



|| घर || 

- एक -

भी कहीं से 
लौटता हूं तो लगता है
माँ अपनी बाहों में भर रही है।  

- दो -

सुंदर महानगर 
भव्य इमारतें 
मनोरम पार्क या 
जिसे हम कहते हैं दुनिया का स्वर्ग 
उनमें बिचडरते हुए 
जिसे मैं नहीं भुला पाता 
वह अपना घर ही तो है। 

- तीन -

ब से छुटा है
तब से कितने शहरों के कितने मकानों में
ढूंढता रहा हूं घर
हमेशा महसूस हुआ
घर ढूंढना दुनिया का बहुत कठिन काम है
और घर यदि मिल भी जाए तो
घर बसाना उससे भी कठिन काम है
जैसे ही घर बसने को होता है
आंधी ठीक उसी समय आती है
उजड़ जाता है बसा- बसाया घर
और फिर घर ढुंढना शुरू हो जाता है
इतना ही समझा
घर हमारी कल्पनाओं में बसता है
या बसता है हमारे सपनों में
घर खोजने की असफल कोशिश में
तन-मन जब पूरी तरह थक जाता है
कोई दूर से पुकारता है-
शाम होने को है,आओ अपने घर चलो। 


|| समय || 


प बड़े हो सकते हैं
इसका यह अर्थ नहीं कि
दूसरा कोई आप से छोटा है

आप खरे हो सकते हैं
इसका यह मतलब नहीं कि
दूसरा कोई निहायत खोटा है

समय ने अपनी कसौटी पर
अनगिनत लोगों को परखा है
अनगिनत लोगों को जाँचा-तोला है

समय बड़ा निर्मम है, निर्भय है
इसने बड़ी-बड़ी हस्तियों का
बीच बाजार में भेद खोला है।


|| अकारण || 


कारण किसी का जन्म नहीं होता
मौत भी नहीं होती अकारण
अकारण फूल भी नहीं खिलते
अकारण काँटे भी नहीं उगते
गौर से समझो निरर्थक का अर्थ
वहाँ भी अर्थ छुपा बैठा होता है
अगर ढूँढोगे तो पाओगे

प्रेम की सरिता में धो लो कालुष्य
अकारण क्यों घृणा करते हो मनुष्य?

|| कैसे बच पाएगा संसार || 



कैसे बच पाएगा संसार
यह धरती
जो घूम रही है अहर्निश सदियों से
कहाँ रूकती है, कब थकती है
तुम उसे रौंद रहे हो

यह फूल
जो खिलखिला कर हँस रहा है
कंटकों की सेज पर लापरवाह
तुम उसे तोड़ रहे हो

यह पवन
जो निरंतर डोल रहा है
तेरी साँसों में अमृत घोल रहा है
तुम उसमें जहर घोल रहे हो
ये धरती, फूल, पवन
क्या कभी कुछ माँगते हैं
क्या अपनी सीमाओं को लाँघते हैं
तुम तो कर गए सारी सीमाएँ पार
बताओ कैसे बच पाएगा संसार?
             

 

|| काठ की कुर्सी || 


काठ की कुर्सी
नहीं होती निरा काठ निर्जीव
काठ के उल्लू को भी बना देती है चैतन्य
बदल देती है उसका पूरा ठाट-बाट
बैठते ही इस पर‌ अधिकांश लोग
बन जाते हैं कठमुल्ला
धँसते जाते हैं नीचे, नीचे और नीचे
बहाने लगते हैं उल्टी गंगा
घोषित करते हैं स्वयं को भगीरथ
जबकि उन्हीं की कुर्सी के ठीक नीचे
बहती रहती है भ्रष्टाचार की बैतरणी
धीरे-धीरे उनकी चेतना पर जम जाती है काई
सचमुच कुर्सी पर बैठने के बाद लोग काठ हो जाते हैं
वे भूल जाते हैं कि कुर्सी की भी कोई उम्र होती है
और कुर्सी से उतरने के बाद कोई मातमपुर्सी भी नहीं करता।
           

|| अपराध और दंड || 


पराध की सारी सूचनाएँ
दर्ज नहीं हो पाती थाने में
मामले पहुँच नहीं पाते अदालत तक
लेकिन जब लगती है मन की अदालत
मुजरिम खुद को पाता है कटघरे में
बड़ा दारूण होता है वह क्षण
जब उसे अपने खिलाफ
लेना पड़ता है फैसला
इस फैसले के खिलाफ
कहीं अपील नहीं हो सकती
असंभव है जिसके खिलाफ सुनवाई
अपराधी कहाँ समझ पाता है कि
हर अपराध के पीछे
परछाईं की तरह चलता है दंड
पर वह उसे देख नहीं पाता
और सुन नहीं पाता उसकी पदचाप।


|| सर्वहारा हंसी || 


से हँसने की फुर्सत नहीं थी
और रोने की की इजाजत नहीं थी
फिर भी वह हँसना चाहता था
पर उसे हँसी नहीं आती थी

हँसते हुए चेहरे
उसके लिए कौतूहल के विषय थे
हालाँकि हँसने वाले चेहरों से
उसका दूर दूर का रिश्ता नहीं था
वह उनकी हँसी का राज जानना चाहता था
पर उसे इतनी हिम्मत नहीं थी कि
उनसे उनकी हँसी का राज पूछे
उसे यह भी आशंका थी 
कि शायद उसके प्रश्न का नहीं मिले माकूल जवाब
और वह खुद बन जाए सब की हँसी का पात्र

ले देकर एक घरवाली ही थी
जिससे वह अपना दुख-दर्द बाँट सकता था
मौके-बेमौके किसी बात पर डांट सकता था
एक शाम उसने पत्नी से
पूछा लोगों के हँसने का राज
भोली-भाली पत्नी भला कैसे दे इस कठिन सवाल का जवाब
कभी पूरा नहीं हो पाया था जिसका एक भी ख्वाब

फिर अपनी बुद्धि का कर इस्तेमाल
कोने में रखे गुल्लक की ओर किया उसने इशारा
कहा- इसी में छुपाया है मैंने हँसी का राज
बरसों से तुम्हारी मजदूरी से बचाकर चवन्नियाँ
भर कर रखा है मैंने गुल्लक
कल बाजार जाना
इन्हें नोटों में बदलकर
नए कपड़े और मिठाइयाँ लाना
मिल बैठकर खायेँगे बच्चों के साथ
फिर पहन-ओढ़ कर घूमने चलेंगे पार्क
देखेंगे रंग-बिरंगे फूल
उन्हीं से पूछेंगे खिलने और खिलखिलाने का राज

रात उसकी पलकों में कटी
सुबह जब वह गया बाजार
साहुकारों ने दिया उसे टका सा जवाब
चवन्नियाँ बाजार से गायब हो गई है जनाब!

मुँह लटकाए वह चल दिया नदी की ओर
गुल्लक को कर दिया नदी में समर्पित
सहसा खुल गए उसके होंठ
और चेहरे पर फैल गई
एक सर्वहारा हँसी। 
          

|| कबीरा || 


मेरी निगाह में हर आदमी में
थोड़ा-बहुत वेश्यावृत्ति है
किसी में कम, किसी में ज्यादा
होती इसकी आवृत्ति है
इसे ठीक से समझो साधु !
जो नहीं समझे वह मूढ़मति है। 

||  दूसरों के कहने पर || 


रास्ते पर चल रहा हूँ
अपनी समझ से रास्ता भी सही है
कोई कहता है -
राह भटक गए हो
अपना रास्ता बदल लो
दूसरे रास्ते से जाओगे
आसानी से मंजिल पर पहुँच जाओगे
कोई कहता है -
बंधु बड़ा कठिन है रास्ता
थक गए हो, सुस्ता लो
कोई कहता है -
रास्ता तो तुमने सही चुना है
लेकिन कोई तुम्हारे साथ नहीं चलेगा
कोई दुष्ट दुस्साहसी कभी-कभी
रास्ता रोककर भी खड़ा हो जाता है
क्षण भर के लिए ठिठक जाता हूँ
परंतु यह यात्रा रुकने वाली नहीं है
सारी आवाजें खो गई है घाटियों में
मैं कुछ भी नहीं सुनना चाहता
जो स्वयं अपना रास्ता चुनता है
वह भला कब किसी की सुनता है
और उसे सुनना भी नहीं चाहिए
अगर कुछ करना है अपने लिए
या दुनिया के लिए भी
तो दूसरों के कहने पर
रास्ता चुनना भी नहीं चाहिए। 


|| जूते के बिना यात्रा || 


पांव में जिनके जूते नहीं होते
वह भी करते हैं यात्रा
और लंबी यात्रा के लिए
हरगिज जरूरी नहीं होते जूते
मैंने वैसे लोगों को देखा है
जो लंबी यात्रा में पांव से जूते निकाल
हाथ में पहन लेते थे
या डाल लेते थे लेते थे झूले में
कोई जरूरी नहीं है कि
यात्रा पर निकलने के पूर्व
खरीद लिए जाएं जूते
या बिना जूते के स्थगित कर दी जाए यात्रा
चलना जिनका स्वभाव है
वे जूते का ख्याल नहीं रखते
उनके लिए जरूरी नहीं होते जूते
जरूरी होती है यात्रा।


|| तारीफ आपकी || 


हा
थ मिलाया
गले लगाया
बांधे प्रशंसा के पुल
पहुंच गए वह मंच पर
बदल गए सारे उसूल
खरी खोटी सुनते हुए मैं
खड़ा रहा जमीन पर
कायम रहा अपनी जमीर पर
खो गया मैं कहीं भीड़ में
वह प्रशंसकों के बीच
हो गए बेसुध विभोर
करता रहा मैं जिसकी तारीफ
वही पूछते हैं मुझसे
तारीफ आपकी? 


संपर्क:
सी एस टी आर आई, सेंट्रल सिल्क बोर्ड
तृतीय तल,हिन्दी अनुभाग,बी टी एम लेआउट 
मडिवाला,बेंगलूर-560068   
ईमेल: lalancsb@gmail.com 
मोबाइल नं : 9431582801 

Tuesday, May 7, 2024

फ़िलहाल - गति का भी वर्तमान है

 'चतुर कवि तो कविता में गाल बजाएगा
नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा'

केशव तिवारी हिंदी - कविता के सशक्त हस्ताक्षर हैं। 04 नवम्बर, 1963 में प्रतापगढ, अबध में जन्मे , उनके चार कविता - संग्रह, "इस मिट्टी से बना", "आसान नहीं विदा कहना", " तो काहे का मैं ", "नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा ", प्रकाशित हुए हैं । अन्य भारतीय भाषाओं में कविताएं अनूदित होकर प्रकाशित हुई हैं / हो रही हैं ।

उनके इस संग्रह ( नदी का मर्सिया तो पानी ही गाएगा ) की कविताएं परिपक्व तो हैं ही, ये जीवन में व्याप्त तमाम तरह की उठा - पटक, सालों - साल के सहन - दर -सहन के बावजूद, लेखन की ताकत को साधिकार पाठक के हक में खींच लाती हैं। इस संग्रह की भाषा, प्रत्येक कोण से इसे मौलिक बनाती है। यह एकालाप का नहीं, संवाद का संग्रह है। इसमें कवि मात्र बखान नहीं, स्थिति - विशेष को पाठक तक ले जाने के उपक्रम रचता है। उनकी शैली का जादू यह भी है कि इसे मात्र आभास नहीं समझ सकते। पाठक यहां , सोच व विचार को अपनी तरह से देखता - परखता है । यहां एक देशज भाषा का आलोक व्याप्त है ।

" पाठा में चैत "

गली- गली अटी पड़ी है
महुआ की महक
उतर रही है
पहली धार की
घोपे के पीछे------ 

*** 

' ... दुःखों की गांठ
और कसती जा रही है
फागुन के उद्धत होते
लाल गमछे से
चैत पोंछ रहा है
अपने पसीने में डूबा धूसर माथ ...' 

***

' चूल्हे पर चढ़ी खाली बटुई - सा
धिक रहा मन
रात से ...'


***

' रात खेतों पर मचानों पर सोती है
दिन कहीं मेड़ -डाँड़ खटता है ...'

इस संग्रह की रेखांकित करने वाली खूबी यह भी है कि यहां उन विषयों को छुआ गया है , जो अभी तक अछूते रहे । जैसे कि यहां महानद चंबल साक्षात विद्यमान है ।

' ... चंबल की घाटियों में
तुम्हारा विचरना
तुम्हारी बाँकी चाल
बुंदेलखंड की प्यास से तुम्हारा
क्या रिश्ता है
पुराणों का दर्शाण
हमारी धसान
हमारे रक्त
हमारी जिह्वा में घुला है
तुम्हारा नमक ...,
'

' उर्मिल ' , ' जेमनार ' जैसी कई अन्य कविताएं भी इसी की गवाही देती मिलती हैं ।

हमारे वर्तमान की शिनाख़्त करता यह संग्रह कतरा - कतरा हमारी धमनियों में उतरता चला जाता है।

' ...एक शराबी पुलिया पर बैठा
शिकायत कर रहा था
उसे भी किसी ख़ास शाम का इंतज़ार था ...'

***

'  इंतज़ार की रस्सी में लटका
एक मुल्क था
जिसे बस एक नट के इशारे का इंतज़ार था ।'

***

' ...जिसे जो दिख रहा है
वो औरों को दिखा नहीं पा रहा है ...'

इसी तथ्य को और गहराई से आंकने के लिए , ' डोर टू डोर सामान बेचती लड़कियां' में स्पष्ट: देखा जा सकता है : 

' ये किसी महानगर से नहीं
किसी आसपास के कस्बे से आकर डोर टू डोर
बेच रही हैं सामान
जिस बाज़ार ने इन्हें वस्तु बनाया
उसी ने दी है यह आज़ादी...'

अब देखें की निचली कविता हमारे समाज की कैसी तर्जुमानी कर रही है : 

'  चीज़ें दूर ही नहीं थी
वे दूर और दूर होती जा रही हैं
उन्हें पाने की इच्छाएं प्रबल और प्रबल
जो ज्ञान उन्होंने जीवन से अरजा था
वह बड़ी चतुराई से लगभग पुराना
और व्यर्थ साबित किया जा चुका था
जीना किसी को था
उम्र कोई और तय कर रहा था ...'

इस संग्रह की कुछ और बेहद ज़रूरी कविताएं हैं , 'ये आवाज़ें' और 'एक कवि के पास'

अब कवि 'छूटने' को ही किन - किन अर्थों में रचता है, यहां उनके कहन के कमाल को प्रत्यक्ष: देखा जा सकता है।यहां ऐसा संश्लेषण, ऐसा गुंफन है, जो पाठक को अपने साथ बहा ले जाता है ।

'अनुवाद में जैसे कभी - कभी
शब्दों के मोह में
कुछ अर्थ छूट जाते हैं 
कटे गेहूं के खेत में सीला बीनते
कुछ बालें कुछ दाने छूट जाते हैं ...'

इस संग्रह की कविताएं फोटोजेनिक बिंब भी रचती हैं, इसी के साथ यहां एक भौगोलिक संकल्पना मूर्त होती है ।

"आवाज़ "

' रनगढ़ पर उतर रही है शाम
नीचे प्राचीर पर पीठ टिकाए
बैठे हैं हम ...' 

यह संग्रह कविता के विद्यार्थियों के पुस्तकालय में बेहद ज़रूरी है।
केशव तिवारी जी को हार्दिक बधाई ।


प्रकाशक :
हिन्द युग्म ,सी - 31 ,सेक्टर 20 ,नोएडा ( उ. प्र .)
पिन - 201301
फोन : 91-120- 4374046


— मनोज शर्मा

Sunday, April 28, 2024

दशमेश सिंह गिल “फ़िरोज़”



दशमेश सिंह गिल “फ़िरोज़”

पैदाइश : फ़िरोज़पुर, पंजाब

रिहाइश: वैंकूवर, कनाडा



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रात से लगता है दिन में डर मुझे

दिन से डर लगता है फिर शब भर मुझे


छोड़ कर तुझ को चला जाऊँ कहीं

ऐ ज़माने तंग इतना कर मुझे


पूछता है क्यूँ हुई अपनी शिकस्त

घेर कर अक्सर मिरा लश्कर मुझे


कांपता साया मैं देखूँ और वो 

देखता है कांपते थर थर मुझे


ज़िंदगी करती है मेरी मिन्नतें

इक दफ़ा फिर से मुहब्बत कर मुझे 


बदगुमाँ होने के दिन फिर आ गए

फूल फिर लगने लगे पत्थर मुझे


रूह की बरसों पुरानी ज़िद वही 

बस निकालो जिस्म से बाहर मुझे 


जब तलक सय्याद छोड़ेगा फ़िरोज़

छोड़ देंगे तब तलक तो पर मुझे


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आँख मिला कर बात नहीं करता मुझसे 

सूरज दिन भर बात नहीं करता मुझ से 


बात नहीं करता मुझ से वो चारागर

ज़ख़्मे दिल पर बात नहीं करता मुझ से 


तारे तो फिर दूर नगर के वासी हैं

चाँद भी अक्सर बात नहीं करता मुझ से  


अब भी है सीने में मेरे बरसों से

लेकिन ख़ंजर बात नहीं करता मुझ से 


वादी चुप है, बादल चुप हैं दरिया चुप

सारा मंज़र बात नहीं करता मुझ से 


जितने भी फैंके थे तुम ने उन में से 

इक भी पत्थर बात नहीं करता मुझ से 


सारे कमरों पर दस्तक दे आया हूँ 

सारा ही घर बात नहीं करता मुझ से 


बात न करती है बेदारी अब कोई 

और दर्दे सर बात नहीं करता मुझ से 


ऐ मेरी तन्हाई, घर में कोई भी

तुझ से बेहतर बात नहीं करता मुझ से



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कोई यख़पोश मौसम गर चमन को घेर ले तो?

गुलाबे सुर्ख़ की रंगत अगर पीली पड़े तो?


लहू दिल के किसी ग़ोशे से फिर रिसने लगे तो?

हमारे ज़ख़्म तन्हाई में उस ने छू लिए तो?


 जिसे अपनी हिफ़ाज़त के लिए ऊँचा बनाया

मिरे घर की वही दीवार मुझ पर आ गिरे तो?


दिखाई क्यूँ नहीं देती मुझे उलझन कहाँ है 

अगरचे मिल गए दोनों ही रस्सी के सिरे तो 


हमारी आपसी दिलचस्पियाँ कम हो न जाएँ

मिटा बैठे बदन से हम बदन के फ़ासले तो 


फ़लक़ ख़ाली न कर देते मुहब्बत करने वाले

अगर उन से हक़ीक़त में सितारे टूटते तो 


तही दस्ती का ये आलम है वो भी दे न पाऊँ

अगर मुझ से कुई इक दिन मुझी को माँग ले तो


शहीदाने वफ़ा का हम को ओहदा कौन देता

नफ़ा नुक़सान उल्फ़त में अगर हम सोचते तो


तिरी यादें भी इक दिन साथ मेरा छोड़ देंगी

कि आँखें फेर लीं मुझ से तिरी तस्वीर ने तो


मिरी तन्हाई ही सब से बड़ी दौलत है मिरी

तिरी सोहबत अगर मुझ से ये दौलत छीन ले तो?



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नाख़ुदा में और ख़ुदा में बहस होनी चाहिए

अब दवा में और दुआ में बहस होनी चाहिए


बहस होनी चाहिए बेदर्द की बेरहम से 

उम्र और दशते बला में बहस होनी चाहिए


कौन सा बेहतर तरीक़ा बात मनवाने का है

ज़िद में और नाज़ो अदा में बहस होनी चाहिए


क्यूँ भटकते फिर रहे हैं देर से सहराओं में

कारवाँ और रहनुमा में बहस होनी चाहिए


मैं रहूँ पस्ती की जानिब तुम बुलंदी की तरफ़

और फिर अर्ज़ो समा में बहस होनी चाहिए


हिज्र से मय की बहस इक शाम करवाएँगे हम

ग़म में और ग़म की दवा में बहस होनी चाहिए


कौन मेरे ख़ूने दिल से सुर्ख़ ज़्यादा है फ़िरोज़

लाला ओ गुल और हिना में बहस होनी चाहिए



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दिल में बैठा है मिरे दरिया की तुग़ियानी का डर

बाप डूबा था मिरा सो है मुझे पानी का डर


अहले दिल को कब रहा है आलमे फ़ानी का डर

डर किसी राजा का है न ही किसी रानी का डर


बेकफ़न भी कब्र में तदफ़ीन हो सकता हूँ मैं

लाश को होता कहाँ है अपनी उरियानी का डर


नफ़सियाती माहिरों से पूछ कर मुझ को बता 

ग़ैर वाजिब तो नहीं चिड़ीओं में वीरानी का डर?


है सज़ा के ख़ौफ़ से ज़्यादा मुझे ख़ौफ़े ज़मीर

क़ैद के डर से ज़्यादा है पशेमानी का डर


चाहता कब है कुई साथी दिले ख़िलवत पसंद

है उसे महफ़िल पसंदों की मेहरबानी का डर


ख़ारिजे मतला न कर दे एक दिन उस को फ़िरोज़

मिसरा ए ऊला को है अब मिसरा ए सानी का डर



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दी में जो गिरे लाज़िम नहीं पानी से मर जाए

मगर मुमकिन है वो इंसाँ परेशानी से मर जाए


लुटा कर बर्ग सारे, चाक दामानी से मर जाए

कहीं ये पेड़ सर्दी में न उरियानी से मर जाए


मज़ा आए तिरी सोहबत मिटा दे गर ग़मे दुनिया

मज़ा आ जाए गर ये बादशाह रानी से मर जाए


जले जंगल तो सारे पेड़ जल कर ख़ाक हो जाएँ

बचे जो पेड़ वो इक रोज़ वीरानी से मर जाए


ज़रूरत ही न हो उस को सज़ा ए मौत देने की

अगर हस्सास हो क़ातिल पशेमानी से मर जाए


चराग़ ऐसा फ़ना हो जाए जो ख़ुद आग में अपनी 

नदी ऐसी जो ख़ुद इक रोज़ तुग़ियानी से मर जाए



   ग़ज़ल


विसाल के लिए ये एहतिमाम रक्खा है

सजा के झील में माहे तमाम रक्खा है


किताब लिक्खी है मैंने ग़मे ज़माना पर 

और उस का नाम ग़मे नातमाम रक्खा है


मैं सुब्ह शाम उसी की देखभाल करता हूँ 

तुम्हारे ज़ख्म ने मुझ को ग़ुलाम रक्खा है


गली में आप की रक्खे हैं पाँव इज़्ज़त से

वहाँ प सर भी बसद एहतराम रक्खा है


रहे उम्मीद तो रक्खी है दूर दूर उस ने 

पर उस ने दश्ते बला गाम गाम रक्खा है


बनाई है तिरी तस्वीर इक मुसव्विर ने

और उस का नाम गुले सुर्ख़ फ़ाम रक्खा है


नशा ए क़रब ने रक्खा ग़ज़ाल पा मुझ को

सूरूरे ग़म ने मुझे ख़ुश ख़िराम रखा है


चलो भला हुआ उस ने फ़िरोज़ और मैंने

तमाम हो चुका क़िस्सा तमाम रक्खा है



   ग़ज़ल


कुछ परिंदे जब सरे शाख़े शजर लौटे नहीं

तो शजर पर फिर कभी बर्गो समर लौटे नहीं


जो गिरे इक बार ख़ाके कूचा ओ बाज़ार में

दामने मिज़गाँ में वो लालो गुहर लौटे नहीं


जो कफ़स को तोड़ने में छिल गए थे इक दफ़ा

जिस्म पर बुलबुल के फिर वो बालो पर लौटे नहीं


मशक भरने तुम भी मत जाना सराबों की तरफ़ 

तुम से पहले जो गए वो हमसफ़र, लौटे नहीं


वो न लौटे, ले गए जो छीन कर सब्रो करार

दे गए हम को जो आबे चश्मे तर लौटे नहीं


कह गए थे आएँगे वापिस मगर आए न वो 

कह गए थे लौट आएँगे मगर लौटे नहीं


इस तरह बस एक आहट पर ही जम जाते हैं कान

जिस तरह दर की तरफ़ जा कर नज़र लौटे नहीं


क्या तलिसमे चश्मे साक़ी ने तुम्हें भी रख लिया?

ले के तुम भी मरहमे जख़मे जिगर लौटे नहीं


जो सिपाही दफ़्न होने गाँव लौटे जंग से

जिस्म तो लौटे हैं लेकिन उनके सर लौटे नहीं


एक दिन हो जाए रुख़सत वक़्त पर शब तो फ़िरोज़

क्या बने गर वक़्त पर उस दिन सहर लौटे नहीं


संपर्क: 

dashmeshgill@hotmail.com

Wednesday, April 17, 2024

सिराज फ़ैसल ख़ान


प्रकाशित पुस्तकें

 क्या तुम्हें याद कुछ नहीं आता (ग़ज़ल संग्रह- 2021)
■ परफ़्यूम (नज़्म संग्रह-2022)
 दस्तक (साझा ग़ज़ल संग्रह-2014) 
 गुलदस्ता-ए-ग़ज़ल (साझा ग़ज़ल संग्रह- 2023)
चाँद बैठा हुआ है पहलू में (ग़ज़ल संग्रह-2024)


 
कविताकोश नवलेखन पुरस्कार(2011)



   ग़ज़ल


माना मुझको दार पे लाया जा सकता है 

लेकिन मुर्दा शहर जगाया जा सकता है


लिखा है तारीख के सफ़्हे - सफ़्हे पर ये

शाहों को भी दास बनाया जा सकता है 


चांद जो रूठा रातें काली हो सकती हैं 

सूरज रूठ गया तो साया जा सकता है 


शायद अगली इक कोशिश तकदीर बदल दे 

जहर तो जब जी चाहें खाया जा सकता है 


कब तक धोखा दे सकते हैं आईने को 

कब तक चेहरे को चमकाया जा सकता है 


पाप सभी कुटिया के भीतर हो सकते हैं 

हुज़रे के अंदर सब खाया जा सकता है


   ग़ज़ल


रो दीवार रोशन है दरीचा मुस्कुराता है 

अगर मौजूद हो मां घर में क्या-क्या मुस्कुराता है


किया नाराज मां को और बच्चा हंस के यह बोला 

कि यह मां है मियां इसका तो गुस्सा मुस्कुराता है


हमारी मां ने सर पर हाथ रखकर हमसे यह पूछा 

कि किस गुड़िया की चाहत में यह गुड्डा मुस्कुराता है


सभी रिश्ते यहां बर्बाद है मतलब परस्ती से

अजल से फिर भी मां बेटे का रिश्ता मुस्कुराता है 


फरिश्तों ने कहा 'आम आमाल का संदूक क्या खोलें' 

दुआ लाया है मां की इसका बक्सा मुस्कुराता है 


लगाया था किसी ने आंख से काजल छुटा कर जो

मेरे बचपन के अल्बम में वो टीका मुस्कुराता है 


दिया था हामिद ने कभी लाकर जो मेले से 

अमीना की रसोई में वह चिमटा मुस्कुराता है


 किताबों से निकलकर तितलियां गजलें सुनाती हैं 

टिफिन रखती है मेरी मां तो बसता मुस्कुराता है 


वो उजला हो की मैला हो या महंगा हो कि सस्ता हो

 यह मां का सर है इस पर हर दुपट्टा मुस्कुराता है


   ग़ज़ल


श्क़ मेरी ज़ुबान से निकला

और मैं ख़ानदान से निकला


सब मुहाफ़िज़ जहां पे बैठे थे

भेड़िया उस मचान से निकला


मैंने ठोकर ज़मीं पे मारी तो

रास्ता आसमान से निकला


क़त्ल जब कर गए उसे क़ातिल

हर कोई तब मकान से निकला


लोग तकते रहे समंदर को

और भँवर बादबान से निकला


रूप इक अनछुआ सा ग़ज़लों का

आज मेरे बयान से निकला


   ग़ज़ल


चाँद पर माना महल सपनों के वो बनवाएगा 

जंगली-पन आदमी पर साथ लेकर जाएगा

 

तोड़ देगा जब तरक़्क़ी की कभी सारी हदें 

आदमी तब अपनी हर ईजाद से घबराएगा

 

दश्त में तब्दील हो जाएँगे ज़िन्दा शहर सब 

बम तरक़्क़ी का ये इक दिन देखना फट जाएगा

 

मुँह के बल इक दिन गिरेगी देखना कुल काएनात 

तेज़-रफ़्तारी में इन्साँ ऐसी ठोकर खाएगा

 

ग़र्क़ कर देगी हमें इक रोज़ तहज़ीब-ए-जदीद 

आदमी ही आदमी को मारकर खा जाएगा


   ग़ज़ल


मेरा इल्म, सुख और हुनर खा लिया

मुहब्बत ने तो मेरा घर खा लिया


नहीं खाएगी ज़हर वैसे तो वो

मगर दोस्त उसने अगर खा लिया?


समन्दर के तो होश ही उड़ गए

सफ़ीनों ने अब के भंवर खा लिया


क़ज़ा एक दो शख़्स खाती थी रोज़

सियासत ने पूरा नगर खा लिया


ये दुख खा गया है ज़मींदार को

कि बच्चों ने सब बेच कर खा लिया


नहीं...शाइरी का नहीं खाते हम

हमें शाइरी ने मगर खा लिया


बुरी ये ख़बर कोई ज़ालिम को दे

तेरे ज़ुल्म ने सबका डर खा लिया


नहीं...आप माहिर नहीं हैं हुज़ूर

ये धोका तो बस जानकर खा लिया


तुझे कुछ ख़बर है तेरे दुख ने दोस्त

मेरा ज़हन, दिल और जिगर खा लिया


बहुत सख़्त थी इस ग़ज़ल की ज़मीन

मेरा इस ग़ज़ल ने तो सर खा लिया


ये सुनने को हम तो तरस ही गए

'सिराज' आपने क्या डिनर खा लिया


   ग़ज़ल


साइल का कोई हल भी नहीं है

कोई देने को संबल भी नहीं है


कहीं क़ालीन राहों में बिछे हैं

कहीं पैरों में चप्पल भी नहीं है


अभी कैसे बता दें बात दिल की

अभी मिलना मुसलसल भी नहीं है


जियोगे शहरे अय्यारी में कैसे

कि तुम में तो कपट-छल भी नहीं है


कहीं गर्दन झुकी है ज़ेवरों से

कहीं किस्मत में काजल भी नहीं है


कभी जी भर के उसको देख ही लूँ

मेरी किस्मत में वो पल भी नहीं है


उसे सोने के गहने चाहिए थे

हमारे पास पीतल भी नहीं है


तसव्वुर है फ़क़त बाहों में बाहें

अभी हाथों में आंचल भी नहीं है


जहाँ लटकी है शीतल जल की तख़्ती

वहाँ पर अस्ल में जल भी नहीं है


   ग़ज़ल


ख़ुशी के कितने हैं सामान ख़ुश नहीं हूँ मैं

तेरे बग़ैर मेरी जान... ख़ुश नहीं हूँ मैं


है ज़हन-ओ-दिल में घमासान ख़ुश नहीं हूँ मैं

फ़रेब है मेरी मुस्कान ख़ुश नहीं हूँ मैं


ख़फ़ा न हो कि फ़रामोश कर दिया है तुझे

कहाँ है अपना भी अब ध्यान ख़ुश नहीं हूँ मैं


हूँ डूबती हुई कश्ती किनारा कर मुझसे

क़सम ख़ुदा की मेरी मान ख़ुश नहीं हूँ मैं


अदब, सिनेमा, समंदर, शराब, लड़की, फूल

ख़ुशी के कितने हैं इम्कान... ख़ुश नहीं हूँ मैं


चमकते शहर, हसीं बीच, मय-कदे, बाज़ार

मेरे लिए हैं बयाबान ख़ुश नहीं हूँ मैं


कई अज़ीज़ गंवा-कर ये ताज पाया है

सो फ़त्ह कर के भी मैदान ख़ुश नहीं हूँ मैं


   ग़ज़ल


वो बड़े बनते हैं अपने नाम से

हम बड़े बनते है अपने काम से


वो कभी आग़ाज़ कर सकते नहीं

ख़ौफ़ लगता है जिन्हें अंजाम से


इक नज़र महफ़िल में देखा था जिसे

हम तो खोए है उसी में शाम से


दोस्ती, चाहत वफ़ा इस दौर में

काम रख ऐ दोस्त अपने काम से


जिन से कोई वास्ता तक है नहीं

क्यूँ वो जलते है हमारे नाम से


उस के दिल की आग ठंडी पड़ गई

मुझ को शोहरत मिल गई इल्ज़ाम से


महफ़िलों में ज़िक्र मत करना मेरा

आग लग जाती है मेरे नाम से


   ग़ज़ल


तेरे एहसास में डूबा हुआ मैं

कभी सहरा कभी दरिया हुआ मैं


तेरी नज़रें टिकी थीं आसमाँ पर

तेरे दामन से था लिपटा हुआ मैं


खुली आँखों से भी सोया हूँ अक्सर

तुम्हारा रास्ता तकता हुआ मैं


ख़ुदा जाने के दलदल में ग़मों के

कहाँ तक जाऊँगा धँसता हुआ मैं


बहुत पुर-ख़ार थी राह-ए-मोहब्बत

चला आया मगर हँसता हुआ मैं


कई दिन बाद उस ने गुफ़्तुगू की

कई दिन बाद फिर अच्छा हुआ मैं


सिराज फ़ैसल ख़ान

शाहजहाँपुर (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल: 7668666278

Friday, April 5, 2024

फ़िलहाल - 8 आरती


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हमें भेड़ - बकरी बनाओ ||

' हीं सीखना हमें दो और दो का जोड़ घटाना
नहीं पढ़ना विज्ञान भूगोल की पोथियां
इतिहास की मक्कारियां समझकर क्या कर लेंगे
और राजनीति तुम्हारी तुम्हें ही मुबारक

हम वही धान कूटेंगे
चक्की पीसेंगे
घूंघट काढ़कर मुँह अँधेरे दिशा फारिग हो लेंगे


हम हाथ जोड़कर सत्यनारायण की कथा सुनेंगे
और लीलावती कलावती की तरह परदेस
कमाने या ऐश करने गए सेठ का
जीवन भर इंतज़ार करेंगे .. '

हमारे समय की बेहतरीन कवि हैं 'आरती'। अनूठी, स्त्री - संवेदना की सच्ची कवि और समय की छाती पर लकीर खींचती हुई । रीवा ( म. प.) में जन्मी आरती ने 'समकालीन कविता में स्त्री - जीवन की विविध छवियां' विषय पर पीएचडी किया है। स्त्री मुद्दों पर निरन्तर लिखा है। प्रिंट व इलैक्ट्रोनिक मीडिया में सक्रिय रही हैं। 'मीडिया मीमांसा' 'मीडिया नवचिंतन' ( माखनलाल चतुर्वेदी विश्विद्यालय ) सहित रवींद्रनाथ टैगोर विश्विद्यालय द्वारा प्रकाशित कथाकोष 'कथादेश' का संपादन भी किया है। 'समय के साखी' की संपादक हैं । 'मायालोक से बाहर' के उपरांत दूसरा कविता - संग्रह 'मूक बिम्बों से बाहर' "राधाकृष्ण प्रकाशन" से पिछले दिनों ही आया है । इसी संग्रह के बहाने कुछ कहने जा रहा हूँ -

इस संग्रह का पहला ही पन्ना ध्यान खींचता है। इसे जनकवि रमाशंकर ' विद्रोही'  व कोविड में हताश, मौत की अचीन्ही नींद सो गए जन - समाज के नाम किया गया है। यह सामाजिक चेतना अचानक नहीं आती। इसके लिए द्वंद्वात्मक कारणों का विश्लेषण करना पड़ता है , जो उनकी कविताओं में बेबाकी से मुखर होता है ।

' ... राजा रानी अपनी बेटी को विदा करते हुए
बहुत सारा धन , घोड़े हाथी और हज़ारों दासियां भी देते हैं
मैं कहानी को थोड़ा रोककर पूछती हूं कि बताओ
ये हज़ारों  - लाखों दासियां कहां से आती थीं
क्या राजा के किसी खेत में उगाई जाती थीं .. ' 

आरती का शिल्प, यकसां इतिहास की उस सड़ांध को खोलता मिलता है, जहां स्त्री को देह मात्र मानकर रौंदा गया तथा दूसरी ओर वह इसे मर्मांतक कथा की तरह रचती हैं। वह स्त्री - देह की संवेदनाओं को उलीकती, तथाकथित स्त्री - विमर्श का भी अतिक्रमण कर जाती हैं। यहीं वह भाषा के उस आलोक का वरण करती हैं ,  जिसमें शब्द - संस्कार खुलकर बोलते हैं। मिथक, इतिहास व वर्तमान का ऐसा गुंफन अद्वितीय है, जो उन्हें हमारे समय की अधिकांश कवियों से अलगाता है।वह वाक्य - विन्यास के भीतर उस नैरेटिव को स्थापित करती हैं, जहां राजनैतिक - सामाजिक छद्म है। यह जितना आसान लगता है, उसे अर्जित करने में कवि की बहुत साधना होती है। यह तथ्य इस उदाहरण से स्पष्ट होगा : 

' एक चिड़िया भी इन दिनों उदास और चुपचाप ऊँघ रही है
एक गिलहरी बीमार -  सी पेड़ की डाल पर सोई है'

आरती की कविताओं के शीर्षक ही ज़बरदस्त हैं। जैसे : 'दासियां किस खेत में उगती थीं', 'तीर की नोक पर रखकर स्तन, एक स्त्री घोषणा करती है', 'नदी शाप देगी और तुम सबकुछ भूल जाओगे', 'वे सड़कें ज़रूर छटपटाती होंगी दर्द से', 'विधवा उत्सव मनातीं मेरे गांव की औरतें'। उनकी कविताओं पर ' राजेश जोशी ' लिखते हैं , "...आरती समय के अंतर्द्वंद्वों और अंतर्विरोधों को समझने - परखने के लिए, उसकी अनेक अंदरूनी परतों में झांकती है । इस समय को कहने के लिए वो मिथकों , स्मृतियों और आख्यान को मिथक की तरह या इतिहास की तरह नहीं , वर्तमान की तरह देखती हैं। ऐसा करते हुए वह बार - बार मिथक और इतिहास के संदर्भों से बाहर अपने समय की सच्चाई से रूबरू होने की जद्दोजहद से गुजरती हैं । इस संग्रह की कविताओं को पढ़ते हुए इस द्वैत और द्वंद्व को लगातार महसूस किया जा सकता है।" 

आरती कई बार स्वयं को ही रचती हुई महसूस होती हैं। ये कविताएं हालांकि उन्होंने एक बड़े समाज को चिन्हित करते हुए लिखीं हैं, लेकिन  बहुधा यह भी लगता है कि ये उनकी निजी डायरी की तरह हैं। इसमें भी कतई संदेह नहीं कि वे बहुत गहरा उतर कर औरत व आदमी के द्वंद्व को मथती हैं। यहां आवर्तन है, जिसे मुहावरे की तरह स्थापित किया गया है। '... आदमी का विलोम जानवर होता है / ... जिसके तहत औरतें 'आदमी' नहीं होतीं...।' यहीं इसे भी रेखांकित करना बनता है कि वे, महज़ स्त्री - मुक्ति की नहीं, स्त्री के हक में अलख जगाने वाले कवि भी हैं।

' सिंधु घाटी के खंडहरों में भटकती
चौदह सीढियां जल्दी - जल्दी फलांग
मैंने तुम्हें आवाज़ दी
कि सुनो ! ऐसे अकेले नहीं पर की जातीं सभ्यताएं ...
कि नदी शाप देगी और तुम सब भूल जाओगे ।'


प्रेम की जागृति , सभ्यता के चरण  व प्रकृति का मिलाप उनकी कविताओं में मिलता है। इस बात को कविता 'धूसर कागज़ पर लिखा प्रेम' में निकट से समझा जा सकता है। इन कविताओं में प्रेम की पराकाष्ठा तो है ही, स्त्री - मन के संघर्ष साथ चलते हैं। यही इन कविताओं की मौलिकता है और सीमा भी। इसी के साथ ये कविताएं हमें प्रकृति के निकट जाने की तमीज बख़्शती हैं। आरती कुदरत को खोलती ही नहीं, इन्हें हमारे सामने इनके असंख्य मायनों संग रख देती हैं। वे रंगों की चितेरी हैं, तो रँगों में व्याप्त प्यास की भी कवि हैं। उनके पास यदि मिथक और इतिहास बार -  बार लौटता है तो समय का मौजूदा संश्लेषण भी उपस्थित रहता है।

कोरोना - काल को लेकर उनकी कविता, 'मौत और महामारी की कविताएं' भी ज़रूरी कविता है। दोहराता हूँ कि आरती एक सशक्त कवि हैं। उनकी संवेदना विचलित करती है, लेकिन उन्हें विषय - विशेष की निरंतरता को लेकर सोचना होगा तथा कुछ और तर्ज़ की कविताओं को भी लिखना - परखना होगा। बहरहाल यह संग्रह हमारा ऐसे संघर्ष से सामना कराता है, जो चिरकाल से चलता हुआ स्थायी आकार ले चुका है। यहां जीवन के मायने उजागर होते हैं। उन्हें हार्दिक बधाई। अंत में उनकी लंबी कविता  'विधवा उत्सव मनातीं मेरे गांव की औरतें' से कुछ पंक्तियां :

' स तरह मेरे गांव कस्बे की औरतें 
किसी औरत के विधवा होने का जश्न मनाती हैं
वे पहले उसे नोचती हैं
फिर उसके घावों को कुरेदती हैं 
उसमें चुटकी भर - भर नमक डालती जाती हैं
तब तक , जब तक वह दर्द की अभ्यस्त होकर
औरों को दर्द देने की प्रक्रिया में शामिल न हो जाए ...'


(प्रकाशक : राधाकृष्ण ,दिल्ली , मूल्य : रू 199/-) 

ई - मेल  : samay sakhi@ gmail. com.



मनोज शर्मा

संपर्क: 7889474880