कविता में तीजन
पीयूष कुमार
लोककला किसी समाज की सांस्कृतिक स्मृति, सामूहिक चेतना और जीवन-दृष्टि की सशक्त अभिव्यक्ति होती है। छत्तीसगढ़ की पंडवानी इस दृष्टि से अद्भुत लोकनाट्य विधा है जिसकी सरताज हैं तीजनबाई जिनका अभी पांच जुलाई को सत्तर वर्ष की आयु में देहावसान हो गया है। लोकनाट्य की विलक्षण परंपरा पंडवानी को अपने अद्वितीय गायन, अभिनय और असाधारण मंचीय व्यक्तित्व से वैश्विक पहचान दिलाने वाली तीजन बाई केवल एक लोकगायिका नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता की प्रतिनिधि थीं। उनके निधन ने कुछ कवियों को गहराई से प्रभावित किया, जिसके परिणामस्वरूप स्वतःस्फूर्त ही उन पर कविताएँ रची गईं। किसी लोक कलाकार पर कविताओं का लिखा जाना एक विशेष घटना है। इन कविताओं में तीजन बाई को कहीं लोकनायिका, कहीं संघर्षशील स्त्री, कहीं पंडवानी की अमर साधिका और कहीं भारतीय लोकसंस्कृति की जीवंत प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है। इस लिहाज से यह देखना महत्वपूर्ण है कि समकालीन हिंदी कविता ने तीजन बाई के व्यक्तित्व, उनके सांस्कृतिक अवदान और उनकी लोकधर्मी चेतना को किस प्रकार रूपायित किया है।
धमतरी के साहित्यकार डुमनलाल ध्रुव जो छत्तीसगढ़ी और हिंदी दोनों में समान अधिकार रखते हैं उन्होंने महान तीजनबाई के निधन पर एक मार्मिक कविता ‘तंबूरा अब भी बज रहा है’ लिखी है -
कहते हैं -
तीजन बाई नहीं रहीं
लेकिन यह बात
उतनी ही अधूरी है
जितनी बिना वर्षा के
बादलों की खबर
तंबूरा
जिसे उन्होंने जीवन भर
अपने कंधे पर रखा
आज पहली बार
धरती के कंधे पर रखा गया है
उसके तार
चुप हैं
पर चुप्पी भी
एक तरह का संगीत होती है
जिसे केवल वही सुनते हैं
जो स्मृतियों के पास बैठते हैं
महाभारत
अब किसी पुस्तक में नहीं
एक खाली आसन पर बैठी है
भीम अपनी गदा खोजते हुए
उस तंबूरे तक आते हैं
अर्जुन
उसकी लकड़ी में अपना गांडीव
पहचान लेते हैं
और कृष्ण
मुस्कराकर कहते हैं -
कथा कभी नहीं मरती
मरता है
केवल वह शरीर
जो उसे बोलता है
आवाजें नहीं मरती
वे हवा की तरह
पेड़ों के बीच से निकलकर
बच्चों की सांसों में रहने लगती हैं
छत्तीसगढ़ की मिट्टी
आज कुछ अधिक गीली है
शायद उसने
अपनी सबसे प्रिय बेटी की आवाज
अपने भीतर रख ली है
कल जब
कोई छोटी लड़की
पहली बार तंबूरा उठाएगी
उसके हाथों में
तीजन बाई की उंगलियों की गर्मी
होगी
तब कोई नहीं कहेगा
कि तंबूरा शांत हो गया
कहा जाएगा -
उसने अपना संगीत
एक कंठ से निकालकर
समय के हवाले कर दिया है।
और समय
इतना उदार है
कि अच्छी आवाजों को
मरने नहीं देता
विश्वप्रसिद्ध पंडवानी गायिका
तीजन बाई पर लिखी गई यह कविता एक साधारण श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि लोककला की शाश्वतता
और कलाकार की सांस्कृतिक उपस्थिति की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है। डुमनलाल यहाँ उनकी
मृत्यु को अंतिम सत्य मानने से इनकार करते हैं। वे विलाप का सहारा नहीं लेते बल्कि
संयत संवेदना से कहते हैं कि कलाकार की मृत्यु उसकी कला का अंत नहीं होती। ‘चुप्पी
भी एक तरह का संगीत होती है’ जैसी पंक्ति दार्शनिक अर्थवत्ता ग्रहण करती है और पाठक
को बाह्य शोक से आगे बढ़कर आंतरिक अनुभूति तक ले जाती है। भाषा सरल है पर व्यंजनापूर्ण
और लाक्षणिक है। यद्यपि कुछ स्थानों पर भावावेश के कारण कथन अपेक्षाकृत विस्तार ग्रहण
करता है, फिर भी संपूर्ण कविता अपनी सांकेतिकता, कलात्मक संयम और भाव-सघनता के कारण
प्रभावशाली बन पड़ी है। यह रचना तीजन बाई की स्मृति को केवल संरक्षित नहीं करती, बल्कि
लोककला की अमर परंपरा को भी सशक्त रूप से प्रतिष्ठित करती है।
इसी तरह रायपुर के साहित्यकार
जयप्रकाश मानस ने भी तीजन बाई के देहावसान के उपरान्त एक कविता ‘जब पृथ्वी ने महाभारत
गाया’ लिखी है जिसमें पंडवानी की कलात्मक विरासत को सहेजा गया है -
जब उन्होंने तंबूरा रखा
उसमें से थोड़ी सी पृश्वी बाहर आई
उन्होंने कहा नहीं कि यह भीम है
उन्होंने बस उसे
थोड़ा सा ऊँचा उठाया
और इतने से
अन्याय थोड़ा छोटा दिखाई देने लगा
महाभारत
किताब से उतरकर
धान के खेत में चला गया
जहाँ एक किसान
हल चलाते-चलाते
अचानक भीम की तरह सीधा खड़ा हो गया
एक लड़की ने
पहली बार अपनी आवाज़ को डर से बड़ा पाया
शायद उसी दिन पंडवानी जन्मी होगी!
या फिर
वह हर बार वहीं जन्म लेती होगी
अब वे नहीं हैं
लेकिन किसी गाँव की साँझ में
जब कोई बच्चा
लकड़ी की डंडी को
तंबूरा समझकर पकड़ता है
तो पृश्वी
थोड़ी देर के लिए
फिर से
महाभारत बोलने लगती है
जयप्रकाश मानस की यह कविता तीजनबाई के व्यक्तित्व की अपेक्षा उनकी लोक - सांस्कृतिक चेतना और कलात्मक विरासत का सांकेतिक चित्र प्रस्तुत करती है। यह कविता तीजन बाई के द्वारा महाभारत को ग्रंथ की सीमाओं से मुक्त कर लोकजीवन का जीवंत अनुभव बना देने को जाहिर करती है जिसमें महाभारत केवल आख्यान नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध, श्रम की गरिमा और आत्मविश्वास का सांस्कृतिक रूपक बन जाती है। ‘अन्याय थोड़ा छोटा दिखाई देने लगा’ जैसी पंक्ति इसी विचार का प्रभावी प्रतिपादन करती है। इस कविता में किसान का भीम की तरह खड़ा होना तथा लड़की का अपनी आवाज़ को ‘डर से बड़ा’ पाना, लोककला की प्रेरणादायी शक्ति की स्थापना करना है। कविता का अंतिम दृश्य इस विश्वास को बल देता है कि महान कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुनर्जन्म लेती रहती है। कविता में ‘तंबूरे से पृथ्वी का बाहर आना’, ‘महाभारत का धान के खेत में उतर जाना’ तथा ‘पृथ्वी का महाभारत बोलने लगना’ जैसे बिंब कविता को गहरी सांकेतिकता और दार्शनिक ऊँचाई प्रदान करते हैं। यह कविता कम शब्दों में व्यापक सांस्कृतिक अर्थवत्ता का सृजन करती है और तीजन बाई की कलासाधना को लोकजीवन, प्रतिरोध और सांस्कृतिक स्मृति के शाश्वत रूप में प्रतिष्ठित करती है।
तीजनबाई पर उपलब्ध कविताओं
में ज्यादातर कवितायेँ तीजनबाई के देहावसान उपरांत लिखी गयी हैं किन्तु बाँदा के वरिष्ठ
कवि केशव तिवारी ने उनपर ‘तीजनबाई’ कविता लिखी थी। यह कविता उनके पहले काव्यसंग्रह
‘ इस मिट्टी से बना‘ (2005 में प्रकाशित) में दर्ज है। इस कविता के साथ ख़ास बात यह
है कि कविता प्रकाशन लगभग दस साल बाद तीजनबाई को केशव तिवारी ने यह कविता रायपुर के
विश्रामगृह में प्रत्यक्ष सुनाई थी। यह कविता इस प्रकार है -
इसके स्वरों से फूट रही है -
छत्तीसगढ़ी धान की खुशबू
इसकी चाल में है
नाच और गम्मत का जोश
युगों से पंडवानी सुनता आ रहा
छत्तीसगढ़ भी
चकित है सुनकर बिटिया की ललकार
छत्तीसगढ़ की पथरीली छाती पर
तन कर खड़ी हो गई है
शाल के वृक्ष की तरह
महाजन के यहां बर्तन मलती
हाट में सर पर लकड़ी का
गट्ठर लिए खड़ी
ठेकेदारों की निगाहों से
बचकर महुआ बीनती
टूरियों तक पहुंच रही है
उसकी हाँक
तीजन हो गई है छत्तीसगढ़!
केशव तिवारी की यह कविता तीजन बाई के व्यक्तित्व को केवल एक लोकगायिका के रूप में नहीं, बल्कि संपूर्ण छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता और लोकचेतना के प्रतीक के रूप में स्थापित करती है। ‘तीजन हो गई है छत्तीसगढ़’ पंक्ति केवल प्रशंसात्मक कथन नहीं, बल्कि कलाकार और उसकी भूमि के अभिन्न संबंध की घोषणा है। कवि तीजन बाई के स्वर में धान की सुगंध, लोकनृत्य की ऊर्जा और पंडवानी की परंपरा को समाहित देखकर मानता है कि उनकी कला लोकजीवन की सामूहिक चेतना का विस्तार है। तीजन के व्यक्तित्व का विस्तार करते हुए केशव तिवारी महाजन, ठेकेदार और श्रमिक स्त्रियों के चित्रों के माध्यम से शोषण के सामाजिक यथार्थ को भी स्वर देते हैं। इस कविता में तीजन बाई को करुणा की पात्र नहीं, बल्कि प्रतिरोध और आत्मविश्वास की सशक्त प्रतीक के रूप में चित्रित करता है। ‘शाल के वृक्ष की तरह तनकर खड़ी हो गई है’ उपमा उनके व्यक्तित्व की दृढ़ता, स्वाभिमान और जीवन-संघर्ष की विजय का प्रभावशाली संकेत देती है। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में साल वनों का बाहुल्य है। केशव तिवारी की भाषा सरल, लोकधर्मी और संप्रेषणीय है, जिस में गहन व्यंजना-शक्ति निहित है। यद्यपि कविता में तीजन बाई का आदर्शीकरण अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देता है, फिर भी यह आदर्शीकरण कृत्रिम नहीं लगता क्योंकि वह उनके संघर्ष, श्रम और लोक-साधना से अर्जित है। यह कविता तीजन बाई को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक आत्मा और लोकप्रतिरोध की सशक्त आवाज़ के रूप में प्रतिष्ठित करने वाली प्रभावशाली रचना है।
दुर्ग में रहनेवाली अल्पना
त्रिपाठी ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय
से नाटक एवं रंगमंच पर शोधकार्य किया है। उन्होंने
कुछ वर्ष पहले ही तीजनबाई का साक्षात्कार भी लिया था। इस साक्षात्कार के बाद उन्होंने
एक कविता लिखी थी ‘तीजन’ जो तीजनबाई की कला और व्यक्तित्व का आत्मीय चित्रण करती है
–
आजादी के साल में जन्मी
ले तीज-त्यौहार का गाढ़ा रंग
गुरबत का आँचल पसरा था
पली-बढ़ी भाई-बहनों के संग
भूली नहीं वो बाबा का पारा
पंडवानी नाम से जो चढ़ता था
अब भी हैं वो यादों में कोड़े
पीठ पर खूब जो पड़ता था
अगले ही पल कुछ आंखों में चमकी
एक अल्हड़ मस्त रवानी थी
नाना से जो सीख रही
द्वापर की बड़ी कहानी थी
आम के छाँव में बचपन गुजरा
जीवन पथ समतल न था
मान सम्मान जन धन मिले
पर मन, अभिमानी चंचल न था
रामकथा जन जन में व्यापी
वो कृष्ण से लौ लगा बैठीं
पांडव की अमर कहानी पर
निज जीवन दांव लगा बैठीं
नाना से फिर गुरुमंत्र लिया
वय तेरह में अँखुआई की
द्रौपदी की पीड़ा गा गाकर
कुछ अपनी पीर पराई की
भरी सभा में जब
द्रौपदी का चीरहरण हुआ
मानो तीजन का भी फिर फिर
दुर्योधन से रण हुआ
द्रौपदी के बन रक्षक
कृष्ण ने लाज बचाई
पर कलजुग में अपनों से टूटी
तीजन की है सच्चाई
जब जब अपनों ने त्रास दिया
कथा ने उन्हें संभाल लिया
तीजन कथा कथा तीजन है
हर शै खूब खंगाल लिया
कापालिक है शैली उनकी
अभिनय में उस्ताद हैं
अपनी लंबी काया में
बच्चों सा दिल आबाद है
तंबूरे के तार से झंकृत
हौजी से फिर संवाद हुआ
इस सम्मोहन से बच निकला
ऐसा न कोई अपवाद हुआ
इन कविताओं से हिन्दी कविता इसलिए भी समृद्ध हो रही है कि यह एक लोक कलाकार पर केंद्रित है। इसी क्रम में तीजन बाई के देहावसान के बाद कवि यश मालवीय ने भी उन्हें अपनी भावपूर्ण रचना 'चली गई तीजनबाई ' कविता में इस तरह याद किया है -
चली गई तीजनबाई
मंचों पर अब नहीं सजेगी
वो मशाल सी तरुणाई
टूट गए घुँघरू चुपके से
चली गई तीजनबाई
वो मिट्टी की गन्ध
हमारी संस्कृति का उजला चेहरा
याद आएगा ज्वार उठाता
स्वर समुद्र गहरा गहरा
दुनिया भर में छत्तीसगढ़ की
बदली रही घिरी छाई
वो संवाद शब्द में
बंधती सी जीवन की लयकारी
एक आग थी, सोए मन में
बो देती थी चिनगारी
व्यथा कथा लड़ती औरत की
उसने जी भरकर गाई
दसों दिशाएँ नाच उठती थीं
जब वो गाया करती थी
कठिन समय को वीरभाव से
खुलकर बांचा करती थी
वो हुंकार मौन है अब तो
आँख हमारी भर आई
नहीं काल भी मिटा सकेगा
वो गायन पंडवानी का
अंत न होगा कभी रोशनी देती
अमर कहानी का
चट्टानों में फूल खिलाकर
थमी थमी है पुरवाई
इस कविता में महान लोकगायिका के निधन पर शोक के साथ-साथ उनकी कलात्मक विरासत की अमरता का भाव भी समान रूप से व्यक्त हुआ है। यश मालवीय मानते हैं कि तीजन बाई का शारीरिक अवसान अवश्य हुआ है पर वे एक कलाकार के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति की जीवंत मशाल और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान के रूप में अमर हो गयी हैं। 'व्यथा कथा लड़ती औरत की / उसने जी भरकर गाई' जैसी पंक्ति यह संकेत करती हैं कि उनके गायन में केवल महाभारत की कथा नहीं, बल्कि स्त्री-अस्मिता और संघर्ष का स्वर भी उपस्थित था। इस कविता में कवि का शोक आत्मविलाप न होकर सांस्कृतिक क्षति की अनुभूति है। यह कविता करुण भाव से आरंभ होकर श्रद्धा और सांस्कृतिक विश्वास में परिणत होती है। गीतात्मक संरचना की इस कविता में प्रशस्तिपरक स्वर अपेक्षाकृत अधिक है और तीजन बाई के व्यक्तित्व का पक्ष सामने नहीं आता, फिर भी श्रद्धांजलि-काव्य की प्रकृति को देखते हुए यह उसकी स्वाभाविक सीमा है।
किसी लोककलाकार के लिए स्वतःस्फूर्त उठनेवाले भाव ज़ब कविता में दर्ज होने लगते हैं तो उस कलाकार का मैयार निश्चित ही बहुत ऊँचा होता है। तीजनबाई के इसी मैयार को अंबिकापुर की कवि मृदुला सिंह ने भी तीजन बाई को पंडवानी की परिष्ठभूमि में अपनी कविता 'पंडवानी की लोकनायिका' में दर्ज किया है -
गीत
संगीत
नृत्य
इन तीनों से बनी पंडवानी
और बनी तीजन
प्राचीन कथा से लेकर
मनुष्य के अंतस में
चल रहे महाभारत तक
हर समय जन्म लेता
धर्म- अधर्म का संघर्ष
कंठ से उसके
अनेक स्वरों में बोलता था
द्रौपदी का आक्रोश
भीष्म की विवशता
कर्ण का अपमान
भीम का क्रोध
और कृष्ण की दूरदर्शी मुस्कान
जीवंत होते रहे
उसकी पंडवानी में
बचपन में
कापालिक गायन के लिए
मंच पर खड़ी तीजन को
पता नहीं था कि
पंडवानी में स्त्रियों को सिर्फ बैठकर गाना है
उसे खडे होकर गाना प्राकृतिक लगा
आकाश
वायु
जल
अग्नि
और भूमि की तरह
पंडवानी के लिए उनका खड़ा होना
खड़े होना था न्याय और धर्म के पक्ष में
इस प्रतिरोध का शस्त्र था
उनका तंबूरा
जो तत्क्षण ही
भीम की गदा
अर्जुन का गांडीव
द्रौपदी के केश
और
कृष्ण का चक्र बन जाता था
धर्म अधर्म के युद्ध का
उन्मुक्त बखान करती
तीजन की आवाज
मौन स्त्रियों के प्रतिरोध की प्रतिनिधि है
जिसमें भाषा को
अनुवाद की आवश्यकता नहीं हुई
पंडवानी के आरोह अवरोह
यति गति ताल छंद
और रागी के हुंकारू में
शब्द पीछे रह जाते
भाव आगे चल पड़ते
इसलिए
जो भाषा नहीं समझते थे
मनुष्य के द्वन्द को समझ लेते थे
तीजनबाई ने पंडवानी को
बाज़ार
संग्रहालय
और अभिजात्यता से बचाकर
छत्तीसगढ़ी माटी के लोकराग को
बिखेर दिया संसार भर में
जो गूंजती रहेगी हमेशा
दिगंत तक!
तीजनबाई पर केंद्रित इन समकालीन कविताओं से यह उम्मीद बँधती है कि कवि अभी लोक और कला से विमुख नहीं हुआ है। पूर्व मे भी इसी तरह व्यक्तिकेंद्रित कवितायेँ लिखी गयी हैं जो मात्रात्मक रूप से कम हैं पर गुणात्मक रूप से स्तरीय कवितायेँ हैं। महान पंडवानी कलाकार तीजनबाई पर इन कविताओं से कला, कविता और साहित्य समृद्ध हुआ है।
| पीयूष कुमार |
लेखक उच्च शिक्षा
विभाग, छत्तीसगढ़ शासन मे हिन्दी के सहायक प्राध्यापक हैं. बागबाहरा, जिला - महासमुंद
मे रहते हैं. सम्पर्क : 8839072306
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