Wednesday, January 14, 2015

अदिति शर्मा


जन्म : २७ सितम्बर १९९५ में
माँ :   श्रीमती वीणा देवी
पिता : श्री माया राम
शिक्षा : राजकीय महाविधालय , साम्बा से कला संकाय से स्नातक कर रही हैं
लेखन : कविता से शुरुआत , कहीं पर भी पहली बार प्रकाशित हो रही हैं

लिखना छुपाया नहीं जा सकता . यह प्रेम की तरह है. अदिति की कविताएँ मेरे सामने आईं. पढ़कर खुशी हुई. बिना किसी ख़ास मुहावरे से प्रभावित इनकी कविताएँ सच्ची भावनाओं और विचार का सुन्दर संवाद हैं. एक दृष्टि, निर्णयबोध तथा प्रतिरोध यहाँ साफ देखा जा सकता है. मैं कविता की दुनिया में अदिति का जोरदार स्वागत करता हूँ. वह खूब खूब लिखे पढ़े और दुनिया को और सुन्दर बनाने में योगदान दे. 

प्रस्तुत हैं इनकी चार कविताएँ -




भाषण

मंच पर खड़ा हो नेता देते है भाषण
खूब पीटी जाती हैं तालियाँ
साठ साल के युवा इन्ही के कारण युवा हैं
पन्द्रह बीस साल के युवा इन्ही के कारण बूढ़े हैं
पर कट्टर समर्थक व प्रशंसक हैं

वे आते हैं आगे
पीछे धकेले जाने के लिए
फिर वक्ता बोलता है
चुप करवाने के लिए
छीनने के लिए उनके कुछ शब्द
उनके जिन्दा रहने तक
जैसे कपड़ा मकान आसमान अधिकार आदि आदि ...

यूँ ही
क्रम चलता रहता है
एक बोलता है
तो दूसरा चुप हो जाता है
दोनों परम्परा निभा रहे हैं
यह परम्परा टूटनी चाहिए ...




घाव और बड़ा आदमी

कोहनी पर भिनभिनाती मक्खियाँ
नाक भौं सिकोड़ता बड़ा आदमी ...

उसके घाव और बड़े आदमी में समानता है
दोनों उसे खत्म कर रहे हैं .




मैं


सदियों से घिसी जाती रही औरत
अपने अस्तित्व के लिए
मर्यादा और कर्त्तव्य  के सिलबट्टे पर
शायद मैं भी घिसी जाऊँगी
चन्दन हो जाऊँगी

ईंट ईंट जुड़ती
खड़े होते झूठी शान के महल
शायद बनाकर कोई वस्तु मात्र
उसमें मैं भी रखी जाऊँगी
झाड़न हो जाऊँगी

हर दूसरे पल
चुपके से निकलता जाता जीवन
कहा जाएगा मुझे भी अगर
आँखों में सीलन लिए मुस्कराने को
फूल बन जाऊँगी

घोंट कर गला इच्छाओं का
रहना जो पड़े
रहूंगी
रोशनी की ज़रुरत जो पड़े
दीप बन जाऊँगी
.....

पर कहो कि आत्मा को बेच दो
अपनी ही चोंच से अपने पंखों को नोच दो
सोच से आसमान निकाल दो
कागज कलम को छोड़ दो
फिर तो मैं लडूंगी
सुई को छोड़कर
तलवार ही बनूँगी .





कौन

आधुनिक दिखने को आतुर
ग्राहकों से भरी कस्बाई फास्ट फूड की दूकान पर
वो कच्ची उम्र का लड़का
जो पक्क रहा हर मौसम में
रोटी के लिए
कर रहा नीलाम अपना करोड़ों का जीवन
उर्जा से भरपूर
या मालिक के डर से
वो दौड़ दौड़ कर पहुँचा रहा आर्डर
कर रहा टेबुल साफ़
जूठे बर्तन उठा रहा
फिर से चमका रहा
फिर से उठा रहा
फिर चमका रहा ...

पर उसके भविष्य को धुंधलाने वाला कौन
उसे इस दलदल में धंसाने वाला कौन ???



सम्पर्क :
गाँव व डाक - सुपवाल
जिला व तहसील - साम्बा
जम्मू व कश्मीर ( १८४१२१ )





प्रस्तुति :- 
 
कमल जीत चौधरी
काली बड़ी , साम्बा { जे० & के० }
दूरभाष - ०९४१९२७४४०३

ई मेल - kamal.j.choudhary@gmail.com

(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)

Thursday, January 8, 2015

डा. राजकुमार


डा. राजकुमार जम्मू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अवकाश प्राप्त प्रोफैसर एवं पूर्व अध्यक्ष हैं। देश विदेश  में संगोठियों में शोध पत्र पढ़ते रहे हैं। मौजूदा समय में जम्मू विश्वविद्यालय से मान्यता प्राप्त बीएड कालेज के प्रिंसिपल हैं। डा. राजकुमार की सात समीक्षा पुस्तकें इनके विस्तृत अध्ययन और गहन चिंतन का परिचय देती हैं। कविता और कहानी के साथ साथ मिथकीय लेखन में विशेष रूचि है। डा. राजकुमार को कहानी और समीक्षा के क्षेत्र में राज्य सरकार और केंद्र से पुरस्कार मिल चुके हैं और इनकी कविता और कहानी पर शोध कार्य हो चुके हैं। 

डा. राजकुमार की प्रकाशित पुस्तकें हैंः

कविता संग्रहः इस भूमंडल पर, सांप मेरे साथी हैं, इक्कीसवीं शताब्दी के नाम, खून का रंग तो है
कहानी संग्रहः खुले हाथ, जाल, वेटिंग रूम, अमलतास के फूल
समीक्षाः मिथक और आधुनिक कविता, नयी कविता में मिथक, कविता एक संदर्भ और परख, कविता में सांस्कृतिक चेतना, शिवालिक क्षेत्र में हिंदी कविता का उद्भव और विकास, जम्मू कश्मीर  का स्वातंोत्तर हिंदी साहित्यः एक विवेचन, कविताः स्वभाव और समीक्षा 

शुभकामनाओं सहित उनका हार्दिक आभार कि उन्होंने ये कविताएँ उपलब्ध करवाई

(प्रस्तुत कविताएं हाल ही  में विमोचित उनके कविता संग्रह 'खून का रंग तो है' से ली गई हैं)





लोहा लोहा होता तो

पक्का होता तो 
गीली हवा से न डरता
लोहा
लोहा होता तो

जंग से न मरता


भोर अरुणाई

सूरज से
भोर
अरुणाई

पवित्रता
रात की

सूरज से
शरमाई!



कोमल क्या बचा है

पड़ी रहने दो
आंखों पर पट्टी

हटा कर
क्या पाओगी

कोमल क्या बचा है

किसे पत्थर बनाओगी



भारत में नेता

दांव लगे
देता धत्ता
दांव पड़े
हथियाए  सत्ता

बुरे वक्त में
गोल्ला
बेग़म का
दांव पड़े तो
हुक्म का पत्ता

ढंकी
आंख ले
बैल सरीखा
एक लीक पर
नहीं घूमता 
भारत में नेता


बेकारी

बच्चे की उंगलियां

रेत पर
बना रहीं
गोल  गोल रोटियां

बेकार पिता
अपाहिज हुआ सा
देख रहा

बच्चा
रेत पर बिसूरता!


भोपाल

बरसों पहले
लीक हुआ
भोपाल

बरसों बीते
न टांक सकी
कोई चौपाल


क्यों लिखूं कविता

क्यों लिखूं कविता
जब
थूथन पर लगा हो
लहू आदमी का
जब वीरांगना-सी लड़ रही बलात्कृता
कोख में ले
बीज़ दुष्ट का
जब चाॅक पर कलेजा काली का
मंच पर गोरी
चमक रही
चिट्टी ट्यूब लाईट-सी
पर नीग्रो खंबे पर टंगा
और रात बेवा रो रही

कुछ भी तो सही नहीं
क्यों लिखूं कविता
क्या करूं कविता का
जो मूल से उखड़ रही!


संपर्क : 
128-लाजपत नगर, गली नंबर 1
कनाल रोड, जम्मू 
मोबाइल : 0-94-192-53-44-7


(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)



Thursday, December 25, 2014

शायक आलोक


शायक आलोक कैमरे से कविताई और कविताई से जीवन के विविध रंग देखते हैं.वे युवा हिन्दी कविता के सशक्त हस्ताक्षर हैं. इनकी कविता कोरी भावुकता, खोखले राजनीतिक नारों और कवि होने के प्रयास से मुक्त सिर्फ और सिर्फ कविता है. सघन संवेदना, मौलिकता और सहजता ही इनकी पहचान है. इसी को इनका एक बड़ा पाठक वर्ग पसन्द करता है . आप भी पढ़ें और अपनी राय रखें. शायक आलोक को धन्यवाद व शुभकामनाओं सहित प्रस्तुत हैं उनकी तीन कविताएँ -




सर्दी और एक ट्रेन यात्रा

1.
[ ट्रेन की खिड़की से बाहर झांकते हुए ]

मुझे ठण्ड लग रही है
और मेरी उँगलियाँ सर्द हो गयी हैं
कल की ही तरह
आज भी
घिर आई है शाम
और मेरे हिस्से का आकाश
सिकुड़ता जा रहा है..
कुहासे की पतली चादर
चीरती महानंदा एक्सप्रेस
जब भी सिहरती है
चरवाहे बच्चे तालियाँ बजाते हैं
घर को लौट जाओ बच्चों
गोबर का बोरसी सुलगाये
इन्तजार में होगी माँ....


2.
[लेमनचूस वाला बच्चा]

उसे घर नहीं लौटना
किसी जल्दबाजी में नहीं है
गोती बांधे किसी मंगोल सेनानायक सा दिखता है वह
खिड़की से अभी अभी टकराई सर्द हवा
उसे थर्रा गयी है
लेमन्चुस्स्स्सस्स्स्स...
लेमनचूस बेचने वाले बच्चे की आवाज़ सर्द हो गयी है
अपनी महँगी जैकेट में
थोडा और सिकुड़ आया हूँ मैं
मुझे घर की याद आ रही है
क्या उसे नहीं आती ?


3.
[बोरियत और किर्र किर्र ]

मैं इन्तजार में हूँ ..
अभी अभी गुजरा है
भूले बिसरे गीत गाने वाला भिखारी
मेरे चेहरे पर जमी सर्दी की तरह
जमे हुए हैं चाय वाले
पिछले डब्बे की मछली रोटी की गंध
मेरे डब्बे तक आ रही है
आधी गंजी पर दुपट्टा डाली नेपाली लड़की
पांच बार थूककर सो गयी है
सनपापरी वाला नौगछिया में उतर गया
मेरी खिड़की से उलटी दिशा में भागते पेड़
अब भी भाग रहे हैं
..वह अब तक नहीं आई
मैं इंतजार में हूँ ...
उबासी में खुद से ही पूछा है मैंने
क्या सर्दियों में नहीं बिकता
किर्र किर्र वाला खिलौना ?


4.
[लौट आना घर को ]

सुबह के ३ बजे भी रिक्शा चलता है
मेरी ही तरह साढ़े पांच फुट का एक इंसान चलाता है उसे
मेरी ही तरह उसकी आँखें लाल होती हैं
उसकी भी एक मोटी चादर होती है
वह भी मनमोहन और अन्ना को जानता है
उसे भी बुर्जुआ सर्वहारा का मार्क्स संघर्ष पता होता है
उसे भी मेरी ही तरह ठण्ड लगती है
मेरी ही भाषा भी बोलता है वो
......
अपने गर्म बिस्तर में घुस आया हूँ मैं
वह अब भी सड़क पर है ..





मरे हुए बच्चे

मैं तुम्हारी ही उम्र का हूँ
तुम मेरी भाषा समझ सकते हो
मेरे साथ खेल भी सकते हो
तुम अपनी गेंद मेरी ओर उछालोगे
और मैं उसे वापस तुम्हारी ओर फेंक दूंगा
हम देर तक यूँ खेल सकते हैं
अब मुझे स्कूल जाने की जल्दी नहीं होती
मैं पेशावर का मृतक बच्चा हूँ
मैं अपनी कब्र में लेटा रहता हूँ
मैं तुम्हें ख़त लिख रहा हूँ क्योंकि
मेरे बाकी सब दोस्त भी मेरे साथ कब्र में लेटे हैं
और हमें खेल के लिए जिंदा बच्चे चाहिए
जवाबी ख़त मिला
जिस दिन तुम मरे
उस दिन से नहीं लौटे हैं पिता मेरे
लिया गया उनसे मौत का बदला
मैं गेंद जेब में लिए यहाँ छुपा बैठा हूँ
कब्र सी ठंडक, अँधेरा है यहाँ
और अम्मी कहती है
डूब गया है हमारी धरती का सूरज
कि यह खेल अब बंद होना चाहिए.


द प्रपोजल

उसने शादी के लिए नहीं पूछा
नहीं बैठा घुटने के बल और
नहीं निकाल लाया हीरे जड़ी अंगूठी
नहीं कहा उसने कि कि रखूँगा संभाल कर
तुम्हारा दिल
उम्र भर मेरे शहद भरे अंतरात्मा के भीतर
कुछ नहीं बुदबुदाया
चिल्ला कर कहा भी नहीं कि
करता हूँ तुम्हें जहाँ भर का प्रेम
उसने नहीं कहा हिंदी फ़िल्मी तर्ज पर कि
चलो मेरी माँ चाय के बहाने देखेगी तुम्हें
उसने इधर उधर देखा
आसमान से लिए शब्द उधार
या अपने ही कलेजे को खंगाल कुछ हर्फ़ जुटाये
और जितना बेतरतीब था वह उतने ही सलीके से
कहा उसने उसे है अब खुद की जगह की तलाश
कि उसे चाहिए अब अपना एक घर
जिसमें हो वाकई एक अदद रसोई भी
और लड़की ने मुस्कुराकर 'हाँ' कह दिया.



शायक आलोक इतिहास व मनोविज्ञान के छात्र रहे हैं. कस्बाई पत्रकारिता से जुड़े रहे. उनकी कविताएं कहानियां कुछ प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
सम्प्रति :- दिल्ली में रहकर स्वतंत्र लेखन व फोटोग्राफी करते हैं. आजीविका के लिए अनुवाद का कार्य करते हैं.
दूरभाष :- 85270-36706 
ई मेल :- shayak.alok.journo@gmail.com



प्रस्तुति :- 
 
कमल जीत चौधरी
काली बड़ी , साम्बा { जे० & के० }
दूरभाष - ०९४१९२७४४०३

ई मेल - kamal.j.choudhary@gmail.com

(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)

Friday, November 21, 2014

तस्लीमा नसरीन

कहां ले जाएगी यह कट्टरता


बांग्लादेश के पूर्व डाक और दूरसंचार मंत्री अब्दुल लतीफ सिद्दीकी ने पिछले दिनों कहा कि वह हज और तबलीगी जमात के विरोधी हैं। इस तरह की टिप्पणी के बाद स्वाभाविक ही उनका मंत्री पद चला गया है। उनके खिलाफ बांग्लादेश की सड़कों पर कट्टरवादियों के जुलूस निकले हैं। उनकी फांसी की मांग की गई है, और उनका सिर कलम करने की कीमत पांच लाख टाका रखी गई है। सिद्दीकी की लानत-मलामत करने में बांग्लादेश की राजनीतिक पार्टियां भी पीछे नहीं हैं। वे कह रही हैं कि लतीफ सिद्दीकी को बांग्लादेश में घुसने नहीं दिया जाएगा। वहां का मीडिया भी उन्हें निशाना बना रहा है।
बांग्लादेश की नब्बे फीसदी आबादी मुस्लिम है। इनमें से ज्यादातर का मानना है कि लतीफ सिद्दीकी ने मुसलमानों की धार्मिक भावना को चोट पहुंचाई है। किसी व्यक्ति को ऐसी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए थी, जिससे किसी की भावनाओं को चोट पहुंचे। मंत्री पद पर होते हुए तो व्यक्ति से और भी संवेदनशीलता की उम्मीद की जाती है। पर उनके खिलाफ सड़कों पर अचानक जो भीड़ उमड़ आई, उसके बारे में क्या कहें, उसे किस तरह जायज ठहराएं? मुस्लिम कट्टरवादी पत्थर मारकर महिलाओं की हत्या कर दे रहे हैं। एक वार में लोगों का सिर धड़ से अलग कर दे रहे हैं, और उसे दुनिया भर में लाइव दिखा भी रहे हैं। ट्राउजर पहनने के जुर्म में लड़कियों पर कोड़े बरसाए जा रहे हैं। कार चलाने के जुर्म में महिलाओं को पीटा और दंडित किया जा रहा है। पूरी दुनिया के लोग इस बर्बरता के साक्षी हैं। एक समय पूरे विश्व में इस किस्म की बर्बरताएं थीं। पर कमोबेश सभी जगह इन्हें गैरकानूनी घोषित किया गया है।
कोई माने या न माने, लेकिन सच यह है कि पिछले दो दशकों में कट्टरवादियों और आतंकवादी संगठनों की संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ गई है। तालिबान, अल कायदा, लश्कर-ए-तैयबा के बाद बोको हराम और आईएस जैसे अनेक छोटे-बड़े आतंकी संगठनों ने अपनी जड़ें जमाई हैं। ये संगठन पूरी दुनिया को दारूल इस्लाम बनाने का ख्वाब पाले हुए हैं। इस दारूल इस्लाम में सिर्फ मुसलमान रहेंगे, दूसरे मजहबों को मानने वालों के लिए इसमें जगह नहीं होगी! प्यू रिसर्च की ताजा रिपोर्ट बता रही है कि दुनिया के अधिकांश मुसलमान शरिया कानून चाह रहे हैं। आज पूरी दुनिया में मुस्लिमों के प्रति एक अजीब किस्म की धारणा बन रही है। मुसलमानों के साथ दोस्ती करने, उन्हें नौकरी देने, उन्हें कारोबार में भागीदार बनाने या उनके साथ सामाजिक रिश्ते रखने के मामले में एक किस्म की हिचक देखी जा रही है। पूरे विश्व में मुस्लिम समुदाय के प्रति अविश्वास जन्म ले रहा है। चूंकि पश्चिमी देशों में मानवाधिकार कानून सख्त हैं, इसलिए मुसलमान वहां अपने रीति-रिवाजों का पालन करते हुए भी रह पा रहे हैं। मानवाधिकार कानूनों का यह सहारा नहीं होता, तो पश्चिम में मुस्लिम समाज का क्या हश्र होता, इसकी सिर्फ कल्पना की जा सकती है।


यदि मनुष्य को अभिव्यक्ति का अधिकार न मिले, तो लोकतंत्र का अर्थ नहीं है। और समाज को बदलने के लिए लोगों की सोच और भावनाओं को भी कई बार निशाना बनाना पड़ता है। राष्ट्र से धर्म को अलग करने और महिला-विरोधी कानूनों को खत्म करने के क्रम में भी लोगों और संस्थाओं की सोच पर चोट करने की जरूरत पड़ती है। बल्कि इतिहास के आईने में देखें, तो समाज के हित में उठाए गए ज्यादातर कदम धर्म को निशाना बनाने के बाद ही संभव हुए। यूरोप में धर्म का वर्चस्व खत्म करते समय भी कई लोगों की धार्मिक भावनाओं को आघात लगा था। गैलीलियो की स्थापनाओं और डार्विन के निष्कर्षों ने भी धार्मिक भावनाओं को आहत किया था। विज्ञान ने तो अंधविश्वासों को लगातार आघात पहुंचाया है। पर यदि हम समाज के आहत होने की चिंता कर अभिव्यक्ति पर रोक लगा दें, विज्ञान के आविष्कार और उसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाकर सभ्यता के पहिये को रोक दें, तो हमारा समाज बंद तालाब जैसा हो जाएगा।
मजहबी कट्टरता आज बांग्लादेश में खूब फल-फूल रही है। कट्टरवादियों की इसमें पौ बारह हैं। जब-जब वे सड़कों पर उतरकर किसी की फांसी की मांग करते हैं, कुछ लोगों की संपत्ति और घर नष्ट करने की शुरुआत करते हैं, तब-तब सरकार उनका पक्ष लेकर भिन्न धर्मावलंबियों का उत्पीड़न शुरू करती है। ऐसा करके जहां कट्टरवादियों के हाथ मजबूत किए जाते हैं, वहीं समाज को दशकों पीछे धकेल देने का काम किया जाता है। मेरे मामले में भी सरकार ने तब यही किया था। अगर तत्कालीन खालिदा जिया सरकार तब कट्टरवादियों का पक्ष नहीं लेती, तो उनका दुस्साहस आज इतना नहीं बढ़ता, और मैं भी अपने वतन में रह पाती। बांग्लादेश की मजहबी कट्टरता के लिए सिर्फ मौलवी नहीं, सरकारें भी जिम्मेदार हैं। अगर प्रधानमंत्री शेख हसीना ने लतीफ सिद्दीकी को बर्खास्त नहीं किया होता, तो वह वतन लौट सकते थे। लोगों का गुस्सा भी धीरे-धीरे ठंडा हो ही जाता। तब मजहबी कट्टरवादियों को भी यह एहसास होता कि शेख हसीना के दौर में उन्हें अपनी मर्जी के मुताबिक चलने की छूट नहीं मिल सकती। इससे बाहर भी बेहतर संदेश जाता।
लतीफ सिद्दीकी के बारे में मुझे किसी ने अच्छी बात नहीं बताई। हो सकता है, वह अच्छे आदमी नहीं हों। यह भी हो सकता है कि सरकार में रहते हुए उन्होंने अच्छा काम नहीं किया हो। हालांकि सत्ता से बाहर होने पर किसी की छवि खराब करने में भला कितना समय लगता है! इसके बावजूद लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल कर उन्होंने गलती नहीं की थी। उनकी टिप्पणी से असहमति थी, तो उसे अभिव्यक्त करने का भी लोकतांत्रिक तरीका है। लेकिन उसका इस्तेमाल न कर उनकी फांसी की मांग करने या उनके सिर की बोली लगाने का इस आधुनिक सभ्य युग में क्या कोई औचित्य है?
लतीफ सिद्दीकी की टिप्पणी से यदि असहमति थी, तो उसे अभिव्यक्त करने का लोकतांत्रिक तरीका है। मगर उसका इस्तेमाल न कर उनकी फांसी की मांग करने या उनके सिर की बोली लगाने का आधुनिक युग में क्या औचित्य है?

(अमर उजाला से साभार)

(चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)

Wednesday, October 22, 2014

नील कमल


जन्म :- १५ अगस्त १९६८ को वाराणसी के भलेहटा गाँव में
शिक्षा :- गोरखपुर वि० वि० से प्राणी विज्ञान में परास्नातक
संग्रह :- हाथ सुन्दर लगते हैं , यह पेड़ों के कपड़े बदलने का समय है
अन्य :- महत्वपूर्ण ब्लॉग ' बीच बहस में कविता ' का संचालन करते हैं, महत्वपूर्ण ब्लॉगों और पत्र - पत्रिकाओं में कविताएँ कहानियाँ और आलेख प्रकाशित होते रहते हैं

बहुत ज़रूरी युवा कवि नील कमल को मैं केवल उनकी कविताओं से जानता हूँ .ऐसा जानना आज बहुत ज़रूरी है . कम ही लोग ऐसा जानना चाहते हैं . साहित्यिक मठाधीशों और चमचावाद को ठेंगा दिखाने वाले नील कमल की कविताओं पर दस्तख़त कर सकते हैं . उनको जान भी सकते हैं . वे प्रतिबद्ध और परिपक्व हैं .इनके यहाँ कला जीवन के लिए और कला कला के लिए, दोनों सिद्धांतों में क्रमशः ईमानदारी और मौलिकता हैं . इनकी कविताएँ विचार को जनेऊ की तरह धारण नहीं करती . वे जानते हैं कि कविता की रचना प्रक्रिया के बहाने सुन्दर दुनिया को कैसे दिखाया जा सकता है . सपना यही से शुरू होता है .जो बदलाव की पहली शर्त है . गुलेल को खतरनाक और निर्दोष बताने वाली दृष्टि साँड को भी नया सौन्दर्य देती है . ऋत्विज प्रकाशन से प्रकाशित उनके काव्यसंग्रह ' यह पेड़ों के कपड़े बदलने का समय है ' की दस्तक सीधे पाठकों के दिलों पर पड़ी है . इसके लिए उनको हार्दिक बधाई . पूरे संग्रह पर फिर कभी ... फिलहाल आभार सहित यहाँ प्रस्तुत हैं उनकी कुछ कविताएँ -




गोदना

सबसे महफूज पनाहगाह
हूँ मैं
बोलती है एक स्त्री की त्वचा
गोदना गुदवाते हुए

दुनिया के तमाम मर्द
जब कहीं नहीं पाते ठौर
तो शरण पाते हैं मुझमें

और जोर देकर कहती है
जो दमक रहा है
मेरी त्वचा के भीतर
उसे सिर्फ काली सियाही
न समझा जाए .



सुना आपने

कभी आप विचार को
जनेऊ की तरह धारण करते हैं

कभी आप जनेऊ को
विचार की तरह धारण करते हैं

दोनों ही स्थितियों में सुविधानुसार
विचार को कान पर टाँग लेने की सुविधा है
कविता की दुनिया में बस यही सुविधा नहीं है

फिलहाल
कविता के कान पर
टंगा हुआ है एक धागा
ख़ता मुआफ़ हो मेरे दोस्तो
आप जो बनते हैं कविता के हिमायती
सबसे ज्यादा साँसत में कविता की जान
आप से .. हाँ आप ही से है ..सुना आपने ?



माचिस

मेरे पास एक
माचिस की डिबिया है
माचिस की डिबिया में कविता नहीं है

माचिस की डिबिया में तीलियाँ हैं
माचिस की तीलियों में कविता नहीं है

तीलियों की नोक पर है रत्ती भर बारूद
रत्ती भर बारूद में भी नहीं है कविता

आप तो जानते ही हैं कि बारूद की जुड़वा पट्टियाँ
माचिस की डिबिया के दाहिने - बाँए सोई हुई हैं गहरी नींद
ध्यान से देखिये इस माचिस की डिबिया को
एक बारूद जगाता है दूसरे बारूद को कितने प्यार से
इस प्यार वाली रगड़ में है कविता.



गुलेल

यह
रोमन लिपि का
पच्चीसवाँ वर्ण है
हिन्दी की हथेली में कसा हुआ

दो उँगलियों  के
फैलाव में बना वह
विजय सूचक चिन्ह है
जिसे संसद की हर बहस के बाद
दिखाते हैं जनप्रतिनिधि

एक खिंची हुई प्रत्यंचा हैं
एक कसा हुआ विवेक
चुटकी में कसमसाता

एक गोली बराबर पत्थर
तना हुआ किसी एक आँख
किसी एक सर पर

सिर्फ गोपियों की मटकी
ही नहीं फोड़ती है गुलेल
वह तोड़ती है पेड़ पर पका
सबसे मीठा आम ..

कितनी खतरनाक है गुलेल
फिर भी कितनी  निर्दोष .

  





साँड

उसे
सचमुच नहीं
मालूम , कि यह
है शांत हरा रंग , और
वह लाल रंग भड़कीला

उसे दोनों का फर्क तक
नहीं पता , यकीन जानिए

वह निर्दोष बछड़ा है
किसी निर्दोष गाय का
जिसके हिस्से का दूध
पिया दूसरों ने हमेशा

वह बचता बचाता
आ गया है सभ्यता के
स्वार्थलोलुप चारागाह से
जहां बधिया कर दिए गए तमाम
बछड़े , खेतों में जोते जाने के लिए ,
उन्हें पालतू मवेशी में बदल दिया गया

साँड को बख्श दीजिए
अफ़वाहें न फैलाइए कि
भड़क जाता है वह लाल रंग देखकर

यह कैसा भाषा - संस्कार है आप का
कि जिसमें बैल कहलाए , जो पालतू हुए , और
जिन्हें पालतू नहीं बना सके आप , वे साँड कहलाए .


सम्पर्क :-
२४४ , बाँसद्रोणी प्लेस
कोलकाता - ७०००७०
दूरभाष - ०९४३३१२३३७९
ई मेल - neel.kamal1710@gmail




प्रस्तुति :- 
 
कमल जीत चौधरी
काली बड़ी , साम्बा { जे० & के० }
दूरभाष - ०९४१९२७४४०३

ई मेल - kamal.j.choudhary@gmail.com

(सभी चित्र गूगल की मदद से विभिन्न साइट्स से साभार लिए गए हैं)